ब्लॉगिंग को बकवास ठहराते पुण्य प्रसून बाजपेयी से हुई मुठभेड़

रविवार का वह खुशनुमा दिन एक साथ बिता, सभी के दिल-ओ-जुबां पर अगली मुलाकात का वादा था। एक एक कर जब सभी प्रफुल्लित मन से विदा लेने लगे तो, अजय झा ने अंत में रह गए द्विवेदी जी से अपने निवास पर आमंत्रित किया। कुछ दुविधा में पड़े, वल्लभगढ़ जाने वाले, द्विवेदी जी को जब देर शाम बॉर्डर पर लगने वाले ट्रैफिक जाम का खाका खींच कर बताया गया तो उन्होंने वह रात अजय जी के निवास पर बिताने का आग्रह स्वीकार कर लिया।

एक बार फिर यह समय था, विधि क्षेत्र के हिंदी ब्लॉगों से जुड़े ब्लॉगरों की त्रयी का एक छत के नीचे अपने विचारों व योजनाओं को साझा करने का।

नाश्ते के तुरंत बाद अजय झा रवाना हो गए अपने कार्यालय की ओर, मैं और द्विवेदी जी नज़दीकी बस स्टॉप से जा पहुँचे यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन। हमें जाना था इरफ़ान जी के निवास स्थल पर्। पिछले दिन की बातचीत ने हमने उन्हें आश्वस्त किया था कि ‘सेकेंड हाफ’ में आपके साथ समय बिताने अवश्य आएंगे। नोएडा जाने वाला यह मेट्रो मार्ग दो दिन पहले ही शुरू हुआ था। टिकट खिड़की पर पहुँचे तो दुविधा में पड़ गए। इरफ़ान जी का निवास स्थान बताया गया था मयूर विहार फेस 1 एक्स्टेंशन 2, सामने मानचित्र पर था मयूर विहार 1, मयूर विहार 2!

इरफ़ान जी को मोबाईल किया गया, वे शायद कहीं व्यस्त थे, थोड़ी देर में वापस कॉल करने की बात कह सम्पर्क कट गया। हमने कुछ सोच कर मयूर विहार 1 का टिकट ले लिया। मेट्रो के अंदर ही पूछताछ की तो एक बुज़ुर्ग से सज्जन ने कुछ परेशान सा होते हुए पूछ कि आखिर आपको जाना कहाँ है?पता बताया गया तो मुस्कुराते हुए कहा ‘ओह! इरफ़ान के यहाँ जाना है! आप मेरे साथ चलिए, मैं बताता हूँ, हम पड़ोसी रह चुके हैं।’इरफ़ान जी घर पर नहीं थे। उनकी श्रीमती जी ने कहा कि आपके ‘सेकेंड हाफ’ में आने की बात हुई थी तो वे कुछ काम निपटाने चले गए हैं। वह तो बात में पता चला कि मेरा तात्पर्य दोपहर 12 बजे के बाद से था, जबकि वहाँ ‘सेकेंड हाफ’ 3 बजे के बाद माना जाता है!

खुशदीप सहगल जी सुबह से दो-तीन बार फोन कर हमारी लोकेशन पूछ चुके थे। वे चाह रहे थे कि हम पहले उनके निवास पहुँचें। जब इरफ़ान जी के निवास पर होने की सूचना दी गई तो फिर उन्होंने अपने कार्यालय में ही मिलने की बात पक्की कर ली।

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इरफ़ान जी के आते तक कॉफ़ी का एक दौर हो चुका था। उन्होंने आते ही मुझसे कुछ तकनीकी बातें पूछनी शुरू कर दीं। फिर तो हम तीनों ने, उनके कम्प्यूटर स्टेशन पर बहुत देर तक समय बिताया। हालाँकि उससे भी ज़्यादा समय द्विवेदी जी के साथ उनका बीता।

मेरी उत्सुकता थी कि वे कार्टून कैसे बनाते हैं, कहाँ बैठ कर बनाते हैं, विषयवस्तू को अपनी चुटीलेपन में कैसे ढालते है! पूरी प्रक्रिया उन्होंने बड़े सहज ढ़ंग से बताई। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर कार्टून बनाए जाने पर न्यायपालिका में उठे विवाद वाले उस घटनाक्रम का विस्तारपूर्वक ब्यौरा दिया जिसके कारण उन्हें जेल की सज़ा सुनाई गई थी और अब भी वह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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भोजन के दौरान इरफ़ान जी ने ग्वालियर में बचपन बिताने से दिल्ली तक के जीवन के बारे में बड़ी दिलचस्प सामाजिक, राजनैतिक, पारिवारिक जानकारियां दीं।

बाद में चले कॉफ़ी के एक और दौर के साथ हमने श्रीमती इरफ़ान द्वारा संकलित विभिन्न विषयों, भाषायों वाली लाईब्रेरी का जायजा लेने के साथ साथ दीवारों पर प्रसिद्ध हस्तियों के साथ इरफ़ान की तस्वीरों को भी निहारा। गोधरा प्रकरण पर बने उनके चुनिंदा कार्टूनों वाली गोधरा एक्सप्रेस ने तो एक दीवार का अधिकतम हिस्सा घेरा हुया था।

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जब हम विदा लेने लगे तो इरफ़ान जी ने मुझे और द्विवेदी जी को अपने कुछ आयोजनों की स्मारिका व भेंटस्वरूप एक-एक स्मृति चिन्ह, सस्नेह दिया। खुशदीप जी को दिया गया समय पार हो चुका था। शाम के साढ़े चार हो रहे थे कि फिर उनका फोन आ गया कि भई पाँच बजे के बाद व्यस्तता बढ़ जाएगी, जल्दी आईए। इरफ़ान जी की कार से हम जा पहुँचे तमाम मीडिया समूहों से भरे नोएडा की फिल्म सिटी में। इरफ़ान जी का एक पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम था सो वे वापस हो लिए। हम जा पहुँचे ज़ी न्यूज़ के द्वार पर सुरक्षा कर्मियों के बीच।

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खुशदीप जी का विशेष निर्देश पहले ही था सुरक्षा कर्मियों को। तत्काल औपचारिकताएं पूरी की गईं। कुछ क्षण पहले ही हमारा इंतज़ार कर गेट से लौट चुके खुशदीप जी, रिसेप्शन पर स्वयं मौज़ूद थे। चाय, जूस, स्नैक्स का प्रबंध था ही। सामने ही बड़ी सी स्क्रीन पर ज़ी न्यूज़ पर चल रही खबरों पर आपसी बातचीत के बाद, खुशदीप जी ने ज़ी समूह के लम्बे चौड़े पूरे परिसर का भ्रमण करवाया। चारों ओर चहल पहल, बड़े बड़े स्टूडियो, कंट्रोल रूम, मेकअप रूम, लाईब्रेरी, रिकॉर्डिंग रूम, वॉयसओवर रूम और भी ना जाने क्या क्या!

खुशदीप जी की फुर्ती के आगे हमारी चाल कुछ सुस्त सी थी या फिर एक अनजानी जगह का जायजा लेते हो गई थी। एकाएक उन्होंने बड़े डेस्क के पास जा एक व्यक्ति के कंधे पर थपकी दी। खुशदीप जी ने हमारा परिचय उन्हें दिया। उनके परिचय के पहले ही चेहरा बता रहा था कि वे पुण्य प्रसून बाजपेयी थे

‘ये ब्लॉगिंग व्लॉगिंग सब बकवास है, फालतू है’ पहला वाक्य यही था उनका! चारों ओर टीवी के विभिन्न चैनलों की आवाजों से माहौल में शोर सा था। मैंने उनकी ओर कुछ झुकते हुए फिर पूछा क्या कह रहे हैं आप? ‘अजी ब्लॉगिंग से समाज को क्या फायदा होता है, यह सब तो चोंचले हैं, कोई मतलब नहीं इस पर समय देने से’! द्विवेदी जी मुझसे आगे की ओर बैठे थे। अपने विचारों के सम्प्रेषण को ब्लॉगिंग के मंच से जोड़ने संबंधी कुछ बातें मेरी पूरी हो पातीं, इससे पहले ही दिवेदी जी ने अपनी सारगर्भित बातें प्रभावशाली ढ़ंग से रखीं। धीरे-धीरे खामोश होते और सिर हिलाते पुण्य प्रसून की मन्द मन्द दबी सी मुस्कुराहट किसी और ही बात की चुगली कर रही थी। मुझे शक होने लगा कि कहीं यह सब कोई ट्रॉल तो नहीं।

खुशदीप जी समय का हवाला देते हुए हमें वहाँ से ज़ी के भाषायी हिस्से की ओर ले गए। चित्र लेने की मनाही थी। मन मसोस कर रह गए।

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खुशदीप जी का निर्धारित कार्यक्रम शुरू होने ही वाला था। हमने जल्दी से एक वादे के साथ विदा ली और रिक्शे में सवार हो पहुँच गए नोएडा सेक्टर 18 के मेट्रो स्टेशन तक। वहाँ से द्विवेदी जी वल्लभगढ़ के लिए रवाना हो गए और हम सवार हुए मेट्रो पर अक्षरधाम स्टेशन के लिए। अक्षरधाम स्टेशन से बाहर निकले तो अंधेरा हो चुका था।

अजय जी इंतज़ार कर रहे कि इस मौके की अंतिम रात कुछ और तकनीकी जानकारी ले ली जाए। ढेर सी जानकारियों का खुलासा करते 17 तारीख की सुबह ढ़ाई बज गए तो अजय जी की आंखें बंद होने लगीं। हम भी अगले दिन का कार्यक्रम बनाते बिस्तर पर जा पहुँचे।
आप कार्यक्रम कब बना रहे हमसे मिलने का?
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ब्लॉगिंग को बकवास ठहराते पुण्य प्रसून बाजपेयी से हुई मुठभेड़” पर 43 टिप्पणियाँ

  1. पुण्य प्रसून ऐसा कहकर आपकी टोह ले रहे होंगे। वैसे इस वकवास में वो भी अच्छी-कासी दिलचस्पी लेते हैं।.

  2. आज आप को फोटोग्राफी का अवार्ड दे दिया जाना चाहिए। मैं अपने हाथों का नृत्य चित्र में पहली बार देख रहा हूँ, उसी की बदौलत।

  3. आपकी फ़ोटोग्राफ़ी के हम भी कायल हैं, लेकिन एक निवेदन है ये फ़ोटो ग्राफ़ी जरा "रामप्यारी बिलाई" को भी सीखा देते तो पहे्ली वाला मामला काफ़ी सुलझ जायेगा, हमेशा ये फ़ोटो पीछे से ही खींचती है।
    हा हा हा

  4. पुण्य प्रसून ऐसा कहकर आपकी टोह ले रहे थे
    इसलिये कि वो खुद भी ब्लोग लिखते है

  5. बढ़िया रहा वृतांत. बाजपेयी जी के विषय में विनीत की बात ही उचित लगती है.

  6. अरे पुण्य प्रसून जी के अन्दर भी एक सच्चे ब्लाग्गर के कीटाणु मैजूद हैं…..इ नया किसिम का 'तिरिया चरित' है …..आपलोगों से कुछ सुनकर अपनी अगली पोस्ट का मसाला ढूंढ़ रहे थे और कुछ नहीं….
    इ सब tektis है…भाई…!!

  7. shukriyachitr aur yatra ka varnan bahut shandaar kiya hai. Aapko bakaul Dwivediji ke Photographi-cum writer ka award milna chahiye…

  8. वे तो ब्‍लागिंग के प्रति बहुत गंभीर हैं .. ऐसा कहकर सामनेवालों के विचारों को समझना उनका स्‍टाइल होगा !!

  9. हम्म… तो दिल्ली में कुछ बकवासियों ने मिल-बैठ कर बकवास की..

  10. हा हा!
    काजल कुमार जी, आप दिल्ली में होते हुए भी हमारी बकवास में शामिल नहीं हुए! कोई नाराज़गी है क्या?

  11. आपका जीवन्त यात्रा वृत्तान्त पढकर
    आनन्द आ गया!
    पुण्य प्रसून बाजपेयी भी अच्छा मजाक कर लेते हैं।

  12. @ बी एस पाबला

    नहीं जी, वो क्या है कि मुझे लगा कि अगर एक-आध बकवास करने वाला कम हो सके तो अच्छा ही है…सो, मैं नहीं आया 🙂

  13. बेहतरीन पोस्‍ट, मजा आया सारा मसाला पढ़ कर 🙂

  14. पाबला जी हम कब से कह रहे है कि अपने यहाँ के मीट के समाचार भी अखबारों मे आते रहे तो कितना अच्छा हो …-शरद (ज़रूर शरद जी ,अगली बार इसका ख्याल रखा जायेगा-पाबला ) , बाकी पी.पी.बी. का समाचार बढिया है ..- आलोचक ।

  15. चुपके से नोयडा से निकल लिए हाँ…………………..????????

  16. सर बस कुछ समय की बात है ..ब्लोग्गिंग और ब्लोग्गर्स मीडिया के लिए एक अनिवार्य सहचर न बन गए तो ….कहियेगा …और हां ब्लोग्गर्स मिलन/बैठक/संगोष्ठी/सम्मेलन ..को कवर करने के लिए हमारे मीडिया मित्र सदैव तैयार रहते हैं जी …जब भी बुलावा आए ….वे न नहीं करेंगे ..हमें यकीन है ….

    सर चलते चलते …इश्वर ने चाहा तो …वर्ष ..2009 …में ही हम छत्तीसगढ की धरती चूमेंगे …….

  17. अजय जी,
    वर्ष 2009 का आखिरी माह आरंभ होने में सिर्फ एक माह एक दिन शेष है। क्या खयाल है?

  18. मस्त घूम आये पाब्ला जी अकेले अकेले।इत्त्ते सारे लोगों से मुलाकात अब तो सिर्फ़ पछता हि सकते हैं।

  19. पाबला जी , द्विवेदी जी बताए रहे की आप दिल्ली मेला घूमने आए थे।
    खैर नही पहुँच पाए मेले तो कोई बात नही। सैर हम कराये देते हैं।

  20. @ डॉ टी एस दराल,

    इच्छा तो थी, लेकिन रवानगी से बहुत पहले ही पता चल गया था कि मेरे दिल्ली पहुँचने से लेकर भिलाई वापस आने तक के लिए मेला, आम लोगों के लिए नहीं रहेगा।

    मिल रहे थे स्पेशल पास,
    मैं नहीं होना चाहता था खास,
    सो बना रहा प्यारे ब्लॉगर साथियों के पास।

    आखिर हम भी ज़िंदगी के मेले वाले हैं 🙂

    बी एस पाबला

  21. zee studios dekhna toh bahut rochak rahaa hoga…khushdeep ji kaun sa program karne jaa rahe the
    very very interesting

  22. ब्लॉग रस तो सभी लेते हैं. लेकिन जिम्मेदारी बहुत कम लोग निभाते हैं.
    जिन्हें सीखना हो पाबला जी से सिख सकते हैं.

    आपके अगले दौरे का इंतिजार है और हाँ कुछ इधर उधर की गुफ्तगू की भी. (गुफ्तगू मतलब – बातें खुशबू वाली)

  23. इतना गुस्सा आ रहा है ना आप पर ,पूछो मत.
    अरे आप सबको पहचानते हैं,हम थोड़े ही जानते हैं,आइडिया लगा रहे हैं ये फलन होंगे वो फलां हो सकते हैं.फ़ोटो के नीचे नाम लिखिए आज,अभी.
    जहाँ कहीं भी किसी का भी फ़ोटो है नाम लिखा देखना मांगता अपुन.
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  31. वाह बहुत सुन्दर आपने ब्लोगरों के मिलने के कई उपयोगी व प्रेरक क्षणों को इस पोस्ट में उचित स्थान देकर इस पोस्ट को रोचक व प्रेरक बना दिया है…

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