जुहू बीच और मेरी बेबसी के आगे अनिता जी का बिंदास अंदाज

यूनुस जी से मुलाकात के बाद, अंधेरी होते हुये जब हम खारघर पहुँचे तो मामी के दो पैराग्राफ सुनने के बाद ही लोहड़ी के कार्यक्रम में शामिल हो सके। तब पाया कि टॉफियों के डीलर अपनी पूरी मस्ती में थे, आखिर कार्यक्रम उन्हीं के लिए तो था! रात को सोते समय, अगले दिन की योजना में, अनिता जी से मुलाकात की प्राथमिकता तय कर ली गयी। लेकिन यह जगप्रसिद्ध है कि जो सोचा जाये वह कभी होता है क्या? कथित हाईकमान के अंदाज में बिटिया ने घोषणा की, कि हम जुहू बीच जा रहे हैं और आपको भी जाना होगा। आखिर बच्चों को भी तो एन्जॉय करना चाहिए, दूसरे शहर आ कर।

एक छोटा सा ब्रेक लेते हुए मैं बताना चाहता हूँ कि हमारे बच्चे, अपनेआप को बुड्ढा/ बुजुर्ग कहते हैं और मुझे बच्चा! तर्क यह रखा जाता है कि आप जितने सक्रिय (Active) हो, उतने हम नहीं हैं! एक समय सीमा में, हम उतना काम नहीं कर सकते, जितना आप कर लेते हो। उदाहरण भी अनेकों गिनाये जाते हैं। इसलिए हम आपसी बातचीत में एकदूसरे को ऐसे ही संबोधित करते हैं

जब बिटिया की घोषणा हुयी तो मुझे अपने दादा जी की याद हो आयी जो, उस वक्त कंधे पर लटकाये जाने वाले कपड़े के बैग के बार-बार मेरे कंधे से खिसक जाने पर, मेरी झल्लाहट को देख, उस बैग को अपने कंधे पर टाँग लेते थे और कहते थे कि जवानों के कंधे पुष्ट होते हैं और बुजुर्गों के धंसे हुये। इसलिये वह बैग नीचे की ओर फिसल जाता है, जबकि मेरे कंधे पर खूँटी जैसे टँग जाता है! मुझे भी (उम्र में बड़े होने के नाते) लगा कि ये बच्चे मस्ती करेंगे कि अपना सामान ढ़ोयेंगे। और फिर इनके फोटो कौन लेगा। अपना डिजिटल कैमरा भी मैं किसी को दे कर राजी नहीं था। तो जनाब, अनिता जी से मुलाकात के हमारे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की तो वाट लग गयी। हमने अनिता जी को फोन लगाया और क्षमायाचना सहित शाम का वक्त तय किया।

अनिता जी ने भी अपने निवास क्षेत्र का पूरा भूगोल समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोपरखेरणे में सेक्टर तीन की एक इमारत के आठवें मन्जिल का पता बताते हुये उन्होने जब यह जानकारी दी कि उनकी गली के मुहाने पर मिठाई की दो प्रसिद्ध दुकानें हैं -राजधानी स्वीट्स और पंचवटी स्वीट्स। तो मेरे मन में यह ख्याल आया कि जिस लड़की की गली की शुरूआत में ही मिठाई की दुकानें हों, उस लड़की के व्यवहार में कितनी मिठास होगी। (भई, अब अनिता जी के लिए, इसलड़कीशब्द पर जिसे आपत्ति हो, वह अपने रिस्क पर अनिता जी से बात कर लें) हालांकि किसी दूसरे सन्दर्भ में अभी अभी ज्ञानदत्त जी अपनी पोस्ट में कह चुकें हैं कि मिठास है गुम। पता नोट करते समय भी एक अपराध-बोध सा मन में था कि इतनी बार वादा कर, जा नहीं पा रहा हूँ। मैं बस इतना ही कह पाया कि समय मिलते ही शाम को अवश्य मिलूँगा।

बच्चों के कार्यक्रम की जानकारी मिलते ही, टॉफियों के व्यापारी की माताजी (मेरे मंझले ममेरे भाई की पत्नी) भी तैयार हो गयीं। टीम में फेरबदल होता रहा, जब टीम तैयार हुयी तो दोपहर हो चुकी थी। बान्द्रा पहुंच कर जुहू बीच के लिए टैक्सी ली गयी। जैसे ही समुद्र का किनारा दिखा, ढेरों खानपान के स्टाल दिखे, भूख लग आयी। जब पूछताछ की गयी तो बताया गया कि सब बंद है, शाम 4 बजे मिलेगा। भूख तो लग चुकी थी। जानकारी दी गयी कि वहीं किनारे पर एक रेस्टॉरेंट है -शिवसागर्। हमने भी सोचा कि भूख के बहाने, सागर किनारे शिव नाम के दर्शन हो ही जायें। वहाँ चहल पहल के बदले आपाधापी ही नज़र आयी। अब ऐसे माहौल में अच्छी सर्विस की उम्मीद करना बेमानीथा। फिर भी मंगाये गये खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट थे। बिटिया को तो वहाँ की मंचूरियन ग्रेवी बहुत पसंद आयी।

अभी रेत पर पहला कदम पड़ा ही था कि पीछे से आवाज आयी ‘जल्दी आयो डैडी!’ बिटिया दूर थी, उसने इशारे से ही बताया कि कैमरे की आवश्यकता है। जब मैं पहुँचा तो वह दो तीन अन्जान लडकियोँ से चहक चहक कर बातें कर रही थी। मामला तब समझ में आया जब हमें बताया गया कि ये सब Indian Idol 4 के प्रतिभागी हैं। निर्देशानुसार कैमरे का उपयोग किया गया। फिर शुरू हुयी जुहू बीच पर चहलकदमी। बच्चों की शरारतें देख देख बड़ा आनंद आ रहा था। चमकती धूप में लहरें भी अपना रूप दिखा रहीं थी।

हर 5 मिनट में एक ना एक हेलीकॉप्टर ऊपर से गुजर जाता था। शायद कोई सुरक्षा सम्बंधित प्रक्रिया हो। काफी दूर तक जाकर लौटते समय महसूस हुया कि भीड़ बढ़ चुकी है। परम्परा समझ कर कच्चे नारियल का स्वाद भी लिया गया। कीमत, जुहू बीच के हिसाब से लगायी गयी थी, वरना उतनी कीमत में हमारे शहर भिलाई में ही वैसे 2 नारियल आ जाते।
बीच से निकलते निकलते, आखिरी चित्र के समय ही हमारे डिजिटल कैमरे से सिग्नल आया कि बैटरी बस खतम ही होने वाली है। हम भी लपके Rechargeable सेल के एक और जोड़े के लिए। मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब मुझे उन स्टालों में कहीं भी Ni-Cd या Ni-MH Rechargeable सेल नहीं मिले! मायूसी के साथ चल पड़े हम, बच्चों के निर्देशित किये गये स्थान की ओर, और पहुँच गये लिंकिंग रोड पर McDonald के सामने। गहराती शाम के माहौल में रौनक देख, हमने ऐलान कर दिया कि आपको जहाँ जाना है जायो, हम अपनी राह खुद देख लेंगे। वापस आकर McDonald में ही मिलो। जहाँ जहाँ मैं जा सका, वहाँ सरसरी निगाह में सिर्फ कपड़ों की दुकानें ही दिखीं, फुटपाथ पर्। हम तो निकले थे एक अदद Windows Mobile की तलाश में! बाद में पता लगा कि गलत जगह था हमारा तलाशी अभियान। वहीं दिख गयी एक Kodak Shop। वहाँ अपनी पसंद के Rechargeable सेल भी मिल गये और 2GB का एक SD Memory card भी ले लिया गया।
McDonald की ओर वापस आते आते बेचैनी लगने लगी। वातावरण दमघोंटू सा लगने लगा। डॉक्टर की चेतावनी याद आने लगी, यह भी याद आया कि आपात्कालीन दवाईयों का पाऊच खारघर में ही रह गया। बिटिया से सम्पर्क की कोशिश की तो रोमिंग में Dolphin ने जिम्मेदारी उठाने से आनाकानी कर दी। एकाएक कहीं टिकने-बैठने की जगह भी ना दिखी। अनजाने खतरे को सामने देख, नानी समेत सभी रिश्ते याद आने लगे। पास ही के एक स्टाल से पानी की बोतल के लिए जब पर्स खोला तो ऊँगलियाँ टकरायी जीवनदायिनी दवाई से! जीभ के नीचे दवाई रख, उस बुक स्टाल-खानपान स्थल पर कुर्सी पर बैठा तो आँखें खुली बिटिया की कॉल आने पर। जो बता रही थी कि McDonald में इंतज़ार किया जा रहा है। मैंने उसे नीचे ही SBI ATM के पास आ जाने को कहा। मेरा चेहरा देख, वह समझ गयी कि कुछ गड़बड़ है। रवानगी का फैसला आते देर नहीं लगी।
घर पहुँचते ही पहला काम किया गया, अनिता जी को फोन करने का। बेहद उदास मन से मैने खेद प्रकट किया तो वे चहक कर कह उठीं कि कोई बात नहीं कल आ जाईये। मैंने बताया कि खुद मेरी भी उत्कंठा है आपसे प्रत्यक्ष मिलने की। (तब तक अनिता जी के बारे में इतनी तारीफें सुन चुका था कि न मिल पाने के कारण, मुझे अपनी बेबसी पर झल्लाहट होने लगी थी) जब मैंने कहा कि कल तो शाम की ट्रेन से वापसी है तो बिंदास अंदाज में उन्होने कहा कि हालाँकि क्लासेस शाम तक हैं, लेकिन आप जाईये दोपहर एक बजे, नवरत्न होटल में साथसाथ लंच कर लेंगे, फिर आप चल दीजियेगा, बस दो घटों की ही तो बात है, आपकी ट्रेन तो रात 8:35 की है। मैंने एक बार फिर हामी भर दी।
अगली पोस्ट में, मेरी मुम्बई यात्रा का अंतिम दिन।
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जुहू बीच और मेरी बेबसी के आगे अनिता जी का बिंदास अंदाज” पर 13 टिप्पणियाँ

  1. पाबला साहब जी बहुत ही सुंदर लिखा आप ने जुहू बीच का विवरण, ओर अनिता जी से तो लगता है आप मिल ही नही सके… लेकिन होता है ऎसा कई बार मेरे साथ हुआ है,आप की अगली पोस्ट का इन्तजार रहेगा.
    धन्यवाद

  2. रोचक विवरण है । सागर किनारे नारियल का पानी पीने को आपने सहज ही ‘परम्परा’ कहा है जो कि उचित भी है। अमोल पालेकर टाइप फिल्मों में अक्सर नारियल पानी पीने की परम्परा रही है। औऱ ये जो बुजुर्गों के कंधे झुके होने के पीछे एक दर्शनशास्त्र ही पेश कर दिया आपने। अगली पोस्ट का इंतजार है।

  3. कृपया उपर लिखित टिप्पणी में कंधे ‘धंसे’ हुए पढे। कंधे ‘झुके’ होने और ‘धंसे’ होने में बहुत फर्क है। टिपियाने के दौरान गलती से ‘धंसे’ हुए न लिख ‘झुके’ हुए लिख गया।

  4. मज़ा आ रहा है पाअब्ला जी,यात्रा संस्मरण जारी रखिए। और हां ज्यादा भाग-दौड़ ठीक नही,गुस्सा करना छोड़िए बी पी डाउन हो जाएगा,मेरा परखा हुआ नुस्खा है।

  5. बहुत ही रोचक श्रृंखला चल रही है आपकी…मुंबई में जुहू से गन्दा कोई दूसरा बीच नहीं है…बल्कि शायद ही कोई साफ़ बीच मुंबई में है….बीच के आनंद के लिए मुंबई से लगभग 100km.आशी या कासिद बीच जन चाहिए…अगली बार जब आप आयेंगे तब चलेंगे….
    अनीता जी से अगर आप नहीं मिले हैं तो समझिये बहुत बड़ी भूल की है आपने…उनसे मिल कर आप इतने खुश होते की बता नहीं सकता…वे बहुत जिन्दा दिल इंसान हैं और ऐसे मिलती हैं हैं जैसे बरसों की पहचान हो…अगर उनसे नहीं मिले तो अगली बार सिर्फ़ उनसे मिलने ही मुंबई आयीये…आप निराश नहीं होंगे…
    ये गोली वाली बात समझ नहीं आयी…दिल दा मामला है…… इसलिए कुछ नहीं कहेंगे…

    नीरज

  6. पाबला जी, आप के साथ तीन दिन रहे लेकिन ये जीभ के नीचे वाली गोली की जरूरत आप को भी होती है। पता नहीं लगा। पर भविष्य़ में कभी लापरवाही न कीजिए। बाकी सलाहें व्यक्तिगत रूप से ही दूंगा। पर आप विवरण रोचक लिखते हैं।

  7. जीभ के नीचे गोली वाली बात खतरनाक है, अपना ख्याल रखिए। द्विवेदी जी ने भी बताया कि आप की फ़ुर्ती की कोई सानी नहीं, फ़िर भी वजन घटाना जरूरी है। देखिए कौन किसको सलाह दे रहा है। वजन घटाने वाली सलाह मुझ पर ज्यादा लागू होती है। नीरज जी सही कह रहे हैं, समुद्र की सैर के लिए जूहू बीच अब अच्छा नहीं रहा , हां ये बात और है कि और किसी बीच पर इंडियन आइडोल नहीं दिखतीं। बच्चों की खुशी तो सर्वोपरी है, हम तो फ़िर अगली बार मिल लेगें जब आप बम्बई आयेगें।

  8. पाबला जी, आपके ब्‍लाग पर पहली बार आई… सारी पोस्‍ट पढ डाली …गोली वाली बात भी …
    पढ कर दु:ख हुआ सावधानी बरतें…पोस्‍ट बहुत ही रोचक है …बधाई…!

  9. विवरण तो रोचक है किन्‍तु आपका ‘यूं’ बीमा हो जाना असहज कर गया। भले ही ‘गोली से यारी’ पुरानी हो, किन्‍तु अपना खयाल रखिए‍गा। खास कर तब, जब आप घर से बाहर हों।

  10. अनीता जी से आपके मिलने की बात पढ़ने के चक्कर में पूरा लेख पढ़ गई। यह क्या आप तो मिले ही नहीं ! लेख पढ़कर मुझे भी बहुत जमाने पहले की जुहू बीच याद आ गई।
    घुघूती बासूती

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