लाज बचाने की खातिर चादर दी जिसने, उसी को मार डाला एक औरत ने

आखिर ऐसा क्या हुआ कि उस औरत ने अपनी लाज बचाने वाले के साथ इतना बड़ा हादसा होने दिया?

जब पिछला घटनाक्रम हुआ तो मेरी दादी माँ ने ऐसा एक किस्सा बताया, जो उनकी आँखों के सामने घटित हुआ।

सुनने में यह भले ही एक पल के लिए अविश्वसनीय लगे लेकिन ऐसा हुआ था

पंजाब के इलाके में मैंने देखा है और ऐसा रिवाज़ भी है कि किसी परिवार में मृत्यु होने पर पारंपरिक फीके रंग के कपड़ों में महिलायों का समूह प्रभावित परिवार के घर शोक प्रकट करने जाता है व सामूहिक रूप से विलाप करता है।

इसके लिए किसी दूसरे गाँव शहर भी जाना पड़े तो यातायात साधनों का प्रयोग कर सारा समूह एक साथ जाता है।

ऐसे ही एक मौके पर, सर्दियों के मौसम में, मेरी दादीजी गाँव की महिलायों के साथ किसी दूसरे शहर जा रहीं थीं। बस से शहर जा कर ट्रेन माध्यम से उन सबको गंतव्य पर पहुँचना था। गाँव की सारी महिलाएँ  घर घर जा कर सबको एकत्रित करते चल रहीं सबको एकत्रित करने के अंतिम क्रम में जब एक महिला के घर पुकार हुई चलने की, उस वक्त वह ज़ल्दबाजी में भागी भागी स्नान कर कपड़े बदलने के लिए गई।

उन दिनों गाँवों के अधिकतर घरों में बिना छत वाले गुसलखाने हुया करते थे बाथरूम हुया करते थे (यह काटापीटी रश्मि रविजा जी के लेख से प्रभावित है 🙂 ) बाल्टी भर स्नान किया, दीवार पर रखी गई कमीज पहनी, सलवार चढ़ाई, नाड़ा बांधा, बाहर निकल देरी के लिए माफ़ी मांगी और सब चल दिए बस अड्डे की ओर

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बस का सफ़र खत्म हुआ, अब बारी थी ट्रेन की। टिकट लेते वक्त दादी माँ ने आखिर उस महिला को टोक ही दिया जो सबसे अंत में शामिल हुई थी और अब वह बार बार अपनी सलवार ठीक करने में लगी थी। पूछे जाने पर कुड़कुड़ाते हुए उसने अपनी बहू को दोष दिया कि सलवार का नाड़ा कुछ ज़्यादा ही लंबा डाल दिया उसने जो अब अंदर की ओर बार बार लटके जा रहा, लहराते जा रहा। वह जितनी बार उसे टटोल कर संभाल कर ऊपर ठूँसती उतनी बार वह फिर नीचे आ जाता।

ट्रेन में उसकी असहजता बढ़ गई। एक सलाह आई कि सलवार उतार कर नाड़ा ठीक कर फिर से पहन लिया जाए। कोई दिक्कत नहीं हैं, वैसे अंदर सर्दियों से बचाव के लिए टांगों पर तंग सा अंदरूनी ऊनी पहनावा था ही। दिक्कत यह थी कि ट्रेन के उस डब्बे में शौचालय नहीं

उसकी लाज को देखते हुए सामने बैठे एक सज्जन ने अपनी ओढ़ी गई पतले खेस सरीखी चादर उतार कर पकड़ाई कि ‘माई! इसकी ओट से अपनी सलवार ठीक कर ले‘। दो महिलाएँ उस चादर के किनारे पकड़ कर खड़ी हो गईं। बड़बड़ाते हुए वह महिला उठी और सलवार ढ़ीली करते हुए अंदर हाथ डाला। अभी सलवार से हाथ बाहर आया ही था कि ‘हाय ओ रब्बा’ करते उसकी चीखें निकल गईं। निगाहें टिकाए दूसरे लोग भी चिल्ला उठे। उसके हाथ में था दो-ढ़ाई फुट का लहराता साँप।

अपने आप को बचने के लिए बुरी तरह चीखते हुए उस महिला ने हाथ झटक कर साँप को अपने से दूर किया तो वह ‘उड़ता’ हुआ उसी सज्जन पर जा गिरा जिसने ओट करने के लिए चादर दी थी। जब तक कोई कुछ समझ पाता बौखलाए, गुस्साए साँप ने उस व्यक्ति को गरदन के पास दो जगह काट खाया और जान बची तो लाखों पाए के मूड में गायब हो गया।

दादी बताती थीं कि उस व्यक्ति ने अगला स्टेशन आने के पहले ही दम तोड़ दिया।

अब सवाल यह कि यह सब हुआ कैसे?

ज़्यादातर लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि दीवार के ऊपरी सिरे पर रखी सलवार में वह साँप दुबका रहा होगा और सलवार चढ़ाते हुए उसका सिर अंगूठे के दबाव के बाद नाड़े के कसाव से दबा रह गया। साँसे अटक गई होंगी उसकी, लेकिन रह रह कर जब उसका अधमरा शरीर हिलता डुलता, तो उस महिला को नाड़े का भान होता होगा।

अब जब भी यह सत्य घटना याद आती है तो दशकों पहले दूरदर्शन पर चंचल आँखें लिए मोनिका लाल, बेहद लोकप्रिय रहे अपने धारावाहिक का नाम लेते हुए दिखती है कि ‘ऐसा भी होता है।’

अब बताईए, आप क्या कहेंगे?

लाज बचाने की खातिर चादर दी जिसने, उसी को मार डाला एक औरत ने
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