काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए

11 सितंबर को छत्तीसगढ़ के भिलाई से, काठमांडू की ओर सड़क मार्ग से जाते हुए उत्तर प्रदेश में हमारा पहला पड़ाव था रॉबर्ट्सगंज कस्बा. जहाँ हम तीन हिंदी ब्लॉगर्स ने रात्रि विश्राम किया. अब योजनानुसार हमें अगले दिन 12 सितंबर को भारत – नेपाल सीमा पार कर लेनी थी या फिर उससे पहले कहीं रूकना था.

सुबह जब मेरी आँख खुली तो ललित शर्मा नहा कर स्नानागार से निकल ही रहे थे. मैंने नाराज़गी का पुट लिए शिकायत की कि जब आप उठ गए थे तो मुझे भी जगा देना था, नहाने के पहले शरीर का तापमान कुछ सामान्य तो हो जाता! ललित जी ने विनम्रता से मेरे कुछ देर और सोए रहने देने की बात समझाई.

हम तीनों जब तैयार हो नीचे उतरने लगे तो ललित जी ने बताया कि हमारे सहयात्री बनने से चूक गए अरविंद मिश्रा जी लखनऊ से रवाना हो, आज सुबह रेलगाड़ी द्वारा रॉबर्ट्स गंज पहुँच रहे हैं. अब चूंकि समय सीमित ही था अत: सर्वसम्मति से हम आगे की ओर सुबह साढ़े पांच बजे रवाना हो गए.

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

रवाना होने के पहले हमें पिछली शाम ललित शर्मा जी के उस मित्र की याद आ गई, जहाँ एक छोटे से विश्राम काल में चाय का दौर चला था. उनके मित्र दो दिन पहले ही अपने वाहन द्वारा काठमांडू से लौटे थे और उनका साफ़ कहना था कि गोरखपुर की ओर जाते हुए आज़मगढ़ हो कर ही जाएँ, गाजीपुर हो कर ना जाएँ, उधर सड़क बहुत खराब है.

मैंने एक बार फिर अपने मोबाइल पर राह देखी तो वह आज़मगढ़ से गुजरती दिखी. उसके बाद तो बड़े आराम से हमने अपनी सुरीली रोबोट कन्या नेवीगेटर को भी कह दिया कि हमें गोरखपुर तो पहुंचा ही दे. साथ ही साथ उसे पंजाबी ज़ुबान में रास्ता बताते जाने की भी ताकीद कर दी. क्योंकि हिंदी बोलते समय उसके द्वारा कहे गए दांयें और बांयें के चक्कर में कई बार धोखा हो चुका था.

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कस्बे से बाहर निकल, पेट्रोल डलवा कर, खुशगवार मौसम के बीच हम बड़े आराम से चले जा रहे थे. 35 किलोमीटर बाद, मुख्य मार्ग से अपेक्षाकृत एक कम चौड़ी सड़क पर जब हमारी कन्या नेवीगेटर ने मुड़ने की गुजारिश की तो कुछ संशय हुया. एक बार फिर मोबाईल पर राह देखी गई और निश्चिंत हो हम फिर चल पड़े सुझाए गए रास्ते पर.

आराम से हम चलते जा रहे थे कि अचानक निगाह पड़ी सड़क किनारे के सूचना पट्ट पर, जिसमें चुनार की दूरी दर्शाई गई थी. ललित जी तो उछल ही पड़े -अरे! ये तो चन्द्रकान्ता वाला चुनार है, चुनारगढ़. बस फिर क्या था, यह निश्चित कर लिया गया कि चुनारगढ़ का यह किला देख कर ही आगे बढ़ेंगे.

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रॉबर्ट्सगंज – चुनारगढ़ मार्ग पर सेमरी के पास सुबह 8 बजे

इधर गिरीश पंकज जी समय की कमी को ले कर अनमयस्क हो रहे थे लेकिन हम दोनों ने, उनकी व्यग्रता को वीटो कर दिया 🙂

अभी कुछ आगे बढ़े ही थे कि साधू वेशधारी व्यक्तियों की आवाजाही दिखने लगी और एक दुर्गम पहाड़ी मोड़ पर महंगी बड़ी बड़ी गाड़ियों का झुण्ड व किसी अनुष्ठान की झलक दिखी तो जिज्ञासा हुई. ज़रा सा आगे जाने पर सड़क पर ही शकतेसगढ़ में एक भव्य आश्रम मिला –श्री परमहंस आश्रम.

एक नज़र प्रवेश द्वार पर डाल हम उत्सुकतापूर्वक चलते रहे चुनार की ओर

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चुनारगढ़ की चाय

आखिरकार रॉबर्ट्सगंज से 65 किलोमीटर दूर आ कर दिखा चुनार.

सामने दिखा ठिकाना, तो मिट्टी के दीयों सरीखे छोटे कुल्हड़ में पी गई चाय. जिस कुर्सी पर मैं बैठा था वह इतनी नाज़ुक थी कि लगा वह अब टूटी तब टूटी. अब उसके टूटने पर पीछे गिरने की बजाय सामने भागूं ये बेहतर ही था. :-).

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चुनारगढ़ किले के सामने

चाय पीते पीते ललित जी ने चुनार के बारे में कुछ नई बातें पता कर लीं.

हमने अपनी गाड़ी मोड़ी और पहुंच गए चुनार के किले के सामने, सुबह सवा आठ बजे. पता चला कि किले के काफी बड़े हिस्से पर पुलिस का कब्जा है. देखने के लिए जो हिस्सा बचा है उसके लिए अपना विवरण, इस कार्य के लिए नियुक्त पुलिस जवान को दर्ज़ करवाना होता है.

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प्रवेश स्थल की खानापूर्ति

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ऐसा भी होता है

किले में हम तीनों अपनी अपनी रूचियों अनुसार टहलते रहे, जायजा लेते रहे.

एक मौके पर कभी बंदीगृह रहे कक्ष में जब गिरीश जी पहुंचे और ललित जी भी लपक कर अंदर जाने लगे तभी हमने कैमरा क्लिक कर लिया.

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शरीर को आराम देते क्षणों में गिरीश पंकज जी संग
फोटो ली कैमरे ने

किले के भीतर एक खिड़कीनुमा स्थान की मोटी मोटी लोहे की छड़ों को मोड़ कर किसी मनुष्य के अंदर बाहर हो सकने लायक स्थान बना देख मैंने वहाँ से नीचे झांका तो धरती पर साफ़ दिखाई दिया लोगों के आने जाने से बने चिन्ह.

इस बारे में पूछे जाने पर अनभिज्ञता जताते हुए पुलिस का जवान रटा रटाया ज़वाब दोहराते रहा कि अंधेरा होने के बाद कोई भी अंदर नहीं आ सकता.

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लगभग एक घंटे बाद, सवा नौ बजे एक बार फिर हम थे अपनी राह पर, गोरखपुर की ओर.

नेवीगेटर पर दिखना शुरू हो गया था कि चंद किलोमीटर बाद ही कोई महत्वपूर्ण, चौड़ी सी सड़क आने वाली है. टेंगड़ा मोड़ आते ही पता चल गया कि ये तो जी टी रोड है, विश्व सुन्दरी बाय पास, नेशनल हाईवे 2 और अब यह हिस्सा है एशियन हाईवे 1 का.

तब तक भूख लग चुकी थी. हाईवे पर आते ही सड़क किनारे सुल्तानपुर के पास भित्ति स्थित एक ढ़ाबे पर हमने नाश्ता किया और सरपट दौड़ा दी गाड़ी उस चौड़ी, चार लेन वाली सड़क पर. 100 किलोमीटर की रफ़्तार से भागती मारूति ईको में हम तीनों को हर स्थान टोल प्लाज़ा नज़र आ रहा था. लेकिन आखिरकार जहाँ पर हमारी साथी कन्या नेवीगेटर ने पंजाबी में बाएं मुड़ने का आग्रह किया वहाँ तक तो टोल पटाने की नौबत नहीं आई

जिस सड़क पर हम मुड़े थे वहीं मौजूद था एक पुलिस सिपाही, जिसने पूछे जाने पर कुछ दूर तक राह खराब होने और उसके बाद ठीक होने की बात बताई. वाकई में कुछ किलोमीटर तक तो सड़क ऊबड़खाबड़ थी लेकिन उसके बाद चिकनी सड़क देख दिल खुश हो गया. हम हंस रहे थे ललित जी के मित्र पर कि उन्होंने शुरूआती हाल देख कर अपनी गाड़ी मोड़ ली होगी, आगे बढे ही नहीं होंगे, जैसे हम आ गए हैं.

यह हँसी-ठठा तब थमा हमारे सामने टूटी फूटी सड़क, मिट्टी के लंबे लंबे ढेरों और नालियों की गहराई ऊँचाई में बदलती दिखी. मैं, किसी उम्मीद में गाड़ी को आगे बढ़ाते गया. नतीजतन रफ़्तार 10 किलोमीटर से भी कम हो गई. कंदवा नामक गाँव के इस मंगल ग्रह जैसी जगह पर दो बार तो गाड़ी इतनी तिरछी हुई कि लगा अब पलटे अब पलटे.

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ये है उत्तर प्रदेश में नेशनल हाईवे 97

थमी हुई साँसे लिए जब मैंने किसी तरह बच कर आगे निकलने की कोशिश की तो अंदाज़ नहीं लगा पाया सूख चुके कीचड़ वाली कठोर मिट्टी की सतह का.

फिर क्या था! गाड़ी का निचला हिस्सा जा टिका उस पर. बहुत कोशिश कर ली, गिरीश जी, ललित जी ने आसपास के लोगों को ले कर धक्का लगा लिया लेकिन चक्के हवा और मिट्टी में ही घूमते रहे.

दोनों तरफ से आते जाते ट्रक हमें देख दूर ही रूक चुके थे. कोई चारा ना देख मैंने ललित जी को किसी ट्रक वाले से आग्रह करने को कहा कि वह हमारी कार को रस्सी से बाँध कर सामान्य जगह पर ले आये. जब तक ललित जी कुछ करते तब तक सबसे आगे खड़े, नागालैंड की नंबर प्लेट वाले ट्रक से उसका नौजवान ड्राईवर कूद कर फुर्ती से आया और जायजा ले अपने ट्रक से रस्सा निकाला, मारूति से बाँधा और पीछे की ओर खींच ले जाने को तैयार हो गया. मैंने भी स्टेयरिंग संभाला और उसकी सहायता से ईको को ले जा खडा किया सपाट जगह.

तब तक आसपास के लोगों ने सलाह दे दी थी कि वापस, उसी फोर लेन पर लौट कर मुगलसराय, वाराणसी होते जाना पडेगा गोरखपुर. मरता क्या ना करता के अंदाज़ में हम लौट आये फिर उसी एशियन हाईवे पर और जिधर से आये थे उधर की दौड़ लगा दी.

इस सारी कसरत में हमारा सवा दो घंटे का समय नष्ट हो चुका था. ललित जी नाराज़गी प्रकट करते हुए नेविगेटर कन्या को लानतें भेज रहे थे कि इसी ने गलत राह सुझाई थी. किसी काम का नहीं यह यंत्र. मैंने समझाने की असफल कोशिश की यह गलती उसकी नहीं, उसने तो अपनी समझ से हमें कम दूरी वाला नेशनल हाईवे सुझाया था, गलती तो सड़क की व्यवस्था करने वालों की है जो ठीक नहीं रख पा रहे राहों को.

दोपहर एक बजे हमने मुगलसराय होते हुए रूख किया वाराणसी का. काशी रेल स्टेशन के पास से गोलगद्दा रोड होते हुए वाराणसी रेल स्टेशन को पार कर हमारी रोबोट कन्या ने राजा बाज़ार रोड, कचहरी रोड, दौलतपुर रोड से ले जा कर हमें वाराणसी से बाहर राष्ट्रीय राजमार्ग 233 पर पहुंचा दिया.

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वाराणसी शहर में प्रवेश करते

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वाराणसी पुरातत्व विभाग की इमारत के पास, लाल खान का मकबरा
(दौड़ती कार से लिया गया चित्र)

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वाराणसी शहर का हाल

गंगा जमना संस्कृति के क्षेत्र में सांस्कृतिक धरोहर कहे जाने वाले वाराणसी के माहौल ने मुझे बहुत निराश किया.

चारों ओर बड़े बड़े कूड़े के ढेर, सडकों पर धूल के गुबार. शायद ही कोई सड़क हमें साबुत मिली हो. सभी सडकों के बीचों बीच दूर दूर तक शायद सीवरेज पाइप के लिए खुदाई की गई थी, जिसे पाटा भी नहीं गया था. ऊपर से अनियंत्रित यातायात.

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हरे भरे खेतों के बीच जामिया इस्लामिया

इस मोह भंग के बाद हम थे राष्ट्रीय राजमार्ग पर 233 पर. पौने तीन बज चुके थे.

एक आम सी बनी सड़क पर मैं अपनी रफ्तार में मारुति ईको को दौडाए जा रहा था. राहगीरों को देख सहज अनुमान लगाया जा सकता था कि यह इलाका मुस्लिम बहुल आबादी वाला है.

तभी थनौली के पास हरे भरे खेतों के बीच एक मस्जिद नुमा लंबी चौड़ी झक्क सफ़ेद इमारत दिखी. जिज्ञासा हुई तो गूगल द्वारा पता चला कि यह भारत स्थित अरबी विश्वविद्यालय जामिया इस्लामिया है.

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वाराणसी – आज़मगढ़ के बीच नेशनल हाईवे 233 पर

काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले रोचक संस्मरणों का संक्षिप्त विवरण यहाँ क्लिक कर देखें »

 

आज़मगढ़ स्टेशन के पास शाम 5 बजे गुजर कर स्टेट हाईवे 66 से हो कर, नेशनल हाईवे 29 पर जब हमारी गाड़ी चिल्लूपार पहुंची तो लगा कि इन सड़कों के लिए जिम्मेदार लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए. वहां से गोरखपुर की सारी राह हमने पानी पी पी कर, जी भर कोसा सड़क को, उसके आकायों को. इस राह पर तीस किलोमीटर की दूरी पार करने में हमें डेढ़ घंटे से भी अधिक का समय लग गया.

आखिरकार हम गोरखपुर की सीमा पर पहुँच ही गए रात 10 बजे. अपनी रोबोटिक कन्या यह बता चुकी थी कि नज़दीकी गोरखपुर – बेलीपार सड़क पर विंध्यवासिनी नगर में होटल्स का जमावड़ा है, उधर ही चल पड़ो.

और जब उस रात मैंने आखिरी बार गाड़ी का इंजिन बंद किया होटल की पार्किंग में तो समय हो रहा था पौने ग्यारह. एक बार फिर रुकते रुकाते 450 किलोमीटर का सफ़र 17 घंटों में, अकेले ड्राइव करते.

आप कर पायेंगे इतना बढ़िया सफ़र?

अगली कड़ी में क्लिक कर पढ़िए भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू

काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
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मेरी वेबसाइट से कुछ और ...

7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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7 दिनों में, भिलाई से सड़क मार्ग द्वारा
काठमांडू आने जाने के लिए हुई 3000 किलोमीटर की यात्रा वाले प्रतिदिन के रोचक संस्मरण 8 हिस्सों में में लिखे गए हैं. जिन्हें रुचि अनुसार पढ़ा जा सकता है इन कड़ियों पर क्लिक कर

  1. काठमांडू सफ़र के पहले की दहशत
  2. काठमांडू की ओर दही की तलाश में तीन तिलंगे
  3. काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए
  4. भैंसा भोजन, खिलखिलाती युवती, पीछा करते युवक और आधी रात का काठमांडू
  5. नेपाल की मुर्गी, उसकी मुस्कान, मेरी नाराज़गी और लाखों का मुआवजा
  6. सुबह सुबह तोड़-फोड़, माओवादियों से टकराव, जलते टायरों की बदबू और मौत से सामना
  7. खौफनाक राह, घूरती निगाहें, कमबख्त कार और इलाहाबाद की दास्ताँ
  8. धुआंधार बारिश, दिमाग का फ्यूज़ और सुनसान सड़कों पर चीखती कन्या को प्रणाम
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काठमांडू जाती कार को नागालैंड वाले खींच ले गए” पर 55 टिप्पणियाँ

  1. पाबला जी भोजन का विवरण भी दिया करे। वरना हमारा सफ़र भूखे पेट ही कटेगा 🙂

    • Delicious
      बात तो सही है
      लेकिन जहाँ अलग अलग रूचियों वाले हों वहां किसी एक भोजन का विवरण देना ठीक ना होगा.

      वैसे, आपने आग्रह किया है तो अगली बार एक बढ़िया से भैंसा भोजन के लिए तैयार रहिएगा

  2. जयपुर से कन्याकुमारी का सफ़र इसी स्पीड से तय किया गया था 🙂

  3. बहुत ही रोमांचक …..अगली कड़ी का इंतज़ार ..

  4. आप चारों (कार भी बेचारी) परेशान हुए पर हमें तो मजा आ गया…आपकी ये दिलचस्प यात्रा वृतांत पढ़ कर…अगली बार मुझे भी ले चलना

    • Overjoy
      जो गए थे साथ, उनसे पूछ लीजिएगा चलने के पहले

  5. पाबला जी, आप कमाल कर रहे है. इतनी जीवंत शैली देख कर मुझे आपसे सीखने का मौक़ा मिल रहा है कि ऐसा ही लेखन होना चाहिए। ख़ास कर यात्रा वृत्तांत। बोधगम्य, सरल. पाठक को लगे कि वह भी यात्रा में साथ है। मैं उतर प्रदेश की बुरी सडको पर एक-दो दिन बाद लिखूंगा लेकिन यात्रा वृतांत तो आपका ही शेयर करूंगा। बधाई आपको इस लेखन के लिए

  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक आज शनिवार (28-09-2013) को “”इस दिल में तुम्हारी यादें..” (चर्चा मंचःअंक-1382)
    पर भी होगा!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…!
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    • Heart
      कुछ नया देखने करने का रोमांच ऊर्जा बनाए रखता है

    • Smile
      पिछले दिन ही 18 घंटे में 650 किलोमीटर चली थी गाड़ी
      पढ़ा ही होगा आपने

  7. हे प्रभू!
    सरदार ऐसे ही कुयों होते हैं 🙂
    हमें तो ड्राइव क्या इतनी देर ड्राइवर के साथ बैठने में भी मुश्किल होगी।

    प्रणाम स्वीकार करें

    • Overjoy
      मेरे साथ ललित जी बैठे थे
      उनका हाल पूछिएगा

  8. रोचक यात्रा वृतांत।। आपने बढ़िया तस्वीरें पोस्ट की, लेकिन आपने कूड़े की तस्वीर के नीचे “वाराणसी शहर” गलत लिखा है!! आप उसकी जगह ये लिख सकते थे जैसे :- “वाराणसी शहर में फैला कूड़ा आदि।”
    मेरी बात का बुरा मत मानियेगा, आपसे छोटा हूँ, लेकिन आपको गलती करते हुए नहीं देख सकता हूँ। धन्यवाद 🙂

  9. जब से आपको सफर शुरू करना था तबसे उसकी पूर्व तैयारीयों से लेख की शुरुआत की थी गाड़ी की मरम्मत से लेके सडक के गढ़ो तक बात पहुच गई मरे लिये तो ये सफर किसी टीवी सीरियल की तरह हो गया हे .अब नया क्या लिखेंगे ! नया क्या लिखेंगे ! यही सोचते रहते हे नये लेख का इंतजार रहेगा पुरे परिवार की की सुभकामना आपका सफर मंगलमय और सेहतमंद हो
    प्रणाम स्वीकार करे

  10. बार-बार लगता है कि आप लिखते हुए सिर्फ सड़कों का ही जिक्र कर रहे हैं…फिर याद आया अगर जगह-जगह रुककर लिखने लगेंगे तो पोस्ट क्या पुरी पुराण लिख बैठेंगे….फिर पता चलेगा की पोस्ट में ४५० किलोमीटर की यात्रा करने में ही २००घंटे लग गए..ऐसे ही लिखते रहिए।

    • Delighted
      माल तो इतना है कि इन सात दिनों के सफर पर 27 लेख लिखे जा सकते हैं
      अब ड्राईवर तो सड़कें ही नापेगा ना
      बाक़ी हाल , साथ गए दो ब्लॉगर्स भी तो लिखेंगे

      • बिल्कुल सही..आखिर वो साथ गए थे..मजे से बैठे हुए..तो कुछ काम वो भी करेंगे ही…

  11. वाकई लगता है आपके साथ ही यात्रा कर रहे हैं.

    नेवीगेटर की अपनी सीमा है उसे रास्‍ता खराब होने की जानकारी नहीं ही होती जबकि‍ भारत में, हम सड़के अपनी मर्जी से खुशी-खुशी जहां-तहां खोद-खोद कर रखते हैं. नेवीगेटर को क्‍या पता कि‍ सड़के खुदी रखना हमारा शग्‍ल ही नहीं वल्‍कि‍ राष्‍ट्रधर्म है. इस मामले में हमारी राष्‍ट्रीय एकता ठाठें मारती दि‍खाई देती है 🙂

  12. सचित्र, सजीव, ३६ गढ़ में रह रहे असंतोषी जीवों की आँखें खोलने वाला वृतांत.

  13. बहुत रोमांचक और डरावनी रही यह यात्रा.लेकिन एडवेंचर इसी को कहते हैं.यात्रा में दो मजबूत आदमी थे,बस गिरीश जी ही कमजोर पड़े होंगे.

    इत्ती लंबी ड्रायविंग वाकई दुस्साहस का काम है.

  14. क्या ख्याल है उत्तर प्रदेश का नाम बदलकर गढ्ढा प्रदेश रख दे ?

  15. रोचक यात्रा विवरण । वैसे बात आपकी सही है हम इतनी देर तो कार नहीं चला सकते है हाँ हमारे बडे भाई साहब जरूर कार चलाने के शौकीन है ।

  16. पढ़ते गए बढ़ते गए ……हम भी अपनी कार या मोटरसाइकिल से नेपाल जाना चाहते हैं , जिसमें आप का लेख उपयोगी है !! ख़राब सड़कों की वजह से ही मैं चे साल से उत्तर प्रदेश गया ही नहीं …………………!!

  17. बाकी तो सब चकाचक है . पर आपकी बेचारी रोबोटिक कन्या पर मुझे बड़ा तरस आ रहा है :).

    • Aerobics
      अरे! उस ‘बेचारी’ ने बहुत मदद की हमारी

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