बजाज स्कूटर ने सारा नशा उतार दिया!

जिंदगी के कई अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें आगे चल कभी अकेले बैठे भी याद किया जाए तो चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है. या फिर कभी लगता है कि यार क्या मूर्खता की थी तब.

ऐसा ही एक किस्सा आज से 33 वर्ष पहले का है. 1983 का.

तब भिलाई के बाहरी इलाके में नंदिनी रोड पर खेदामारा नाम की जगह पर बिजली का एक सब-स्टेशन बन रहा था. काम में लगे कुछ कर्मचारियों का स्थायी निवास तो वहीँ बना दिया गया.

मेरी नौकरी लगे बस चंद दिन ही हुए थे. विभाग में ही समान तकनीकी रूझान/ खुरापात वाले एक वरिष्ठ मिले और हमारी मित्रता हो गई. मैं उस समय रंगीन टेलीविजन की तकनीक का प्रशिक्षण ले चुका था और इधर ताज़ा ताज़ा रंगीन टेलीविज़न की बहार आई हुई थी.

खेदामारा सब-स्टेशन के एक अधिकारी ने विदेश से एक रंगीन टेलीविजन मंगवाया था , जिसे वे ऑन ही नहीं कर पा रहे. मित्र सहकर्मी तक खबर पहुंची और हम दोनों निकल पड़े उस शाम.

उस समय मेरे पास पिता जी का दिया हुआ बजाज स्कूटर था. जिस पर सवार हो हम गए और टेलीविज़न का सारा मामला समझा कर लौटे रात के नौ बजे.

गड्ढों भरी सुनसान सड़क पर मैं स्कूटर दौड़ाए चला जा रहा था. स्कूटर की हेडलाइट तब एक दिये की रौशनी सरीखी ही दिखाई देती थी दूर से. चांदनी रात में कुछ दूर तक की राह तो नजर आती लेकिन गड्ढों का कोई अंदाज ना लग पाता, जिसके कारण कई बार हम गिरते गिरते बचे.

एसीसी चौक के दो किलोमीटर पहले हम दोनों ने किसी बात पर ठहाका लगाया ही था कि एकाएक गड्ढे में गाडी धचकी और मुझे लगा बादलों पर चलने लगा है फिसलने लगा है स्कूटर. हैंडल को अपने नजदीक महसूस कर ब्रेक भी मारता रहा लेकिन स्कूटर अपनी मर्जी से ही रुका.

हुआ क्या था कुछ समझ नहीं आया. जब उतर कर स्टैंड पर खड़ा करने लगा स्कूटर को, तब पता चला कि नीचे पैर रखने की जगह से सारी चैसिस टूट चुकी, स्कूटर दो टुकड़ों में बंट चुका. बस्स एक्सीलेटर, गियर की तारों सहित कुछ बचा हुआ है वहां जिससे दोनों हिस्से अलग अलग नहीं हो रहे

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दो खुरापाती दिमागों ने काम करना शुरू किया. सड़क किनारे से एक मजबूत टहनी तलाशी गई. पत्थरों से मार मार कर उसे उतना आकार दिया कि उसका एक सिरा हैंडल के नीचे चाबी वाली जगह के पास टिका कर दूसरा सिरा पेट्रोल नॉब के नीचे वाले हिस्से में फंसा दिया जाए. इससे स्कूटर पुराने रूप में ‘सीधा’ हो गया.

सावधानी से किक मार मैंने मित्र को पीछे बिठाया और धीरे धीरे बढ़ चला.

परिवहन उद्योग की मरम्मत वाले काम की अधिकता वाली नंदिनी रोड शुरू हो गई. उन दिनों रात होते ही शहर सुनसान हो जाता था. तब तक चार पाँच बार वह टहनी छिटक चुकी थी जिसे बार बार टिका कर मैं ले ही आया उस बजाज स्कूटर को शहर की सीमा में.

रात के दस बजने वाले थे तभी मेरी निगाह पडी दाहिनी ओर एक ट्रक के नीचे होती वेल्डिंग की चकाचौंध पर. तुरंत एक नया उपाय सूझा और स्कूटर को सडक पर ही दो टुकड़ों में छोड़ कर हम आ गए ट्रक के पास.

झाँक कर देखा, एक सिक्ख अधेड़ ट्रक के नीचे अकेले ही घुसा हुआ मस्त गुनगुनाते हुए लगातार वेल्डिंग किये जा रहा. मैंने दो बार पुकारा लेकिन उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया. हार कर पास पड़े एक ड्रम के ढक्कन को नीचे गिराया तब वे बाहर खिसके. पास आते ही शराब की तीखी गंध ने बता दिया कि वे किस हालत में हैं.

बड़ी ही नाराजगी से उखड़े मूड में वे चिल्लाये कि क्या तूफ़ान आ गया जो परेशान कर रहे हो? मैंने जब उन्हें बताया कि कैसे हमारे स्कूटर के दो टुकड़े हो गए हैं. उसे ठीक सीधा करना है. दो लोहे के टुकड़े वेल्ड कर दीजिये स्कूटर चलने लायक हो जाए बाक़ी कल दिन में देखा जाएगा.

उन्हें विश्वास ही नहीं हुया. बडबडाते हुए वे फिर ट्रक के नीचे घुसने लगे तो मैंने गुहार लगाई. ट्रांसपोर्ट लाइन के कुछ परिचितों के नाम लिए. तब वे तैयार हुए और देखने आये सड़क पर पड़े स्कूटर की ओर.

देखते ही वे हैरानगी से चिल्लाए ‘ओत्तेरे की !@#$$ %^& *(*&%# ओये ऐ की होया %(#&^$# ऐ गड्डी चला के ले आए तुस्सीं #^%&( ? सारा नशा उतार दिया यार!

सिवाय मुस्कुराने के मैं क्या कर सकता था.

हम तीनों उस बजाज स्कूटर को संभाल कर दुकान तरफ लाए. उन सज्जन ने एक फुट के बड़े से दो एंगल निकाले. हम दोनों ने नीचे टूटी चैसिस को तान कर सीधा रखा और वे सिक्ख महाशय गालियाँ देते, बडबडाते, शाबासी देते दोनों एंगल की वेल्डिंग करते रहे.

काम ख़त्म हुया तो यूं दिखा जैसे बड़ा सा मोटा सा प्लास्तर चढ़ा हो टूटे हिस्से पर.

जब मैंने उनका मेहनतनामा देने के लिए जेब में हाथ डाला तो उन्होंने मना कर दिया ‘ओ रेहन दे, जाओ खुश रहो’ मैंने एक बार और कोशिश की तो झूठी नाराजगी दिखाते बोले ‘जा यार! इतने बड़े बड़े ट्रक देखे लेकिन ऐसा मामला नहीं देखा कभी. इस स्कूटर ने तो मेरा नशा ही उतार दिया अब और पीनी पड़ेगी बहुत काम बचा है’

अब वो मित्र तो रहे नहीं. लेकिन जब भी याद आता है यह वाक्या, मुस्कराहट आ ही जाती है.

आप भी तो मुस्कुरा रहे होंगे?

बजाज स्कूटर ने सारा नशा उतार दिया!
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बजाज स्कूटर ने सारा नशा उतार दिया!” पर 31 टिप्पणियाँ

    • Pleasure
      जुगाडू हुए बिना काम नहीं चलता रमेश जी

  1. हमने भी बजाज सुपर स्कूटर खूब चलाये हैं.१९८० में तब गंगटोक से मंगवाया था,सिलीगुड़ी में रहने वाले एक रिश्तेदार के दोस्त की एजेंसी थी वहां,क्योंकि तब यह ब्लैक में मिलता था.गंगटोक से ट्रक द्वारा सिलीगुड़ी लाया गया और पापा के पिउन द्वारा सिलीगुड़ी से चलाकर कटिहार.सच में यह उन दिनों स्टेटस सिम्बल था.कई बार डेंट-पेंट कराया और आज भी यह स्कूटर सही सलामत है,हालांकि उपयोग नहीं कर रहा.घर के एक कोने में पड़ा पुराने दिनों की याद दिलाता रहता है.इतने साल चलाने के बाद भी यह बीच से नहीं टूटा.पता नहीं कैसे आपका…….!
    टिप्पणीकर्ता Rajeev Kumar Jha ने हाल ही में लिखा है: खींचता जाए है मुझेMy Profile

  2. Bachpan ki yaad dila di… Hamare ek dost ka scooter tha jise hum Dracula kehate thay kyunki wo पेट्रोल bohut piti thi

  3. सरदारों की यही बात मुझे हमेशा अच्छी लगती है – ज्यादातर का दिल दरिया ही होता है । कोई और होता तो मनचाहे पैसे ऐंठ सकता था लेकिन दार जी ने मना कर दिया । और एक मिसाल तो सदियों से कायम है, किसी भी गुरूद्वारे चले जाओ, सिर्फ सर ढकना होता है और कोई नहीं पूछेगा कौन से धर्म, जात बिरादरी से हो । दर्शन करो और प्रसादा छखो – साफ़ सुधरा और बेहतरीन खाना जिस पर लाखों लोग निर्भर रहते हैं । मन करे तो सेवा दो नहीं तो कोई जबरदस्ती नहीं । मतलब जहाँ पर छोटी मोटी समाज सेवा को लोग बढ़ा चढ़ा कर ऐसे बताते हैं कि पता नहीं क्या पहाड़ खोद दिया – गुरुद्वारों में रोज़ गरीब और जरूरतमंदो के लिए भोजन (वो भी उत्तम दर्ज़े का ) उपलब्ध होता है और शायद ही कभी इसकी चर्चा होती हो । अपने कॉलेज के दिनों में मैं इतना प्रभावित था इन बातों से कि पूरा चालिया किया था बंगलासाहिब गुरूद्वारे में । और कहने की जरूरत नहीं कि मेरी अरदास पूरी भी हुयी ।
    टिप्पणीकर्ता raj shekhar sharma ने हाल ही में लिखा है: Jupiter Transit in Leo | Horoscope ReadingsMy Profile

    • Smile
      सच्चे मन की कामना हमेशा पूरी होती हैं

  4. शुक्र हैं, स्कूटर बीच में से टूट गया लेकिन सवारी को कोई चोट नहीं लगी.
    ऐसा मैंने कभी सुना नहीं.
    सिख लोग मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, अधिकांशत: दिल के बड़े दिलेर होते हैं.
    थैंक्स.

    • Pleasure
      जिसको भी पता चला था तब, सबने यही पूछा था कि चोट नहीं लगी?

      हर इन्सान अच्छा है, कुछ ज़्यादा ही अच्छे हैं 🙂

    • Heart
      कई घटनाएँ तो बताने से भी डरता हूँ कि विश्वास ही नहीं करेगा कोई

  5. आदरणीय पाबला जी,
    अत्यंत बहादुरी का परिचय दिया आपने,आजकल स्कूटर लुप्त से हो गए हैं।

  6. Hahaha इसी तरह की एक घटना मेरे साथ भी घट चुकी है1983 में ही जुगाड़ भी same था जगह थी शिकोहाबाद और स्कूटर लम्ब्रेटा था।

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