मैं कैसे उसे जानवर कह देता?

हमारी बिटिया ने अपने बचपन में मुझसे एक दिन जिज्ञासा प्रकट की कि ‘दुनिया में सबसे खतरनाक, बददिमाग जानवर कौन सा है?’ मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा ‘आदमी!इंसान!’ वह हैरान सी फिर पूछ बैठी कि ‘वो कैसे?’ तब तक मैं संभल चुका था और बात को टालने की कोशिश की कि जब बड़े हो जायोगे तो खुद ही समझ आ जाएगा यह सब।

बहुत सी बातों के साथ-साथ एक किस्सा उसके साथ भी गुजरा इसी की याद आ गई अचानक।

2009 के किसी दिन मैं बिटिया को उसके कॉलेज छोड़ने निकला। मारूति वैन में बिटिया सामने, बगल की सीट पर बैठी थी और मैं अपनी सामान्य गति से गाड़ी चलाते हुए, शहर के दो-चार ट्रैफ़िक सिगनल वाले स्थानों में से एक, नेहरू नगर चौक पर जा पहुँचा। ताज़ा ताज़ा लाल बती हुई थी, लगभग डेढ़ मिनट था हमारे पास, सो डैशबोर्ड पर ही रखे अखबार उठाकर नज़र दौड़ाने लगा।

अभी कुछ पल ही हुए थे कि हल्का सा शोर हुआ तो सिर उठाकर क्या देखता हूँ कि हमारे आगे, सबसे सामने खड़े (विकलांगों द्वारा प्रयुक्त) चार पहिया स्कूटर सवार एक व्यक्ति, तीर की गति से लाल बत्ती पार करते सीधा नेहरू नगर की ओर भाग रहा था और वह गतिमान गाड़ियों के बीच अपने वाहन को लहराते हुए चलते भी बना।

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शारीरिक विकलांगों द्वारा प्रयुक्त किया जा सकने वाला चार पहिया वाहन

आसपास खड़े लोगों में से कोई हंसने लगा, कोई बड़बड़ाने लगा, कोई तारीफ़ करने लगा, कोई ज़माने को कोसने लगा, कोई तो ट्रैफ़िक पुलिस की ‘नाकामी’ पर माथा पकड़ कर चिल्लाने लगा। हम बाप बेटी एक दूसरे की तरफ़ ताक रहे थे जैसे भरोसा दिला रहे हों कि जो कुछ देखा वह सब सच में घटित हुआ है।

बिटिया को कॉलेज छोड़ कर जब मैं घर लौट रहा था तो स्टील क्लब वाले चौक से सेंट्रल एवेन्यू पर हो लिया। मुड़ते ही सुहावने मौसम में इक्का दुक्का गाड़ियों के ट्रैफ़िक वाली छायादार चौड़ी सड़क पर गति को कम कर आराम से गाड़ी चला रहा था कि सामने की ओर बाईं तरफ़ एक कुत्ता मस्त दुलकी चाल में जाते दिखा। रह रह कर वह सड़क की ओर गरदन भी मोड़े जा रहा था। मुझे आभास हुआ कि शायद वह सड़क पार करना चाह रहा है। अपनी गाड़ी की गति और कम कर ली मैंने।

सेक्टर 7 स्कूल के सामने ही संकरी सी जेब्रा क्रॉसिंग है जो सड़क के दूसरी तरफ़ जाने के लिए मार्गविभाजक पर लगी एक मीटर ऊँची लोहे की जाली में बने एक इंसान के निकलने लायक जगह तक जाती है। एकाएक वह कुत्ता ठीक उस जेब्रा क्रॉसिंग के मुहाने पर रूका, पल भर में ही दांएँ बाएँ गरदन घुमाई और उसी पुरानी चाल में उन धारीदार पट्टियों के ऊपर चलता हुआ मार्ग विभाजक से होता हुआ दूसरी तरफ़ चल दिया।

भिलाई का सेन्ट्रल एवेन्यू

मुझे अपनी आँखों देखी पर ही भरोसा नहीं हो रहा था। शाम को मैंने बिटिया से यह दृश्य बताते हुए सवाल किया कि मैं कैसे इस चौपाए को जानवर कह दूँ? उसने पलट कर सवाल किया कि आप उस नेहरू नगर चौक वाले को जानवर कहोगे क्या? मैंने फिर कहा कि उस दोपाए को भी कैसे जानवर कह दूँ? जो मेरा ही कोई साथी होगा!

अब आप ही बताएँ मैं किसे जानवर कहता?

मैं कैसे उसे जानवर कह देता?
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मैं कैसे उसे जानवर कह देता?” पर 23 टिप्पणियाँ

  1. किसी भी जानवर ने कभी भी प्रकृति को या उसके नियमों को हानि नहीं पहुंचायी है। लेकिन मनुष्‍य ने हानि के अतिरिक्‍त कुछ नहीं किया है।
    टिप्पणीकर्ता ajit gupta ने हाल ही में लिखा है: पूर्ण चन्‍द्र की रात में जंगल का राग सुनोMy Profile

  2. आपकी चिट्ठी पढ़ कर मुझे चेननई के पास घड़ियाल फार्म की याद आ गयी। वहां एक चित्र लगा है जिसमें लिखा है कि दुनिया का सबसे खतरनाक जन्तु। यह ढ़का हुआ है। इसे देखने के लिये आपको उस फ्रेम के पल्ले खलने पड़ेंगे। यदि आप इसके पल्लों को खोलें, तो इसके अन्दर कोई चित्र नहीं है केवल एक शीशा है। जिसमें आप अपना चित्र देख सकते हैं।
    टिप्पणीकर्ता उन्मुक्त ने हाल ही में लिखा है: The file ‘Golconda Fort and World Famous Diamonds’ was added by unmuktMy Profile

  3. लो जी अस्सी भी कामयाब हो गये, लेकिन बडी देर लगी करीब २ मिंट इस पेज को खुलने मे, व्काया सच मे बहुत अच्छा ओर सही लगा, हम जब भारत आते हे तो हमे तो इस से भी ज्यादा देखने को मिलता हे, लेकिन चुप रहते हे.
    टिप्पणीकर्ता राज भाटिया ने हाल ही में लिखा है: अरे मान जाओ ना…. देखॊ पीछे पीछे मनाने तो आ रहा हे…My Profile

  4. बचपन में पढ़ा था कि Man is a social animal!! अब धीरे-धीरे Social गायब हो गया है और बस जो बचा है सो आपकी पोस्ट में दिखाई दे रहा है!!
    टिप्पणीकर्ता सलिल वर्मा ने हाल ही में लिखा है: बाद मरने के मेरेMy Profile

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