रचना सिंह की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास

अपनी पिछली पोस्ट पर मैंने, जनमदिन की बधाई स्वीकार चुकीं रचना जी के आग्रह पर, संबंधित पोस्ट हटाने हेतु साथियों का अनुमोदन मांगा था।

मेरी बातों से इत्तेफाक रखते हुए लगभग किसी ने भी अनुमोदन नहीं किया है। किन्तु मुद्दे से भटकते हुए रचना जी की टिप्पणियाँ लगातार मिलती रहीं। अपनी अंतिम टिप्पणियों में फिर से कुछ बातें की हैं। यह पोस्ट इसी सिलसिले की अगली कड़ी है।

रचना जी को यदि अपने नाम से यह पोस्ट लिखे जाने पर आपत्ति है तो इसका कारण यह कि उनकी बातों के जवाब में लिखी जा रही टिप्पणी अनावश्यक रूप से लम्बी हो रही थी, सो पोस्ट में बदल दिया उसे। वैसे भी जिसका प्रोफाईल ही उपलब्ध नहीं वो आपति क्या करेगा।

उन्हें देवनागरी में लिखते देख प्रसन्नता हुई। मैं यही लिखना चाहता था कि मैं अपने ब्लॉग पर क्या लिखता हूँ, किसे बधाई देता हूँ, ये मेरा अधिकार है। यदि किसी को उस पर आपत्ति हो तो अपना विरोध दर्ज़ करवाना संबंधित व्यक्ति का काम है।

आपको अपना जनमदिन पाश्चात्य पद्धति से मनाना पसंद ना आता होता तो आप लपक कर बधाईंयाँ ले धन्यवाद न देती, बल्कि मुझे और बाकी 18 स्नेहियों से अपना विरोध दर्ज़ करवातीं व बधाईयाँ ठुकरा देने का एलान करते हुए किसी तरह की कार्रवाई करवा देने की बात कह चले जातीं। आज दो माह बाद आपको याद आ रहा है कि आपका जनमदिन मनाया गया था? उस दिन क्या हो गया था आपकी मानसिकता को?

रही बात तालियाँ बजाने वाली तो आप स्वयं एक उदाहरण हैं कि आपने बधाईयाँ स्वीकार कर ताली दोनों हाथों से बजने वाली कहावत का समर्थन किया है।

आंग्ल भाषा के विरोधी या भारतीय संस्कृति के उपासक के अलावा एक और शब्द होता है व्यवहारिकता।

अगर आप कहती हैं कि भारतीय संस्कृति मे जनम दिन मनाने की परम्परा नहीं है तो जरा नज़रें घुमा कर आसपास के भारतीय संस्कारों वाले परिवारों में झांक लें, आपको अपनी मानसिकता फिर बदलनी पड़ेगी।

1 अप्रैल को चिट्ठाचर्चा पर मेरी फोटो को ले कर जो बवाल हुआ था उसकी शुरूआत मैंने ही विरोध दर्ज़ करवा कर की थी। संभवत: वह चित्र मेरे ही मातृ संस्थान के किसी सभागार का था जिसमें एक सिक्ख पुरूष सहित कई लोगों को दिखाया गया था और उस सिक्ख को बी एस पाबला बताया गया था। इस बात का पता मुझे तब चला था जब किसी अन्य इकाई के सहकर्मी ने वह चित्र देखकर मुझे फोन किया था और यह निश्चित करने को कहा था कि वह मैं ही हूँ।

किसको किसको समझाता? चित्र को देखने वाले, उन्हीं सज्जन को बी एस पाबला मान लेते, फिर मैं सामने होता तो मुझे झूठा करार दे दिया जाता! यह पहचान के संकट की बात थी, कोई छोटी मोटी बात नहीं। मैंने तभी संभावित पाठकों को सूचित करने के उद्देश्य से टिप्पणी कर बताया था कि अप्रैल फूल की अवधारणा के बावज़ूद, व्यक्तिगत तौर पर, मुझे अपने नाम के साथ किसी और का चेहरा देखकर बुरा लगा है। मैं चाहता हूँ कि कोई खेद भी व्यक्त न करे। जो हुया सो हुया।

उसके बावज़ूद जब अनूप शुक्ल जी ने कहा कि यह सभी को पता है कि वह चित्र आपका नहीं है तो मैंने फिर हल्के अंदाज़ में पूछा था कि जिन्होंने मुझे देखा ही नहीं, उन्हें कैसे पता है कि ये चित्र मेरा नहीं है? 🙂

उसके बाद उन्होंने वह चित्र हटवा दिया, जबकि मैंने हटाने को कहा ही नहीं था। (वैसे भी वह चित्र एक सार्वजनिक संस्थान की आंतरिक सभा का था जिसे सार्वजनिक किया जाना, चित्र उपलब्ध करवाने वाले साथी को अनुशासनहीनता की परिधि में ला खड़ा करता)

फिर अनूप जी ने होली के मौके पर तमाम साथी ब्लागरों की फोटों वाली पोस्ट का जिक्र करते हुए लिखा कि जो पाबलाजी होली के मौके पर साथी ब्लागरों की फ़ोटो के साथ खिलंदड़े अंदाज में पेश आते हैं वे एक अप्रैल तक आते अपने नाम के साथ किसी दूसरे की फोटो देखकर दुखी हो जाते हैं।

मेरी आपत्ति फिर थी कि मूड, आनंद, माहौल के मुताबिक, होली पर कुछ ब्लॉगर साथियों के चित्र के साथ कलाकारी की गयी थी। ब्लॉगर साथियों के चित्र वास्तविक थे, नाम बताए ही नहीं गए थे। मूल चेहरे से किसी तरह की छेड़खानी नहीं हुयी थी। सिर्फ सार्वजनिक स्थानों का बैकग्राऊंड उपयोग में लाया गया था। यहाँ तो बिना किसी के संदर्भ में मूल चित्र से छेड़खानी कर नाक, कान, मुँह, आँख तोड़ मरोड़ देते है और नाम पूछते हैं! मैंने खिलंदड़े अंदाज़ में ब्लॉगर साथियों की फोटो को लेकर मस्ती की थी। उनका नाम लेकर किसी दूसरे की फोटो का उपयोग नहीं किया। आप खिलवाड़ कीजिये, लेकिन नाम और चेहरा अलग ना कीजिये।

हालांकि इसके बाद कई स्थानों पर, विशुद्ध मनोरंजन के संदर्भ व उद्देश्य से मेरे चेहरे के साथ छेड़खानी कर पहेलियाँ बूझी गई हैं। मैंने तो वहाँ भी तालियाँ बजाई हैं। साथियों के साथ मुस्कुराया हूँ।

वैसे भी भारतीय संस्कृति वाली होली एक ऐसा सार्वजनिक त्यौहार है जहाँ निशाने पर लिये गये व्यक्ति का सार्वजनिक उपहास स्वीकार्य है। पाश्चात्य संस्कृति का अप्रैल फूल दो व्यक्तियों के बीच चुहलबाजी के रूप में व्यक्तिगत उपहास की अवधारणा है।

रही बात “माल” बेचते दिखाये जा रहे विवेक सिंह जी की पोस्ट की। आप उत्तरप्रदेश से हैं तो जरा पता कीजिएगा कि बागपत के पास कोई पाबला नामक गाँव है क्या? या फिर हरियाणा के कैथल में कोई पाबला नामक गाँव तो नहीं? यह भी पता कीजिएगा कि बी एस पाबला नामक कोई विश्व प्रसिद्ध अभियांत्रिकी प्रोफेसर-लेखक तो नहीं चंड़ीगढ़ के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नीकल टीचर्स में? कोई पाबला, मध्य प्रदेश के मूख्य वन संरक्षक तो नहीं रहे हाल ही तक? आपने मशहूर पंजाबी पॉप गायक सोनी पाबला को सुना ही होगा? या फिर सीएटल, वांशिगटन के लोकप्रिय पाबला क्यूज़िन में लंच तो लिया होगा?

क्या पाबला पर मेरा पेटेंट है? क्या उस पोस्ट पर सिक्ख प्रतीकनुमा रूप का मतलब मैं इकलौता ही हो गया? धन्य है आपकी मानसिकता।

वैसे एक बात बताइएगा रचना जी। आप भारतीय संस्कृति को मानती हैं या पाश्चात्य संस्कृति को? अगली बार जनमदिन जैसी (सार्वजनिक) बातों पर आपकी उसी मानसिकता का ख्याल रखने का प्रयास किया जाएगा।

रचना सिंह की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास
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रचना सिंह की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास” पर 16 टिप्पणियाँ

  1. न खाता न बही…
    जो पाबला जी कहें वही सही…

    जय हिंद…

  2. मातृशक्ति की जिज्ञासाए स्वयं ईश्वर भी नहीं शांत कर पाया . आप तो बी .एस. पाबला हो

  3. जिज्ञासा क्या थी, पता ही नहीं लगा।

  4. सुना है कि अगला आदेश आने वाला है कि ..जहां जहां उनकी टिप्पणियां हैं….वहां से हटा दी जायें….या हो सके तो वो पोस्टें भी…अरे बाप रे अब ये इतनी सारी जिज्ञासायें कौन शांत कर पायेगा….सर कौन कहता है कि ब्लोग्गर्स कुछ कर नहीं रहे..खाली बैठे हुए हैं..अब इस से ’रचना’त्त्मक और क्या हो सकता है..आपने शांत किया तो ..नोबेल शांति का अगला नोमिनेशन ….टैण टैणेण

  5. पाबला जी,
    खेद है आपको मेरी बात बुरी लगी !
    मैं केवल इस लिए पोस्ट हटाने की बात कर रहा था क्यों की कोई बात ना होते हुए भी बात का बतंगड़ बन रहा है !
    यहाँ एक बात और स्पष्ट करना चाहूगा, यह मेरी भी समझ में नहीं आया लगभग २ महीने के बाद बात इतनी क्यों बड़ी ??
    बाकी ब्लॉग आपका है, मर्ज़ी भी आपकी !
    मैं सिर्फ़ आप को हो रही इस बेकार टेंशन से खुद टेंशन में हूँ और कोई बात नहीं !

  6. हम तो इस विषय में चुप ही रहेंगे पाबला जी।
    6 माह पूर्व हमारी एक पोस्ट पर भी इसी तरह का बखेड़ा खड़ा हो गया था।
    रचना जी को तो हम दूर से ही नमस्ते कर लेते हैं।

  7. ये जिंदगी के मेले,
    दुनिया में कम ना होंगे.
    गर वो यहाँ ना होंगे.

    फिर काहे का झगडा है, पाबला जी.
    छोडिये हमारे ब्लॉग पर सुन्दर सुन्दर तस्वीरें देखिये और आनंद लीजिये.

  8. पाबला जी , मेने इस लिये उस पोस्ट को हटाने के लिये कहा था कि बात वही खत्म हो जाये, वेसे मुझे कोई हक भी नही था, लेकिन सच मे हमे अभी तक पुरी बात का पता ही नही कि असल मै बात क्या है, ओर अब हम जानना भी नही चाह्ते,लेकिन लगता है कि किसी मामुली सी बात का ही बतगड बनाया गया है… चलिये साणू की असी ता मस्त है अपने पाबला जी दे नाल

  9. पाबलाजी,
    आप बधाई के पात्र हैं कि किसी की जिज्ञासा शान्त करने का प्रयास कर रहे हैं । यह एक पुनीत कार्य है और मैं वैयक्तिक तौर पर इसका समर्थन करता हूँ ।

    हालांकि आप काम तो अपने पूरे पराक्रम से ही कर रहे होंगे लेकिन कभी कभी किसी कार्य का कोई भी परिणाम निकलता नहीं है……….. मसलन आप उनको जगाने की कोशिश कर रहे हैं जो सोये हुए नहीं बल्कि सोये हुए का नाटक कर रहे हैं …….. उनको कैसे जगा पाते हैं आप ……..ये देख कर ही अब मेरी जिज्ञासा शान्त होगी……

    WISH YOU ALL THE BEST !

  10. पाबला जी ज्यादातर बातें आपके बताये गये कथनो से स्पष्ट हो गयी हैं और मुझे नहीं लगता कि अब भी रचना जी के पास विरोध करने के लिए कुछ बचा होगा। और आपने बताया कि ये बात काफी पुरानी हो गयी है और जब इनको बधाईयाँ दी गयीं तब इन्होने दोनो हाथो से बधाईयाँ लपकी। बात तो सही है लेकिन इसके साथ एक सवाल जो यहाँ खड़ा होता है वह यह कि उस समय ये सो रहीं थी , नहीं शायद हो सकता उस समय दिमाग मे नहीं आया होगा मुझे पाश्चात जन्म दिन नहीं मनाना है। मुझे तो ये भी लगता है कि शायद इनको उस समय ये नहीं मालूम था कि आप पाश्चात संस्कृति के विरोध में लिखे गये लेखो पर सहमती देते है। वैसे जो भी हो मुझे नहीं लगता कि आपको इन सब छोटी बातो के लिए इतने पोस्ट लिखने की जरुरत नहीं है सबको पता है कि कौन कितने पानी में है।


  11. अटपटा दिख रहा है, पाबला के गले पड़ती हरदम एक बला ,
    या नाम का असर हो, पाओ जी + बला = पाबला

    ऒऎ छड्ड यार, सिक्खाँ नें ज़नानियाँ दे मूँ लगदे चँगा नईं लगदा ।

    I have learned to expect unpredictables from certain uncomfortable corners. That is it !

  12. किसी भी मुद्दे को उसकी तार्किक परिणति तक पहुचाने का माद्दा
    दिखा यहाँ मुझे ! अब यह परिवाद खत्म किया जाय !

  13. कोई टिप्पणी नहीं करूँगा इस मसले पर…

    यह मेरी हाजिरी ही सही।

  14. हम तो आपके ब्लॉग की सजावट देखकर ही मंत्रमुग्ध हो गये हैं। अभी उसकी बधाई ले लीजिए, पोस्ट की दुबारा आकर दी जाएगी।
    धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    ———-
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