भारतीय रेल की लेटलतीफ़ी से मुझे मिला एक खजाना!!

नागपुर में 9 जनवरी की शाम दलसिंगार यादव जी ने जब मुझे स्टेशन के बाहर छोड़ा तो अंदर जा कर पता चला कि ट्रेन आएगी डेढ़ घंटा देरी से, फिर देर बढ़ कर हो गई तीन घंटे! अब क्या किया जाए? धीरे धीरे टहलता हुआ स्टेशन के सामने ओवरब्रिज़ के नीचे बने खान-पान केन्द्रों में दो आलू के पराठे, फरमाईशी नीबू चाय के साथ उदरस्थ कर आया और बढ़ चला प्लेटफार्म 6-7 की ओर। अंधेरा छाने लगा था। निगाह पड़ी सामने ही एक निर्णामाधीन संरचना पर। ऊँचाई बहुत थी। खड़े होकर अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि आखिर यह बन क्या रहा है किन्तु असफ़ल रहा। एक फोटो ही ले ली जाए तो कैमरे की फ्लैश चमका दी।

(नागपुर स्टेशन के प्लेटफार्म 6-7 के पास बन रही कोई संरचना)

फुटब्रिज़ से नीचे उतरते उतरते नज़र गई प्लेटफार्म की व्यवस्था पर। ‘कोई वीआईपी आने वाला है क्या?’ मैं मन ही मन बुदबुदाया। लेकिन प्लेटफार्म पर पहुँचते ही कदम ठिठके।


ओह, यह नोबल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150वीं जन्मतिथि पर भारतीय रेल द्वारा श्रद्धांजलि दिए जाने के उपक्रम में चल संग्रहालय के रूप वाली विशेष ट्रेन थी! दो-चार चित्र ले इसके भीतर जाने की इच्छा हुई तो दिखा कि जाने की राह तो कोई है ही नहीं सारे डब्बों के दरवाज़े बंद हैं।

पूरा मुआयना करने की नीयत से मैं टहलता हुआ ट्रेन के अगले हिस्से की ओर बढ़ चला। अरे! यह क्या!? इंज़िन के पीछे वाले डब्बे का दरवाज़ा खुला हुआ है। कोई हलचल नहीं दिखी दरवाज़े के आसपास। वहीं बैठे एक तोंदियल पुलिस वाले से पूछा कि अंदर जा सकते हैं ना? उकताए से उस ‘जवान’ ने सिर हिला कर ‘सहमति’ दी तो लपक कर अपन जा घुसे उस डब्बे में।

फिर क्या था थोड़ी देर तक तो मैं ध्यान से हर जानकारी को देखता और उसका आकलन करता रहा लेकिन ज़ल्द ही अहसास हो गया कि यदि यही रफ़्तार बनी रही तो मेरी ट्रेन छूट जाएगी! तो फिर दनादन कैमरे का उपयोग कर सैकड़ों चित्र और वीडियो ले डाले जिसमें से कुछ यहाँ उपलब्ध हैं बाकी तो आप इस लिंक पर देख सकते हैं या फिर नीचे दिए गए स्लाईड-शो पर देख लें

सभी चित्रों पर पारदर्शी प्लास्टिक लगा हुआ था, नतीजतन फ्लैश का प्रतिबिम्ब सारी मेहनत जाया कर देता था। उस पर तुर्रा यह कि प्रकाश व्यवस्था के कारण सीधी चमक कैमरे के लैंस पर। अब एपर्चर आदि व्यव्स्थित करने का समय नहीं। सो कोण बदलते हुए कैमरे को ही यह काम सौंप दिया कि भई सब कुछ खुद ह

भारतीय रेल की लेटलतीफ़ी से मुझे मिला एक खजाना!!
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22 comments

  • भारतीय नागरिक - Indian Citizen says:

    bilkul tha ji, baadshaho…

  • Smart Indian - स्मार्ट इंडियन says:

    यह अनमोल झलक शेयर करने का शुक्रिया।

  • Smart Indian - स्मार्ट इंडियन says:

    यह अनमोल झलक शेयर करने का शुक्रिया।

  • Kajal Kumar says:

    Wah balle balle

  • शिवम् मिश्रा says:

    वाह जी वाह … इसको कहते है समय का सदुपयोग !
    अब कल हम जा रहे है कलकत्ता … मिलते है लौटने के बाद !

  • ललित शर्मा says:

    एक पंथ कई काज।

  • चला बिहारी ब्लॉगर बनने says:

    एक अद्भुत संकलन.. यात्रा का आनंद दोगुना हो गया!

  • राज भाटिय़ा says:

    खजाने के लिये आप का धन्यवाद, सच मे बहुत सुंदर खजाना आप के हाथ लगा, लेकिन ४,३० घंटे लेट गाडी, वल्ले वल्ले

  • खुशदीप सहगल says:

    पाबला-मंत्र…

    हम है राही प्यार के,
    हमसे कुछ न बोलिए,
    जो भी प्यार से मिला,
    हम उसी के हो लिए…

    जय हिंद…

  • GirishMukul says:

    वाह
    सर जी
    जबलपुर आई थी तब हम प्लान बनाते रह गये. "कहां हम जैसे पापी कहां पंढरपुर"

  • Vivek Rastogi says:

    वाह जी वाह मजा आ गया… हम तो कभी जीवंत रेल प्रदर्शनी देख नहीं पाये, आज देख ली..

  • ZEAL says:

    सुखद अनुभव हुआ इस जानकारी से । आभार पाबला जी ।

  • निर्मला कपिला says:

    बहुत खूबसूरत खजाना हाथ लगा। बधाई।

  • Atul Shrivastava says:

    सचमुच खजाना ही है यह।

  • डॉ टी एस दराल says:

    यह तो वास्तव में बड़ा कीमती खज़ाना हाथ लग गया । आभार इस प्रस्तुति के लिए ।

  • ताऊ रामपुरिया says:

    बहुत लाजवाव और कीमती अनुभव बांट दिये आपने, शुभकामनाएं.

    रामराम.

  • डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह says:

    Pabla ji,ek baar fir apney maje laga diye,wah aloo ke parathey aur neebu ki chay,saath mey GURUDEV paar itni intensive coverage,aap sey seekhna hoga bahut kuch jo ki nahi seekh sakta is janm mey mai to.Anyway,good post and my best wishes,
    regards
    dr.bhoopendra
    rewa mp

  • प्रवीण पाण्डेय says:

    बंगलोर में भी आई थी, बहुत अच्छा लगा था देखकर।

  • अजय कुमार झा says:

    सर ये खजाने भी आपके साथ साथ ही चलते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जौहरी कहीं आसपास ही है । दुर्लभ चित्रों को सहेजती हुई एक संग्रहणीय पोस्ट ।

  • गगन शर्मा, कुछ अलग सा says:

    ऊपर वाला भी कुछ 'एडा' ही है शायद। अरे तूने कोई नेमत बक्शनी है तो सीधे-सीधे दे ना भाई। गाड़ी लेट करवा कर, रकत-चाप बढवा कर इधर-उधर घुमवा कर परौंठे खिलवा कर ही क्यों 🙂

  • गगन शर्मा, कुछ अलग सा says:

    ऊपर वाला भी कुछ 'एडा' ही है शायद। अरे तूने कोई नेमत बक्शनी है तो सीधे-सीधे दे ना भाई। गाड़ी लेट करवा कर, रकत-चाप बढवा कर इधर-उधर घुमवा कर परौंठे खिलवा कर ही क्यों 🙂

  • डॉ. दलसिंगार यादव says:

    आपकी खोजी और घुमक्कड़ी वृत्ति का अनमोल तोहफ़ा। दो दिन से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक सेमिनार में व्यस्त रहने के कारण पोस्ट का पूरा आनंद नहीं ले पाया था। आज थोड़ा ही देखा। अद्भुत।

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