जब माताजी की आँखों में एकाएक आँसू आ गये और लौटने को तत्पर हो गयीं

मुंबई यात्रा समाप्त हुए हालांकि एक माह से ऊपर हो चुका है, लेकिन एक घटना अब भी याद आ जाती है, जिसने कम से कम तीन प्राणियों के स्वभाव में फर्क ला दिया।

अब तक आप पढ़ चुके हैं कि कैसे हावडा-मुंबई एक्सप्रेस से मुंबई पहुँच कर हमारा परिचय टॉफियों के कारोबारी से हुया, Domino Pizza के बाहर खडी आधुनिक युवती की हरकत को देख यूनुस जी से नाराज हुया, ममता जी से मिलने से इनकार भी कर दिया, अपनी बेबसी के आगे अनिता जी के बिन्दासपने का जिक्र किया और फिर प्लेटफार्म पर एक उलझन के बारे में बातें भी हुयीं।

घर से चलते वक्त मैंने मुख्य शयन कक्ष और अपने कंप्यूटर कक्ष में ताला लगा दिया था और ज़रूरी उपकरण बेटे के कक्ष में स्थानान्तरित कर दिए थे।

रविवार, 11 जनवरी की शाम जब बच्चों के साथ यूँ ही टहलने की बात हो रही थी तब मोबाइल पर, भिलाई से सुपुत्र ने संपर्क किया। आवाज कुछ रुआंसी सी लगी ‘डैडी, मन बहुत उदास है, मैं बस रो ही पडूंगा।’ मैं चौंका, क्या हो गया? लगभग चीखते हुए ही पूछा ‘क्या हुया?’ उत्तर मिला ‘अरे यार! डेज़ी आपको याद कर रही है।’ मैं झल्लाया ‘ त्तुम क्या कर रहे हो, थोडा टहला कर ले आयो, उसे’।

प्रतिकार करती आवाज आयी ‘सुनो तो सही। वह आपके कंप्यूटर रूम के दरवाजे के आगे बैठकर अजीबोगरीब आवाजें निकाल रही है और दरवाजे को पंजों से खुरच रही है! हट ही नहीं रही है वहाँ से और ना ही सुबह से कुछ खाया है, उसने। एकदम सुस्त और गुमसुम हो गयी है। पारस (सुपुत्र का मित्र) भी उसके पास चुपचाप बैठा है।’

मैं स्तब्ध रह गया। थोड़ी देर चुप रहने के बाद, मैंने अपने पुत्र से मोबाईल को स्पीकरफोन में लाने को कहा। फिर डेज़ी को संबोधित किया, पुचकारा, फटकारा, चिल्लाया, कुछ निर्देश दोहराये। सुपुत्र बताते जा रहा था कि कैसे उसकी आँखों में चमक आ रही है चौकन्नी हो रही है, चुस्त हो अंगड़ाई ले रही है, धीरे से जबड़ा खोल रही है, मोबाईल पर पंजे मार रही है। और फिर जब जानी पहचानी गुर्राहट मुझे सुनाई दी, तब मैंने उसे खाना खाने का निर्देश दिया और बताया गया कि ‘वह’ अपना भोजन कर रही है।

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(हमारी पालतूडेज़ी‘: जब वह नौ महीने की थी)

पिछले साल गर्मियों में एक दिन, सुपुत्र का फोन आया ‘डैडी! एक पपी ले आऊँ?’ मेरा सपाट उत्तर था ‘नहीं’। फिर एक प्रश्न दगा ‘क्यों?’ मैंने तीखे स्वर में दोहराया ‘बच्चे! इन बेज़ुबानों से इतना लगाव हो जाता है, जो कई बार बहुत कष्ट देता है। जॉनी याद है?’ (जॉनी हमारा पालतू, कद्दावर, जर्मन शेफर्ड था, 15 साल पहले। जो कतिपय पारिवारिक कारणों से मौत के आगोश में चला गया)

जवाब मिला ‘यार, उसी की तो याद आती रहती है, इसलिए इसे लाने की सोच रहा हूँ।’ हमने पैतरा बदला ‘इसकी देखभाल कौन करेगा?’ उत्साह भरी आवाज़ आयी ‘मैं करूँगा’। हमने एक और पाँसा फेंका ‘इतनी गर्मी में यह टिक नहीं पायेगा, सर्दियों में देखेंगे।’ विरोध भरा स्वर आया ‘यहाँ भी तो गर्मी में रह कर बच जायेगा, हमारे यहाँ ही इसे तकलीफ होगी?’

मेरी ओर से तर्क दिया गया ‘राशन वाले के यहाँ शक्कर के बोरे पड़े रहते हैं, चींटियाँ नहीं आती। घर में थोड़ी सी शक्कर लायो तो कितना बचाव करना पड़ता है। राशन दुकान में चूहे उतना ऊधम नहीं मचाते, जितना अपने घर में।’ तब धीमी सी आवाज आयी ‘ठीक है, जैसा आप बोलते हो। लेकिन सर्दियों में पक्का? प्रॉमिस?‘ मैंने तात्कालिक तौर पर हामी भर दी।

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(हमारे सुपुत्र, गुरुप्रीत: डेज़ी के साथ)

उसी शाम जब मैं, कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहा था, सुपुत्र महाशय पधारे, हाथों में नाजुक सा पिल्ला पकडे हुए। घोषणा हुई ‘इसका नाम डेज़ी है।’ हमने एक नज़र डाली और हामी में सर हिलाया। पूछा गया ‘कितनी प्यारी है ना!?’ मेरा माथा ठनका ‘फिमेल है क्या?’ उम्मीद भरी आवाज आई ‘इस के बच्चे होंगे, तो बेचूंगा। शौक भी पूरा होगा, पैसे भी आयेंगे।‘ मेरी चुप्पी देख वह लौट गया। थोडी देर कुछ शोरगुल होता रहा। फिर बात आयी गई हो गई।


(डेज़ी: इस परेशानी में कि, इस धार को नष्ट कैसे किया जाए?)

2008 की सर्दियों में एक दिन सुपुत्र फिर हाजिर हुए ‘आपने कहा था ना की सर्दियों में ले आना? मैं ले आया।’ कुछ कहते नहीं बना। वह थी एक जर्मन बॉक्सर प्रजाति।

बस फरमान भर जारी कर पाये कि इसका खाना, टहलाना, तुम ख़ुद ही करोगे। बस इतना काफी था दोनों बच्चों के लिए। लेकिन फिर पंजाब से आए हमारे मातापिता। माता जी को कुत्तों से नफरत। ठेठ पंजाबी जबान में, कुत्ता पालने वालों पर भांतिभांति के कटाक्षकरती थीं। पिता जी को कभी कुत्ते के काटे जाने पर नाभि क्षेत्र में पूरे 14 इंजेक्शन लगे थे। वे तो कुत्ते का चित्र देखकर ही डरने वालों में से थे। मैं फँस गया था, दो पाटों के बीच।

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(हमारी माताजी: डेज़ी के साथ)

फिर हुई, उपरोक्त मुंबई की घटना। माता जी का तो बुरा हाल, लगीं ख़ुद को कोसने, आंखों में आंसू लिए चिरौरी करने लगी कि एक बार मेरी बात करवा दो डेज़ी से! मैंने टालने के अंदाज में कहा कि वह अभी ठीक है। कल बात कर लेना। माताजी उदास होकर बोलीं कल तक मुझे नींद भी नहीं आएगी।आखिरकार फोन लगाया गया। सुपुत्र महाशय ने, डेज़ी को, स्पीकरफोन पर जब माँ की आवाज जैसे ही सुनाई, उसकी कातर कूं-कूं सुन, माताजी रो पडीं। पिताजी भी कसमसाए। माताजी ने अपनी कूट भाषा में पता नहीं क्या-क्या कहा। थोडी देर बाद मुझसे बोलीं ‘हम आज ही लौट सकते हैं क्या? वह बेजुबान मेरी राह तक रहा है।’

लौटे तो हम अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम अनुसार। लेकिन आगे क्या हुया? फिर कभी बताऊंगा।

जब माताजी की आँखों में एकाएक आँसू आ गये और लौटने को तत्पर हो गयीं
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जब माताजी की आँखों में एकाएक आँसू आ गये और लौटने को तत्पर हो गयीं” पर 11 टिप्पणियाँ

  1. इतेफ़ाक देखिये हमारे घर मे भी अखिरी बार पामेरियन पाला गया था,उस्का भी नाम गोलू ही था,और उसके जाने के बाद हममे इतनी हिम्मत ही नही हुई कि किसी और को उसकी जगह ला सकें।सच 14 साल वो हमारे परिवार का सदस्य रहा।आपने तो रुला ही दिया पाब्ला जी।

  2. बस एक बार आ जायें तो ऐसा मोह में बांधते हैं कि परिवार के सदस्य हो लेते हैं. मेरे पास पहले जर्मन सेफर्ड थी..गुजर गई. अब, चिड़िया हैं मगर सबसे पहली चिड़िया अब भी याद है..उस पर मैने लिखा था जब वह गुजरी:

    http://udantashtari.blogspot.com/2006/12/blog-post_29.html

    कभी पढ़ियेगा जरुर.

  3. मूक प्राणियों का शुध्‍द और निश्‍छल प्रेम जितना भला लगता है, उनके न रहने पा वह सब उतना ही कारूणिक हो जाता है।

  4. आपके परिवार के कुत्ता प्रेम के बेरे में जानकर बहुत अच्छा लगा। कुत्ते पालने व उनसे प्रेम करने के बाद मनुष्य बदल ही जाता है।
    घुघूती बासूती

  5. बिल्कुल सही कहा जब ये घर के सदस्य हो जाते हैं तो इनके जाने पर बहुत दुःख होता है

  6. बचपन में घर में भैंस जरूर थी। बरसों तक वह और उस की वंशजों ने हमें दूध पिलाया। फिर स्थानाभाव से हमें उस से वंचित रहना पड़ा। मैं खुद डेडी के साथ तीन दिन दो रात रहा हूँ। इतने से में उस ने कितना प्यार उड़ेला यह मैं ही जान सकता हूँ। उसे न जाने कैसे यह अहसास हो गया कि मैं जाने वाला हूँ तो वह उदास हो गई, और जिस तरह उस ने विदा किया उस का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। डेजी बहुत ही संवेदनशील है।

  7. मानव और जीव जंतु का प्रेम मन को बाँध लेता है. माँ जी और डेज़ी का प्रेम इसी बात का उदाहरण है…

  8. देख लो घुमती घुमती यहाँ तक पहुँच गई फरवरी २००९ की पोस्ट.सबसे पहले बता दूँ बीजी और बेटे के फ़ोटो देख कर बहुत अच्छा लगा.
    ये घर के सदस्य बन जाते हैं.बड़े प्यारे होते हैं प्यार को समझते और उसकी कद्र करते हैं.कौन कहता है ये जानवर है? मेरा डोबरमेन था 'पोचु'
    बहुत समय बाद मोह्हले वालों ने बताया कि आपका पोचु लडको के साथ क्रिकेट खेलता है और लड़कियों के साथ रस्सी कूदता है.' एक बार तो मुझे यकीन नही हुआ किन्तु जब देखा तो आश्चर्यचकित रह गई. बाहर झपट कर निकल कर गेट तेजी से बजाने लगता. बच्चे गेट खोल देते,वो बाहर.इधरगेंदे को बेट मारा,उधर पोचुजी हवा मे उछले और ये लिया केच.वो दोनों टीमों मे रहता. रिज़ल्ट? सबसे ज्यादा बाल को हवा मे किसने उछाला ? बाल हवा मे उछलने पर ही पोचु भैया जम्प मारते,नही तो बाल को जमीन पर रगड खाते देखते रहते.
    डेज़ी की याद हमारे पोचु को भी फिर सामने ले आई.
    ऐसा ही होता है जी.क्या करें.ये जिंदगी के मेले हैं.

  9. जानवरों,कुत्तों से नफरत करने वाली बीजी उसे कितना प्यार करने लग गई थी.है ना? ये जानवर अपने प्यार से दिल जीत लेते हैं सबका.तभी तो एकदम घर के मेम्बर बन जाते हैं.
    पर….ना कोई रहा है ना कोई रहेगा. तस्वीरों मे सिमट कर रह जाते हैं सब.

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