जब डॉक्टर का काम दर्जी ने किया

मुझे बचपन से शौक रहा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स से उलझने का. तकनीकी दक्षता भी उसी में हासिल की.अब मेरी आजीविका मुख्य तौर पर दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स के रखरखाव से जुडी है.

अब तो दिन रात सैकड़ों किलोमीटर लंबी तारों का संजाल, महीन पुर्जों से अटे पड़े सर्किट बोर्ड, जुगनू सी दमकती  कतारबद्ध इंडिकेटर लाइट्स, घूरती आँखों सरीखे दसियों सीसीटीवी कैमरे गोया किसी मायावी दुनिया का आभास देते हैं.

वो तो गनीमत है कि बड़े बड़े वाल्वस की दुनिया से सफ़र शुरू कर तकनीक से कदम मिलाते कंप्यूटर तक आ पहुंचा वरना वहीं स्क्रू-ड्राईवर, कटर लिए खड़े रहते.

सैकड़ों तकनीकी मुश्किलों को सुलझाते, कुछ नया बनाते अब चार दशक होने को आए. इस बीच ऐसे भी कई अवसर मिले जब बनी बनाई लीक से हट कर विज्ञान, इलेक्ट्रोनिकी के नियमों के खिलाफ सोच कर, कल्पना की उड़ान भर किसी तकनीकी दोष की जड़ तक गए और उससे निजात पाई गई.

मतलब यह कि हमला वहां किया गया जहाँ दुश्मन के छिपे होने की संभावना किसी हालत में नहीं हो सकती लेकिन वही निशाना सटीक बैठा 🙂

दर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स

इसकी प्रेरणा में मुझे वह कहानी हमेशा याद रहती है जो बचपन में कभी अपने घर के पास वाली सार्वजनिक लाईब्रेरी में पढी थी.

 हुया यह कि एक राजा अपने लुक और स्टाइल को ले कर बहुत चौकन्ना रहता. राजमहल भी उसने अपनी पसंद से बनवाया हुया था. चारों तरफ रंगीनियाँ बिखरी रहती. हमेशा नये नए कपडे पहनना उसका जूनून था. कोई भी नया डिजायन दिखता तो वह उसे चाहिए ही चाहिए. तरह तरह की शेरवानियाँ, बंद गले के कोट  उसकी कमजोरी माने जाते थे.

एक बार पड़ोसी देश का राजा आया तो उपहारस्वरूप कई पोशाकें दे गया. स्टाइलिश राजा की तो बांछें खिल गईं. गिफ्ट में मिले उन कपड़ों में सज धज कर सभागृह में इठलाते बैठना, मंत्रियों को उस बारे में बताना उसका नित का काम हो गया.

लेकिन एक दिन नृत्य की महफ़िल में राजा को अचानक चक्कर आ गया, साँसें भारी होने लगीं, आँखों से धुंधला सा दिखने लगा, पसीने से भीग गया शरीर. दरबार में हडकंप मच गया. वैद्य आये, कुछ दवाई दी, आराम करने को कहा.

दूसरे दिन बाग़ में घूमते हुए फिर अचानक चक्कर, धुंधलापन, साँसें भारी, पसीने की धार. वैद्य ने दवाई तो दी लेकिन ये काम रोज का हो गया. आसपास के राज्यों से भी तमाम वैद्य आये लेकिन नतीजा कुछ  ना निकला.

राजा ने मुनादी करवा दी कि जो उसकी बीमारी ठीक कर देगा उसे पाँच गाँव ईनाम में दे दिए जायेंगे. हर कोई दौड़ पड़ा. कोई किसी पेड़ के पत्ते ले आया, कोई कहीं की भस्म को अचूक बताए, कोई किसी टोटके की बात करे तो कोई भूत प्रेत का साया बताए.

दर्जीदिन गुजरते गए, राजा की बीमारी ठीक ना हुई. चिंता में घुलते राजा ने सोच लिया कि कुछ नहीं हो सकता, अब अंत निकट है. क्यों ना अपने बचे शौक पूरे कर लिए जाएँ. नए कपडे सिलवा कर पहन कर ही मरूं

उसने अपने दर्जी को बुलावा भेजा. दर्जी अपने सहायक के साथ आया. राजा को दिलासा भी दी और दुआएं भीं. राजा ने भी ठंडी सांस छोड़ते अपने दिल की बात कही कि मेरे लिए नये कपडे सील दो, नाप एक बार और ले लो.

दर्जी ने अपना इंची टेप पकड़ा और लगा नाप लेने. जैसे जैसे वह बोलते जाए वैसे वैसे सहायक नोट करते जाए. शेरवानी की लंबाई 44 इंच… बांह 31 इंच… कंधे 22 इंच… बंद गले वाला कालर 20 इंच…

राजा ने टोका ‘नहीं बांह 32 इंच कर दो और कालर 19½ इंच होना चाहिए’. दर्जी बांह के लिए तो मान गया लेकिन कालर 20 इंच ही रखने को कहा सहायक से. राजा ने फिर टोका ‘नहीं! कालर 19½ इंच ही रखो’. दर्जी ने बड़ी विनम्रता से कहा कि महाराज! कालर 20 इंच ही रहने दीजिये. राजा ने भड़क कर पूछा कि  19½ इंच रखने से क्या आफत आ जायेगी?

दर्जी ने आख़िरी बार कोशिश करते हुए बताया कि महाराज अगर बंद गले का कालर 19½ इंच रखेंगे तो गला सा घुटने से आपको अचानक चक्कर आ जाएगा, साँसें भारी हो जायेंगी, आँखों से धुंधला सा दिखने लगेगा, शरीर पसीने से भीग जाएगा, ऐसा लगेगा कि प्राण निकलने ही वाले हैं.

यही वह कहानी है जिसको ध्यान में रखते हुए लीक से हटते काम कर परिणाम देते हुए कई बार मैंने अपने वरिष्ठों से पीठ थपवाई है अपनी नौकरी के मुश्किल मौकों पर.

आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ तो होगा ना?

जब डॉक्टर का काम दर्जी ने किया
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जब डॉक्टर का काम दर्जी ने किया” पर 8 टिप्पणियाँ

  1. पाबला साहब आपका लेख बहुत ही प्रेरणा देने वाला है।आप दवारा दिया गया तकनीक ज्ञान से हजारों लोग लाभान्वित हो रहे हैं।आपका आभार एवम् बारम्बार धन्यवाद।

  2. आपके तकनिकी ज्ञान का जबाब नहीं …….

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