लखनऊ सम्मान समारोह: यादें याद आती हैं

पिछले वर्ष अप्रैल में जब परिकल्पना – नुक्कड़ सम्मान समारोह दिल्ली में हुआ तो रात्रिभोज में रवीन्द्र जी को कहा था कि अगली बार भी ज़रूर बुलाईएगा, भले ही कोई सम्मान -वम्मान ना दें लेकिन तारीख ज़रूर बता दें, हम पहुच जायेंगे खुद ही! तब से गाहे बगाहे उनसे कहता ही रहा इस बात को.

इस वर्ष जब हमने अपना नाम गायब देखा सूची से तो एक संतोष की सांस ली. निंदकों की मिसाईल का निशाना बनने से बच जो गए थे 🙂

लेकिन बाद में एक मित्र द्वारा जो जानकारी मिली तो मैं हैरान रह गया. परिकल्पना की उस लिंक पर सही में एक सूची में मेरा नाम दिख रहा था तो दूसरी में ब्लॉग्स इन मीडिया का. पहली सूची थी ‘दशक के ब्लॉगर’ की और दूसरी थी ‘दशक के ब्लॉग’ की

कुछ असहजता सी हुई. मैं कैसे दशक का ब्लॉगर हो सकता हूँ? मुझसे कहीं बेहतर पात्र हैं ब्लॉगिंग की इस अनोखी दुनिया में. रही बात ब्लॉग्स इन मीडिया की तो वह ब्लॉग है ही नहीं, वह तो एक समग्र वेबसाईट है.

रवीन्द्र जी को फोन किया गया. उन्होंने हँसते हुए कहा ‘मैं क्या करूँ, यह तो वोटिंग के नतीजे है, आपके चाहने वालों का मत है, मेरी व्यक्तिगत पसंद थोड़े ही है’

एक मित्र ने मुझे समझाने की कोशिश की ब्लॉग्स इन मीडिया आज भले ही वेबसाईट हो लेकिन लम्बे अरसे तक तो वह मुफ्त ब्लॉगिंग वाले प्लेटफार्म पर था ना! तो दिक्कत क्या है अगर कोई उसे ब्लॉग की श्रेणी में रख रहा?

तब मैंने रवीन्द्र जी को कहा अगली बार जब कभी ऐसा करना हो तो मुफ्त ब्लॉगिंग और पैसा खर्च कर किए जा रहे प्रयासों की अलग श्रेणी रखें. उसमे भी सामूहिक, व्यक्तिगत संचालन को अलग रखें.

लेकिन फिर शायद कुछ विवाद हुआ और वोटिंग का परिणाम अपडेट किया जाना बंद कर दिया गया.

अंतिम परिणाम जब बताए गए तो ब्लॉग्स इन मीडिया, सूची में दूसरे स्थान पर रहा और स्वाभाविक रूप से उड़न तश्तरी प्रथम स्थान पर शान से दमक रहा था.

चलो जी अब अपना जाना पक्का हो गया 🙂 लेकिन तभी ध्यान गया समारोह वाले शहर की ओर. अरे! ये तो लखनऊ लिखा है! चलिए नवाबों के शहर की सैर भी हो जाएगी, पहले एक बार मौक़ा चूक गए हैं.

 

लेकिन कार्यक्रम है सोमवार को और पड़ोसी शहर रायपुर से, सीधी ट्रेन शुक्रवार दोपहर चल कर शनिवार तड़के पहुंचाएगी फिर दो दिन, दो रातें कैसे, कहाँ बिताई जाएं. उधर वापसी में यही ट्रेन बुधवार दोपहर को चलेगी गुरूवार को घर ले जाएगी. ना, मामला नहीं जमेगा.

इस बीच एक पारिवारिक कार्य आ पडा जिसके लिए दिल्ली मुनासिब थी. तो इस तरह बात बनी कि गुरूवार को रवाना हो शुक्रवार की रात बिताई जाए बुआ जी के निवास पर, फिर शनिवार की शाम कुछ घंटे अजय झा जी के परिवार संग बिता रात को रूख किया जाए लखनऊ का. रविवार का दिन-रात बिताया जाए आराम करते, शहर घूमते. फिर सोमवार की रात ही चला जाए वापस दिल्ली के रास्ते वापस भिलाई.

रवानगी के दो दिन पहले ही स्थानांतरित हो कर गए हमारी कंपनी के पश्चिम बंगाल स्थित एक उच्चाधिकारी मित्र से चर्चा हुई तो पता चला वे 24 -25 अगस्त को एक साक्षात्कार के लिए दिल्ली में रहेंगे, तो उनके सानिध्य का भी मौक़ा निकल आया. इधर खबर लगी कि साहित्य अकादमी के रवीन्द्र भवन में एक कार्यक्रम है और साहित्य अकादमी के सदस्य, मित्र गिरीश पंकज भी मौजूद रहेंगे वहाँ, तो हमने उनसे भी गुजारिश की कि कुछ समय के लिए साथ दे दें वे.

लेकिन सोचा हुआ कभी होता है? दिल्ली के पास पलवल पहुँचते, बुआ जी से संपर्क किया गया तो पता लगा वे सब उसी पारिवारिक मुद्दे पर पंजाब पहुँच गए हैं और घर पर केवल उनकी बहू और बच्चे हैं. हमने निजामुद्दीन स्टेशन पहुँच पवन चंदन जी से संपर्क किया कि शायद रिटायरिंग रूम मिल जाए तो पता चला वे शहर में दूर कहीं हैं. इधर रिटायरिंग रूम वालों ने टका सा ज़वाब दे दिया.

राम कृष्ण आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास 24 अगस्त की दोपहर एक होटल में तरोताजा हो गिरीश जी से बात करने की कोशिश की. हम दोनों के ही फोन रोमिंग पर थे. बहुत कोशिश करने पर भी सम्पर्क ना हो सका. अपन खा पी कर सो गए.

नींद खुली दोपहर 3 बजे अधिकारी मित्र की कॉल से. वे फुरसत पा चुके थे. मैंने मोबाईल में झांका और सबसे आसान तरीके से रामकृष्ण मेट्रो स्टेशन से पटेल चौक मेट्रो स्टेशन की राह पकड़ी और खरामा खरामा पहुँच गए होटल जनपथ. रात्रि विश्राम वहीं किया और वापस अपने होटल पहुँचा 25 अगस्त की दोपहर.

दिल्ली की बारिश भी गज़ब की मिली. आधे घंटे की ही बारिश में घुटने, कमर तक पानी. हमारे भिलाई सरीखे सवा महीने बारिश होती रहे तो पता चले देश की राजधानी की व्यवस्था.

पुरानी दिल्ली स्टेशन का प्रवेश स्थल, बारिश रूकने के 1 घंटे बाद
पुरानी दिल्ली स्टेशन का प्रवेश स्थल, बारिश रूकने के 1 घंटे बाद

पुरानी दिल्ली स्टेशन से रात पौने दस बजे चली फरक्का एक्सप्रेस ने लखनऊ पहुँचाया सुबह नौ बजे. पुराने आरटीओ कॉम्प्लेक्स कहे जाने वाली जगह पर मिला होटल. शिवम् मिश्रा जी का संदेश मिला कि वे भी रवाना हो चुके. लेकिन मोबाईल में दिख रहा था कि उनकी गाड़ी फतेहपुर में फर्राटा भर रही. मैंने पूछा तो ज़वाब मिला कि इलाहाबाद हो कर आएँगे.

इस बीच अमित श्रीवास्तव जी ने सम्पर्क किया तो पता चला उनके परिवार ने स्टेशन से ही शिखा वार्ष्णेय जी को ‘हाइजैक’ कर लिया है और वे वहीं रहेंगी उस रात. अमित जी ने रात्रि भोज के लिए आमंत्रित किया शिवम् मिश्रा जी सहित लेकिन शाम होने को आई मोबाईल पर शिवम् जी की उपश्थिति लगातार इलाहाबाद में ही दिख रही थी. बहुत देर बाद उनकी हलचल दिखी लखनऊ की ओर बढ़ते हुए.

मोबाइल पर जब उनकी लोकेशन आसपास ही दिखी तो मैं नीचे उतर आया और कुछ ही पल में शिवम् जी सामने थे. आखिर वे भी तो अपने मोबाईल पर मेरी सटीक लोकेशन देखते रहे हैं.

मैंने अमित जी से पूछा कि आना कहाँ है? आपका निवास कहाँ है? उधर से आवाज़ आई ‘ऐसा कीजिए पहले तो आप गोमती नगर थाने आ जाईए‘ मैं सकपका गया आखिर इरादा क्या है इनका. डरते डरते पूछा ‘क्या गलती हो गई हुज़ूर हमसे?’ वे हँसे ‘अरे नहीं, गोमती नगर थाने के पास आ जाएँ मैं मौजूद रहूँगा आगे की राह के लिए’

मैंने मोबाईल पर गोमती नगर थाने का स्थान निर्धारित किया और फिर जैसे जैसे मोबाईल से कन्या स्वर कहते गया वैसे वैसे उस अनजान शहर में स्कॉर्पियो का स्टेयरिंग घूमता गया. तय स्थान पर अमित जी मिले.

निवेदिता-अमित श्रीवास्तव जी के निवास पर
अमित श्रीवास्तव, शिवम् मिश्रा, बी एस पाबला, शिखा वार्ष्णेय, निवेदिता श्रीवास्तव

पास ही के एक रेस्टारेंट में शानदार रात्रिभोज के बाद देर रात तक हम पाँचों ने ढेर सारे मुद्दों पर बातचीत की, ठहाके लगाए, आपसी बातचीत में जो शब्द एक से अधिक बार आए वह थे ब्लॉग, लंदन, मिश्रा, पवन, शोभा, इलाहाबाद, रचना, साहित्य, गधा, माया, दिल्ली, महफूज़, मोटा, पांडे, अदा, खिल्ली, गोमती, अनूप, मुर्गा, कल्पना, रवीश, जर्मनी, प्रवीण, भावना, राज, सहानुभूति, चप्पल, हजरतगंज, जनपथ, मोबाईल, धूप, अजय, हाथी, आगरा, ममता, अनिता, बारिश, दिल्ली, पागल, रात, कोलकाता, शृंगार, सागर, शिव, आराधना, दुआ, पूजा, चप्पल, ढोलक, निशा, हड़काया, दीपक, रिमोट, समीर, कविता

वापस होटल लौट सुबह शिवम् जी अपने एक परिचित के पास किसी कार्य से गए और लौटने में हो गई देर. समारोह स्थल, राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह तक जब हम पहुंचे तब तक 11 बज चुके थे.

राय उमानाथ बाली प्रेक्षागृह, लखनऊ सभागार में सभागार में

 

प्रवेश द्वार पर ही गर्मजोशी से मिले रणवीर सिंह ‘सुमन’ जिन्होंने हमें सबसे अगली पंक्ति में ले जा बिठाया. लगभग उसी समय डॉ अरविन्द मिश्रा जी अपने संबोधन के लिए स्थान ले रहे थे. कुर्सी में कुछ इस तरह धँसा हुआ था मैं कि पीछे मुड़ कर नज़र घुमाने का कोई प्रयास करता तो हास्यास्पद ही लगता.

ब्लॉग्स इन मीडिया के लिए सम्मान प्राप्ति
ब्लॉग्स इन मीडिया के लिए सम्मान प्राप्ति

कुछ ही समय में समारोह परवान चढ़ने लगा. कई साथी आ कर मिल गए कईयों से आँखों ही आँखों में बातचीत हो गई. पिछली कतार से शरारती आवाज़ आई सुनीता शानू जी की तो मैंने असमर्थता व्यक्त की पीछे मुड़ बात करने से. बाद में जब उन्होंने रंजना भाटिया जी से परिचय करवाया उन्होंने तो मुझे याद आया कि ब्लॉग्स इन मीडिया जब ब्लॉग ऑन प्रिंट था तब उसमें शामिल होने के लिए रंजना जी को निमंत्रित किया गया तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था. वही बात मैंने वहाँ दोहरा दी कि मैं तो जानता हूँ रंजना जी को.

 

सुशीला पुरी
सुशीला पुरी

शेफाली पाण्डे
शेफाली पाण्डे

रविंदर पुंज
रविंदर पुंज

प्रवीण चोपड़ा
प्रवीण चोपड़ा

वंदना अवस्थी दुबे
वंदना अवस्थी दुबे

श्रीश बेंजवाल शर्मा
श्रीश बेंजवाल शर्मा

नीरज 'मुसाफिर' जाट
नीरज ‘मुसाफिर’ जाट

इस्मत ज़ैदी
इस्मत ज़ैदी

कुमारेन्द्र सेंगर
कुमारेन्द्र सेंगर

धीरेन्द्र भदौरिया
धीरेन्द्र भदौरिया

अरुण कुमार निगम
अरुण कुमार निगम

 

भोजन सत्र के दौरान जब कुमारेन्द्र सेंगर, शेफाली पांडे, प्रवीण त्रिवेदी जैसे मित्र मिले तो महसूस हुआ कि मंच से संबोधन के दौरान एक बात कहना भूल गया कि यही वे साथी है जो आज के ब्लॉग्स इन मीडिया के महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं. मैंने अगर पहले ही मिल लिया होता तो मंच से एक बार फिर इस बात को दोहराता.लेकिन……

पहली बार आमने सामने मिल रहे लगभग सभी साथियों ने स्वयं ही सामने आ कर पूछा ‘पहचाने पाबला जी?’ और जब तक मष्तिष्क सारी कड़ियाँ जोड़ कोशिश करे तब तक अपना परिचय वे खुद ही दे देते. अब अपना आकार और वेशभूषा ऎसी है कि हमें तो परिचय देने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती. भीड़ में भी पहचान लिए जाते हैं. 😀

समारोह में आयोजकगण अपनी सामर्थ्यानुसार व्यवस्था संभाले हुए थे और वक्तागण अपने अपने अनुभव, आशंकायों, जिज्ञासाओं, जिम्मेदारी के अनुसार संबोधित कर रहे थे. बाहर साथियों से मिलते बतियाते देख अंदर बैठने की हमारी पुकार हुई तो चुपके से पिछली सीटों पर जा विराजे. जहां मुलाक़ात हुई शैलेश भारतवासी से. इससे पहले डॉ अरविन्द मिश्र, रविकर फैजाबादी, उदयवीर सिंह, संजय भास्कर, यशवंत माथुर, धीरेन्द्र भदौरिया, मुकेश सिन्हा, संतोष त्रिवेदी, अरुण निगम, विनय प्रजापति सहित कई साथियों से मुलाक़ात हुई. नाम जैसे जैसे याद आते जाएँगे लिखता जाऊँगा

बदले हुए कार्यक्रम के अनुसार शिवम् जी को मैनपुरी लौटना था. सो हमारा कारवाँ चल दिया अमित जी के निवास की ओर. व्यस्त सड़क पर अमित जी की कार से रवि रतलामी जी सपत्नीक उतरे और हमने शिवम् जी की स्कॉर्पियो से उतर कार में समाने की कोशिश की. आड़े तिरछे होते देर हो गई. सड़क पर पिछली गाड़ियों के होर्न बजने लगे. सामने से ट्रैफिक पुलिस वाला डंडा लहराते कार की ओर बढ़ा तो मैंने सोचा अब यह अपना रंग दिखाएगा. लेकिन वह हँसते हुए अंदर झांकते कह उठा ‘ आपके लिए तो बड़ी गाड़ी ठीक है सरदार जी’

अमित जी के निवास पर रात्रिभोज के पश्चात मैं और शिखा जी चल पड़े अमित जी की कार में रेलवे स्टेशन. जहाँ आधे घंटे के अंतराल से हमारी अलग अलग ट्रेन थी.

दिल्ली से दो ट्रेनों के बीच का अंतराल 6 घंटों का था. उत्तर भारत की एक नामी महिला साहित्यकार ने मेरी वेबसाईट से मोबाईल नंबर ले कर तब संपर्क किया था जब मैं लखनऊ के होटल में रूका हुआ था. वे इंटरनेट की दुनिया में उतरने के पहले, मुलाक़ात कर उसके दाँव पेंच जानना चाह रही थीं. इन 6 घंटों का आधा समय मैंने उन्हें ही समर्पित कर दिया.

लैपटॉप ले कर पहुंची इन मोहतरमा ने ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, वेबसाईट पर अपनी बहुत सी जिज्ञासाओं की बौछार कर दी और हमने पुरानी दिल्ली के प्लेटफार्म पर मैकडोनाल्ड में स्नैक्स, कॉफी की चुस्कियाँ लेते यथा संभव उनका समाधान किया.

इस बीच अजय झा जी ने संपर्क किया. लेकिन मुलाक़ात हो पाई निजामुद्दीन स्टेशन पर ट्रेन चलने के दस मिनट पहले ही.

29 अगस्त की दोपहर हमने अपने प्यारे से घर में कदम रखा और दो घंटे बाद ही दस्तक दी ऑफिस में.

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