आखिरकार दुनिया के उस इकलौते अद्भुत स्थान जा ही पहुंचे हम

भिलाई से पुणे, 1200 किलोमीटर जाने के लिए हम दोनों भाई एशियन हाईवे पर गाड़ी दौड़ाते राह में एक रात रूकने के इरादे से नांदेड जा पहुंचे थे और अगली सुबह बढ़ गए थे पुणे की ओर. जहाँ बिटिया कर रही थी इंतज़ार, अपने जुड़वाँ भाई की असामयिक मृत्यु के बाद आये उनके जनमदिन के मौके पर.

26 मई का वह पूरा दिन हमने बिटिया के लिए रख छोड़ा था. ना तो किसी ब्लॉगर से संपर्क किया और ना ही किसी फेसबुक मित्र से. अर्चना चावजी, उन दिनों नासिक में छुट्टियां बिता रहीं थीं और उन्हें मेरे सारे यात्रा कार्यक्रम की जानकारी थी, उनसे ज़रूर बात हुई. प्यारी सी बहना जो ठहरीं.

पुणे छावनी स्थित गुरूद्वारे में शीश नवाने पश्चात दिन भर बिटिया के साथ रहने के बाद मौक़ा था अपने प्रिय चैतन्य पराँठा में हाजिरी लगाने का ! सो एक चक्कर वहाँ भी लगा आए

पुणे के ऍफ़ सी रोड स्थित चैतन्य पराँठा में एक दौर

पुणे के ऍफ़ सी रोड स्थित चैतन्य पराँठा में एक दौर

पुणे की सड़कों पर दिखा शेवरलेट ऑटो रिक्शा

पुणे की सड़कों पर दिखा शेवरलेट ऑटो रिक्शा

पुणे से वापस लौटने का उपक्रम शुरू हुआ 27 मई की सुबह 4 बजे.

शहर से बाहर निकलते निकलते डेक्कन जिमखाना के पास एक जगह जमावड़ा दिखा चाय के लिए. हम भी रूक गए. चाय वाले के पास जा कर ‘दो चाय’ का निवेदन करते एक आम भारतीय सरीखे हमने भी उसकी पतीली में निगाह डाली. उसके पेंदे में थी अजीब सी बड़ी बड़ी पत्तियाँ, जैसे गन्ने के खेत से तोड़ कर लाईं हों. हालांकि उसने स्थानीय भाषा में कुछ बताया जो अपने पल्ले नहीं पडा. चचेरे भाई का अंदाजा था कि वह सुबह सुबह चाय के कारण होने वाली ‘गैस’ संबंधी समस्या से बचाती होगी.

शिकार करते शिकार हो गए

शिकार करते शिकार हो गए

सुबह सवा सात बजे तो हम अहमदनगर भी पहुँच चुके थे. वहाँ से हमने जाना था पैठण, जो अचानक ही मेरी यात्रा योजना में तब जुड़ गया था, जब गूगल मैप्स पर संभावित राह का सूक्ष्म अवलोकन किया जा रहा था अप्रैल माह में.

मुझे दिखी थी अजीब सी आकृति जो एक बड़े से जलाशय के पास थी, राह में ही थी यह जगह सो बना लिया मन यहाँ का भी.

पैठण बाग़

पैठण बाग़, आसमान से कुछ यूँ दिखता है

महाराष्ट्र के निवासी सहकर्मियों से पतासाजी की तो पता चला कि यह भव्य उद्यान काफी कुछ कर्नाटक के वृन्दावन गार्डन सरीखा है और बहुत बड़े क्षेत्र में फैला है. संगीतमय फव्वारों का भी शानदार प्रदर्शन होता है.

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औरंगाबाद की सरकारी वेबसाईट पर पैठण उद्यान का विहंगम दृश्य

और खोजबीन की तो ज्ञात हुआ कि यहाँ संत एकनाथ की समाधि है, यहाँ की ज़री वाली रेशमी साड़ियाँ, बनारसी साड़ियों से ज़्यादा खूबसूरत मानी जाती है, राजनैतिज्ञ शंकर राव चव्हाण, बाला साहिब पाटिल यहीं के हैं. गोदावरी नदी पर बना नाथ सागर बाँध है, जायकवाड़ी पक्षी अभ्यारण्य है.

और जब हम राष्ट्रीय राजमार्ग 222 पर गाड़ी दौडाते, शेवगाँव के रास्ते होते हुए पैठण पहुंचे तो सुबह के 10 बज चुके थे, जिस राह से जाना था वह कंक्रीट की सड़क में तबदील हो रही थी, चारों तरफ धूल का गुबार, मशीनों की गड़गड़ाहट, एक दूसरे से आगे निकलते वाहनों की होड़ के चलते गति 20 से अधिक नहीं हो पा रही थी.

NH222

NH222 पर

शेवगाँव के एक मोड़ पर

शेवगाँव के एक मोड़ पर

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शेवगांव से पैठण की ओर

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नाथ सागर बाँध

पहुँच तो गए लेकिन बाँध के ऊपर तक जाना भी तो है

पहुँच तो गए लेकिन बाँध के ऊपर तक जाना भी तो है 😀

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नाथ सागर बाँध के ऊपर पहुच गए तो एक फोटो ले ही ली जाए 🙂

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अपनी फोटो ही ना चिपकाई तो क्या मतलब 😀

गोदावरी नदी पर बना, 350 वर्ग किलोमीटर में फैला, यह बाँध महाराष्ट्र के बड़ी सिंचाई योजनायों में से एक है. जो औरंगाबाद व जालना जिले की जल संबंधी आवश्यकतायों की पूर्ति करता है. इसकी 1965 में इसकी नींव रखी थी प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने और उदघाटन किया गया था 1976 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा.

41 मीटर ऊंचे और 10 किलोमीटर लंबे इस बाँध की एक विशेषता ये भी है कि यह, एशिया में मिट्टी से बने बड़े बांधों में से एक है.

इरादा था उस मशहूर उद्यान के अवलोकन का लेकिन स्थानीय व्यक्तियों से बातचीत में पता चला इस भीषण गरमी में कोई फ़ायदा नहीं वहाँ घूमने का और फिर फव्वारे वगैरह तो रात को ही रंगीनियाँ बिखेरते है. इसलिए कुछ फोटो खींच लिए सनद के लिए 😀

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दोपहर के पहले ही साढ़े ग्यारह बजे हम दोनों भाई पैठण से रवाना हो चुके थे लोनार की ओर, जहाँ जाने की तमन्ना पिछले तीन वर्षों से थी क्योंकि पिछली बार मैं पुलिस वालों के साथ कारों की दौड़ के बाद पनपी परिस्थितियों के कारण चूक गया था

राह में सड़क किनारे एक बार फिर हमें वह अजीब से आकार की संरचनाएं दिखने लगीं जो हमें नागपुर – नांदेड के बीच दिखीं थी. एक – दो बार किनारे रूक कर जायजा लिया लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके कि आखिर हर आधे किलोमीटर बाद,  रिसते पानी वाला यह पांच दस फीट ऊंचा मोटा सा पाईप है क्या? और पानी आ कहाँ से रहा है? कई स्थानों पर तो नज़दीकी घरों तक प्लास्टिक के पतले पाईप जुड़े दिखे तो जिज्ञासा और बढ़ गई

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एक स्थान पर कुछ व्यक्ति उसी आकृति के पास बैठे दिखे तो उनसे की गई बातचीत के दौरान ज्ञात हुया कि यह पैठण बाँध से जालना शहर को जल आपूर्ति के उपक्रम में बनी योजना का अंग है. लगभग 5 फीट के व्यास वाले पाईप को ज़मीन के अंदर ही ‘दौड़ाया’ गया है और बीच बीच में ‘सांस’ लेने के लिए यह अनोखे सी आकृतियों ज़मीन के ऊपर निकाली गईं हैं. जहाँ कहीं पानी रिस रहा है वहाँ पास के घर वाले अपने उपयोग के लिए बाल्टी, ड्रम, पाइप के सहारे उसका उपयोग कर लेते हैं.

गाड़ी, दौड़ते हुए चले जा रही थी. जालना शहर की सीमा लगभग 15 किलोमीटर रह गई थी कि यातायात रूका हुआ मिला. सामने ही दिख रहे थे सड़क पर कतार से रखे हुए बड़े बड़े बरतन. जानकारी मिली कि पानी की तंगी के विरूद्ध, क्रुद्ध महिलाओं ने घड़े रख कर धरना दे दिया है और प्रदर्शन जारी है.

कुछ देर प्रतीक्षा की तो चचेरे भाई का सुझाव आया. ये धरना प्रदर्शन तब तक ख़तम नहीं होगा जब तक कोई जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी नहीं आयेगा. और इसमें देर ही लगेगी. पीछे एक मोड़ से दूसरी सड़क के सहारे जालना जाया जा सकता है, ऐसा मोबाईल पर गूगल मैप्स दिखा रहा.

अंबड -पारतुर-लोनार

मैंने अपनी मारूति ईको मोड़ी और चल दिए नई राह पर. पता नहीं कितनी देर तक हम गाड़ी दौडाते रहे जालना नहीं आया. मानचित्र देखा गया तो समझ आया कि हमारे मशीनी मित्र, जीपीएस नेवीगेटर ने हमें स्टेट हाईवे 177 के सहारे जालना शहर ना ले जा कर सीधे लोनार की राह पकड़ ली है और फिर पारतुर कस्बे को पार करते, स्टेट हाईवे 171 से होते, हम जा पहुंचे शाम 5 बजे लोनार झील के किनारे.

आकाशीय उल्का पिंड की टक्कर से निर्मित खारे पानी की दुनिया की पहली झील, लोनार का निर्माण करीब दस लाख टन के उल्का पिंड की टकराहट से होने का अनुमान है. करीब 1.8 किलोमीटर व्यास की इस उल्कीय झील की गहराई लगभग पांच सौ मीटर, परिधि 8 किलोमीटर है. इस लोनार झील के बारे में तीन वर्ष पहले ही मैं विस्तृत लेख लिख चुका, जिसे यहाँ क्लिक कर पढ़ा जा सकता है. इच्छा बस इसके साक्षात दर्शन करने की थी.

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सनद रहे कि हम गए थे

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लोनार झील के इस दृश्य पर क्लिक कर 5800 X 800 की वृहद पैनारोमिक छवि देखी जा सकती है

तेज हवायों के बीच, लोनार झील को जी भर कर अपनी नज़रों और कैमरों में कैद कर जब हमारी उत्कंठा शांत पड़ी तब भी सूरज अपनी सारी तेजी से चमक रहा था. समय महज साढ़े पांच का ही हुआ था. बीस हजार की आबादी वाले कस्बे का जायजा लेने निकले तो समझ आ गया कि यहाँ रात गुजारना बेमानी है.

विचार विमर्श पश्चात यह निर्णय लिया हम दोनों ने कि अगला बड़ा शहर अकोला है जो 130 किलोमीटर ही दूर है, जब तक वहाँ पहुंचेंगे अंधेरा होने ही वाला होगा, रात गुजार कर चल देंगे भिलाई की ओर.

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हम दोनों भाई, कुछ निश्चित अंतराल बाद आपस में सीट्स बदल लेते थे. ऐसे ही एक समय, पहाड़ों के ऊपर जब मैं ड्राइविंग सीट पर था तो अजय कुमार झा की आई कॉल का ज़वाब देते मेरे अंदर रहते, भाई ने यह खूबसूरत चित्र ले लिया. अकोला अभी 60 किलोमीटर दूर था.

लेकिन इसके बाद हमारे साथ वह हुआ जो हमने सोचा भी नहीं था. इस बारे में अगले लेख तक तो रूकना ही पड़ेगा. 😀

रुकेंगे ना?

आखिरकार दुनिया के उस इकलौते अद्भुत स्थान जा ही पहुंचे हम
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आखिरकार दुनिया के उस इकलौते अद्भुत स्थान जा ही पहुंचे हम” पर 29 टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही बढ़िया यात्रा वृतांत …..चलो अभी तक लोनार झील के बारे में पढ़ा था …आज आपकी वजह से दर्शन हो गये .
    पाबला जी , एक जिज्ञासा है , अगर लोनार झील उल्कापिंड से निर्मित है तो , बोर्ड पर लोनार क्रेटर क्यों लिखा था ? क्रेटर तो ज्वालामुखी के मुख को कहते है ! क्या ये ज्वालामुखी के मुख पर बनी झील है ?

    • Heart
      मुकेश जी
      बेशक इसे ज्वालामुखी के मुख के रूप में जाना जाता है लेकिन क्रेटर का अर्थ यह भी होता है:
      Bowl-shaped depression formed by the impact of a meteorite or bomb

      इसे कटोरे की आकृति का गड्ढा या विस्फोट के फलस्वरूप होने वाला गड्ढा कह सकते हैं हिंदी में

      चन्द्रमा या मंगल की सतह पर ऎसी हजारों छोटी बड़ी आकृतियाँ दिखती है

  2. पैठन एक महत्वपूर्ण जगह है. सन 200 के आसपास यह एक बड़े प्रतापी राजवंश “सतवाहनों” की राजधानि हुआ करती थी और इसका नाम था “प्रतिष्ठान”. लोनार झील ने तो मन मोह लिया. सुन्दर यात्रा वृत्तांत.
    टिप्पणीकर्ता PN Subramanian ने हाल ही में लिखा है: श्री फलMy Profile

  3. तीन साल बाद आपकी अधूरी यात्रा पूरी हो गई…। कितना अच्छा लगता है मनपंसद जगहों पर घूमना..। चलिए मंगल पर जाने का मौका मिले ने मिले मंगल ग्रह के इस पृथ्वी मिलन वाली जगह पर तो जरुर जाउंगा कभी न कभी। देखिए कब जाता हूं।

  4. वाह!! क्या यात्रा वर्णन किया है आपने। आप तो पक्के घुमक्कड़ लगते हैं। सुन्दर तस्वीरें और वीडियोस के लिए हार्दिक आभार। 🙂

  5. बहुत ही बढ़िया जगह जी जानकारी दी आपने, मेरी भी इस जगह घूमने की इच्छा जगा दी आपने, आप तो घूम लिए अब हमे भी जाना पड़ेगा, नहीं तो मन नहीं मानेगा,

    • Heart
      जब भी जायें
      अपने अनुभव साझा कीजियेगा

    • Smile
      सही अनुमान था हर्षवर्धन जी
      क्योंकि आपने लिंक्स दीं थी दो दो

      जबकि मैंने पहले ही तकनीकी सुविधा दे रखी है अपने ब्लॉग की अंतिम पोस्ट लिंक प्रदर्शित करने के विकल्प चुनने की

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  6. जिस रोचक शैली में आप लिखते हैं कि पूरा पढे बिना रहा हीं नही जा सकता।

  7. भाजी,
    आप लिखते सुन्दर शैली में है| खूब जानकारी भी देते हैं|
    vinnIe

  8. बहुत रोचक शैली में यात्रा वृत्तांत .मनोहारी चित्र .मन करता है अभी निकल पड़ें .

  9. दही पराठा दिखाकर ललचा दिया न? अब खाना ही पड़ेगा !
    माय ब्लॉग renikbafn.blogspot.com

  10. इस पर अब तक कमेंट क्यों नहीं हुआ मेरा, जबकि पोस्ट तो पहले पढ़ी और देखी है … प्यारी सी बहना हमेशा याद करती है उस समय को…. और वीर जी फ़िर मिलने का मन भी होता है … फ़िर मिलूंगी

    • Heart
      मिलूंगा मिलूंगा
      ज़रूर मिलूंगा प्यारी सी बहना से

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