बल्ब से भी अधिक चमकीली, धूप जैसी सफेद रोशनी देने वाले कागज़: जहां चाहो चिपका लो

जो कुछ अब आप पढ़ने जा रहे हैं वह किसी परी लोक की कथा नहीं बल्कि एक अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का नतीजा है, जो अगले दो साल में ही घर घर तक पहुंचने वाला है। ब्रिटेन की प्रयोगशालाओं में आजकल जिस एक खास योजना पर बड़े जोरशोर से काम चल रहा है वह है एक ऐसा चिपकाया जा सकने वाला कागज़ तैयार करना जो बिजली के बल्बों का स्थान लेगा।

कम कार्बन उत्सर्जन करने वाली तकनीक विकसित करने के उद्देश्य से प्रारंभ इस योजना के अनुसार, वर्ष 2012 तक बल्ब से भी अधिक चमकीली और धूप जैसी सफेद रोशनी देने वाले कागज़ बाजार में आ जाएंगे जिन्हें जहां चाहो चिपका लो

इन कागजों पर एक खास किस्म का रसायन चढ़ा होगा जो बल्ब से भी बेहतर यानी धूप की सी रोशनी फेंकेगा और उससे आंखें भी नहीं चौंधियाएंगी। हालांकि रसायन लिपे इन कागजों को रोशन करने के लिए बिजली का ही इस्तेमाल किया जाएगा। लेकिन इसकी वोल्टेज इतनी कम होगी कि इसे हाथ लगाने पर कोई झटका नहीं लगेगा।

इन खास कागज़ से मिलने वाली रोशनी को भी बल्बों की ही तरह रेग्यूलेटर के सहारे कम ज्यादा किया जा सकेगा।

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यह तकनीक है organic light emitting diodes संक्षेप में OLEDs. इस तकनीक का उपयोग इस समय टीवी और कम्प्यूटर मॉनीटर की स्क्रीन में किया जा रहा है। जिसकी मोटाई बमुश्किल 5 रूपए के सिक्के से कुछ ही अधिक है तथा सामान्य एलसीडी टीवी के मुकाबले 40% कम बिजली की खपत करते हैं। यह उत्पाद भारत के बाज़ारों में उपलब्ध हैं।

ब्रिटिश सरकार द्वारा समर्थित कार्बन ट्रस्ट ने एक कंपनी लोमोक्स को इस तकनीक को विकसित करने के लिए अनुदान भी दिया है। कंपनी का दावा है कि ये कागज़, साधारण बिजली के बल्ब से करीब ढाई गुना अधिक प्रभावीतथा उर्जा की बचत करने वाले होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक टेलीविजन,कंप्यूटर तथा मोबाइल फोन के पटलों में भी इस्तेमाल की जा सकेगी।

इसमें बेहद कम यानी करीब तीन से पांच वोल्ट का ही इस्तेमाल किया जाएगा जो बिजली से या फिर सौर ऊर्जा के पैनलों से या फिर बैटरियों से प्राप्त की जा सकेगी।

नीचे दिए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि इस तरह के कागज़ में छेद किए जाने या उसे कैंची से काटे जाने का कोई अन्तर नहीं पड़ता।


कंपनी इस खास प्रकार के कागज का इस्तेमाल 2012 में पहले खुले स्थानों जैसे सड़क पर लगने वाले दिशा सूचकों तथा बैरियरों पर करेगी जहां बिजली उपलब्ध नहीं होगी।

कंपनी का कहना है कि वैसे तो लाइट फेंकने वाले डायोड्स (एलईडी) काफी साल पहले ही बनकर तैयार हो गए थे लेकिन इनकी लागत काफी अधिक होने तथा इनके टिकाऊ न होने के कारण व्यापक इस्तेमाल के लिए इनका उत्पादन रोक दिया गया था

लेकिन अब एक ऐसी नई तकनीक विकसित कर ली गई है जिसकी मदद से सूर्य सी चमकदार रोशनी रसायन लिपे कागज से ही प्राप्त कर ली जाएगी। यह तकनीक कम खर्चीली तो होगी ही साथ ही टिकाऊ भीहोगी। वैसे इस तकनीक का उपयोग कर आप पूरी दीवार को अपना टीवी या कंप्यूटर मौनिटर भी बना सकेंगे!

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ट्रस्ट का कहना है कि अगर विश्वभर में साधारण बल्बों की जगह ये अत्याधुनिक लाइट फेंकने वाले कागज़ लगा दिए जाएं तो 2020 तक कार्बन उत्सर्जन 25 लाख टन और 2050 तक और घटकर 74 लाख टन से भी अधिक कम हो जाएगा।

तकनीक का कुछ खुलासा यहाँ मौज़ूद है। समाचार यहाँ है।

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बल्ब से भी अधिक चमकीली, धूप जैसी सफेद रोशनी देने वाले कागज़: जहां चाहो चिपका लो” पर 20 टिप्पणियाँ

  1. वाह प्रौद्योगिकी करे अलिफ़ लैला की कहानियों को साकार

  2. बहुत बढ़िया बिल्कुल नयी जानकारी है।धन्यवाद।

  3. मैं तो ऐलिस इन वंडरलेंड में पहुँच गया।

  4. पाबला जी तुस्सी ते सच्ची मुच्ची ग्रेट हो 🙂
    बहुत बढिया जानकारी!

  5. फ़्यूज तो यह भी होगा . लेकिन होगा बहुत सुन्दर

  6. आप की बात सही है, अभी कुछ दिनो मै यह लेपटाप ओर टी वी स्करीन के रुप मै बाजार मै आ जायेगा, जिस से वजन भी बहुत कम होगा, टुटने का डर भी नही, रोल कर के कही भी ले जाओ. बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने

  7. वाह सर कल की दुनिया हमेशा ही इतनी कमाल की लगती है खासकर जब भी आप दिखाते हैं , अद्भुत जानकारी है एक दम कमाल , जानकर मजा आ गया

  8. कल ही इस बारे में पढ़ा!!

    ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

  9. itni taknik to bhayi mujhe samajh hi nahi aati… main to aaj tak ye nahi jaan paya hun ki kambakht chand andhere mein kaise chamakta hai… koi "kagaj" chipka gaya hai kya wahan…

    jabardast evam lajawaab… adbhutaas…

  10. बहुत बडिया जानकारी है धन्यवाद। मैने तो इतने काम के आपके ब्लाग पहले देखे ही नहीं थे। दिनिया भर का ग्यान तो यहीं है शुभकामनायें

  11. इस चीज को आप और हम बहुत पहले से यूज़ कर रहे हैन ये l.e.d. ही है जिससे आज कल t.v. के स्क्रीन भी बन रहे है बस अन्तर ये है कि इसे शीशे की जगह प्लास्तिक की शीट पर असेम्बेल किया जा रहा है और चूकी ये सिसीज मे ना हो कर पैर्लर असेम्बल किये जा रहे है इस लिये पन्च करने पर भी अगल बगल मे डायोड सही काम कर रहे है ये बात सही है कि ये जल्दी खराब नही होते मगर शुरुआत मे इसका यूज़ वही कर सकेगे जिसके पास अथाह दौलत हो 🙂

  12. पाबला जी अगर जिंदा रहे २०१२ तक तो जलायेंगे इसे …..!!

  13. मजा आ गया
    जितनी तारीफ़ की जाय कम है
    सिलसिला जारी रखें
    आपको पुनः बधाई
    साधुवाद..साधुवाद
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

  14. pehli baar aagman hua aapke blog par.bahut badhiya jaankari.thanks a lot.SSA

  15. बहुत अच्छी जानकारी दी है. विज्ञान का एक और चमत्कार.

  16. मैं बहुत दिनों से 'कल की दुनिया' जैसे हिन्दी चिट्ठे की आवश्यकता अनुभव कर रहा था। अच्छी-अच्छी जानकारियाँ लायें और बांते। हिन्दीजगत का कल्याण हो।

  17. अद्भुत,आश्चर्यजनक !! जब भी पढ़ती हूँ यकीन नही होता आने वाली दुनिया ऐसी होगी?? बस इसीलिए सभी अपनों के साथ हजारों साल जीना चाहती हूँ.ये विज्ञान ,ये इंसान कहाँ तक जाता है.अभी बीस साल पहले तक आज की दुनिया की कल्पना नही की थी.
    इसी तरह आज सब पढ़ कर आश्चर्य जरूर हो रहा है किन्तु….वो दिन आएगा.काश हमारी उम्र ठहर जाए हम एकदम स्वस्थ हालत में रहे और अपनी आँखों से ये सब देखें.
    क्या विज्ञान ऐसा भी करेगा किसी दिन वीरजी ???
    आप तो सपनों की दुनिया में ले जाते हैं.सब परी कथाओं -सा लगता है. हा हा हा

  18. काश हमारे देश के लोग भी इस तरह का आविष्कार कर सकते ! दिमाग की कमी नहीं इस देश में पर सारी जिंदगी दो रोटी के लिए मक्शक्कत करते निकल जाती है .

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