यूनुस जी से मुलाकात और उनसे नाराज़गी

खारघर के Domino Pizza के बाहर उस युवती ने, किसी फिल्म में गंदी बस्ती के चरित्र को जीती, शबाना आजमी के अंदाज में, सिर खुजाना शुरू किया और पलक झपकते ही (शायद) एक जूँ निकाल कर अपने तराशे नाखूनों से उसका काम तमाम कर दिया! मेरी हँसी फूट पड़ी। एक तो आवाज भारी, उस पर उन्मुक्त हँसी। इस पर बिटिया की नाराजगी का जिक्र मैने किया था।

रात को सोने के पहले मामाश्री ने अपने अंदाज में बोरिवली (विविध भारती स्टूडियो) तक जाने के साधनों के बारे में बताना शुरू किया। CBT, सेंट्रल बस टर्मिनल तक बस पकड़ लेना, फिर बांद्रा तक 505 की बस मिलेगी, अच्छा रहेगा यदि 20 रूपये वाली टिकट लो। उससे दिन भर BEST की, किसी भी रूट की, बस पर मनचाहे स्थान तक, सफर किया जा सकता है (नवी मुम्बई को छोड़कर)। फिर सामने ही से लोकल लेकर बोरिवली!


दूसरे दिन, 12 जनवरी को अनिता जी ने जब एक बार फिर सम्पर्क किया तो मैं दुविधा में पड़ गया। बस इतना ही कह पाया कि लौटते समय, जरूर कोशिश करूँगा, मुलाकात की। उम्मीद के मुकाबले मौसम कुछ ज़्यादा ही गरम था, उमस भी महसूस हो रही थी। CBT से 505 रूट की बस से जाते हुए वही माहौल लगा, जो अक्सर दिल्ली की बसों में दिखता है। वैसे, मुम्बई की बसों में सफर करते समय बस एक बात बहुत अच्छी लगी कि इनमें कानफाड़ू हॉर्न नहीं बजाये जाते। वही पुराने हाथ से दबा कर बजाये जाने वाले, रबर के हॉर्न! क्या पता इतने ट्रैफिक के बीच इनकी आवाज़ कोई सुनता भी है या नहीं।

बांद्रा तक पहुंचते-पहुंचते भूख लग आयी। बस जहाँ रूकी, वहीं सड़क पर एक कामचलाऊ ‘रेस्टारेंट’ दिखा। अंदर पहुँचे। जितनी खाने की वस्तुयें उपलब्ध दिखीं, सब अंजान सी शक्लें, समोसों को छोड़कर! स्वभाविक था कि उनके नाम भी मालूम नहीं थे। मीनू सामने आया। उसमें भी नाम तो सभी अंतर्राष्ट्रीय दिखे! लेकिन 10 गुना 10 के उस खान-पान केन्द्र में नामानुसार कुछ ना था। तभी मीनू कार्ड पर लिखा दिखा – पाव भाजी। मन मार कर वही मंगाया गया। फिर भी बात नहीं बनी। चुपके से नज़र मारी तो साथ की टेबल पर एक सज्जन किसी अखबार में तल्लीन, हमारे छत्तीसगढ़ के ‘चीला’ (चावल के आटे का एक व्यंजन) जैसा कुछ लिए बैठे थे। फिल्म ‘रंगीला’ के आमिर खान जैसी हालत में कथित वेटर से पूछ ही लिया गया कि वह क्या है? जवाब मिला -परांठा! हमने सूरत-सीरत का मिलान ना होते हुए भी उसका भी स्वाद लिया, साथ लाये गए कबाब के साथ।

बांद्रा से बोरिवली के लिए टिकट की कतार में पुरूषों के आगे-पीछे खड़ी महिलायों को देखकर लगा कि स्त्री-पुरूष समानता बस यहीं है, यहीं है, यहीं है। यह मेरे लिए अचरज़ की बात नहीं थी, गर्व की अनुभूति थी। हमारे क्षेत्र में भी अब यह तख्तियाँ टंगने लगीं हैं कि महिलायों के लिए अलग लाइन/ कतार नहीं है। इसके साथ-साथ माहौल यहाँ भी जाना-पहचाना ही दिखा। टिकट क्लर्क से झगड़ा, लाइन तोड़कर आते लोग, मोबाईल पर मुर्दों को जगाने वाली आवाज़ में बतियाते लोग।

बोरिवली तक स्टेशनों के नाम पढ़ते रहे, बिटिया अपने मोबाईल FM पर खोयी रही। स्टेशन पर उतरे तो भूल गये कि जाना किस ओर है। बाहर निकलते ही तलाश शुरू हुयी एक अदद पेन की। हमारा पेन कहाँ छूट गया पता ही नहीं चला। आदत रही नहीं, बिना पेन के चलने की। यकीन मानिए, लगभग पौन किलोमीटर भटक लिए, ऐसी कोई दूकान नहीं मिली, जहाँ से पेन लिया जा सके। हारकर आटो रूकवाने शुरू किए तो कोई तैयार ही नहीं हुआ विविध भारती का नाम सुनकर। तर्क कई मिले, न जाने के।

जब एक आटो वाले ने हमें विविध भारती परिसर के ऊँचे से गेट के आगे उतारा तो गेटमेन से पता चला कि यूनुस जी लंच के लिए अभी-अभी गये हैं, बस अभी आ जायेंगे। यूनुस जी को फोन लगाया गया और सूचना दी गयी कि हम उनके दरबार में हाज़िर हैं। नाम-पता दर्ज करवाने के बाद हमें एक छोटे से सभागारनुमा कमरे तक छोड़ा गया,, इस सूचना के साथ कि यूनुस जी से मिलने आयें हैं। अब मैं उन विदुषी का नाम भूल चुका हूँ, जो उस कक्ष में मौज़ूद थीं।

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हमारे कैमरे से, ज़नाब युनूस खान

यूँ ही बात करते-करते जब कुछ नाम हमने लिए, तो अपने काम छोड़कर उन्होंने हमें रेणु बंसल जी से मिलवाया, जो कॉरीडोर में ही नियत स्थान पर भोजन अवकाश पर थीं। ममता जी के भी हम फैन रहे है। (अन्ग्रेज़ी शब्द लिखना मज़बूरी है। अब यदि लिख दूँ कि चाहने वाले रहे हैं, तो यूनुस जी पटक-पटक कर मारेंगे) उनके बारे में जिज्ञासा जताई तो पता चला कि वे अवकाश पर हैं।

कुछ ही देर बाद, एक संदेशवाहक ने संदेश दिया कि आपको साहब बुला रहे हैं, ऊपर। सीढ़ियों से दूसरा कमरा। एक चक्कर लगा कर आ गये, समझ ही नहीं आया किस दरवाज़े को धक्का दें।

उसी संदेशवाहक ने फिर हमें महेन्द्र मोदी जी के कमरे तक ले जा कर छोड़ा। औपचारिक परिचय के बाद मोदी जी ऐसे घुले मिले, जैसे पुरानी पहचान हो। यूनुस जी बस, आ रहे हैं, यह सूचना भी दी। बातें शुरू ही हुयीं थी कि यूनुस जी अपनी चिर-परिचित

मुस्कान लिए दाखिल हुए।

बेहद गर्मजोशी से मिले यूनुस जी ने कुछ क्षण बाद ही यह कहते हुए क्षमा मांगी कि एक ‘लाइव’ कर के आता हूँ, 2:30 से 3:00 वाला सदाबहार नगमे। वे चले गए तो हमने भी इच्छा जाहिर कि यूनुस जी को कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए देखने की। मोदी जी तुंरत उठे और हमें साथ ले जाकर लगभग हर स्टूडियो और कक्ष दिखाए और उनकी संक्षिप्त जानकारी दी। यूनुस जी को साक्षात प्रसारण करते देख, एक पुरानी इच्छा भी पूरी हुयी।


स्टूडियो और प्रसारण नियंत्रण कक्ष में नई-पुराने उपकरणों की जुगलबंदी देखकर मैं हैरान था।

स्पूल रिकॉर्डर, रिकॉर्ड प्लेयर, सीडी प्लेयर, कंप्यूटर, विविध एनालॉग -डिजीटल उपकरणों का उपयोग एक साथ होते देख मुझे अपने इस्पात संयंत्र की याद हो आई। मैं सोचता था कि ऐसा तकनीकी संगम हमारे ही यहाँ होता है। कितना गलत था मैं।

यूनुस जी ने तभी जसवंत सिंह जी का वह रिकॉर्ड दिखाया जिसके बारे में इस मुलाक़ात के बाद, उन्होंने एक पोस्ट में जिक्र किया था।

ओह! यह पोस्ट लम्बी होती जा रही है। जब तक आगे की बातें आपसे बांटूं, तब तक आप इसे ही पढ़िए। बस कुछ ही घंटों में फिर मिलता हूँ। यूनुस जी से नाराज़गी का किस्सा भी बताऊंगा।

यूनुस जी से मुलाकात और उनसे नाराज़गी
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यूनुस जी से मुलाकात और उनसे नाराज़गी” पर 14 टिप्पणियाँ

  1. ये फोटो वाला रिकार्ड प्लेयर अभी भी चल रहा है – ग्रेट! सन ७२ में पिलानी में लैंग्वेज लैब में इस पर सुना करते थे अंग्रेजी प्रोनंसियेशन के ऑडियो! 🙂

  2. vaah.. yunus ji se mil aaye.. mujhe bhi milna hai.. 🙁 bahut dino se due hai..

    aapke baare me Vaibhav se pata chala tha.. achchha laga.. 🙂

  3. बी एस पाबला मजा आ गया आप का लेख पढ कर, यहां भी जब हम कही दुसरे देश मै जाते है तो, खाने पर बहुत मुसिबत आती है. ओर हम चोर आंखो से आसपास नजर डोडा लेते है, या फ़िर वेटर को पुछ लेते है, सब से बडी प्रोबलम हे हम सब शाका हारी है,
    चलिये आप के साथ बस मे हम ने भी यात्रा कर ली, ओर सब से मिल भी लिये.
    धन्यवाद

  4. अभी आए अभी मिले और नाराज़ भी हो गए ।
    मज़ा आ रहा है जी ।
    बस जी शुरू रहिए ।

  5. आप जिस जगह से चले थे वो सी बी डी है सी बी टी नहीं । विविध भारती के स्टुडियो वाकई एक अलग प्रकार की अनुभूति देते हैं। लायब्ररेरी भी देखी कि नहीं। मोदी जी भी उतने ही मिलनसार हैं जितने यूनुस जी। और उनकी आवाज भी रेडियो पर फ़ौरन पहचानी जाती है। देखिए आप सी बी डी से सौ किलोमीटर दूर घूम आये लेकिन 25 किलोमीटर की दूरी पर नहीं आ पाये इसे कहते हैं किस्मत्।

  6. रोचक विवरण है।

    आप को कैसे लगा कि यह पोस्ट लम्बी हो गई है। मुझे तो मुन्नाभाई MBBS वाले सर्किट की याद आ गई जब मुन्नाभाई को हॉस्टेल में रहने के लिये कमरा मिलता है और सर्किट कमरे में घुसते ही कहता है – भाई , ये तो रूम तो शुरू होते ही खत्म हो गया 🙂 वैसे ही आपकी पोस्ट भी लगी। जारी रहें।

  7. ऊपर की फोटो वाले टेप रिकॉर्डर को नागरा कहते थे शायद. इसे लेकर फीचर रिकॉर्डिंग के लिए जाना ऐसे लगता था कि कोई गाँव की और चल दिया हो … दोबारा देख कर अच्छा लगा…

  8. आप का यात्रा वृत्तांत इतना जीवंत और सहज है कि सभी चित्र आँखों के सामने उभर आए..प्याज़ की परतों जैसे एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट मिलती है जिसे पढ़ने की उत्सुकता बनी हुई है..

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