आपके पास कोई ज़वाब है इसका?

आज वाणी जी की पोस्ट पर निगाह पड़ी बख्श दो इन बुजुर्गों को …..

उद्देलित विचारों के बीच टिप्पणी करने लगा। कुछ लंबी सी हो रही थी, सोचा क्यों ना पोस्ट ही बना कर लिख दूँ। इसी बीच एक टिप्पणी अंश ने ध्यान खींचा कि माता पिता क्या सोच कर दुनिया में संतान लाते हैं? क्या सोच कर उनको बड़ा करते हैं? बस फिर क्या था सारे विचार हो गए गड़मगड़। इसी सोच में डूब गया कि यदि कोई ले ही आया है मुझे इस दुनिया में, तो मैं कर क्या रहा हूँ इस दुनिया में? किसके लिए कर रहा हूँ?

एक धार्मिक प्रवचन में सुनी कथा भी याद आई

एक मनुष्य ने भगवान को प्रसन्न कर वरदान पाने की सोची। वह ऊँचे पहाड़ की एक बड़ी सी चट्टान पर बैठ गया। सौ वर्ष तक तपस्या करते रहा। भगवान प्रसन्न हो अवतरित हुए और पूछा कि बोल मनुष्य, तुझे क्या वरदान चाहिए? मैं खुश हूँ तुम्हारी इस सौ वर्ष की तपस्या से। मनुष्य में अहंकार आ गया और इठलाते हुए बोला प्रभु! मुझे मेरी सौ साल की तपस्या का फल चाहिए हिसाब किताब कर दीजिए। भगवान से पहले ही चट्टान से आवाज़ आई हे मानव मैने तुझे खुद पर सौ वर्ष बिठाए रखा! पहले मेरी तपस्या का फल दे भगवान से हिसाब बाद में कर लेना पहले मेरा ॠण चुका!!

मेरा ज़वाब मेरे पास है कि माता पिता क्या सोच कर दुनिया में संतान लाते हैं? क्या सोच कर उनको बड़ा करते हैं? अगर आपके ज़वाब मिल जाए तो विचारों को कोई नई दिशा मिले।

ज़वाब साझा करेंगे ना!?

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आपके पास कोई ज़वाब है इसका?” पर 20 टिप्पणियाँ

  1. भगवान ने जो दिया उसी में खुश व मस्त रहना चाहिए। नहीं तो कहते है कि भगवान यदि देता भी छ्प्पर फ़ाड के है, तो लेता भी सब कुछ फ़ाड के ही है।

  2. हमें अपना भाग अधिक लगने लगे तो प्रकृति अस्थिर होने लगती है।

  3. प्रकइतु का भी अपना नियम है। इंसानी प्रश्न जब अपनी सीमा तोड़ने लगे तो पत्थर जैसा जड़ (प्रकृति का अवयव ) भी सह नहीं पाता।

  4. जो अपने मां-बाप का न हुआ वह किसी और का क्या होगा. वैसे अगर अन्यथा न लें तो भारतीय संस्कृति में जो ॠण बताये गये हैं उससे उऋण होने के लिये यदि पुरुषार्थ किया जाये तो यह सब संकट दूर हो जायें.

  5. बिना सोचे जो जवाब दिया जाए वही मन की आवाज़ होती है.. मेरे मातापिता ने मुझे जन्म दिया..अंतिम साँस तक उनकी सेवा करके भी उनका कर्ज़ नहीं चुका सकती क्यों कि इस दुनिया में लाने वाले हैं…दूसरी तरफ मैने जन्म दिया बच्चों को अपने जीवन को सार्थक करने के लिए..बदले में कुछ भी पाने की इच्छा नहीं बस वे खुश रहें…एक बच्चे की तरह और एक अभिवावक की तरह दोनो जवाब आपके पास हैं..आप क्या समझे…आप पर है…

  6. ईश्वर को जब इस दुनिया को करीब से देखने का मन किया तो उसने हमें जन्म दिया और इसके लिए उन्होंने हमारे माता -पिता को चुना ….

  7. फीड पर इंदु पुरी गोस्वामी जी का मिला ज़वाब

    मैं तो आज तक नही समझ पाई. शायद कोई सोच , विचार या प्लानिंग के बाद बच्चे हमारे जीवन में नही लाते हम. एक लंबे अरसे तक बच्चों के ना होने पर ज्यादातर पेरेंट्स अपने सूनेपन को मिटाने के लिए बच्चा चाहते हैं और….उनकी इस सोच पर मैं खूब हंसती हूँ.
    मेरे बच्चो का जन्म बस हो गया. मैं आश्चर्यचकित थी कि मेरे भी बच्चे होंगे ये तो कभी सोचा ही नही था.हा हा हा
    बड़ा करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी थी और उनसे स्वाभाविक रूप से प्यार भी हो गया था.अब बड़े हो गए हैं तो ……हम फिर अकेले हैं जैसे शादी के शुरू के दिनों में.
    वे हमे संभालेंगे नही संभालेंगे …..नही सोचती.बस इतना कि हम दोनों हैं और हमारा भविष्य.एक साथ मरने की ख्वाहिश है बस.एक दुसरे को अकेला छोड़ कर नही जाना चाहते.
    बच्चे प्यार करते हैं हमसे.कब तक? नही मालूम

  8. रोज़ चिडिया को घोंसला बनाते हुये बच्चे पालते हुये सोचती हूँ कि इन्सान से अच्छे तो ये जीव हैं बिना स्वार्थ के सृष्टी सृजन का काम कर रहे हैं बच्चों के पर निकल जायेंगे तो उड जायेंगे इन्हें पता है फिर भी कितनी निषठा से उन्हें पाल पोस रहे हैं लेकिन हम बच्चों को जन्म बाद मे देते हैं पहले उनसे आपेक्षायें पाल लेते हैं। शायद यहीं से कर्ज़ होने या चुकाने का सिलसिला शुरू होता है जो हमारे दुख का कारन बनता है।

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    मेरा ज़वाब मेरे पास है कि माता पिता क्या सोच कर दुनिया में संतान लाते हैं? क्या सोच कर उनको बड़ा करते हैं? अगर आपके ज़वाब मिल जाए तो विचारों को कोई नई दिशा मिले।

    बीर जी,

    इसका जवाब देने से पहले मैं तो आँख बंद कर यह सोच रहा हूँ कि एक बड़े कपि से आधुनिक मानव बनने के विकास क्रम की कम से कम कुछ लाख वर्ष लंबी इस यात्रा में अनेकों आपदायें, युद्ध, बीमारियाँ, अकाल, फाके आदि आदि पड़े होंगे… परंतु इन सब अनहोनियों के बावजूद भी मेरी-मेरे परिवार की रक्त श्रंखला चलती रही, जीवित रही और उसी के कारण आज मैं हूँ, ऐसा ही मेरी पत्नी के साथ भी हुआ… संतान पैदा करने के पीछे यही जैविक दायित्व होता है किसी भी जीव का… और तमाम फलसफों के बावजूद मानव है तो जीव ही… इस जैविक दायित्व को हमारी सनातन सभ्यता में 'पितृ ऋण' भी कहा गया है… और इससे मुक्ति का एक ही रास्ता बताया गया है वह है संतान पैदा करना और उसे पालित-पोषित करने में अपना श्रेष्ठतम देना !

    कभी समय मिले तो मेरी यह पोस्ट क्या है जीवन का उद्देश्य ? भी देखियेगा…

  10. माता-पिता हमें सोचकर लाए या बिना सोचे ही हम धरती पर आ गए, लेकिन जैसा भी हो, हमारे आने का माध्‍यम वे ही हैं। हमें उन्‍हें श्रेष्‍ठ जीवन देने के बारे में ही चिंतन करना चाहिए। माता-पिता को भी चाहिए कि वे अपना स्‍वाभिमान बनाकर रखें। कमजोर को हर कोई दबा देता है।

  11. मैं तो सुनने की कगार पर हूँ …
    इस लिए मैं भी ,बच्चों के विचार सुनना चाहता हूँ कि आजकल के बच्चों की क्या सोच है ..?
    इसके बारे में |

  12. हां सर जिंदगी से इस फ़लसफ़े को समझना भी बहुत आसान नहीं है , कोशिश करने के बाद ही पता चलेगा कि जीवन का ये कौन सा दर्शन है

  13. माता पिता ने चाहे अपना सूनापन मिटाने की खातिर या किसी और स्वार्थ के कारण जन्म दिया हो पर इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि उन्हों ने जीने की कला सिखाई, जीने की शक्ति दी और इस शक्ति का प्रयोग हम आजीवन करते हैं। जब तक हम जिन्दा हैं उनके ॠण से मुक्त कैसे हो सकते हैं। आप ने क्या जवाब सोचा अपने ही प्रश्न् का जानने को उत्सुक हूँ

  14. पाबला जी , यदि सोच कर संतान लाते तो क्या १२१ करोड़ होते ?

    लेकिन लालन पालन के बारे में एक हरियाणवी गाना याद आता है —

    पाला सै तै कदे न कदे , तने करके टूक खवा दे
    इतना ए अहसान भतेरा , मेरे सर पे घड़ा उठा दे ।

    आज भी हिन्दुस्तानी मात पिता बुढ़ापे में बच्चों की ओर देखते हैं ।

  15. फीड पर सुरेश यादव जी का ज़वाब

    माँ बाप सोच कर संतान को नहीं लाते हैं बल्कि संतान आजाने के बाद सोचते हैं .यही अच्छा है .यही स्वाभाविक है

  16. आप अपने विचारों से भी अवगत कराइए वीरजी !हम जानना चाहते हैं.

  17. आप अपने विचारों से भी अवगत कराइए वीरजी !हम जानना चाहते हैं.

  18. मेल द्वारा जानकारी देने के लिए धन्यवाद् आपका | मेरे ब्लॉग में आते रहें और अपनी टिप्पणियों से उत्प्रेरित करते रहें |

    http://pradip13m.blogspot.com/

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