दिल्ली की डॉलफिन, पंजाब के किन्नू और ठण्ड के मज़े


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एक निजी पारिवारिक आयोजन के लिए जब मैं अपने पिता जी के साथ भिलाई से पंजाब जाने के लिए अपनी ही चौपहिया गाड़ी दौड़ाते हुए सागर शहर से होते हुए आगरा में रात बिता कर दिल्ली पहुंचा तो तारीख हो चुकी थी 7 जनवरी.

दोपहर 2:30 बजे पहुंचते साथ ही मिली बुआ की प्यार भरी झिड़की और गरमागरम चाय. पिताजी तो तुरंत सो गए और मैं चल पड़ा नहाने.

भिलाई से चलने के बाद से जिन दो मित्रों ने लगातार संपर्क रखा वे थे मुरैना के भुवनेश शर्मा और दिल्ली के इरफ़ान खान. मुरैना में तो भुवनेश जी से मुलाकात हो गई. अब दिल्ली पहुंचते ही इरफ़ान जी ने मोबाइल की घंटियाँ बजा दीं.

मेरा बीएसएनएल मोबाईल नंबर रोमिंग पर था और उसने दिल्ली एमटीएनएल के डॉलफिन नेटवर्क पर सवारी करना बेहतर समझा. कोढ़ में खाज सरीखे मामला यूँ हुआ कि दिल्ली में रहते सारे समय मोबाइल नेटवर्क, इस मायावी संसार के समुद्र में डॉलफिन सरीखे डूबता उभरता रहा.

8 जनवरी की सुबह बिटिया ने, मुंबई से दिल्ली जिस ट्रेन से पहुँचना था उसका आखिरी स्टेशन है सराय रोहिल्ला, दोपहर डेढ़ बजे

दिल्ली सराय रोहिल्ला

अपनी कन्या नेवीगेटर के सहारे मैं दोपहर एक बजे ही जा पहुंचा स्टेशन. रूखा सूखा सा कस्बाई स्टेशन सा माहौल. गेट पर ना कोई टिकट देखने वाला ना कोई सुरक्षा बल का जवान. ना ही पार्किंग का कुछ देना पड़ा.

8 और 9 जनवरी का समय बुआ जी के परिवार संग बीता. 10 जनवरी की सुबह पंजाब की ओर रवानगी की योजना थी.

एक रात पहले, गाड़ी की साफ़ सफाई, व्यवस्था ठीक करने की नीयत से रिमोट के सहारे दरवाजा खोला. चाबी सीट पर रख कर एक एक कर अंदर पड़े, भिलाई से सफर के दौरान खाली हुए चिप्स के रैपर, मिठाई का खाली डब्बा, अमूल दही का डब्बा बाहर दिख रहे म्युनसिपल्टी के कचरा डब्बे में फेंकते गया.

अपने हिसाब से समय सीमा समाप्त होते रिमोट प्रणाली ने एक सीटी मारी और संकेत दिया कि दरवाजे लॉक हो गए, सिस्टम सचेत है अब.

अंदर रखे बैग, सूटकेस ठीक से रखने के लिए जैसे ही कदम अंदर रखा मैंने, गाड़ी ने चीख पुकार मचा दी. हड़बड़ा कर चाबी तलाशी तो चाबी गायब. इधर उधर हाथ मारे तो समझ आया कि चाबी तो अब गई म्युनसिपल्टी के कचरा डब्बे में.

अब ? दूसरी कोई चाबी है नहीं, ना ही है रिमोट. गाड़ी की चीख पुकार लगातार होते सुन आसपास के लोग भी आ गए. मन कह रहा था कि यार इतना लापरवाह और बेख़याल नहीं हुआ हूँ अभी कि चाबी भी फेंक दूँ. अंदर रखी बड़ी सी टॉर्च निकाल, जला खोज की तो चाबी सीट के नीचे कारपेट पर पड़ी मिली रिमोट संग.

तब से एक अतिरिक्त चाबी, गाड़ी के बाहरी गुप्त स्थान पर छुपा कर रखता हूँ कि ऎसी ही किसी परिस्थिति में काम आए.


निकलना तो जल्दी था. लेकिन कोहरे का कहर इतना कि मारुति ईको का इग्नीशन ऑन करते करते दस बज गए. वज़ीराबाद रोड पर भजनपुरा से होते हुए 1500 ₹ का पेट्रोल डलवा कर जैसे जैसे आगे बढ़ते गए हम, वैसे वैसे ट्रैफिक का दबाव बढ़ते गया.

सोनीपत होते करनाल पहुंचते 150 किलोमीटर का सफर तय करने में हमें तीन घंटे लग गए. इससे पहले भूख लग आए, सोचा एक काम निपटा ही लिया जाए भोजन का.

दिल्ली वजीराबाद पुल

दिल्ली सोनीपत करनाल

लेकिन तेज़ भागती गाड़ी से, सड़क किनारे किन्नू के स्टाल रह रह कर दिखते जा रहे थे. साथ बैठे फूफा जी से पूछा तो उन्होंने भी मेरा समर्थन किया कि भोजन तो होता हेगा, पहले किन्नू का जूस पी लिया जाए. 😀

किन्नू एक ऐसा फल है जो ख़ास तौर पर पंजाब और आसपास के राज्यों में बहुतायत से पैदा किया जाता है. सबसे पहले मेरा सामना इस फल से 1995 में हुआ था जब मोटरसाइकिल से उत्तर भारत की यात्रा के दौरान मसूरी से शिमला की राह पर थे.

मूल तौर पर अंग्रेजी में इसकी वर्तनी Kinnow है. King tangor तथा Willowleaf mandarin की संकर प्रजाति के अक्षर Kin+Ow को मिला कर बन गया Kinnow जो अपभ्रंश से हो गया किन्नू. यह संतरे जैसे दिखता है किन्तु आकार बड़ा होता है. रंग भी कुछ अधिक गहरा.

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में किन्नू का रकबा करीब 4,000 हेक्टेयर बताया जाता है. खबर है कि हर साल पंजाब में 2,200 एकड़, हरियाणा में 1,100 एकड़ और राजस्थान में 700 एकड़ का रकबा बढ़ रहा है।

दिल्ली के किन्नू

किन्नू के पेड़ों पर हर दूसरे साल फल लगते हैं. आवक दिसंबर में शुरू होती है और यह फरवरी तक उपलब्ध रहता है. इसका छिलका संतरे की तरह न तो बहुत ढीला होता है, न ही माल्टा की तरह बहुत सख्त. खुदरा बाजारों में किन्नू 60 ₹ प्रति किलोग्राम बिकता है, जबकि किसानों को प्रति किलोग्राम के 8-10 ₹ जाते हैं.

रोचक तथ्य यह कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू सन् 1962 में पाकिस्तान यात्रा के बाद लौटते समय वहां से किन्नू के चार पौधे भारत लाये थे। इनमें से दो पौधे नई दिल्ली के पूसा संस्थान एवं दो लखनऊ के वानस्पतिक उद्यान में लगाये गए. गुणों से भरपूर इस किन्नू को 1915 में अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में विकसित किया था.

किन्नू का डबल गिलास रसास्वादन कर हमने भोजन किया करीब एक घंटे बाद. बुआ जी घर से गोभी के पराँठे बना ले आईं थीं. दही मक्खन के लिए एक बड़े से ढाबे में रूक कर चाय भी उदरस्थ कर ली.

सोनीपत, करनाल, अंबाला, खन्ना होते जो राह मैंने चुनी थी वह कभी शेरशाह सूरी मार्ग और ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटी रोड) के नाम से जानी जाती थी लेकिन आजकल एशियाई हाईवे 1 कहलाती है. लगभग सारी ही राह बढ़िया है लेकिन कई जगहों पर पुनर्निर्माण के चलते यह कच्ची, गड्ढों वाली सड़क में तब्दील हुई मिली.

1000 ₹ का पेट्रोल डलवा, करनाल और शंभू में क्रमश 105/ 63 ₹ का टोल टैक्स चुका, पारिवारिक बातों और फर्राटेदार गाड़ी के बीच तारतम्य बिठाता मैं जब अपने गाँव के पास था तो दोपहर के 3 बज रहे थे. चचेरे भाई को पहले ही इत्तला दी जा चुकी थी. ठण्ड के इस मौसम में शाम होने का अहसास दिलाता वातावरण जैसे कह रहा था कि बच्चू, अच्छा किया जो दिन ढलने के पहले ही आ गए वरना कोहरे की चादर फिर एक बार लपेट लेती तो मुश्किल हो जाती.

आखिरकार अपनी मारुति ईको से 1670 किलोमीटर का सफर कर हम पहुंचे गाँव. चलते वक्त अजीब सी घबड़ाहट थी 75 वर्षीय पिताजी के संग होने के कारण. लेकिन उन्होंने बड़ी हिम्मत दिखाई और सारी राह आनंद लिया सफर का.

आपने कभी इन परिस्थितियों में लंबी यात्रा की है अपनी ही गाड़ी चलाकर?

दिल्ली की डॉलफिन, पंजाब के किन्नू और ठण्ड के मज़े
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  1. इतनी लम्बी यात्रा गाड़ी चलाकर हमने की है जी, अभनपुर से काठमाण्डौ और काठमाण्डौ से अभनपुर तक। 🙂
    टिप्पणीकर्ता चलत मुसाफ़िर ने हाल ही में लिखा है: आत्मकथा कहना, खांडे की धार पर चलना….My Profile

  2. Heart
    हा हा हा

    पता नहीं 8 कड़ियों वाला यह काठमांडू संस्मरण कितने मित्रों ने पढ़ा होगा

    दही की तलाश/ भैंसा भोजन/ खिलखिलाती युवती/ नेपाल की मुर्गी/ लाखों का मुआवजा/ मौत से सामना/ दिमाग का फ्यूज़/ चीखती कन्या

    • मैंने पढ़ा है यह लेख और ललित भाई का भी लेख….
      काश मुझे पता होता. मैं भी इस यात्रा का साक्षी होता… 🙁

  3. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की कल की बुलेटिन विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर …. आभार।।
    टिप्पणीकर्ता Harshvardhan ने हाल ही में लिखा है: पानी में चंदा और चाँद पर आदमीMy Profile

  4. अतिरिक्त चाबी गाडी में पड़े स्टेपनी जैसी हैं ..जाने कब काम आ जाय ..
    माल्टा देखकर खाने को मन ललचा रहा है …
    …..सुन्दर फोटो के साथ सुन्दर यात्रा वृतांत सजीव बन पड़ता है

  5. वाह भाई वाह,
    भाई अब किन्नू का स्वाद तो पीने से ही पता चलेगा. पर रंग रूप और आकार देखकर स्वादिष्ट होने का पता तो चल ही रहा है.

  6. बड़े भैय्या पाब्ला जी,
    मुझे गूगल वाले ई मेल के माध्यम से कहते हैं; की आप अपना ई मेल औरों के लिए भी ओपन करिये; जिसे मैंने कुछ ख़ास ख़ास लोगों के लिए ही स्वीकारोक्ति दी है. अगर मैं सबके लिए ओपन कर देता हूँ ; तो इससे कुछ समस्या तो नही होगी. कृपया समाधान करने की कृपा कीजियेगा.

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