मैं और मेरा ड्राईवर …

सेर को सवा सेर तो सुना होगा लेकिन किसी का ड्राईवर होना भी एक मान की बात कैसे हो सकती है पढ़िए एक वैज्ञानिक से जुड़े इस रोचक संस्मरण में

जीवन की राहों में कई पल ऐसे आते हैं जब बचपन में भोगा, सहा, पढ़ा, समझा गया कुछ एकाएक ही अवचेतन मस्तिष्क से निकल कर वास्तविकता में अपने आप को प्रकट कर दे, साकार कर दे  फिर चाहे वो शब्दों के रूप में बाहर आये या व्यवहार में दिखे.

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ.

नौकरी करते कई वर्ष हो चुके थे जब एक सहयोगी मेरी टीम में जुड़े. अपने काम पर अच्छी पकड़  तो थी, साथ साथ दुनिया भर के सम-सामायिक विषयों और राजनैतिक उठा-पटक पर भी अच्छी खासी नजर रखते. सारे अखबार देखना, टीवी समाचारों से अवगत रहना उन्हें खूब भाता.

रोज ही किसी ना किसी बात पर हमारा अच्छा खासा विमर्श हो ही जाता. इन सबसे निर्लिप्त बाकी सहयोगी हमारी बातें सुनते खिसियाये से हाँ हूँ करते लेकिन सक्रिय भागीदारी से परहेज करते.

दुनिया भर की हलचल पर ऐसे कई मौके आये जब मैं कोई पुरानी बात भूल जाता तो उन्हें फोन कर संदर्भ बताते ही संक्षिप्त जानकारी तुरंत ही मिल जाती. ऐसा गजब का खजाना कि वाह वाह!

एक बार ऐसे ही मित्र मंडली में किसी राजनैतिक मुद्दे पर गरमागरम बहस चल रही थी कि मित्र राजेश चौहान ने गुटनिरपेक्ष सम्मलेन की अध्यक्षता से संबंधित फिदेल कास्त्रों और इंदिरा गांधी की मुलाक़ात पर एक सवाल पूछ लिया. खुद को तो हम वैसे तोप मानते थे लेकिन उस सवाल से अंदर ही अंदर सकपका गया.

अब क्या किया जाए? पलक झपकते ही मैंने ऊंगली उठाई कि क्या फालतू के सवाल से टाइम ख़राब करते हो ? इसका जवाब तो मेरा ड्राईवर ही दे देगा! कुछ और बात करो! उस वक्त ऊंगली की दिशा उन्हीं जागरूक सहयोगी की ओर थी जिनका नाम है तोप सिंह वर्मा.

एकाएक सन्नाटा छा गया. फिदेल कास्त्रों एक तरफ रह गये. बेमतलब ही किसी को ड्राईवर कह देना समझ ना आया दोस्तों को. तब तक मैं भी संभल चुका था कि गड़बड़ हो गई है यूं ही किसी को ड्राईवर बोल कर, अचानक ही कुछ गलत बोल बैठा हूँ.

एक जोरदार ठहाका लगाते हुए मैंने दोहराया ‘हाँ! मेरा ड्राईवर ही तो है ये तोप सिंह’.

फिर भी किसी की हिम्मत ना हुई कि अपनी नाराजगी जाहिर करे. तब मैंने वह कहानी सुनाई जो कभी बचपन में पढी थी.  अब ये कहानी सच्ची है या झूठी, पता नहीं.

ड्राईवर

हुआ यूं कि जब अल्बर्ट आइंस्टीन सापेक्षता का सिद्धांत बता कर सारी दुनिया में अपना लोहा मनवा चुके तब उन्हें हर यूनिवर्सिटी, हर संस्था से व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाने लगा. धुआंधार तरीके से वह मशहूर वैज्ञानिक एक शहर से दूसरे शहर जाता, लेक्चर दे कर, सवालों के उत्तर दे कर किसी दूसरी जगह के लिए तैयार हो जाता. उन दिनों भी वे कार के मालिक थे और एक ड्राईवर रखा हुआ था. नाम था हैरी.

जब आइंस्टीन मंच पर अपना लेक्चर देते रहते तो वह ड्राईवर एक किनारे बैठा रहता. उनकी एक एक बात उसके कानों में पड़ती रहती. लेक्चर ख़त्म होता, लोग दो-चार सवाल पूछते आइंस्टीन महोदय से और उस दिन का काम ख़तम.

एक दिन जब वे घर से रवाना हुए तो सर आइंस्टीन ने अपने आप को थका हुआ सा महसूस किया. उन्होंने ड्राईवर को पुकारा -हैरी! आज कुछ ठीक नहीं लग रहा मुझे. मन नहीं है लेक्चर का. कुछ आराम करना चाहता हूँ. एक काम करो, तुम मेरे कपड़े पहन लो मैं तुम्हारी यूनिफार्म पहन लेता हूँ. वहां कोई भी तो मुझे पहचानता नहीं. तुम आइंस्टीन बन कर लेक्चर दे देना. अब तुम इतना कुछ तो समझ चुके हो कि एक ही विषय पर क्या लेक्चर देना है कैसे बोलना है सवालों के जवाब क्या क्या होते हैं. तब तक मैं पीछे किसी सीट पर एक नींद मार लूंगा, आराम कर लूंगा.

ड्राईवर ने सहमति में सर हिलाया. दोनों ने कपडे बदल लिए. वह मशहूर वैज्ञानिक आइंस्टीन, ड्राईवर बन कार चलाने लगे और असल ड्राईवर -हैरी, ठाठ से पिछली सीट पर बैठा रहा.

सभा स्थल पर सूट-बूट धारी हैरी को पलकों पर बिठा कर मंच तक पहुंचाया गया, दर्शकों से परिचय करवाया गया. और फिर हैरी ने दे दनादन सापेक्षता के सिद्धांत पर धाराप्रवाह लेक्चर देना शुरू कर किया.

इधर असल आइंस्टीन पीछे की कुर्सियों पर खर्राटे भरने लगे. उनकी नींद तब टूटी जब व्याख्यान ख़तम होने पर तालियों की गडगडाहट से हॉल गूँज उठा. इधर मंच से हैरी उतर रहा था उधर आइंस्टीन महोदय अंगडाई लेते उठ खड़े हुए कार की ओर जाने के लिए.

लेकिन मंच से उतरते ही हैरी को घेर लिया एक ऐसे विद्यार्थी ने जो अपने दोस्त से शर्त लगा कर आया था कि आज आइंस्टीन सर को ऐसा सवाल पूछूंगा कि वे चकरा जायेंगे. हुआ भी वही. जैसे ही उस विद्यार्थी ने मंच से उतरे हैरी से वह कठिन सवाल पूछा, वह आइंस्टीन बना ड्राईवर सकपका गया.

लेकिन हैरी ने पलक झपकते ही अपनी खीज दिखाई कि क्या फालतू के सवाल से टाइम ख़राब करते हो ? इसका जवाब तो मेरा ड्राईवर ही दे देगा!. उसने इशारा किया ड्राईवर की पोशाक पहने आइंस्टीन की ओर.

… और फिर उस ड्राईवर बने असल अल्बर्ट आइंस्टीन  ने उस कठिन सवाल का जवाब दिया मंच पर जा कर.

उस दिन मित्र मंडली में साकार हो उठी यही वह कहानी थी जो मेरे दिमाग में कहीं छिपी बैठी रही होगी. इस किस्से को सुनते ही वहां ठहाके गूंजने लगे थे. तब से कहीं भी तोप सिंह जी का उल्लेख होता है तो आपस में उसे ड्राईवर ही कह पुकारते हैं हम लोग.

कभी आमने सामने भी हों तो बड़े विनीत भाव से हाथ जोड़ वह मुस्कुराते हैं कि मेरा अहोभाग्य जो आप ड्राईवर मानते हो मुझे.

आपके जीवन में भी ऐसा कोई ‘ड्राईवर’ तो जरूर होगा?

मैं और मेरा ड्राईवर …
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