तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी, हैरान हूँ मैं

25 मई 1986 की उस आधी रात मैं अकेला उस सुनसान लॉबी में धड़कते दिल के साथ दीवार से सट कर खड़ा था जिसमे एक ऑपरेशन थियेटर के भीतर हमारे अंश से पनपी नई जिंदगियां

25 मई 1986 की उस आधी रात को मैं अकेला, उस सुनसान लॉबी में धड़कते दिल के साथ दीवार से सट कर खड़ा था जिसमे एक ऑपरेशन थियेटर के भीतर हमारे अंश से पनपी नई जिंदगियों को इस दुनिया में लाये जाने की डॉक्टरी कोशिश शुरू हो चुकी थी.

घड़ी के कांटे जब एक साथ हुए तो तारीख बदल कर हो गई 26 मई. अजीब सा तनाव हावी होते जा रहा था कि एकाएक दरवाज़ा खुला. मुस्कुराते चेहरे पर हरा मास्क लटकाए, डॉक्टरी दस्ताने पहने हाथों में सफ़ेद इनेमल की ट्रे लिए उस नर्स ने पुकारा तो नज़दीक पहुंचते ही नज़र पड़ी. हिलते डुलते दो नन्हों पर. कलाईयों में थे पहचान के टैग.

नर्स ने मुस्कुराते हुए कहा एक बाबा है, एक बेबी. मारे खुशी के मेरी आँखों में आँसू आ गए. छू कर देखने के आग्रह के बावजूद, नवजातों को कोई संक्रमण न हो जाए इस डर के कारण, हाथ बढ़ते बढ़ते रूक गया. मेरा अंश, नाजुक से छोटे छोटे आकारों में कुलबुला रहा था और मैं हैरानगी भरी डबडबाई आँखों से उन्हें देखे जा रहा था

Twin -Ranjeet, Gurupreet with Grand Motherमेरी माँ की खुशियों का ठिकाना ना था. ईश्वर ने उसकी झोली जो भर दी थी. 16 वर्ष की आयु में मेरे छोटे भाई की असामयिक मृत्यु के तुरंत बाद, बड़ी मुश्किल से तो उसने मुझे 23 वर्ष की कच्ची उम्र में ही विवाह के लिए मना लिया था भावनात्मक जोर डाल कर और फिर पोते की चाहत भी बता दी. अपना आँचल फैला कर उसके लालन-पालन की ज़िम्मेदारी भी ज़ाहिर कर दी.

मैंने भी अपना कठोर निर्णय सुना दिया कि संतान पहली और आखिरी होगी. फिर भले ही वह बेटी हो या बेटा. माँ ने यह भी मंज़ूर कर लिया. लेकिन शायद उस ‘सुपर प्रोग्रामर’ ईश्वर को मेरा यह अंदाज़ पसंद नहीं आया. उसने हमारे परिवार को दोहरी खुशी दे दी. जुड़वाँ के रूप में एक बेटा एक बेटी. मैं नाराज़ नहीं, हैरान था कुदरत के फैसले पर.

चार माह के दुधमुंहे गुरुप्रीत को माँ ले गई और अपना सारा लाड़ प्यार उड़ेलने लगी. हम 15 -20 दिनों में 100 किलोमीटर दूर एकाध बार जा आते. माँ-पिता जी कभी गुरुप्रीत को ले आते कभी हम बिटिया, रंजीत को छोड़ आते.

चार वर्ष बीत चुके थे. एक दिन जब पिता जी को अकेले ही आए हुए देखा तो मेरा माथा ठनका कि कुछ गड़बड़ तो है. रहस्य तब खुला जब उनका धीमे स्वर में आदेश आया ‘गुरूप्रीत को अपने पास ले आओ’ मैं चौंका -अरे! क्या हुआ? ज़वाब मिला कि तुम्हारी माँ के हद से ज़्यादा लाड़ प्यार ने उसे बहुत बिगाड़ दिया है और पढ़ाई वगैरह भी नहीं करता.

स्थिति बड़ी विकट थी और मैं धर्मसंकट में. बड़ी ज़द्दोजहद के बाद माँ, गुरूप्रीत को वापस सौंपने को तैयार हुई तो केवल उसकी शिक्षा के नाम पर. साथ ही ढेर सारी हिदायतें और शर्तें भी मिली.

Ranjeet Gurupreet at Amarkantak Ranjeet Gurupreet at Tandula Dam

स्कूल तो बच्चे जाते थे लेकिन ज़िंदगी ने हमारे इम्तिहान लेने शुरू कर दिए. कम उम्र में ही दो बच्चों की परवरिश. दोनों की अलग अलग ज़रूरतें, अलग अलग रुचियाँ. एक सोता तो दूसरा जगता. एक दवाई हंस कर पी लेता तो दूसरे को दवाई देने के लिए पहलवानी आजमानी पड़ती. एक दाहिनी और भागता तो दूसरा बाईं ओर.

बाज़ार जाते तो मैं हैरान होता कि दोनों ने कभी हाथ-पैर पटक कर किसी बात की जिद नहीं की. बस कान में धीरे से कह देते कि जब आपका मन करे तो वो चीज ले कर दे देना.

बिटिया को, हर रात सोने के पहले मुझसे किसी भी तरह की कहानी, संस्मरण सुनना खूब भाता था. गुरूप्रीत अगर सोया ना रहे तो वह भी आनंद उठाता.

At a get together At Dog Show
At Golden Temple At Own Field

 

ऐसे ही एक मौके पर मैंने कहानी सुनाई कि कैसे एक परिवार से रूठ कर उनका बेटा घर से चले गया, तलाशने पर भी नहीं मिला. कई वर्षों बाद उसकी चिट्ठी मिली ‘मम्मी-पापा, मुझसे गलती हो गई थी. अब मैं रविवार की रात को घर लौट रहा हूँ, लेकिन पता नहीं, अब आप सब वहाँ हो कि नहीं और फिर हिम्मत भी नहीं आपके सामने आने की, क्या पता अब तक गुस्स्सा बना हुआ हो.

अगर आप नाराज़ नहीं हों तो घर के बाहर की लाईट जलाए रखियेगा. मैं समझ जाऊंगा, आप सब मुझसे अब भी प्यार करते हैं. लाईट जलती ना मिली तो मैं दूर से ही देख, वापस लौट जाऊंगा.

 

अपनी अपनी ठुड्डियों को हथेली पर टिकाए, दोनों बच्चे बड़े ध्यान से सुन रहे थे कि जिस रात वह बेटा लौटा तो आंधी तूफ़ान बारिश का कहर जोरों पर था. सारे इलाके में बत्ती गुल थी. एकाएक टैक्सी ड्राईवर ने एक ओर इशारा किया सा’ब ! देखिये कैसे पागल लोग हैं, इतने आंधी तूफ़ान में भी घर के सारे लोग बरामदे में ढेर सारी लालटेन टांगे खड़े हैं.

इससे आगे मुझे कुछ कहने की ज़रुरत ही नहीं पड़ी. दोनों बच्चों ने कहानी का क्लाईमैक्स खुद ही बता दिया. गुरुप्रीत ने बड़ी मासूमियत से पूछा ‘मैं कभी घर से चले गया तो आप भी बत्ती जला कर रखोगे ना?’

Birthday with Grand Parents With Grand Father

 

दोनों का हर जनमदिन बड़ी धूमधाम से मनाया जाता. सारा परिवार इकठ्ठा होता. रात गए तक रौनक रहती. ऐसे ही चौहदवें जनमदिन पर मैंने गुरुप्रीत को एक पुस्तक उपहार स्वरूप दी ‘रिच डैड पूअर डैड’ बस फिर क्या था. ज़नाब के सपनों को पंख लग गए

A Newspaper Reportइस बीच पिता जी सेवानिवृत्त हो पंजाब जा बसे थे. ‘रिच डैड पूअर डैड’ के असर से गुरूप्रीत के मन में अब तक औपचारिक शिक्षा से मोह भंग हो चुका था. मौक़ा पा उसने मुझे मना लिया कि पंजाब में दादा दादी के साथ रहते वह CMC से कम्प्यूटर शिक्षा में पारंगत हो ले.

वापस आ कर उसने सीधे Datapro के लिए काम करना शुरू कर दिया. फिर क्या था! शेर के मुंह खून लग चुका. नई तकनीक से पैसा कैसे कमाया जा सकता है उसे समझ में आ गया बस यहीं से उसकी कल्पना ने उड़ान भरी और एक बार फिर परवान चढी जब मैंने उसे शेयर बाज़ार की बारीकियां समझाईं. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आधिकारिक NCFM का कोर्स ख़त्म करते करते वह शेयर बाज़ार से भी लाभ कमाने लगा था. इस बीच जब मैंने उसे मज़ाक ही मज़ाक में उसे चाँद पर प्लॉट उपहार में दिया तो उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते थे.

लेकिन घुमंतू प्रवृत्ति के चलते वह डाटाप्रो में अधिक ज़िम्मेदारी संभालते हुए जा पहुंचा राऊरकेला. फिर उसके बाद कुछ समय बिता दिया धुले में

Somewhere

 

तभी हुई एक पारिवारिक त्रासदी के चलते मै रह गया अकेला. गुरूप्रीत मेरे पास वापस लौटा, वेबसाईट डिजायन और निर्माण की अपनी कम्पनी रजिस्टर्ड करवाई.

मेरे अकेलेपन को बांटने माँ-पिता जी भी पंजाब से लौट आए. तब तक बिटिया BCA में एडमिशन ले चुकी थी.

Twin -Ranjeet, Gurupreet

ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चले जा रही थी. बिटिया ने बीसीए के बाद एमबीए का रूख किया. गुरूप्रीत का व्यवसाय भी उन्नति की ओर था. लेकिन उसने अपना पुराना शौक, मॉडलिंग नहीं छोड़ा था. जिसके चलते वह कई विज्ञापन फिल्में भी कर चुका और स्थानीय लघु फिल्मों में भी उसकी मांग बनी हुई थी.

कड़ी मेहनत के बाद, सप्ताहांत में इने-गिने दोस्तों के साथ पार्टी और मौका मिलने पर अपनी बाईक से आसपास के दर्शनीय स्थलों पर जाना उसे खूब पसंद था. और कहीं काम से जाना पड़ जाए तो कहने ही क्या. एक पंथ दो काज!

Ad shooting Dubbing at Studio

वह कई बार मुस्कुराते हुए मुझसे कहता कि अब पंजाब जायेंगे तो आपको किसी ‘स्पेशल’ से मिलाऊँगा. मैं इस बात को अनसुना सा कर देता लेकिन एक बार मैंने भी मुस्कुरा कर ज़वाब दिया कि वो ‘स्पेशल’ कौन है, मुझे सब पता है! तुम्हारी दादी ने मुझे सब बता दिया था. अब वो हैरान.

हुआ यह था कि वर्षों पहले उसकी बनाई ‘दिल मिल गए’ सीरियल की वेबसाईट पर एक सुंदर बच्ची का कमेंट आया और फिर इन दोनों के दिल ऐसे मिले कि गुरूप्रीत अपनी दादी को उनके परिवार में ले जा कर मंजूरी ले आया जीवन भर साथ निभाने की. लेकिन किसी डर के कारण खुद मुझे नहीं बता पाया.

2010 के नवंबर माह में व्यावसायिक कार्य से देर रात लौटते हुए गुरूप्रीत के साथ एक सड़क दुर्घटना में कुछ ऐसा हुया कि वह कोमा में चले गया. इसी सदमे में उसकी दादी, मेरी माँ ने प्राण त्याग दिए. इधर माँ का जाना हुआ, उधर यह महाशय उठ बैठे. मैं एक बार और हैरान था ज़िंदगी से.

चेतना लौटते ही गुरूप्रीत को अपराधबोध होने लगा कि उसके कारण उसकी प्यारी दादी चले गई. भावुकता में कई बार कह उठता कि मैं भी उसके पास चले जाऊँगा. मैं उसे यही दिलासा देने की कोशिश करता कि इसमे उसका कोई दोष नहीं

दुर्घटना के बाद तेजी से सामान्य हुए गुरूप्रीत का इलाज़ कर रहे न्यूरोलॉजिस्ट डॉ ठाकुर ने कुछ अरसे तक सतर्कता बरतने का निर्देश दिया था. मन बहलाने के लिए ना चाहते हुए भी मैंने एक बार फिर पालतू कुत्ते की अनुमति दे दी. मैक के आते ही घर में रौनक बढ़ गई.With Mac

साथ निभाने का वादा किए उस बच्ची ने गुरूप्रीत के स्वास्थ्य लाभ में हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी बहुत मदद की. गुरूप्रीत को समय पर दवा की याद करवाना, निराशा के पलों में हौसला देना, आर्थिक मसलों का प्रबंधन जैसे मामलों में वह बखूबी साथ निभाती. समर्पण और लगाव के बीच इन दोनों बच्चों के साथ बस, कसर थी तो एक औपचारिक सामाजिक समारोह की.

27 अगस्त 2012 को लखनऊ में हिंदी ब्लॉगिंग में मेरी वेबसाईट www.BlogsInMedia.com को सम्मानित किए जाने पर वह बेहद खुश था. लौटने पर मुझसे, अपनी पसंदीदा पिज्जा पार्टी भी ले ली थी उसने. 3 सितंबर को जब गुरूप्रीत से पहले ही मैंने अपनी होने वाली बहू को जनमदिन की बधाई दी तो झूठमूठ सा रूठ गया. जिसे मैंने एक पार्टी का वादा कर मनाया.

लेकिन हँसते मुस्कुराते परिवार में शायद कुछ ठीक नहीं था. 5 सितंबर को गुरूप्रीत के कमरे में छत से एकाएक टपके बारिश के पानी ने उसका प्रिय लैपटॉप बिगाड़ दिया. दूसरे दिन सर्विस सेंटर ने हाथ खड़े कर दिए. बेहद बिगड़े मिजाज़ को शांत करने की कोशिश करने के बाद भी तनाव उसके चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा था.

आखिरी कोशिश में लैपटॉप को बल्बों की तेज़ रौशनी में सुखाया जा रहा था. 7 सितंबर की शाम, मैं जब बाज़ार में कुछ खरीददारी कर रहा था तो गुरुप्रीत ने दिनेशराय द्विवेदी जी को फोन किया. उसने ऐसा कुछ कहा कि द्विवेदी जी ने मुझे मोबाईल पर संपर्क किया और तुरंत घर लौटने का आदेश दिया. घर पहुंचा ही था कि उदास दिख रहा गुरूप्रीत अपने कमरे से निकला और ‘आया’ कह बाहर का गेट खोल सडक पर जा पहुंचा.

एक सामान्य सी बात मानते हुए मैंने द्विवेदी जी को आशवस्त किया कि कोई ख़ास बात नहीं. सब ठीक है. लेकिन जब कुछ समय तक वह नहीं लौटा तो देखता हूँ कि उसके मोबाईल, पर्स, बाईक सब घर पर ही है. उसके दोस्तों ने भी अनभिज्ञता ज़ाहिर की.

हम भी कभी उदास होते हैं तो अकेले में रोने को मन करता है, पार्क के किसी बेंच पर बैठ कर लौट आते हैं कुछ समय बाद. ऐसे में पुलिस की कार्यप्रणाली जानते हुए रात 11 बजे मैंने अपने परिचित पुलिस वालों से आग्रह किया कि कहीं बैठा मिल जाए गश्ती दल को, तो उसे घर ले आईयेगा. रात 1 बजे और सुबह 6 बजे भी जब सभी ओर से नकारात्मक संदेश मिले तो मैं हैरान कि आखिर माज़रा क्या है!

8 सितंबर की सुबह 9 बजे पुलिस वालों का सामान्य सा संदेश मिलने पर जब मैं अपने घर से 5 किलोमीटर दूर नेहरू नगर रेलवे क्रॉसिंग पर पहुंचा तो मुझे कतई अंदेशा नहीं था कि मेरे जीवन का अब तक का सबसे बड़ा आघात मेरी प्रतीक्षा में है.

कुछ ही समय में, रेल की पटरियों पर बढ़ते मेरे कदम रूक गए. मेरे ही अंश के छोटे छोटे टुकड़े, इधर उधर बिखरे पड़े थे और मैं हैरानगी भरी डबडबाई आँखों से उन्हें एकटक देखता रह गया. पहचान के नाम पर उसकी टी-शर्ट का ब्रांडेड टैग भर दिख रहा था. अंतिम पहचान के रूप में, दिल पर पत्थर रख जब औंधे पड़े चेहरे के हिस्से को पलटा तो मानों मेरी दुनिया ही उजड़ गई.

Gurupreet Singh: 26 May 1986 - 8 Sep 2012

 

जिंदगी से हैरान होते हुए, उस कहानी के पागलों जैसे, पता नहीं किस उम्मीद में आज भी मैं अपने घर की सारी लाइटें जलाए रखता हूँ. शायद किसी रात वह लौट आये.



तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी, हैरान हूँ मैं
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64 comments

  • प्रवीण कुमार गुप्ता says:

    पाबला जी, क्या कहे मन भर आया हैं, उस परम पिता परमेश्वर की इच्छा के सामने कोई कुछ नहीं कर सकता हैं. भगवान आपको शक्ति दे…

  • कोरें भिगो दीं पाबला जी
    टिप्पणीकर्ता girish billore ने हाल ही में लिखा है: सा’ब चौअन्नी मैको हम निकाल हैं…!!My Profile

  • archanachaoji says:

    मैं आपके साथ हूँ,बहुत कुछ एक सा घटा है ..और कुछ कह नहीं पा रही ..

  • आज भी विश्वास नहीं होता | बस आपका हँसता हुआ चेहरा याद आता है ,जब आपको स्टेशन ( लखनऊ ) छोड़ने गया था | आपसे कई बार बात करनी चाही पर हिम्मत नहीं जुटा पाया | उस परम पिता परमेश्वर के आगे हम सब लाचार ही तो हैं | ईश्वर आपको शक्ति दे | अपने को संभालिये और अपना ख़याल रखिये |

  • archanachaoji says:

    अपनी लिखी ये पंक्तियाँ याद आ गई —

    एक जैसा दुःख मेरा तुम्हारा ,
    मैंने खोया चाँद, तुमने तारा ,
    मैंने खोयी खुशी ,तुमने हँसी ,
    फ़िर भी हम दोनों को जीना है,
    अपने आंसुओ को अकेले पीना है ,
    यहाँ पर मै तेरे साथ ,व तू मेरे साथ है,
    बाकी सब ऊपरवाले के हाथ है ,
    वहां किसी के साथ कोई दगा नही होता ,
    क्योकि ,ईश्वर और मौत का कोई सगा नही होता|

  • आपका पूरा लेख /संस्मरण पढ़ कर मै काफी भावुक हो गया …ईश्वर से कामना है कि आप को इस दुःख से उबरने की शक्ति दे …

  • वीत में गुरु की प्रीत…

    जय हिंद…

  • बवाल हिंदवी says:

    पाबला साहब, आपने जीवन में वो आघात सहा,जो रब किसी को न दे। हमें ललित जी ने पिछले दिनों मुकुल भाई के घर पर बतलाया।विश्वास न हुआ। लख्ते-जिगर के जाने का दुख आपको सहने की शक्ति, वाहे गुरू दे, ऐसी कामना और व्यथित ह्र्दय के साथ। आपका बवाल।

  • पढ़ते पढ़ते मन भर आया , आँखें भी नम हो गयी , इस दुखद घटना के बारे में जब से पता चलता है तब से जब भी याद आ जाती है मन बहुत दुखी होता है 🙁
    टिप्पणीकर्ता Ratan Singh Shekhawat ने हाल ही में लिखा है: Punjab High court recruitment of 400 Clerk in 2013My Profile

  • काजल कुमार says:

    प्रभु जैसे रखे. रहना है.

  • मन भर आया, आपके घर का चाँद, उपहार में मिले चाँद के टुकड़े में रहने चला गया।

  • sudhir pandey says:

    आह

  • दयानिधि वत्स says:

    कई दफा बहुत कुछ कहना चाहकर भी शब्द नहीं निकल पाते. वही हो रहा है अभी.
    उस दर्द को तो कोई नहीं जान सकता लेकिन इस लेख को पढ़कर तो कलेजा चाक हुआ जाता है.

  • कुछ भी कहने में असमर्थ पा रहा हूँ खुदको…..
    टिप्पणीकर्ता Dr. Zakir Ali Rajnish ने हाल ही में लिखा है: हिन्‍दी के सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग: जिन पर हिन्दी ब्लॉग जगत की गुणवत्ता टिकी है ?My Profile

  • अन्तर सोहिल says:

    आह!

  • t s daral says:

    इस त्रासदी पर निशब्द हूँ।
    अप्रत्यासित, असामयिक, अकस्मात् , दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना।
    वाहे गुरु आपको शक्ति दे।

  • बहुत समय से आपको फोन करना चाह रही थी पर करने की हिम्मत नहीं जुटा पायी ….
    कल से कई बार इसको पढ़ कर घुट रही हूँ पर फिर भी लिख नहीं पायी ….
    शायद ऐसी पीड़ा खुद बहुत ज्यादा पीड़ित होती है और सन्नाटा खींच जाती है …..(

  • Prashant PD says:

    कुछ भी नहीं कह सकता हूँ इस पर.

  • दुखद !
    कुछ भी कहना मुनासिब नहीं !
    टिप्पणीकर्ता वाणी गीत ने हाल ही में लिखा है: अमीर- गरीब , बड़े -छोटे, ऊँच – नीच का भेद मिटाता है छठ पर्व !My Profile

  • ashish jain says:

    आप के जीवन की सबसे भयावह त्रासदी पढने के बाद मुझे भी अत्यंत आघात हुआ है , ईश्वर आपको साहस प्रदान करे .

  • shikha varshney says:

    जिंदगी इम्तहान लेती है….पर ऐसे ….
    क्या कहूँ..:(.

  • ashok saluja says:

    निशब्द! कहने को कुछ रहा नही ,सहने को सब कुछ ….
    वाहे गुरु आप को सहने की शक्ति बक्शे !

  • rashmi ravija says:

    इसे पढ़ते हुए सबकी आँखें गीली हो आयीं होंगी,
    आपका दुःख भीतर तक महसूस करते हैं,पाबला जी
    पर कुछ भी कह पाना मुश्किल हो जाता है..

  • sourabh says:

    बच्चे ने इतनी खुशी इकट्ठा दे दी और चला गया, सचमुच इतने प्यारे पापा को कैसे छोड़ चला यूँ ही गुरप्रीत

  • पाबला जी, निशब्द हूँ।.. वाहे गुरु आप को जीवन की सबसे भयावह त्रासदी सहने की शक्ति प्रदान करे।

  • जो घटना क्रम अलग अलग तरीके से आपके मन मस्तिष्क में दिन रात एक सिनेमा की तरह चलता रहता होगा उसे लिखने में बहुत साहस, शक्ति व धैर्य लगा होगा। अपना दुखः साझा करके आपने अपने मित्रों को अपनापन दिया है। बाँटने से आपका दुखः कुछ सह्य हो जाए यही कामना करती हूँ।
    घुघूती बासूती

  • Rajeshwari says:

    समय समय पर आपके ब्लॉग पढ़ती और पसंद करती रही हूँ। ये दुखद समाचार भी कहीं ब्लॉग पर ही पता चला था लेकिन आज पढ़कर …..क्या बताऊँ, लगता है शरीर में दम ही नहीं है। ज़िन्दगी से नाराज़ होना बनता है और उस ज़िन्दगी देने/ लेनेवाले से भी। ईश्वर आपको इस दुःख को सहने की शक्ति दे, ये दुआ है।

  • ajit gupta says:

    पाबला जी, शब्‍द नहीं मिल रहे। ऐसा क्‍या घटित हो गया जो इतना बड़ा कदम एक क्षण में ही उठा लिया। आप बहुत ही संवेदनशील पिता हैं, यह बात आपकी पूर्व पोस्‍ट से जाहिर होती रही हैं, आपको प्रभु शक्ति दे। हम सभी की आंखों में भी आंसू है।

  • Digamber Naswa says:

    आपका दुःख बहुत ही गहरा है … कभी कभी समय कितना बेरहम हो जाता है पर वही समय धीरे धीरे सहने की ताकत भी देता है … ईश्वर आपको शक्ति दे …

  • Surinder Sharma says:

    पाबला जी,

    यह उम्र भर का दुःख है , आप ब्लॉग पर आये . कहते हैं दुःख बाँटने से कुछ कम हो जाता है . भगवन जाने वाले की आत्मा को शांति दे।

  • ali syed says:

    स्तब्ध हूं

  • उस परमपिता की यही इच्छा रही होगी, उसकी वो ही जानता है।
    आपको शक्ति भी वही देगा इस दारुण दुख को सहने की।
    टिप्पणीकर्ता संजय @ मो सम कौन ने हाल ही में लिखा है: अकहानी.My Profile

  • किस्मत में इतना ही साथ लिखा था भाई …
    टिप्पणीकर्ता सतीश सक्सेना ने हाल ही में लिखा है: विदाई गुडिया की … सतीश सक्सेनाMy Profile

  • KK JHARLA says:

    अत्यंत आघात हुआ है , ईश्वर आपको साहस प्रदान करे

  • atyant dukhad.
    kyaa kahun.??

  • .

    एक बार फिर आंखें नम हो गईं …

    भाईजी
    उबरना ही होगा … कोई और रास्ता नहीं …

    # नए साल में हमें अपने पुराने ♥पाबलाजी♥ की प्रतीक्षा रहेगी

  • .
    .

    ♥(¯`’•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•’´¯)♥
    ♥ नव वर्ष मंगबलमय हो ! ♥
    ♥(_¸.•’´(_•*♥♥*•_)`’• .¸_)♥

    राजेन्द्र स्वर्णकार

  • kavita rawat says:

    जिंदगी में कब क्या हो जाय कुछ नहीं कह सकते ..एक पल में खुशिया ही खुशिया और दूजे पल दुखों का पहाड़ …
    उफ़ कितना भयावह है यह सब ..
    इश्वर आपको यह भारी दुःख सहने की शक्ति दे ..यही प्रार्थना है …

  • yashwant mehta says:

    निशब्द हूँ !!

    परमात्मा कृपा करे

  • आदरणीय पाबला जी,
    सादर प्रणाम !
    इस त्रासदी पर शब्द नही हैं | Tears Tears

  • Kishan Puorhit says:

    भगवान् ने ये कैसा अन्याय किया, कभी कभी उसके न्याय पर शक होने लगता है……………………….

  • मैं आपके साथ हूँ,बहुत कुछ एक सा घटा है……

  • अभी आपसे बात करने के बाद आपका ब्लॉग देखा, आंखे भर आयीं/ इश्वर ऐसी पीड़ा किसी को न दे, जाने किस मनः स्थिति मे हमारे बच्चे इतने निर्मम हो जाते हैं/ कुछ भी कह नहीं पा रहा, इस पीड़ा के आगे सारे शब्द झूटे है, व्यर्थ ही हैं/ प्रभु से प्रार्थना है आपको शांति दे यदि दे सके /
    डॉ.भूपेन्द्र सिंह

  • Prashant Mishra says:

    i am word less sir!

  • ePandit says:

    आपका यह दुःखद संस्मरण आज ही पढ़ा। आँखों में आँसू आ गये। बचपन में अपनी बहन को खोने और आज एक पिता होने के नाते जान सकता हूँ कि यह कितना बड़ा आघात है। समय दर्द भले हल्का कर दे लेकिन भुलाये नहीं भूलता।
    टिप्पणीकर्ता ePandit ने हाल ही में लिखा है: UMI X2 – क्वाड कोर प्रोसैसर तथा २ जीबी रैम युक्त ५ इंची फुल ऍचडी स्मार्टफोन भारत में जारी @₹१४,०००My Profile

  • मैं निशब्द हूँ और आँखें नम हैं | मुझसे ऐसी परिस्तितियाँ संभाली नहीं जातीं |
    टिप्पणीकर्ता Tushar Raj Rastogi ने हाल ही में लिखा है: चाँद पूनम काMy Profile

  • jitendra shringi says:

    पाब्ला जी आपने तो आज रुला दिया मेरी प्यारी मां भी इस घटना के अगले ही महीने में मुझे रुला के गयीं हैं आज में दुबारा दुखी हुआ दर्द को सहना ही इन्सान की नियति है

  • आपकी पोस्ट पढता रहता हूँ पर इसको आज पढ़ा. सोचा था की बहुत कुछ लिखूंगा पर अब शब्द नहीं मिल रहे. क्या कहूं?

  • हाय ओए रब्बा, तू एह की कीता……तैनूं की मिलिया…….
    पर इक नेक इंसां दी दुनिया उजाड़ दित्ती, तैनूं रता तरस वी ना आया…….हुन ओस नूं ते उस दे परिवार नूं संभाल के रखीं……

  • आपके जीवन के इस हादसे से बिलकुल अनभिज्ञ था और कभी सोच भी नहीं सकता था कि ईश्वर कभी आप जैसे खुशमिज़ाज शख्स को इतना बड़ा गम देगा । आज आपकी गूगल एडसेंस की पोस्ट पढ़ रहा था जहा पर आपके पुत्र गुरप्रीत का ज़िक्र भी था तो जिज्ञासावश उस पन्ने पर चला गया और सच मानिये अभी भी मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा कि ये सब सच है । ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि आपको सदैव धैर्य और शक्ति दे ।
    टिप्पणीकर्ता Raj Shekhar Sharma ने हाल ही में लिखा है: Saturn transit in Scorpio | Horoscope ReadingsMy Profile

  • sagar says:

    pata aisa kaise ho jata hai, aap jaise logo ko bhi ishwar takleef de deta hai.

    vishwas uth jata hai us se !

  • ajay arya says:

    मैंने आज ही ये सब पढ़ा । संसार का सबसे बड़ा दुःख झेला ह आपने , मेरे पास कहने को शब्द नहीं ।
    उसके खेल वो ही जाने

  • आपका आज लेख पढ़कर मन बहुत उदास हो गया और हादसे के मात्र तीन महीने से कम समय के बाद आप द्वारा लिखा लेख वाकई कोई बहुत ज्यादा हिम्मत और धैर्यशील व्यक्ति ही लिख सकता है. मैं ने आज आपका लेख पढ़ा है, जब आपने यह दुःख भरी पीड़ा व्यक्त की थी. तब मैं भी अनेक मुश्किलों में फंसा हुआ था. इसलिए पढ़ न सका था. भगवान आपको उपरोक्त दुःख सहने की सहनशक्ति के साथ ही उपरोक्त दर्द को जल्द से जल्द भुलाने में मदद करें. आपकी पोस्ट पढ़कर दिमाग ने भी काम करना बंद कर दिया है..क्या लिखूं , क्या नहीं ? कुछ समझ नहीं आ रहा है. आज के बच्चों में सहनशक्ति पता नहीं क्यों कम होती जा रही है ? पता नहीं अपने बाद अपने माता-पिता की क्यों नहीं सोचते हैं ? लेपटॉप भी सुख जाता और नहीं भी सूखता तो दूसरा आ जाता ? यदि कोई डाटा भी खत्म हो गया था. दुबारा बन जाता और यदि नहीं भी बनता तो क्या वो “जीवन” से ज्यादा कीमती था ? जब मुझे गुरु दिनेशराय दिवेध्दी जी इस हादसे के बारे में पता लगा था तब भगवान से पूछ बैठा था कि भगवान आप अपने नेक इंसानों की ही परीक्षा क्यों लेता है ?

  • Sao sir says:

    पाबला जी..वो अमर है दिलों में ! बावरा मन उसके न होने का झूठा अहसास कराता है, वो यहीं है.. हर पल हमारी आंखों में…हमारे जेहन में !

    खुश रहिये और यूँ ही प्यार बाँटते रहिये !

  • निःशब्द हूँ , कहने को कुछ.भी नही है । जीवन है तो जीना भी है ।

  • ज्यों राम राखे
    त्यों रहिये रे भाई

  • नहीं पाब्ला जी , गुरुप्रीत कहीं नहीं गया …..मंद हवा के झोंको में हौले हौले लहराते हर फूल में वो नज़र आयेगा …कुछ यूँ गुनगुनाते ..रहें न रहें हम …महका करेंगे बनके फिजा …

  • sanjay dani says:

    इतना दुखद हादसा कि दिल गमगीन हो गया , पर खुद के साथ घटित घटना को कोई हिम्मत वाला ही अलफाज की शक्ल में मंजरे आम कर सकता है । god bless you.

    डा संजय दानी दुर्ग ।

  • S S K PANICKER says:

    वास्तव में इंसान कटपुतली की भाँती जीवन पर्यंत नाचता ही रह जाता है मैं जब जीवन में पहली बार पाबला जी से मिला तब उनकी आंखों की गहराई ने इंसानी रिश्तेा का वजूद समझा दिया था । आज गुरुप्रीत चाहे जहां भी है मेरा मन यह अवश्य मानता है कि वह पबला जी को छोड़कर दूर जा ही नहीं सकता । यह भी ईश्वर की एक लीला है कि आज गुरुप्रीत किस रूप में है और उसे पाबला जी किस रूप में देखते हैं यह ईश्वर या पाबला जी से बेहतर कोई नहीं समझ सकता ।

  • एक सुंदर श्लोक है: चरैवेति-चरैवेति। यानी चलते रहो, चलतेरहो।
    इसी को कृष्ण ने गीता में एक अन्य रूप में कहा है: कर्म करो, और सब मुझ पर छोड़ दो।
    राज कपूर ने भी इसी दर्शन कोमेरा नाम जोकर मेंंपेश किया: द शो मस्ट गो ऑन।
    आपके बालक कोईश्वर नेकिसी ख़ास प्रयोजन से भेजाहोगा। वो प्रयोजनसिद्ध हुआ औरवो चला गया। आप इस बात पर विचार करें की आपको ईश्वर ने क्या करने के लिए भेजा है। सबके दुःख के अपने अपने कारण हैं। नज़दीकी केकारणसबको अपना दुःखबड़ा लगता है। आपका दुःखहम सिर्फ़ फबाँट सकते हैं। परइसे सबसे ज़्यादा आपूही महसूस कर सकते हैं।

  • निशब्द…बस इसे पढ़ते हुए मेरी आँखें भर आई और मन भी .

  • Manoj Goyal says:

    आपका पूरा लेख /संस्मरण पढ़ कर मै काफी भावुक हो गया …ईश्वर से कामना है कि आप को इस दुःख से उबरने की शक्ति दे …

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