द्विवेदी जी की भिलाई यात्रा: दूसरा दिन, वैन की समस्या, रायपुर प्रेस क्लब तथा हमारे कारखाने की युवती

द्विवेदी जी के साथ जब देर रात उस पारिवारिक रेस्टोरेंट से लौटे तो उनकी आँखों में नींद साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने कोशिश तो की कम्प्यूटर के सामने कुछ समय बिताने की लेकिन आँखे बोझिल होते ही फिर दीवान पर जा पहुँचे। हमने भी कुछ वक्त बिताया नेट पर और अगले दिन रायपुर यात्रा के बारे में सोचते हुये दूसरे शयन कक्ष की ओर बढ़ चले। सुबह जब 10 बजे तक रायपुर के लिए रवाना होने का इरादा बन चुका था तो आरंभ वाले संजीव तिवारी जी का फोन आया कि छत्तीसगढ़ में द्विवेदी जी के आगमन से उत्साहित दुर्ग अधिवक्ता संघ तथा अभिभाषक वाणी के सदस्य उनसे मिलना चाहते हैं। इसी सिलसिले में अधिवक्ता व अभिभाषक वाणी के संपादक शकील अहमद सिद्दीकी मुलाकात करना चाह रहे हैं। मैंने उन्हें बताया कि रायपुर जाने का कार्यक्रम बना हुया है ज़्यादा समय दे पाना मुश्किल होगा।

(संजीव तिवारी जी , दिनेशराय द्विवेदी जी , शकील अहमद सिद्दीकी जी के साथ मैं)

लेकिन जब समान विचारधारा के व्यक्ति आपस में बैठे तो समय कैसे बीता, पता ही नहीं चला। सिद्दीकी जी ने अभिभाषक वाणी का ताज़ा अंक द्विवेदी जी को दिखाया और जानकारी भी दी कि इस पत्रिका का इंटरनेट संस्करण भी उपलब्ध है, जो संभवत: भारत में किसी बार एसोशिएशन का प्रथम प्रयास है। इसी मुलाकात में यह भी तय हो गया कि अगले दिन, 30 जनवरी को द्विवेदी जी के वापस रवाना होने के पहले एक संक्षिप्त कार्यक्रम बार एसोशिएशन में रखा जाये।

घर से निकलते हुये आवारा बंजारा वाले संजीत त्रिपाठी जी को रायपुर में सूचना दी कि हम, अब रवाना हो पा रहे हैं। लेकिन याद आया कि अपनी मारूति वैन कुछ डगमगा सी रही है शायद अगले चक्कों का एलायनमेंट गड़बड़ा गया है। अब एक्सप्रेस हाईवे पर ऐसी अवस्था में वाहन उतारना ठीक नही लगा, सो फोन लगा कर पहुँचने की सूचना दे कर रास्ते में ही पड़ने वाली उस कम्प्यूटराईज़्ड मशीन के हवाले कर दी गयी वैन। बमुश्किल 15 मिनट ही लगे होंगे काम पूरा होने में। भुगतान कर जैसे ही हमने एक्सीलेटर पर पाँव दबाया तो इंजिन की गुर्राहट में कोई तब्दीली नहीं हुयी। करीब के मैकेनिक ने बताया कि एक्सीलेटर की अंदरूनी तार टूट गयी है। इसे बदलवाते कुछ और समय बीत गया! अभी हम रायपुर से कुछ दूरी पर ह
ी थे कि संजीत जी का फोन आ गया कि कहाँ तक पहुँचे? हमने बताया कि टोल प्लाज़ा पर हैं, रहे हैं। रायपुर शहर के ट्रैफिक को देखते हुये आधा घंटा और।

(भिलाईरायपुर की सीमा पर बना टोल टैक्स प्लाजा)

जब हम रायपुर के मोती बाग स्थित प्रेस क्लब के कार्यालय पहुँचे। दोपहर के एक बज रहे थे। अनिल पुसदकर जी, संजीत त्रिपाठी जी अपने साथियो के साथ बाहर ही इंतज़ार करते मिले। मैं स्वयं भी इन दोनों से पहली बार मिल रहा था। गर्मजोशी से हुये अभिवादनों के आदान-प्रदान के बाद पूरी इमारत का भ्रमण करवाया गया, विभिन्न साथियों से मिलवाया गया। मुख्य सभागार में ही हम सभी बैठे। कुछ तो प्रेस क्लब के साथी थे और कुछ विभिन्न क्षेत्रों के आमंत्रित गण। कार्टून वाच के त्रियंबक शर्मा, दूरदर्शन के श्री झा तो थे ही, थोड़ी देर में रायपुर शहर के महापौर भी आ पहुँचे। ब्लॉगजगत के साथ-साथ अन्य सामयिक विषयों पर चर्चा चलती रही। महापौर सुनील सोनी से हाथों द्विवेदी जी को एक खूबसूरत सा स्मृति चिन्ह प्रदान किये जाने के साथ ही यह छोटी सी समारोहनुमा मुलाकात समाप्त हो गयी।

(दिनेशराय द्विवेदी जी को स्मृति चिन्ह प्रदान करते रायपुर के महापौर श्री सुनील सोनी)

वक्त दोपहर के भोजन का था जिसके लिए अनिल पुसदकर जी ने मानातूता के घने वनों के बीच व्यवस्था करवा रखी थी। हम सभी (द्विवेदी जी, वैभव, संजीत त्रिपाठी, अनिल जी और मैं) अनिल जी की स्कॉर्पियो में जब माना हवाई अड्डे के पास स्थित अतिथि गृह में पहुँचे तो शहर की आपाधापी से दूर एक अजीब सी शांति का अनुभव हुया। भोजन लगभग तैयार था। सादे किंतु सुस्वादु भोजन के पश्चात, बाहर बरामदे की कुर्सियों पर फिर महफिल जमी। इस बार चर्चा में छत्तीसगढ़, रायपुर, नक्सलवाद, विनायक सेन, ब्लॉग, बस्तर, आदिवासी, राजनीति, विकास, विवाद, सेहत, सराहना, जैसे विषय शामिल थे। समय बीतते चले गया। अंधेरा छाने लगा तो याद आया कि कल रात ही, आज का रात्रिभोजन अवनींद्र शर्मा जी के निवास पर निश्चित किया जा चुका है। समय पर पहुँचना चाहिए। कॉफी का एक दौर चलने के बाद हम लौट चले वापस प्रेस क्लब की ओर, जहाँ हमारी वैन खड़ी थी।

अभी हम भिलाई अपने निवास पर पहुँचे ही थे कि अवनींद्र जी का फोन आ गया। वे मुझे भी रात्रि-भोजन पर बुला रहे थे। मैंने द्विवेदी जी की मार्फत अपने शामिल ना होने की बात कहलवा दी क्योंकि मेरे अपने मत में एक पारिवारिक माहौल के भोज में मेरा शामिल होना ठीक नहीं था। द्विवेदी जी भी मेरी भावना समझ चुके थे। देर रात द्विवेदी जी लौटे तो अवनींद्र जी भी साथ थे। इस बार उन्होंने तसल्ली से बैठ कर हम लोगों के साथ कॉफी का आंनंद उठाया और हमारे कारखाने की तारीफ भी की।

(मेरे निवास के मुख्य कंप्यूटर कक्ष का एक दृश्य)

कारखाना!? मैं भी चौंका था यह शब्द सुन कर। यह तो बाद में द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया था कि वे तो दरअसल हमारे मुख्य कम्प्यूटर और उससे जुड़े तामझाम और स्थापित सॉफ्टवेयरों से होने वाले कार्यों की बात कर रहे थे। उन्हें घर के विभिन्न कक्षों में कम्प्यूटर तथा आपस में जुड़ी संचार इंटरनेट व्यवस्था पसंद आयी

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द्विवेदी जी की भिलाई यात्रा: दूसरा दिन, वैन की समस्या, रायपुर प्रेस क्लब तथा हमारे कारखाने की युवती” पर 4 टिप्पणियाँ

  1. आपका कारखाना देखने ज़ल्द आना पड़ेगा भिलाई।

  2. ye beimani hai.. ham aapke karkhane vali yuvti ko dekhne aapke blog par aaye the, magar kuchh bhi nahi dikha.. 🙁
    🙂

  3. ‘कारखाना’ देखने आना ही पड़ेगा लगता है।
    वैसे ये गलत बात है साहब, युवती का झांसा देकर बुला लिये, और हम इधर आए तो कंप्यूटर दिखा रेले हो 😉

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