बहू मना करती है, इसलिए दूसरों के घर में चोरी करने के लिए भटकती हूँ

एक ऐसा सच्चा किस्सा जिसमें बहू से त्रस्त एक धार्मिक महिला की वेदना है

जब से डेज़ी नहीं रही, तब से सुबह टहलना कुछ कम हो गया है।

फिर भी एक नियम बना रखा है कि दूर बैठे अखबार वाले से अखबार लाने के बहाने बदन को कुछ हरकत दी जाए।

कल सुबह ऐसे ही अखबार लेकर लौट रहा था। घर के पास ही था, सामने एक बुज़ुर्ग महिला दिख रही थी। पता नहीं क्या सोच कर उन्हें पार नहीं किया, बस पीछे चलते हुए अपनी चाल धीमी कर ली मैंने।

मेरे देखते ही देखते उस महिला ने घर की चहारदिवारी पर लगे फूल नोचने शुरू कर दिए। (ऐसा ही कुछ पिछले बरस भी लिख चुका हूँ)

आहिस्ता से उनके पास जा कर मैंने कहा कि यदि फूलों की ज़रूरत है तो घंटी वाला स्विच दबाकर घरवालों से फूल मांग लीजिए। अंदर के फूल निगाह में नहीं आते, बाहर के फूल, नुचे अच्छे नहीं लगते।

bspabla-home

महिला ने कहा “आपका घर है यह? घंटी बजा कर मांगूंगी तो गिने चुने फूल ले पाऊँगी, बाहर से बिना पूछे तो जी भर ले जा सकती हूँ!”

मैंने पूछा कि क्या करती हैं इन फूलों का? जवाब मिला भगवान की पूजा। जब मैंने कहा कि किसी के घर वालों का दिल दुखा कर, चोरी के फूलों से की गई पूजा से भगवान प्रसन्न होते हैं क्या?

तो एक क्षण चुप रह कर उस बुज़ुर्ग महिला ने बड़ी वेदना भरे स्वर में जो कुछ कहा, उसे सुन मैं चुपचाप घर के अंदर चले गया।

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उनका कहना था “हमारे घर में भी बहुत अच्छा बड़ा सा बगीचा है ऐसे फूल भी लगे हैं ढ़ेरों, लेकिन बहू एक भी फूल तोड़ने नहीं देती, इसलिए चोरी करती हूँ दूसरों के घरों में”

मैं क्या कहता?

बहू मना करती है, इसलिए दूसरों के घर में चोरी करने के लिए भटकती हूँ
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28 comments

  • Mithilesh dubey says:

    hmmmmmmmm वाह जी बढिया है ।

  • पी.सी.गोदियाल says:

    पाबला साहब , जब से इस कमबख्त ???? ब्लॉग्गिंग की दुनिया में उतरा हूँ पहली बार( वैसे पहली बार डेजी के बारे में पढ़ा था ) आपकी एक लेख पढ़ रहा हूँ बहुत अच्छा लिखते है आप इसे continueity दीजिये

  • anitakumar says:

    हे भगवान! पाबला जी क्युं डरा रहे हैं हमें…।:)

  • डॉ. मनोज मिश्र says:

    उनका कहना था "हमारे घर में भी बहुत अच्छा बड़ा सा बगीचा है ऐसे फूल भी लगे हैं ढ़ेरों, लेकिन बहू एक भी फूल तोड़ने नहीं देती, इसलिए चोरी करती हूँ दूसरों के घरों में"
    मैं क्या कहता?………….
    ऐसी हालात में तो कुछ कहा भी नहीं जा सकता.

  • Arvind Mishra says:

    दैया रे ,कहाँ चोट की …..

  • ललित शर्मा says:

    कहानी कई घर की। 🙂

  • HARI SHARMA says:

    पाबला जी ऐसे ही जो भी लोग कुछ ऐसा वैसा करते दिखे सोचे कि वो ऐसा क्यु कर रहे है
    सबके अपने अपने तर्क मिलेगे.

    वैसे थोडा सा तर्क भौडा हो जायेगा लेकिन असन्गत नही कि – एक लडके ने अपने साथ बाली लडकी को छेडा तो लडकी ने तुरन्त कहा कि तेरे घर मै मा बहिन नही है क्या तो लडके ने मायूसी से कहा है तो पर वो मुझे खुद्को नही छेडने देती.

  • डॉ महेश सिन्हा says:

    न जाने कब तक चलेगा ये सास बहू का प्रसंग ?

  • dhiru singh {धीरू सिंह} says:

    बहू की बात सर्वोपरि तभी रहेगी शान्ती

  • Vivek Rastogi says:

    बेचारी सास और वाह वो ताकतवर बहु जिसने अपनी सास को चोरी करने के लिये मजबूर कर दिया, वो भी फ़ूलों की।

    वैसे पाबलाजी हमारे घर में भी बहुत सारे फ़ल, फ़ूल के पेड़ लगे हैं और अगर कोई रोज भी चोरी से तोड़ता है तो हम मना नहीं करते हैं, क्योंकि उसे दुख होगा कि अरे चोरी करते हुए या तोड़ते हुए पकड़ लिया, हम चुपचाप अपनी खिड़की से देखते रहते हैं, और अगर बाहर किसी काम से जाना भी होता है तो कोशिश करते हैं कि तब तक बाहर न जाये जब तक कि उनका काम ना हो जाये। इसी बहाने हमारे फ़ूल भगवान के चरणों में अर्पित हो जाते हैं।

  • Udan Tashtari says:

    कितनी मजबूर है वो बुढ़िया अपने ही औलादों के हाथ मगर संस्कार हैं कि छूटते नहीं..पूजा में फूल चढ़ाकर जाने क्या मांगती होगी!!

  • राज भाटिय़ा says:

    बहू की हिम्मत तभी बढी होगी जब पेट का जना ही कमीना निकला, लेकिन मां फ़िर भी उसी के सुख मांगती होगी भगवान से.
    आप का लेख पढ कर कुछ पल ठिठक गया, मुठ्ठियां भींच गई

  • डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक says:

    शायद बहू को कभी बुढ़िया नही होना है!

  • PD says:

    padh kar serious ho gaya tha.. but Anita aunty ji ka comment padh kar hansta hi ja raha hun.. 🙂

    aage kisi comment ko padhna nahi chahta, udas nahi hona hai.. 🙂

  • दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi says:

    मेरे सामने सार्वजनिक पार्क है जिसे हमारी सोसायटी ने गोद लिया था। एक बागप्रेमी ने उस का विकास किया फूलों वाले पौधे लगाए। रोज फूल खिलते हैं। लेकिन तोड़ने वाले अंधेरे में ही शुरू हो जाते हैं। जब तक सूरज निकले फूल गायब हो जाते हैं। कोई किस्मत वाला ही बचा रह जाए तो रह जाए। उन में पुरुष भी हैं और महिलाएँ भी। सब जवान और अधेड़ हैं वृद्ध कोई नहीं।

  • खुशदीप सहगल says:

    जब अपने बागीचे में खुद के खिलाए फूल कांटे चुभोने लगें तो माली के आंसू निकलना लाजमी है…ऐसे फूलों को चढ़ाना भगवान के चरणों को भी अपवित्र करना होगा…इससे कहीं ज़्यादा पवित्र हैं वो चोरी के फूल, जो माली की साधना का साधन बनते हैं…

    जय हिंद…

  • अजय कुमार झा says:

    सर फ़ूलों को चुपके से तोड लेना बहुत लोगों की आदत जैसा होता है , हां मगर इसके पीछे दिया गया कारण आज के सच को , कहूं कि कडवे सच को सामने रख गया

  • जी.के. अवधिया says:

    पाबला जी,

    "सुखी जगत में कौन है कहो मोहि समझाय …"

    यह संसार ऐसा ही है।

  • डॉ टी एस दराल says:

    ओह ! मार्मिक परिस्थिति ।
    एक पुष्प की अभिलाषा याद आ गयी।

  • vinay says:

    सारी टिप्पणीयां पड़ रहा था,और जैसे खुशदीप सहगल की टिप्पणी पर निगाह पड़ी तो मुझे लगा कि खुशदीप जी ने मेरे मन की बात कह दी ।

  • Mired Mirage says:

    बात दुखी तो करती है। समस्या की ओर ध्यान भी दिलाती है। इस घटना के बहुत सारे कारण व पहलू हो सकते हैं। जिस पर एक पूरा लेख बन सकता है। समाधान भी यदि परिवार चाहे तो हो सकते हैं। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य का स्वभाव समस्याओं से निपटना कम अपनी अपनी जिद पर अड़े रहना और शहीद महसूस करने में ही तृप्ति पाने का अधिक होता है।
    यहाँ एक समाधान हो सकता है। बगीचे के एक भाग या क्यारी में अधिक फूल देने वाले जैसे गेंदा के पौधे लगाए जाएँ जो केवल पूजा के लिए हों। गुड़हल आदि भी लगाए जा सकते हैं। समझौता यह हो कि यहाँ के फूल केवल पूजा के लिए होंगे। अन्य क्यारियों से पूजा के लिए फूल न लिए जाएँ।
    मुझे कमरों में फूल सजाने का शौक था और मैं सामने का बगीचा फूल विहीन नहीं करना चाहती थी अतः मैं सजाने के लिए फूलों के पेड़ पीछे के बगीचे में लगाती थी। पूजा के लिए फूल भी वहीं लगे होते थे।
    घुघूती बासूती

  • दिगम्बर नासवा says:

    आजकल घर घर की कहानी ऐसी ही है ……… कहीं फूल तो कहीं कुछ और ……… कितने रूखे हो गये हैं हम ……

  • शरद कोकास says:

    भगवान भला करे ..तीनो का ।

  • niraj says:

    आपने बहुत सारे सच से पर्दा उठाया है ….क्यूंकि , ये सिर्फ फूलों तक ही सिमित नहीं……. लेकिन ये एक सच के अलावे दूसरा सच ये भी कि बहुत जगहों पे ये बुजुर्ग अपने पुराने और नये पीढ़ी के बिच के तालमेल की कमी के कारन भी, स्तिथि काफी दयनीय हो जाती, उसके बाबजूद इन बुजुर्गों से अच्छे और समझदारी की उम्मीद करने से अच्छा ,हम नये पीढ़ी को , और अधिक से नजदीक से इनको समझना होगा…….

  • 🙁 हमारे ही परिवेश की सच्चाई ….. क्या कहें ?

  • kulwant chaudhary says:

    इश्वर भाव के भूके हे. फूलो के नहीं ऐसे पूजा करो के फूलो की जरुरत न परे मरुस्थल के लोग भी puja करते हे समुन्दर के बीच jahajके लोग भी पूजा करते हे.पूजा के लिए फूलो के चोरी jururi nahi

  • arvind mishra says:

    ये तो मुझे भी ललचा रहे हैं !

  • alok khare says:

    ठाले बैठे पुण्ये प्राप्त कर रिये हो पावला साब!

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