मेरी दिल्ली यात्रा: पहली बार राजीव तनेजा, खुशदीप, इरफ़ान, विनीत से रुबरू होने का रोमांच

बेशक विनीत कुमार के मोबाईल नम्बर पर हुए वार्तालाप के बाद मुझे कुछ असहजता सी लगी हो, किन्तु अगले दिन ब्लॉगर साथियों से रूबरू होने का ख्याल मुझे रोमांचित कर रहा था। 14 नवम्बर को उत्तरप्रदेश, दिल्ली, पंजाब के कई साथियों ने सम्पर्क किया और मिलने की उत्कंठा बताते हुए आ पाने का प्रयास किए जाने की सूचना दी। अजय जी ने एक बार बैठक वाले स्थान तक हो आने का प्रस्ताव दिया तो मैंने आलस्य के मारे उन्हें मना कर दिया।

15 नवम्बर की सुबह हम दोनों करीब साढ़े दस बजे ही बैठक के लिए चुने गए Gg’s पहुँच गए। अन्दर जाकर नियत स्थान पर नज़र मारी तो टेबलों से अलग, एक साथ लगी कुर्सियों का रूख एक ही ओर पाया। प्रबंधक को बुला कर उसे व्यवस्था बद्लने को कहा गया तो वह असमंजस में पड़ हमें ही समझाने लग गया। उसे बताया गया कि यहाँ कोई कॉंफ्रेंस या लेक्चर नहीं होने जा रहा। तब कहीं जा कर वह हमारे मनमुताबिक व्यवस्था हो पाई।
मैं और अजय झा ऐसी जगह बैठ गए, जहाँ से आगंतुक की निगाह आसानी से पड़ जाए। कुछ ही देर में एक सज्जन ने छुई-मुई, तन्वंगी युवती के साथ प्रवेश किया और अजय जी का अभिवादन करते हुए मुझसे गले मिलने लपक पड़े। हमारी बांहों का घेरा कसे जाते तक अजय जी ने बता दिया कि ये हँसते रहो वाले राजीव तनेजा जी हैं। दरअसल वे, राजीव जी से साहित्य शिल्पी वाले आयोजन में मिल चुके थे।
हालांकि अभिवादन कर चुका था, किन्तु मैं उलझन में था कि राजीव जी के साथ जो युवती है, उन्हे क्या कह सम्बोधित करूँ? अजय जी ने शायद मेरी उलझन ताड़ ली और मुझे सूचित करने के अंदाज़ में बताया कि भाभीजी से तो फरीदाबाद (साहित्य शिल्पी आयोजन) में भी मिल चुका हूँ। ओह, तो यह श्रीमती संजू तनेजा थीं। बाद में पता चला कि श्रीमती तनेजा भी हिंदी ब्लॉगर हैं। उनका ब्लॉग है आईना कुछ कहता है
कुछ क्षण ही बीते थे कि एक फुर्तीले से नौजवान को बल्ले बल्ले करते राजीव जी से गले मिलते पाया। वह तो लगभग पहचान में आ गए। वे थे, आज उनसे पहली मुलाकात होगी … गुनगुनाते हुए देशनामा वाले खुशदीप सहगल। गले मिलने की तमन्ना हम दोनों ने भी पूरी की।
अब तक कतिपय साथियों ने मोबाईल पर सम्पर्क कर, न आ पाने की सूचना दे दी थी। द्विवेदी जी वल्लभगढ़ से रवाना हो चुके थे। हमारी बातचीत अभी परवान भी नहीं चढ़ी थी कि इतनी सी बात वाले कार्टूनिस्ट इरफान ने अपनी चिर-परिचित हंसी के साथ प्रवेश किया। फिर तो धमाल ही हो गया थोड़ी देर के लिए
बैठते ही उन्होंने धीरे से पूछा कि तीसरा खम्बा वाले दिनेशराय द्विवेदी जी नहीं आए? मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ। मैंने उन्हें बताया कि द्विवेदी जी अपने आप को इरफान का फैन कहते हैं! अच्छा रहेगा जब चलेंगे दोनों फैन एक साथ, ठडी हवाओं का आनन्द तो हम लेंगे!!
तभी द्विवेदी जी का फोन आ गया। वे शायद रास्ता भटक गए थे। अजय जी उन्हें ले कर आए तो सबसे ज़्यादा खुशी इरफान जी के चेहरे से छलक रही थी।
सबसे अंत में पहुँचने वाले रहे विनीत उत्पल। पता नहीं क्यों मुझे लगता रहा कि उन्हें मैंने पहले भी कहीं देखा है।
औपचारिक, शुरूआती ठंडे जूस और गर्मागर्म चाईनीज़ स्नैक्स के साथ बातों का सिलसिला एक बार जो शुरू हुआ तो रूकने की कोई गुँजाईश नहीं थी।
लेकिन भई, यहाँ रूकने करने की ज़रुरत मुझे लग रही है। शायद कुछ बड़ी सी हो रही यह पोस्ट।
क्या खयाल है आपका?
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मेरी दिल्ली यात्रा: पहली बार राजीव तनेजा, खुशदीप, इरफ़ान, विनीत से रुबरू होने का रोमांच” पर 20 टिप्पणियाँ

  1. हमें तो लगा कि पोस्ट जल्दी खत्म हो गई…जारी रहिये!!

  2. आपलोगों के संस्‍मरण पढकर अच्‍छा लग रहा है .. बहुत सुंदर चित्र हैं सभी के !!

  3. अरे! इन सब में आप खुद कहाँ हैं?

  4. आदरणीय पावला जी
    सनम्र निवेदन है कि आप खजाना पुरा खोलने की महती कृपा करें, किश्तों मे मजा नही आयेगा, क्योंकि अपने को पहला पैग डबल पटियाला लगता है। उसके बाद आण दयो जी आण दयो। हा हा हा

  5. पाबला जी,
    नौजवान बनाने के लिए आपने मुझसे एक ट्रीट पक्की कर ली है…फोटो में मैं इसी विचार की मुद्रा में हूं कि अदा जी अब क्या कमेंट करने वाली हैं…अजय जी वाली पोस्ट पर हम सब की तोंद को तो वो पहले ही निशाना बना चुकी हैं…

    जय हिंद…

  6. ज़रा-ज़रा सी मिठाई दिखा कर क्यों ललचा रहे हो पाबला जी?

  7. विनीत रायपुर मे रह चुके हैं पाब्ला जी।वैसे मैं भी कल भिलाई होकर राजनांदगांव गया और वापस आया था,लेकिन रूकने का समय नही मिल पाया।आपको ये बात कल इसलिये नही बताई कि आप फ़िर बिना रूके जाने ही नही देते और मुझे लौटना बहुत जरूरी था।हा हा हा हा हा,वैसे हो सकता है कि कल फ़िर उधर से गुज़रूं,इस बार मिलकर ही जाऊंगा,आप फ़ोटू मस्त खींचते है और छापते भी बड़ी-बड़ी है। हा हा हा हा।

  8. यादगार लम्हों को बाँटने का शुक्रिया!
    काश् हम भी साथ होते!

  9. वाह पाबला जी, आपका अंदाजे बयाँ जो है न.
    आह! बोलने कभी नहीं देता.

    रिश्तों का सफ़र यूँ ही किश्तों में जारी रखिये. क्यूंकि ये है जिंदगी के मेले. किसी किश्त में पाबला का चेहरा सतरंगी और सुलभ का मन बावला जरुर दिखेगा.

    जानदार फोटो ली है आपने. एक और हुनर का पता चला.

    सुलभ

  10. खुशकिस्मत हैं जी आपजी आप जो इतने बड़े बड़े ब्लागर्स से जा मिले हम तो इनके नाम पढ़ कर ही संतोष कर लेते हैं…इश्वर करे आप की तरह कभी हमारे भी दिन फिरें…
    नीरज

  11. पिछली पोस्ट में विनीत कुमार और इस पोस्ट में विनीत उत्पल। या तो नाम ठीक कर लें या बात!

  12. कारवां गुजर गया, और हम खड़े खड़े गुबार देखते रहे।
    खैर अगली बार सही।

  13. मैं जानता था सर ..कि जब आप शुरू होंगे तो आप ही आप होंगे तभी सब पहले ही ठेल और लपेट दिया अब मजे से मजा लेंगे ..॥

    शुकुल जी …पहली पोस्ट में विनीत कुमार , गाहे बेगाहे वाले जी की ही बात हो रही थी और इसमें ..विनीत उत्पल जी की हो रही है…कोई गलती नहीं हुई है …

  14. दिलवालों की दिल्‍ली में हिन्‍दी ब्‍लागरों के मिलन का हाल पढकर मन बल्‍ले बल्‍ले कर उठा. आघू के गोठ-बात अउ फोटू के अगोरा हे.

  15. पावला जी एक तो आपका जीवन्त वरण,और दूसरी फोटोग्राफी लाजवाव ।

  16. यह परिचय सत्र देख कर मज़ा आ गया .. अब सम्वाद सत्र शुरू होगा ना ?

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