महाराष्ट्र का वह बुद्धिमान रोबोट हमारा मन मोह गया

मई 2013 में सड़क मार्ग से पुणे जाते हुए, हमें अहमदनगर होते हुए जाना था. चचेरा भाई साथ ही था. अहमदनगर से पहले ही हमें ऐसा कुछ नज़ारा दिखा कि वर्षों पहले किसी काम से तौबा किये हुए मन ने आखिरकार वही काम करने का मन बना लिया 😀

एशियन हाईवे पर अपनी मारूती ईको दौड़ाते हम दोनों भाई भिलाई से 625 किलोमीटर दूर नांदेड पहुँच चुके थे जो हमारी इस यात्रा में एक पड़ाव था और सिक्ख धार्मिक स्थल भी.

हमारे जीपीएस उपकरण ने संध्या 4 बजे जहाँ गाड़ी रोकने का आदेश दिया, वहां मैं भ्रमित हो गया. यह तो वह स्थान नहीं जहाँ हम पिछली यात्रा में आये थे. यह तो था गुरूद्वारा लंगर साहिब.

चचेरे भाई ने गुरुद्वारों का भूगोल समझाने की कोशिश की लेकिन शायद मुझ पर थकान हावी थी मैंने पूरी बात सुनी ही नहीं. बस, उसी के हवाले कर दिया मामला.

langar sahib

लंगर साहब गुरूद्वारे का एक विहंगम दृश्य

सबसे पहले तो हमने रूकने का इंतज़ाम करने की सोची. गाड़ी खड़ी की लंगर साहिब के सामने यात्री निवास में. मौसम खुशगवार ही था इसलिए एसी की ज़रुरत नहीं लगी. सो, साधारण कमरे के लिए लगी कतार में हम भी खड़े हो गए अपना नंबर आने की प्रतीक्षा में.

कतार में लगे व्यक्तियों से पता चला कि अपना परिचय पत्र भी दिखाना पड़ेगा. मैंने जेब में हाथ डाला तो याद आया सब कुछ तो गाड़ी में छोड़ आया. चचेरे भाई के पास था आईडी प्रमाण, मैंने उसी को सामने कर दिया. हमसे आगे खड़े व्यक्ति ने जब काउंटर पर रेल टिकट भी दिखाया तो हम भाई आपस में फुसफुसाए कि कह देंगे कार से आये हैं. और जब हमारा नंबर आया तो बंदे ने गाड़ी के कागजात दिखाने को कह दिया.

मैं भागा उलटे पैर गाड़ी की ओर. अभी आर सी बुक ले कर चंद कदम ही चला था कि याद आया गाड़ी के कागजातों में नाम मेरा और पहचान पत्र भाई का? गड़बड़ हो जायेगी. फिर पलटा अपने परिचय पत्र के लिए.

प्रति व्यक्ति 100 रूपयों की सुरक्षा निधि दे कर हमें चाबी मिली कमरे की. फिर हमने पहला काम किया भोजन का. अटूट लंगर चल ही रहा था सामने.

कमरा तलाशा तो पता चला वह है सबसे ऊपरी मंजिल पर. भले ही अटैच्ड लेट-बाथ वाले डबल बेड, टाइल्ड कमरे में कोई कमी नहीं थी लेकिन बुरी तरह तप रहे उस स्थान ने नानी याद दिला दी.

झटपट नहा कर हम चल पड़े सिक्खों के पाँच तख्तों में से एक, तख़्त श्री हुजूर साहिब के दर्शनों के लिए. जब हम दर्शन ड्योढी पर पहुंचे तब जा कर मुझे समझ आई, पिछली बार के सापेक्ष भौगोलिक स्थिति. :-).

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तख़्त श्री हुजूर साहिब का रात्रिकालीन दृश्य

अंदर जाते ही भावुकतावश मैंने चचेरे भाई के साथ बढ़ने से इंकार कर दिया. मुझे याद आ रहा था गुरुप्रीत से 3 वर्ष पहले किया हुआ वादा कि अगली बार नांदेड जाऊँगा तो उसे साथ ले कर चलूँगा. अब उसके ना रहने पर एक हूक सी उठ रही थी.

चचेरा भाई मुझे प्रांगण में एक पेड़ के नीचे बैठा कर दर्शनों के लिए, माथा टेकने चले गया. मैं अपने आप को संभालने की कोशिश में लगा रहा. आधे घंटे बाद जब उसने चलने को कहा तो मैंने सारे झंझावातों को झटकार कर किनारे करते हुए निर्णय सुनाया कि इतनी दूर आ कर भी अगर शीश ना नवाया तो यह बेअदबी होगी गुरुओं की.

और फिर गुरूद्वारे में माथा टेक, वहीं लंगर में प्रसादरूपी भोजन कर हम लौटे अपने कमरे में और रवाना हुए अगली सुबह पुणे की ओर, अहमदनगर के रास्ते

नांदेड से बाहर निकते हमें सुबह के पांच बज गए और हमारे जीपीएस उपकरण ने ऎसी सड़क पर चलने का निर्देश दे दिया था जो एक साधारण सी सडक लग रही थी. इसी राह में हमने ढेरों मोर भी चहलकदमी करते मिले

नांदेड - परभनी मार्ग

नांदेड – परभनी मार्ग

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आगे बढ़ते हुए हमने सैकड़ों पवन चक्कियां देखीं, कई पहाड़ी घाट पार किए, नागिन जैसी बल खाती ऊंची नीची सड़कों पर गाड़ी दौडाई, ढेरों फोटो खींची और जा पहुंचे अहमदनगर के पास

पवन चक्कियों के साथ

पवन चक्कियों के साथ

ऊँचे पहाड़ों पर

ऊँचे पहाड़ों पर

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यह हाल है महाराष्ट्र के बांधों का
जहां सुबह सुबह बोतल में पानी ले कर जाना पड़ता है

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नांदेड – अहमदनगर मार्ग

नांदेड - अहमदनगर मार्ग

नांदेड – अहमदनगर मार्ग

अहमदनगर के काफी पहले ही हमें सड़क के किनारे, गन्ना रस के स्टाल नज़र आने लग गए थे. मुझे वह किस्सा याद आने लग गया जिसके बाद गन्ना रस पीने से तौबा कर ली थी मैंने.

इन स्टाल्स में एक ख़ास बात ने मेरा ध्यान खींचा. इन सभी में किसी तरह की बिजली मशीन या डीजल पंप का इस्तेमाल नहीं हो रहा था बल्कि ख़ास तरह से बनाए गए गन्ना निचोड़क यंत्र को बैल ही चलाता था. अपवाद रूप में एक स्थान पर बैल के स्थान पर मानव भी दिखाई दे गया.

गाड़ी दौड़ती जा रही थी. बैलों द्वारा चलित गन्ना निचोड़क यंत्र एक एक कर आँखों से सामने से निकलते जा रहे थे. कंधे पर उस यंत्र का मुख्य पुर्जा संभाले कहीं कोई बैल बैठा दिख जाता, कहीं वह अपने कार्य में जुटा दिखता, कहीं चुपचाप खड़े दिखता.

मेरे दिल पसीजने लगा. सूखे जैसे हालातों में बेचारे पता नहीं कैसे रह रहे होंगे. मानव तो किसी तरह परिस्थितियों से लड़ लेता होगा लेकिन यह मूक प्राणी क्या करें? अजीब से अपराधबोध ने जब हावी होना शुरू कर दिया मैंने चचेरे भाई को निर्णय सुनाया “चलो, गन्ना रस पीया जाए” उसने भी झट से सहमति में सर हिलाया तो मैंने अगले गन्ना रस विक्रय केंद्र पर गाड़ी खडी कर दी.

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अपने अपने काम में जुटे, मानव व बैल

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संपूर्ण रूप से, लकड़ी के बने हुए बेलन

प्लास्टिक की नाज़ुक कुर्सियों पर धीरे से बैठते मैंने दो ग्लास गन्ना रस के लिए कहा. उस व्यक्ति ने पहले लकड़ी से बने बेलनों को पानी से नहलाया, फिर बड़े से स्टेनलेस स्टील के पतीलें में जैसे ही बर्फ का टुकड़ा डाला. टन्न से आवाज़ हुई और वह खड़ा बैल चलने लग गया.

मैं चौंका और ध्यान से सारी प्रक्रिया देखने लगा. गन्ने का सारा रस निकालने के लिए उसी को बार बार बेलनों के बीच डाला जाता है. जब बेलनों पर जोर पड़ता तो बैल भी अपनी गर्दन तान कर ताकत लगाता और जब बेलन खाली घूमते रहते तो मस्त आराम से गर्दन झुकाए चहलकदमी सरीखा चलता.

इसी बीच वहाँ एक और गाड़ी आ कर रुकी तो सर झुकाए चलते उस बैल ने एक जुम्बिश के साथ कनखियों से उस ओर देखा और फिर रफ़्तार पकड़ ली शायद यह सोचते कि ‘चल यार, एक और ग्राहक आया’ 🙂

इधर जब गन्ने का सारा रस निकालने के उपक्रम में आखिरी बार गन्ना गुजर चुका बेलनों के बीच से तो बैल अपने आप ही खड़ा हो गया, एक गहरी साँस लेते

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चित्र लिए जाने के समय भी सचेत होता मेरा प्रिय रोबोट

 

हम दोनों भाई भौंचक्के से, बैल के इन सारे क्रियाकलापों को देखते ही रहे. पास जा कर जब उसका फोटो भी लेने लगे तो महसूस हुआ कि भौंहें चढ़ाए बड़े गौर से हमें देख रहा वह.

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घुमक्कड़ी जिंदाबाद

एक जीते जागते रोबोट को देख मंत्रमुग्ध से दोनों अपनी मारूति ईको में जा बैठे अपने अगले पड़ाव, पुणे की ओर जाने के लिए. जहां एक दिन रूक कर हम जाने वाले थे पैठण और लोनार.

आपने भी ऐसे रोबोट देखे ही होंगे ?

महाराष्ट्र का वह बुद्धिमान रोबोट हमारा मन मोह गया
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महाराष्ट्र का वह बुद्धिमान रोबोट हमारा मन मोह गया” पर 36 टिप्पणियाँ

  1. मज़ा आ गया इस ट्रेवलौग को पढ़ कर…. टनन्न …. की आवाज़ मजेदार थी ….

    • Smile
      वो टन्न की आवाज़ अभी भी हमारे कानों में गूंजती है

  2. चलो अब आप भी पीने लगे वापस…. 🙂 हमने भी पायल की दूकान पर उसको और उसके दादाजी को देखकर ही पीया….(बल्कि बहुत पीती हूँ ;-))….अब टेस्ट बढ़ जायेगा ….

    • Cheers
      ये तो बस एक बार ही पी लिया है
      वापस थोड़े ही पीने लगे हैं

  3. सुन्दर यात्रा विवरण. तख़्त श्री हुजूर साहिब का रात्रिकालीन दृश्य बहुत ही प्यारा लगा. आपने यह नहीं बताया कि गन्ना रस पीने से तौबा क्यों की थी. महाराष्ट्र में गन्ने का रस निकालने के लिए लकड़ी के बेलनों का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए अनुकूल है.
    टिप्पणीकर्ता पा ना सुब्रमणियन ने हाल ही में लिखा है: श्री फलMy Profile

    • Heartसुब्रमणियन जी, ऊपर वृतांत में ही लिंक दी हुई है उस ‘गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?’ प्रकरण की
      लेकिन यहाँ भी देख लीजिये
      https://www.bspabla.com/?p=1935

  4. मैं ज़रा कन्फ्यूज़ हो गया हूँ.
    हुजुर साहिब गुरुद्वारा और लंगर साहिब गुरुद्वारा एक ही हैं या अलग अलग.??
    ये रोबोट तो मुझे बहुत अच्छा लगा.
    देखना तो दूर कभी सुना भी नहीं.
    धन्यवाद जी.
    CHANDER KUMAR SONI
    http://WWW.CHANDERKSONI.COM

    • Smile
      मैं तो गुरुद्वारों की भव्यता देख भ्रमित हो गया था

      वैसे हुजुर साहिब गुरुद्वारा और लंगर साहिब गुरुद्वारा अलग अलग है
      लेकिन हुजुर साहिब गुरुद्वारा के भीतर भी ‘इन-बिल्ट’ लंगर स्थल है

  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज सोमवार (10-06-2013) को सबकी गुज़ारिश :चर्चामंच 1271 में “मयंक का कोना” पर भी है!
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

    • THANK-YOU
      धन्यवाद रूपचन्द्र शास्त्री जी

  6. हमेशा की तरह सुंदर यात्रा वृतांत. गन्ने के रस से तौबा वाला विवरण भी पढना अभी बाकि है ।

  7. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज (सोमवार, १० जून, २०१३) के ब्लॉग बुलेटिन – दूरदर्शी पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई | Happy
    टिप्पणीकर्ता Tushar Raj Rastogi ने हाल ही में लिखा है: घुंघरूMy Profile

  8. बहुत ही सुन्दर मोहक यात्रा वृतांत ..
    गन्ने का रस निकालने के लिए जूते बैल देख मुझे शिंगणापुर की याद आ गयी …. मोर की मोहक तस्वीर हैं …
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार ..

  9. बहुत ही सुन्दर मोहक यात्रा वृतांत.सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार

  10. कितना अद्भुत है सहज-सरल घटना में भी जीवन कथा पा लेना ! आपकी तीव्र दृष्टि और शब्दजाल की जकड़न अभी तक महसूस रहा हूं !

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