द्विवेदी जी की भिलाई यात्रा: पहला दिन, डेज़ी की उछल कूद, भाई से मुलाकात व अगले दिन की योजना,

हालांकि शब्दों के सफर वाले अजित वडनेरकर जी के निवास से रवाना होकर द्विवेदी जी छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से भिलाई आ रहे थे। किंतु गफलत ना हो जाये इसलिये उन्हें एक छोटी सी जानकारी भी दे चुका था कि वे दुर्ग स्टेशन पर ही उतरें, मैं वहाँ मौज़ूद रहूंगा।

दरअसल भिलाई एक ऑद्योगिक टाऊनशिप का आकार लिये हुये है तथा इसी नाम के रेल्वे स्टेशन से सड़क परिवहन की सुविधा संतोषप्रद नहीं है। दुर्ग, इस क्षेत्र का एक जंक्शन स्टेशन है व रेलगाड़ियों के रूकने का समय भी किंचित अधिक ही होता है।

जब द्विवेदी जी द्वारा सुपुत्र के साथ आने की सूचना पक्की हो गयी , तो पहला विचार मेरे मन में पिता-पुत्र द्वय के ठहरने की व्यवस्था का आया था क्योंकि आबंटित सरकारी निवासों की अपनी बनावट व रखरखाव का तरीका होता है।

मेरे आबंटित आवास से लगभग कुछ सौ मीटर की दूरी पर ही हमारे संस्थान का एक भव्य होटल है जिसके बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स, अल्पकाल के लिए कम्पनी अपने कर्मचारियों को मामूली से किराये पर उपलब्ध करवाती है। कागजी कार्यवाही पूरी करने के लिए जब मैंने एक दिन पहले संबंधित अनुभाग प्रमुख से सम्पर्क किया तो बड़ी विनम्रता से बताया गया कि कोई गुंजाईश ही नहीं है। प्रधानमंत्री ट्रॉफी हेतु आंकलन समिति के पुनर्निर्धारित कार्यक्रम के कारण तमाम बुकिंग्स रद्द कर दी गयी हैं, नई बुकिंग का तो सवाल ही नहीं!

मैंने सोचा, अब जो होगा देखा जायेगा।

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भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा संचालित भिलाई निवास का बाहरी दृश्य

28 जनवरी की सुबह जब द्विवेदी जी को मोबाईल में सम्पर्क किया गया तो पता चला कि वे अभी गोंदिया में हैं। अंदाजन समय की गणना कर मैं और गुरूप्रीत घर से निकल चले। आराम से वैन चलाते हुये जब स्टेशन के नज़दीक पहुँचे तो पाया कि दल्ली राजहरा जाने वाली रेल ट्रैक पर रेल्वे क्रॉसिंग बंद है।

अभी इग्नीशन ऑफ किया ही था कि मोबाईल में द्विवेदी जी की तस्वीर उभरी। पता चला कि गाड़ी पहुँच चुकी, इंतज़ार किया जा रहा!

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भिलाई टाउनशिप के चौक पर बना यह भव्य ग्लोब दर्शाता है कि पूरी धरती को साढ़े सात बार लपेट सकने वाली दूरी के बराबर की रेल पांते, भिलाई इस्पात संयंत्र बना चुका

जब हम पहुँचे तो द्विवेदी जी सामने ही खड़े दिख गये। मैं और द्विवेदी जी पीछे बैठे, गुरुप्रीत व वैभव आगे। गर्मजोशी से जो बातें शुरू हुयी तो लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं, आखिर चैट और फोन पर इतनी बातें हो चुकी थीं कि औपचारिकता की गुंजाईश ही नहीं बची थी।

इस जुड़वाँ शहर की सीमारेखा पर मैंने द्विवेदी जी को बताया कि यहाँ दुर्ग खत्म हुया और भिलाई शुरू हुया। सेक्टर 9 चिकित्सालय के सामने से सेंट्रल एवेन्यू पर, रेल चौक से मुड़ते हुये भी जब उस ग्लोब का अर्थ बताया तो महसूस हुया कि द्विवेदी जी शायद किसी दौड़ में प्रथम आने की उत्कंठा लिये कहीं और खोये हुये हैं।

रहस्य तब खुला जब घर के पास पहुँचते ही वे फिनिशिंग लाईन को छूने वाले अंदाज में बोल पड़े ‘आ गया घर’ अंदाज तो लगा चुका था, फिर भी पूछा मैंने कि कैसे पता लगा? वे बोले इन केसरिया फूलों से लदी चहारदीवारी को देख कर!

मैंने उन्हें बताया कि यह हमेशा नहीं रहते, गर्मियों में कुछ और नज़र आयेगी इनकी रंगत। असल में, वे इसे पहले यहाँ देख चुके थे।

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गर्मियों व जाड़ों में हमारे निवास की चहारदीवारी के दो रूप

गेट खोलने के पहले ही डेज़ी की दोस्ताना उछल कूद शुरू हो चुकी थी। हल्की सी डाँट पड़ी तो शिकायत भरा लहजा लिये द्विवेदी जी व वैभव की गंध को नथुनों में भरने का उपक्रम करती टहलने लगी।

मेरे माता पिता बाहर ही लॉन में थे। औपचारिक अभिवादन के आदान प्रदान के बाद द्विवेदी जी को मैं सीधे अपने कम्प्यूटर-सह-शयन कक्ष में ले गया।

अब यह कक्ष उनके हवाले था।

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डेज़ी की एक मुद्रा

तरोताज़ा हो कर, नाश्ता कर हम तीनों ही 6 किलोमीटर दूर भिलाई तकनीकी संस्थान की ओर, अपनी वैन से चल पड़े।

सीढ़ियाँ चढ़ते ही द्विवेदी जी एकाएक वाह कह उठे। उन्हें सामने ही पंडित जवाहरलाल नेहरू का विशाल पोर्ट्रेट नज़र आ गया था। प्रशिक्षण अधिकारी श्री पीके तिवारी के कक्ष में भी उन्होंने जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन का पोर्ट्रेट देखा तो मुक्त कंठ से सराहना किये बिना नहीं रह सके।
उनका कहना था कि ऐसे चित्र अब इनी-गिनी जगहों पर ही दिखते हैं। प्रधानमंत्री ट्रॉफी हेतु आंकलन समिति के कार्यक्रम के चलते तिवारी जी कक्ष में मौज़ूद नहीं थे। वैसे भी अब प्रति सोमवार को पंजीयन का कार्य होने की सूचना का परिपत्र सामने था।
द्विवेदी जी को संस्थान की केंद्रीय लाईब्रेरी भी पसंद आयी। लगभग हर तकनीकी विषय की नयी पुरानी पुस्तकें व ताज़ा पत्रिकायों से वे बेहद प्रभावित थे।
लौटते समय मैं उन्हें सेंट्रल एवेन्यू से ले गया। टाउनशिप की हरियाली देख वे अभिभूत थे। संयंत्र प्रबंधन ने वर्षों पहले जो सघन वृक्षारोपण का अभियान चलाया था, उससे मुझे, स्वयं भी कई बार किसी जंगल में पहुँच जाने का आभास होता है।
भोजनोपरांत द्विवेदी जी ने कम्प्यूटर के सामने आसन जमाया लेकिन थोड़ी देर बाद ही यात्रा की थकावट व भोजन पश्चात की खुमारी के असर से, साथ ही लगे दीवान पर जा पहुँचे।
शाम को जब मैं कि्सी कार्य से उस कक्ष में पहुँचा तो देखा कि मेरी आहट पा कर, डेज़ी अपने कान पीछे झुकाये बाहर की ओर खिसक रही है। द्विवेदी जी जगे हुये मिले तो मैंने आशंकित हो कर पू्छा ‘इसने परेशान तो नहीं किया?’ वे हंस कर बोले ‘अरे नहीं! वह तो पहचान बढ़ा रही थी।
अब पता नहीं क्या तरीका रहा होगा पहचान बढ़ाने का!
अंधेरा जब छाने लगा तो हम तीनों ही पैदल चल पड़े, द्विवेदी जी की बुआ के पुत्र के घर, जो लगभग 800 मीटर की दूरी पर मैत्री कुंज जाने वाली सड़क पर बीएसएनएल कालोनी में है।
उनके सरकारी निवास का दरवाजा खुलते ही मुझे आभास हो गया कि कुछगड़बड़ हो गयी है। दरअसल जब द्विवेदी जी ने अपने इन भाई सा’ब के की चर्चा की थी तो मैंने किसी अपनत्व की भावना के वशीभूत उन्हें मना लिया था कि रहियेगा हमारे यहाँ ही, आप तो बस उन्हें (अवनींद्र शर्मा) सरप्राइज़ ही दीजियेगा, एकाएक पहुँच कर।
पारिवारिक वातावरण में हो रही बातचीत के बीच मुझे श्रीमती शर्मा की स्वभाविक नाराज़गी महसूस होती रही हम भी तब, डेज़ी जैसे अपने कान झुकाये बैठे रहे!
रात्रि भोजन के लिए द्विवेदी जी मना कर चुके थे। हंसी ठट्ठे में काफी समय बीत गया।
अभी हम उस कालोनी के गेट पर विदा ले ही रहे थे कि आरम्भ वाले संजीव तिवारी जी ने मोबाईल पर सम्पर्क किया। द्विवेदी जी से उनकी लम्बी बातचीत में यह तय हुया कि 29 जनवरी के सुबह रायपुर चला जायेगा तथा 30 की दोपहर दुर्ग बार एसोशिएसन के कार्यक्रम में।
वापस घर लौटते हुये, अवनींद्र जी भी हमारे साथ ही आ गये थे। कुछ समय हमारे निवास पर उन्होंने फिर आने का वायदा कर विदा ली। इधर, हमारे सुपुत्र भोजन के लिए नज़दीक के पारिवारिक रेस्टोरेन्ट, मधुरम जाने का मन बना चुके थे। बड़ी मुश्किल से द्विवेदी जी को मनाया गया
धीमी रोशनी में, सुमधुर संगीत के बीच, अनेक विषयों पर ढ़ेरों बातें हुयीं। हालांकि वह एक ऐसा रेस्तरॉ है, जहाँ बिना महिला सद्स्य के नहीं जा सकते, किंतु मैंने विशेष अनुमति ले ली थी।
(रात के समय हमारे सरकारी निवास का एक दृश्य)
जब हम लौट रहे थे तो सड़कें लगभग सूनी हो चुकीं थीं। मौसम सर्द बना हुया था। द्विवेदी जी की आँखों में नींद साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने कोशिश तो की कम्प्यूटर के सामने कुछ समय बिताने की लेकिन आँखे बोझिल होते ही फिर दीवान पर जा पहुँचे।
उधर वैभव और गुरूप्रीत अपनी मस्ती में बतिया रहे थे। हमने भी कुछ वक्त बिताया नेट पर और अगले दिन रायपुर यात्रा के बारे में सोचते हुये दूसरे शयन कक्ष की ओर बढ़ चले।
यह था पहला दिन।
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द्विवेदी जी की भिलाई यात्रा: पहला दिन, डेज़ी की उछल कूद, भाई से मुलाकात व अगले दिन की योजना,” पर 6 टिप्पणियाँ

  1. …बाकि सब तो बढिया लगा लेकिन …..बस डेज़ी से डर गए

  2. जब रिश्ते टूट रहे हों तब आप लोग ब्लॉग्स के ज़रिये एक नया समाज गढ़ रहे हैं, सैल्यूट आपको।

  3. अरे वाह !ये तो अच्छा रहा जी ..चित्र भी अच्छे हैं…. डेजी खतरनाक लगती है

  4. सब को पता नहीं क्यों डेजी डरावनी लग रही है। वह तो बहुत प्यारी बच्ची है। हाँ मुहब्बत हो जाए तो शैतानी जरूर करेगी। लेकिन प्यार भरी।

  5. किसी जमाने में क्रिकेट की कमेंट्री रेडियो पर सुना करते थे तब टी वी नहीं हुआ करते थे। आप की पोस्ट पढ़ कर वो दिन याद आ गये। सलाम है आप की यादाश्त को जो एक एक डिटेल याद रखी। बहुत ही मजा आया, ऐसा लगा जैसे हम भी भिलाई घूम लिए। लेकिन एक बात बताइए जी आज तक बचपन से सुना है कि लड़कियां जब कभी घर से बाहर जाने की इजाजत मांगती हैं तो मां बाप कहते हैं भाई को साथ ले जाओ। अब भिलाई में कुछ उल्टा है जी, मर्द खाना खाने बाहर जाते हैं तो महिलाओं को साथ ले जाना पड़ता है। …॥:)

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