एक दूसरे से पहली बार मिले चार ब्लॉगरों की लम्बी बैठक

लुधियाना स्टेशन पर 15 दिसम्बर की दोपहर पं डी के शर्मा ‘वत्स’ जी से मुलाकात कर, 16 दिसम्बर की सुबह दिल्ली के एसीपी से पंगा लेने ना लेने का विचार करते हुए मैं अपने मोबाईल पर जीपीएस मोहतरमा की बदौलत सूटकेस उठाए पैदल ही नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन जा पहुँचा। मुझे जाना था शाहदरा, अपनी बुआ जी के घर्। टिकटनुमा टोकन लेने के पहले स्टेशन परिसर में ही ब्रेड पकौड़ा और कॉफ़ी उदरस्थ कर काऊँटर की कतार में लग गया। टिकट ले कर भ्रामक सूचना पटलों के सहारे किसी तरह पहुँच तो गया प्लेटफार्म पर लेकिन यह समझ नहीं आया कि ट्रेन कौन सी पकड़ूँ?एक तरफ लिखा था हुडा सिटी सेंटर और दुसरी तरफ था जहांगीरपुरी। प्लेटफार्म के दूसरी ओर दीवारों में जो राह लिखी गई थी उनमे शाहदरा का नामोनिशां नहीं! जिससे भी पूछा उसने यही कहा कि मैं भी पहली बार यहाँ आया हूँ।

मैंने एक पुलिस वाले को पकड़ा तो उसने बताया कि कश्मीरी गेट उतर कर रेड लाईन पकड़नी पड़ेगी। इतना समझ में आने के बाद जहांगीरपुरी की ओर जाने वाली भीड़ भरी मेट्रो पर सवार हो कश्मीरी गेट स्टेशन उतरा और दो-तीन मंजिल ऊपर की ओर जा कर कथित रेड लाईन को इंगित करते प्लेतफार्म पर जा पहुँचा। वहाँ दिलशाद गार्डन की ओर जाने वाली राह बताते पटल से यह सुनिश्चित हुया कि मुझे उसी ट्रेन से शाहदरा तक जाना है।
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दिल्ली मेट्रो का मानचित्र

बाद में दिल्ली मेट्रो की वेबसाईट पर यह भी पता चला कि मेट्रो के प्रतिक्रियात्मक नक्शे से खेलते हुए दो स्टेशनों के बीच का किराया पता किया जा सकता है, जिसमें यह भी प्रदर्शित होगा कि मेट्रो रेल बदलनी कहाँ से है! करना कुछ नहीं है बस यह लिंक क्लिक करें शुरूआती स्टेशन के बिन्दु पर माऊस से क्लिक कर अंतिम स्टेश्न के बिन्दु पर क्लिक करें। बस, सारी जानकारी सामने! वैसे पीडीएफ़ में 6 पृष्ठों वाली मेट्रो गाईड काफी फायदेमंद है नए यात्रियों के लिए। इसे मोबाईल में भी पड़ा जा सकता है।
शाहदरा मेट्रो स्टेशन के सामने ही से सायकिल रिक्शा कर बुआ ज़ी के घर जा पहुँचा जहाँ भोजन कर दो घंटे की नींद ली। इस बीच मेरे साधारण से जूतों का स्वाद उनके पड़ोसी का कुत्ता ले चुका 🙂
16 दिसम्बर की शाम आटो रिक्शा ले, अंधेरा घिरते ही चल पड़ा अजय कुमार झा के निवास की ओर्। वे काफी अरसे से ‘धमका’ रहे थे कि अब की बार दिल्ली आए तो उनकी वेबसाईट के कार्य को किसी परिणाम तक पहुँचा कर ही जाएँ!
17 दिसम्बर को अजय जी का कार्यावकाश था मोहर्रम के कारण। वह दिन उनकी वेबसाईट, ब्लॉगिंग के विभिन्न मुद्दे, भविष्य की योजनायों, पारिवारिक बातों में बीत गया। कुमार राधारमण जी ने एक बार पुन: मुझे आमंत्रित किया अपने निवास पर, तो मैंने उनसे निवास का पता पूछा। यह खुलासा हुआ कि वे तो अजय कुमार झा जी के कार्य स्थल, कड़कड़डूमा अदालत के सामने ही एक किलोमीटर दूर रहते हैं। बस फिर क्या था यह कार्यक्रम बना कि अजय जी अगले दिन मुझे वहाँ छोड़ कर कोर्ट चले जाएँगे और शाम को लेने आ जायेंगे, मिल भी लेंगे राधारमण जी से।
अब दूसरे दिन हो गई देर। 10 बज ही रहे थे। मैंने अजय जी से कोर्ट के सामने ही छोड़ देने को कहा जिससे टहलते हुए ही जा सकूँ। दिक्कत यह हुई कि गर्म कपड़े पहनने के तीसरे तरीके पर आंशिक अमल करते हुए शुद्ध ऊन का तंग सा स्वेटर पहन लिया। पैदल चल तो पड़ा लेकिन पसीने से पूरा बदन तर-बतर हो गया। मन किया स्वेटर उतार कर वहीं फेंक दूँ। अभी आधी राह ही पार की थी कि ललित शर्मा जी का फोन आ गया। वे अशोक बजाज जी के दिल्ली पहुँचने की बात बताते हुए संभावित कार्यक्रम की चर्चा करने लगे। तभी मेरी निगाह सामने एक बोर्ड पर पड़ी, जिसमें ललित शर्मा ही लिखा देख मुस्कारा उठा मैं।

राधारमण जी से दो मोबाईल वार्तायों के बाद मैं सही जगह पहुँचा तो बड़े से गेट के सामने ही वे मेरी प्रतीक्षा करते मिले। बेहद आत्मीयता से गले मिले खुशमिज़ाज़ राधारमण जी के साथ उनके निवास की ओर बढ़ते हुए हमने एक-दूसरे के ब्लॉगों का जिक्र करते हुए उनकी विशेषतायें गिना दीं।

राधारमण जी के निवास पर पहुँचते ही मुझे एक शर्मिंदगी ने घेर लिया। एकाएक ही उत्तपन्न हो चुके पैरों में पसीने की गंध मुझे ही असह्य लग रही थी उनका पता नहीं क्या हाल हो रहा होगा।
बातों की शुरूआत करते हुए मृदुभाषी राधारमण जी ने बताया कि वे श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय में कार्यरत होने के साथ-साथ आकाशवाणी के अंशकालिक समाचार वाचक भी हैं। मैथिली व भोजपुरी जैसी विपरीत भाषायों में महारत हासिल कर चुके हैं। सामने आ चुकी नाश्ते की ट्रे का सम्मान करते हुए हमारे बीच जितनी भी बातें हुईं वह सभी ब्लॉगिंग के दायरे में रहीं।
ब्लॉगों को गूगल द्वारा बंद किए जाने, एग्रीगेटरों के बंद होने व उनकी कार्यशैली, एग्रीगेटरों की संख्या बढ़ने व उनसे होने वाले लाभ-हानि, चिट्ठाचर्चा डॉट कॉम विवाद, ब्लॉगिंग को साहित्य मानने न मानने की बहसबाजी, विभिन्न ब्लॉग चर्चा मंचो के उभरने, बिन मांगे ही ब्लॉग लेखक द्वारा टिप्पणी पर ज़वाब दिए जाने, टिप्पणियों को आधार बना कर पोस्ट लिखे जाने की प्रवृत्ति पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। एक सुझाव उनका था कि सभी चर्चा मंचों पर ब्लॉग पोस्ट्स की सूची में एक चौथाई वह सार्थक ब्लॉग रहें जिसके पाठक कम हैं।
दक्षिण भारत, मुम्बई, गुजरात से प्रकाशित होने वाले हिन्दी समाचारपत्रों के ऑनलाईन संस्करण की अनुपलब्धता के चलते उनकी जानकारियों से वंचित होने की बात करते हुए हम भोजन करने लगे। स्वादिष्ट भोजनोपरांत हमारी चर्चा आगे बढ़े इससे पहले ही अविनाश वाचस्पति जी की कॉल आ गई। उन्होंने केवल इतना ही पूछा कि कहाँ हैं? मैंने बताया राधारमण जी के घर पर, तो उनकी ओर से कहा गया कि वे भी हमारा साथ देने पहुँच रहे हैं।
अविनाश जी का इंतज़ार करते तक हमारी जो बातें हुईं उससे मुझे किंचित हैरानी हुई। राधारमण जी ब्लॉग जगत की हर उथल-पुथल से ना सिर्फ वाकिफ़ हैं बल्कि कई विवादास्पद व पुरानी बातें भी उनके संज्ञान में हैं। अविनाश जी की कॉल फिर आई, वह रास्ता भटक गए थे। हम दोनों परिसर के ग़ेट तक जा कर अविनाश जी को साथ ले आए। एक बार फिर दौर चला नाश्ते के साथ ठंडे पेय का।

अविनाश जी से मेरी यह पहली मुलाकात थी। राधारमण जी भी पहली बार मिल रहे थे। अविनाश जी के जनमदिन वाले दिन उनके संबंधी की हत्या से बात निकलते हुए अपराध के ग्राफ़ बढ़ने की ओर चल पड़ी और अखबारों के स्तंभ लेखन, कार्यालयों में शुरूआती दौर के कम्प्यूटर प्रयोग, हिन्दी लिखने के औज़ारों, एक ही आलेख के कई ब्लॉगों पर दिखने, अजित वड़नेरकर जी की किताब, टिप्पणी पुराण, वर्धा कार्यशाला से होते हुए अशोक बजाज जी के कार्यक्रम पर टिक गई। फिर कैमरे से फोटो लिए जाने के लिए प्रकाश की उचित व्यवस्था की तलाश में हम जा पहुँचे छत पर।

बातों ही बातों में मैंने अविनाश जी को अपने मन की बात बताई कि दिल्ली आने पर मुझे व्यंजना वाले नीरज बधवार से मिलने की बड़ी उत्कंठा होती है, मुझे उनका व्यंग्य लेखन बहुत पसंद है। उन्होंने झट मोबाईल संभाला, नीरज जी को कॉल मिला कर बात करने के पश्चात मुझसे बात करवा दी। नीरज जी को जब पता चला कि मैं दिल्ली में हूँ और फिलहाल उनके आस-पास के इलाके में ही हूँ, तो तुरंत ही हमारा साथ देने को आतुर हो उठे। स्थान पूछ कर वे 20 मिनट के भीतर ही आ पहुँचे। अब हम तीनों थे गेट पर नीरज जी का स्वागत करने के लिए। अविनाश जी ने बताया कि बात तो होती रहती है किन्तु नीरज जी से आज पहली बार मुलाकात होगी।
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अविनाश वाचस्पति, बी एस पाबला, नीरज बधवार, कुमार राधारमण

अब थे हम चार ब्लॉगर। और चारों के चारों पहली बार एक दुसरे से रूबरू हो रहे थे। नीरज बधवार जी ने जब मुझसे कहा कि मुझे तो आप देखते होंगे रोज़ाना! मैंने चकित होते हुए ना में सर हिलाया तो उन्होंने बताया कि वे सहारा के मध्यपर्देश-छत्तीसगढ़ चैनल पर समाचार पढ़ते हैं। उनकी उम्मीद थी कि टीवी देखते हुए उन पर भी नज़र जाती ही होगी। वे अपने आप को मेरा प्रशंसक बता रहे थे और मैं उनकी तारीफ किए जा रहा था 🙂
एक बार फिर पेय पदार्थ थे सामने। चुस्कियाँ लेते हंसी ठठा अपनी रफ्तार में चलता रहा। समय खिसकता रहा। अजय झा जी से बात हुई तो पता चला कि मुझसे सम्पर्क करने की उनकी कोशिश नाकाम रही थी और वे काफी समय पहले घर पहुँच चुके हैं।
काफी देर हो चुकी थी। नीरज जी के जीजाश्री ने संकेत दे दिया था कि वे आ रहे हैं। हम तीनों चल पड़े नीचे खड़ी अविनाश जी की कार की तरफ। जहाँ उनकी नेटबुक में अब तक लिए गए चित्र स्थांतरित किए गए। इसके बाद एक फरमाईशी चित्र भी लिया गया।

नीरज बधवार जी की कार में सवार हो हम चल पड़े अजय जी के निवास की ओर्। ओवर ब्रिजों के एक जमावड़े पर नीरज जी राह को ले कर कुछ भ्रमित हो गए। मोबाईल पर उनकी बातचीत से ऐसा प्रतीत हो गया था कि उन्हें कहीं पहुँचना भी है। मैंने उनसे वहीं उतार देने का अनुरोध किया। बार बार खेद प्रकट करते नीरज जी को विदा दे मैं चल पड़ा आटो रिक्शा पर सवार हो गीता कालोनी की ओर।

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एक दूसरे से पहली बार मिले चार ब्लॉगरों की लम्बी बैठक
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एक दूसरे से पहली बार मिले चार ब्लॉगरों की लम्बी बैठक” पर 41 टिप्पणियाँ

  1. बढिया यात्रा रही आपकी, कुमार राधारमण एवं नीरज बधवार जी से पहली बार मिले हम भी।

  2. बहुत बढिया लगा मिल कर . समय मिला तो आज मै भी बरेली मे दो ब्लागरो से मिलूंगा . खुश्दीप जी और अनुराग जी से .

  3. रोचक विवरण…
    नीरज बधवार जी से फोन पर तो एक बार बात हुई थी…अब उनसे मिलने की तमन्ना है

  4. … bahut sundar … shaandaar-jaandaar !
    नया साल शुभा-शुभ हो, खुशियों से लबा-लब हो
    न हो तेरा, न हो मेरा, जो हो वो हम सबका हो !!
    … nav varsh ki haardik badhaai va shubhakaamanaayen !!!

  5. अपको नये साल की हार्दिक शुभकामनायें। इस ब्लागर मिलन के लिये बधाईयाँ।

  6. आप ऐसे ही सम्‍पूर्ण भारत की यात्रा करते हुए एकता का संदेश देते रहें। बधाई और शुभकामनाएं।

  7. आखिर सब परेशानियों का सामना करने के बाद भी आप बुआ के घर भी पहुंच गये और अपने जूते……हा हा हा सबको जूते कयों खिलाते हैं? मैं तो डर गई रे बाबा!(सॉरी) तीनो ब्लोगर्स भाइयों से (बाप रे अब ये न कह देना कोई कि 'भाई' बोलती है.)मिल कर अच्छा लगा.दिल्ली जाऊंगी तब सबसे मिलनी इच्छा है.एक बात बताइए 'हमने एक-दूसरे के ब्लॉगों का जिक्र करते हुए उनकी विशेषतायें गिना दीं।'कयों भाई जी आप लोग कमियां कयों नही बताते?कम से कम मुझ जैसा नौसिखिया खुद को इम्प्रूव तो कर सके.
    खैर ….एक बार में कोई आर्टिकल पढ़ जाए तो समझिए लेखनी में दम है.आप भी बांधे रखते हैं.
    वाह! हेडर ही बना दिया फोटो का,गजब!
    सीखना पडेगा आपसे.

  8. अरे! उस दिन रास्ते में मैं भी तो मिला था।
    फोटो अच्छे हैं, नया कैमरा कौन सा लिया?

  9. एक छोटी सी बात रह गई पाबला जी! इसी दौरान चला बिहारी वाले सलिल वर्मा से एक मुख्तसर सी बात चीत भी हुई. हालाँकि यह बहुत मामूली घटना थी, किंतु मेरे लिये स्मरणीय थी!!
    नये साल की शुभकाम्नाएँ!!

  10. बेहद रोचक. तस्वीरें तो एक दम प्रोफेशनल. आप को नव वर्ष की मंगलकामनाएं.

  11. बढ़िया वर्णन ।
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।

  12. वाह वाह जी यह लाभ होता हे भारत मे रहने वालो को एक दिन मे ही कितने लोगो से मिल लो, बहुत अच्छा लगा, आप ने जुराबे लगतार दो दिन पहनी होगी चलिये यह भी एक याद गार बन गई:) बहुत सुंदर विवरण जी धन्यवाद

  13. साब जी आप तो गलत प्रोफ़ेशन में हैं कहां भिलाई में स्टील बनवाने में लगे रहते हैं, आप को तो ट्रेवोलोग लेखक ही होना चाहिए था।
    वैसे आप की स्वेटर का डिजाइन और दिल्ली मेट्रो का नक्शा एक सा नहीं दिखता क्या?
    अविनाश जी से मुलाकात हो चुकी है, राधारमण और नीरज जी के बारे में जानना बहुत अच्छा लगा। आप की बातों से लगता है कि महफ़िल में बड़ी दिलचस्प चर्चाएं हुईं, उनके बारे में जरा विस्तार से तो बताइए।
    बुआ के घर से चले तो जूते कौन से पहने थे?…।:)

  14. यद्यपि इच्छानुरूप आवभगत मैं न कर पाया,जिन लोगों को लंबे समय से इंटरनेट पर देख रहा था,उनसे मिलना बेहद उत्सुकतापूर्ण और आनंददायी था। किन शब्दों में शुक्रिया अदा करूं! प्रवास में होने के कारण मैं तो नववर्ष की बधाई तक नहीं दे पाया। आप तीनों कृपया विलम्बित शुभकामनाएँ स्वीकार करें।

  15. @ इंदु पुरी गोस्वामी

    'हमने एक-दूसरे के ब्लॉगों का जिक्र करते हुए उनकी विशेषतायें गिना दीं।'कयों भाई जी आप लोग कमियां कयों नही बताते?

    क्योंकि कमियाँ तो कोई भी बता देता है, विशेषताएँ बताने वाले इने-गिने ही होते है 🙂

  16. @ दिनेशराय द्विवेदी

    अरे! उस दिन रास्ते में मैं भी तो मिला था।
    फोटो अच्छे हैं, नया कैमरा कौन सा लिया?

    आपकी फोन कॉल का जिक्र इसलिए नहीं किया मैंने, क्योंकि उसमें एक संवेदनशील मुद्दा था।
    नया कैमरा है Canon Power Shot A3100 IS

  17. @ चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    इसी दौरान चला बिहारी वाले सलिल वर्मा से एक मुख्तसर सी बात चीत भी हुई

    जी, यह मामूली घटना नहीं थी किन्तु इस बातचीत का स्मरण ही नहीं रहा पोस्ट लिखते हुए 🙁

  18. @ राज भाटिय़ा

    आप ने जुराबे लगतार दो दिन पहनी होगी

    ना, ऐसा हुआ ही नहीं 🙂

  19. @ anitakumar

    आप की स्वेटर का डिजाइन और दिल्ली मेट्रो का नक्शा एक सा नहीं दिखता क्या?

    बुआ के घर से चले तो जूते कौन से पहने थे?…।

    मैं तो सोच रहा कि अविनाश जी की कमीज पर डिज़ायन की चुटकी ली जाएगी 🙂

    मरता क्या ना करता, वही पहनने थे, वही पहने रखे 🙁

  20. @ कुमार राधारमण

    इच्छानुरूप आवभगत मैं न कर पाया

    राधारमण जी, जिस आत्मीयता भरे पारिवारिक वातावरण में आपका साथ रहा उसमें आपसे मुलाकात करना मेरे लिए आल्हाद्कारी रहा और निश्चित तौर पर, विचारों के आदान-प्रदान में मुझे काफी कुछ सीखने को मिला

    आभार आपका, सभी साथियों का

  21. चलिए चुटकी नहीं लेता
    देर से आया हूँ इस लिए 🙂
    यात्रा में अभी काफी पीछे चल रहे हैं … अभी अपन का मिलन तू हुआ ही नहीं
    उपयोगी साईट बताने का शुक्रिया
    दिल्ली मेट्रो की तरफ से एक दिन का किराया मुफ्त समझिए 🙂

  22. वाह जी वाह … आप के इस घुमने फिरने की आदत से मुझे बहुत लाभ मिलता है … घर बैठे बैठे ही सब से मिलना हो जाता है !

    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

  23. रविवार को तो मेरे लिये,मिलना थोड़ा कठिन है,आप से मिलने की इच्छा है,रविवार के अतिरिक्त कभी फिर दिल्ली आयें तो सूचना दीजीयेगा ।

  24. @ padmsingh

    उपयोगी साईट बताने का शुक्रिया
    दिल्ली मेट्रो की तरफ से एक दिन का किराया मुफ्त समझिए 🙂

    दिल्ली से रवाना होते यह फंडा काम करता तो कितना बढ़िया रहता 🙁

  25. @ शिवम् मिश्रा

    आप के इस घुमने फिरने की आदत से मुझे बहुत लाभ मिलता है ..

    आदत नहीं, ज़रूरत होती है तभी आता-जाता हूँ 🙂

  26. @ vinay

    रविवार के अतिरिक्त कभी फिर दिल्ली आयें तो सूचना दीजीयेगा।

    जब भी दिल्ली प्रवास पर होता हूँ आपसे बातें तो हो जाती हैं, मुलाकात रह जाती है 🙁

    इस बार तो गुरूवार से सोमवार तक था दिल्ली में

  27. बहुत ही रोचक लगा ये मुलाकात विवरण…

    मैं भी अनीता जी से सहमत हूँ…आपको तो पूर्णकालिक यात्रा वृत्तांत लिखना चाहिए
    नव-वर्ष की शुभकामनाएं .

  28. बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

  29. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  30. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  31. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  32. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  33. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  34. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  35. ये दिल्ली के कुत्ते जूते खाने के लायक ही हैं। 🙂

  36. बहुत ही रोचक लगा ये मुलाकात विवरण…

  37. नए साल की आपको सपरिवार ढेरो बधाईयाँ !!!!
    नए साल की आपको सपरिवार ढेरो बधाईयाँ !!!!

  38. पाबला सर, आपको उस दिन गीला कॉलोनी न छोड़ पाने का मुझे अब भी बुरा लग रहा है मगर आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। अविनाश जी से तो मेरी पहले कुछ बार हो चुकी थी मगर राधारमण जी से उस दिन मैं पहली बार ही मिला। उनसे मिलकर भी बेहद अच्छा लगा। बहरहाल फोटो में अपने फूले हुए गालों को देखकर उतना अच्छा नहीं लग रहा:) दौड़ लगानी पड़ेगी फिर से…

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