मेरी दिल्ली यात्रा: जब विनीत कुमार ने पहचानने से इंकार कर दिया

दिल्ली के लिए रवाना होने से कुछ दिन पहले अजय झा जी ने मुझसे स्नेहपूर्वक आग्रह किया कि इन तीन दिनों के प्रवास में, मैं उनके घर ठहरूँ। मैंने ठिठकते हुए अपना संकोच उन्हें बताया कि एकाएक ‘किसी’ के घर ठहरना मुझे असहज सा लग रहा, वैसे भी शाहदरा में मेरी सगी बुआ जी हैं, वर्षों बाद दिल्ली जाना हो रहा, तो कम से कम पहला दिन तो वहीं रूकूँ, बाकी बाद में देखा जाएगा। लेकिन कहा जाता है ना कि जो सोचा जाए वह कहीं होता है क्या!? भिलाई से निकलते हुए बुआ जी को सूचना देनी चाही तो पता चला कि वे सपरिवार दिल्ली से बाहर हैं तीन-चार दिन में लौटना होगा। अजय जी को मैंने बता दिया कि अब तो हम पूरा समय उनके साथ रहेंगे।

जिस ट्रेन में मेरी यात्रा हो रही थी, उसमें मुझे साईड की ऊपरी बर्थ मिली हुई थी। 12 की रात को सोने का समय हुआ तो ऊपर बर्थ में जाते हुए लगा कि या तो शरीर भारी हो गया है या उम्र भारी पड़ रही! जैसे तैसे अपने आप को वहाँ ढ़केला तो महसूस हुआ कि किसी ताबूत में लेटा हूँ!! करवट लेकर बाँह तक उठाने की जगह नहीं मिल रही थी। बड़े पशोपेश में था कि माज़रा क्या है। जितनी भी नींद आई, हैरान परेशान कर देने वाले सपनों से ही गँवाई। सुबह उस जगह से नीचे उतरने में जो कुछ आसपास के लोगों ने देखा होगा, उसे मोस्ट अमेज़िंग वीडियो में स्थान दिया जा सकता है!

वो तो बाद में पता चला कि यह सब लालू यादव जी के मंत्रीकाल में देखे गए उस अल्पकालीन स्वप्न का परिणाम है, जो राजस्व बढ़ाने लिए साईड की दो बर्थों के बीच तीसरी लगाई गई थी। अब वह बीच वाली बर्थ निकाल दी गई है, लेकिन ऊपर वाली बर्थ जो और ऊपर उठा दी गई थी, उसे नीचे सामान्य स्थिति में नहीं लाया गया है!!

देर शान पौने आठ बजे पहुँचने वाली ट्रेन रात करीब दस बजे निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँची। अजय जी के निवास में जब प्रवेश हुआ तो 11 बज ही रहे थे।

बेहद आत्मीयता के साथ उनकी श्रीमती जी ने अभिवादन किया। मैं तो हैरान सा रह गया। मुझे ऐसा लगा कि मेरी स्वयं की छोटी बहन सामने खड़ी हो। वैसी ही निश्छल हँसी, वैसा ही बातों का अंदाज़, वैसा ही चश्मे का फ्रेम! कुछ अर्सा पहले, अजय जी के साथ हुए एक घटना क्रम से मुझे जानकारी हुई थी कि श्रीमती झा पंजाबी भाषी हैं।
दूसरे दिन, 14 नवम्बर की सुबह उत्साह से भरे अजय जी ने नाश्ते के बाद अपनी योजना बतानी शुरू की। उनका विचार था कि मैं यदि चुपचाप उनसे मुलाकात कर वापस चले गया और बाक़ी साथियों को इस बात का पता चला तो उनकी टांग खिचाई होनी निश्चित है! इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने एक छोटा सा ब्लॉगर मिलन कार्यक्रम रख लिया था 15 नवम्बर का। स्थान उनके क्षेत्र का ही था, लक्ष्मी नगर डिस्ट्रिक्ट सेंटर में।
दिन भर अजय झा, आपसी बातचीत में, अपनी तकनीकी जिज्ञासा शांत करते रहे। उनके यहाँ केबल से इंटरनेट कनेक्शन है, जिसकी धीमी गति से मुझे झूंझलाहट सी हो जाती थी। उस दिन वहीं से एक दो पोस्ट दे पाया, बाद के दिनों के लिए, समयाभाव के कारण वह भी संभव नहीं हो पाया।
शाम ढलते ही मुझे विनीत कुमार की दाँत किटकिटा कर जाड़ा काट देने वाली टिप्पणी याद हो आई। मुझे लग
ा कि इस बारे में आपसी बात कर कुछ साथियों का एक और छोटा सा कार्यक्रम कर लिया जाए। विनीत जी का नम्बर नहीं था हमारे पास। मुझे रवि रतलामी जी द्वारा लिया गया विनीत कुमार का इंटरव्यू याद आया तो अंदाजा लगा कि रवि जी के पास हो सकता है नम्बर, विनीत कुमार का। रवि जी ने हाथ खड़े कर दिए और अविनाश वाचस्पति जी से सम्पर्क करने की सलाह दी। अविनाश जी ने सहर्ष हमें वह नम्बर नोट करवाया। हमने झट से वह नम्बर लगाया। सामने वाले ने जब फोन नहीं उठाया तो फिर कोशिश की। अब की बार कुछ अस्पष्ट सी आवाज़ आई तो मैंने सुनिश्चित करना चाहा कि विनीत कुमार बोल रहे हैं ना। अगले ने हामी भरी तो मैंने अपना परिचय दिया, सामने से पूछा गया कि आपको किससे बात करनी है!
एक बार और वही उपक्रम हुआ तो मेरी मुख-मुद्रा देख अजय झा ने अपने मोबाईल से वह नम्बर डायल किया और बड़ी गर्मजोशी से अपना परिचय देते हुए बात शुरू की। उसके बाद कुछ क्षण तक मोबाईल कान से लगाए आती आवाज सुनते रहे और फिर धीरे से पूछा आप डीयू से विनीत कुमार बोल रहे हैं ना, अविनाश वाचस्पति जी को जानते हैं? जो जवाब मिला, उसे सुनते ही अजय जी ने मोबाईल सम्पर्क तोड़ दिया।
अब अगले दिन का सुखद विवरण, अगली पोस्ट में
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मेरी दिल्ली यात्रा: जब विनीत कुमार ने पहचानने से इंकार कर दिया” पर 22 टिप्पणियाँ

  1. लगता है कि आपने एकता कपूर से कोचिंग क्लासेज़ ली हैँ….

    रोचक संस्मरण…अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा

  2. सस्पेन्स!!!

    इन्तजार है अगली कड़ी का…टें टें !!!

  3. एक फोटोग्राफर के रूप में आप को बधाई। अजय का चित्र बहुत सुंदर लिया है। बहन जी को प्रसन्न कर ही दिया।
    लालू जी रेल में मुनाफा कमाने में इतने व्यस्त हो गए कि मुसाफिरों को मुर्गी ही समझ बैठे। भूल गए कि उस का खाविंद हर सुबह कुकड़ूँ कूँ बोल जाता है।

  4. हमें भी शिकायत है, आप हम से कभी नही मिले। ब्लॉग पर भी।

  5. @ डॉ टी एस दराल

    शिकायत हो सकती है किसी भी स्तर पर, लेकिन
    आपका नाम सुन कर कभी पहचानने से इंकार नहीं करूँगा दराल जी।

  6. वाह जी इह ताँ बहुत बधिया गल दस्सी कि झा जी की पत्नि पंजाबन है सत श्री आकाल उना नूँ ते आपजी नू वी बधाईयां

  7. आजकल आप भी ऐसे ही बात कर रहे हैं पाब्ला जी,और सुबह-सुबह मैं तो सालो से ऐसे ही बात करता आ रहा हूं।

  8. "सुबह उस जगह से नीचे उतरने में जो कुछ आसपास के लोगों ने देखा होगा, उसे मोस्ट अमेज़िंग वीडियो में स्थान दिया जा सकता है!"

    हम भी भुगतभोगी है सो आपका दर्द समझते है!

  9. दिलचस्प यात्रा वर्णन….आगे क्या हुआ….
    नीरज

  10. दर असल लालू जी की सीट ममता जी ने हथिया ली है सो सब सीट ऊपर नीचे करने का काम भी उनके जिम्मे आ गया है ..अब धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा तब तक रिज़र्वेशन मे साइड अपर का ऑप्शन टालते रहें । बाकी बढिया है मोबाइल कनेक्शन क्यों काट दिया गया ,यह जानने की उत्सुकता तो हमे भी है ।

  11. दिनेश द्विवेदी जी के कथन पढ़ 'लालू जी रेल में मुनाफा कमाने में इतने व्यस्त हो गए कि मुसाफिरों को मुर्गी ही समझ बैठे।' मेरी हंसी छुट गई.

    पाबला जी, आपकी हैरानी, परेशानी जायज है. मैं सोच रहा हूँ अभी 'वाचस्पति' जी क्या सोच रहे होंगे.

    सुलभ जायसवाल 'सतरंगी'

  12. पोस्ट की शीर्षक पढ़ने के बाद मेरी स्थिति डूब मरने जैसी है। पढ़ते ही पहले अजय भाई को फोन लगाया। मैंने उनसे पहला ही सवाल किया कि आपने मुझसे बात की है,आप मेरी आवाज पहचानते हैं। क्या आपको लगता है कि मेरे बात करने का अंदाज ऐसा ही है जैसा कि पाबलाजी ने अपनी पोस्ट में बताया है। अजय भाई का जबाब था कि मैं तो खुद ही शॉक्ड रह गया। मैंने उनसे पाबलाजी का नंबर मांगा। फोन पर उन्होंने उनका नंबर लिखवाया। मैंने उनसे बात की। फिर कमजोर नेटवर्क की वजह से बीच में ही डिस्कनेक्ट हो गया। पाबलाजी ने उधर से फोन किया और बताया कि हमारे यहां नेटवर्क वीक रहता है। कोई बात नहीं,अबकी बार अगर दिल्ली आया तो आपसे मिलना होगा। लेकिन पाबलाजी ने साथ में यह भी कहा कि उस दिन जो फोन पर बात कर रहे थे,अजयजी उस आवाज को पहचान रहे थे। उन्होंने कहा कि ये विनीत की ही आवाज है। लेकिन मैंने पोस्ट में इसका जिक्र इसलिए नहीं किया है कि ये बहुत ही पर्सनल बात है।
    अब देखिए,कहानी ये है कि जिस आवाज ने पाबलाजी को पहचानने से इन्कार कर दिया वो अजयजी के हिसाब से मैं ही हूं। पाबलीजी के हिसाब से संभव है कि विजी होने की स्थिति में मैंने ऐसा कह दिया हो। ये सब बहुत ही मामूली बातें हैं,हमें भूल जाना चाहिए।
    मैंने उनसे और अजयजी से भी कहा कि मैं लगातार कमेंट कर रहा था कि मैं भी आपलोगों से मिलना चाहता हूं। लेकिन सर्दी-खांसी की जकड़न से उबर ही नहीं पा रहा था। दिनभर कमरे में मफलर लपेटे काढ़ा पीता रहा। इस विजी कहीं जाना नहीं हुआ। इस बीच ये सब हो गया। आज पोस्ट का शीर्षक पढ़कर सन्न रह गया।
    अजय भाई और पाबलाजी ने कहा है कि छोड़िए इन सब बातों को। लेकिन सच कहूं,मेरे लिए ये बहुत ही अफसोसनाक बात है। मैं इतना भी व्यस्त नहीं रहता कि किसी के फोन करने पर इरिरटेट हो जाउं। पाबलाजी ने कहा है कि अपनी बात रखी है,कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं लेकिन मुझे अभी तक यही लग रहा है कि जो बातें मैंने की ही नहीं,वो मेरे लिए कैसे संदर्भ बन गया? गलत पाबलाजी नहीं हैं,अजयजी भी नहीं हैं। लेकिन मैं अपने पक्ष से क्या करुं?

  13. कुछ मुलाकातों का संयोग ऐसे भी बन जाता है और संवाद की शुरूआत हो जाती है ….विनीत भाई मन में कोई क्लांत न रखें …और हां अगली बैठकी के लिए तैयार रहें ..अबकी सर्दा जुकाम का बहाना भी नहीं चलेगा ..अरे वो एक्सपायर हो गया न ..
    सर मेरी फ़ोटो तो आपने कमाल निकाल दी है ..सोच रहा हूं प्रोफ़ाईल में यही लगा लूं..

  14. सही है.. उस पर तो फिर भी गनीमत है। एक दफ़े साइड मिडिल पर लेटना हुआ था.. खुद-ब-खुद शे’र निकल पड़ा–

    ज़िन्दगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
    पाँव फैलाउं तो दीवार में सर लगता है..

  15. होता है कभी-कभी..हम गलत नम्बर सही बातें बतियाते रहते हैं. बढिया संस्मरण.

  16. फोन की क्या कहें – एक स्त्री मुझे बार बार फोन करती रही। किसी गांव से लगती थी। हर बार पूछती – तबियत ठीक हुई कि नहीं।
    बताने पर भी कि नम्बर गलत है, यदा कदा आ ही जाता था।

  17. दिल्ली मीट की बढ़िया जानकारी और आपके संस्मरण उम्दा रहे ……आभार

  18. 🙂 Bechare Vinit ji aap ki post padh kar unki sardi khaansi toh aur badh gayi hai aur awaaz nikal hi nahi rahi…ab kadhaa bhejiye…:)

  19. स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं हुई…
    फिलहाल विवरण रोचक रहा 🙂

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