चाचा का रूआंसापन, पिता जी की मुस्कुराहट

आज माँ और पिताजी अपने पंजाब स्थित गाँव रवाना हो गए, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से। वे सेवानिवृत्ति के बाद से ही अपनी जड़ों के पास रहने की जिद करते हुए चले गए थे, लेकिन चूँकि उनके दोनों बच्चे (मैं और मेरी छोटी बहन) यहीं भिलाई में हैं, इसलिए सर्दियों में आते है, गर्मियों में चले जाते हैं।

अभी दो दिन पहले ही जब पिता जी और मेरे सेक्टर 4, भिलाई में निवासरत चाचाजी आपस में बैठे कुछ सलाह मशवरा कर रहे थे तो मैं भी शामिल हो गया उनकी बातों में।

बात कहाँ की कहाँ निकल गयी और वे दोनों उलझ पड़े, अपनी बचपन की किसी बात को लेकर (दोनों में लगभग 1 वर्ष का अन्तर है)। छोटे बच्चों की तरह बात करते हुए, उन्हें देखना, एक अलग ही अनुभव था।जब लगने लगा कि अब मामला, अर्थहीन होता जा रहा है, तो मैंने, बात का रुख मोड़ने की मंशा से पूछ लिया कि जिस जगह की बात कर रहे हैं, वो जगह कहाँ हैं?

हालांकि वे सैकड़ों बार बता चुके थे, लेकिन इस बार फिर बताते हुए बोले कि वाह! कैसे भूल सकते हैं, पाकिस्तान में तो था, हमारा गाँव। जहाँ जनम लिया वो जगह कभी भूलती है?

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पाकिस्तान में जनमे मंझले, छोटे, बड़े भाई

बात बन रही थी। मैंने फिर चुहलबाजी की ‘मौका मिलेगा तो फिर जाना चाहोगे, देखना पसंद करोगे’। पिताजी ने ठंडी साँस भरी ‘अब ऐसा मौका कहाँ मिलेगा?’ तभी एक विचार कौंधा कि क्या वह गाँव गूगल अर्थ में देखा जा सकता है? मैं झपट कर गया और लैपटॉप उठा लाया, यह कहते हुए कि अभी आपका गाँव दिखाता हूँ।

गाँव का नाम तो मैं बचपन से सुनते चला आ रहा था -चक नंबर 11 , लेकिन सबसे पहले तो मैंने पूछा कि जिला कौन सा था? पिता जी का जवाब आया ‘अरे तुम तहसील औकारा देखो। उसके पास ही था गाँव।’ अब हमने Aukara देखना शुरू किया। बात नहीं बनी तो गूगल बाबा की शरण में गए तो पता चला कि Aukara किसी का नाम तो हो सकता है लेकिन किसी जगह का होना तो मुश्किल है।

ना में सिर हिलता देख चाचा ने कहा ‘चल, अरनाला खुर्द देख वहाँ से तो बस एक-डेढ़ मील का ही फासला है।’ हमने फिर हाजिरी लगाई, गूगल दरबार में। जवाब मिला कि बच्चा, Arnala तो मुंबई में विरार-वसई के पास एक जगह है जहाँ एक किला है। पाकिस्तान रेलवे की वेबसाईट भी देख डाली गयी, नतीजा शून्य।

कोशिश करते समय बीतते जा रहा था। पिता जी व्यंग्य के साथ देख रहे थे। मैं झुंझला गया ‘अरे कोई जानी मानी जगह का नाम तो लो।’ चाचा की आवाज आयी ‘चल लाहौर देख। फिर रेलवे लाइन पकड़।’

लो जी लाहौर मिला। दक्षिण की रेल लाइन पकडी, तो जी औकारा भी मिल गया और अरनाला खुर्द भी! दरअसल वह था Okara और Renala Khurd ! हमसे ग़लती हो गयी थी, सुने गए नाम के स्पेलिंग समझने में। पिता जी को जब मैंने बताया कि यहाँ एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट दिख रहा है। तो हामी भरते हुए उनहोंने निर्देशित किया कि ऊपर की ओर देखो, एक बड़ी नहर होगी और वे पास आ कर बैठ गए।

नहर तो मिल गई। पिता जी ने एक जगह पर उंगली रखते हुए कहा कि यहाँ का तो नक्शा ही बदल गया है, शायद यह जगह होगी। हमने भी खुशी जाहिर की और इन्टरनेट की महानता का बखान किया।

तब तक चाचाजी मोर्चा सम्भाल चुके थे ‘मुझे भी दिखायो।’ नक्शे में वह जगह दिखाई तो वे तुरन्त बोले ‘नहीं, यह हमारा गाँव नहीं है भैय्या।’ अब हम फिर नए निर्देशों का पालन करने में जुट गए। तमाम चिन्हित स्थानों पर माऊस कर्सर ले जा कर देखते रहे लेकिन जनाब चकनंबर 11 फौजियांदा, नहीं मिला, वहीं सर्च किया गया तो एक जगह मिली Chak 11 4L Miltary Farm Okara

दोनों भाईयों ने में सर हिलाया कि गाँव तो ओकारा और लाहौर के बीच ही है। अब हम लाहौर से चले, रेलवे लाइन पकड़ कर, आया स्टेशन रेनाला खुर्द, साथ-साथ थी बड़ी नहर। पिताजी को मैंने बताया कि एक स्टेशन धुन्नीपुरा भी है तो वे उछल से पड़े। बस वहाँ से करीब दो मील पश्चिम की और है चक 11।

चाचाजी ने भी हामी भारी, नहर और रेलवे लाइन के बीच देखो। साथसाथ वे बुदबुदा से रहे थे‘दो तालाब हैं, एक बड़ा सा उत्तर की और और दूसरा छोटा वाला दक्षिण की और। बताये गए स्थान पर एक बसाहट दिखी।

जूम किया तो दिखा एक तालाब। क्षेत्रफ़ल उतना ही, जितना चाचा ने बताया। तुरंत ही मिल गया दूसरे सिरे पर दूसरा तालाब। एक दो जगह और भी आभास हुया, तालाबों का। चाचाजी तो एकदम भावुक हो गए, ‘यही है, यही है।’ फिर धीरे से बोले ‘गाँव के बीचोंबीच एक कुयाँ भी है, छत वाला।’ मैंने कहा कि कुयाँ तो बचा नहीं होगा आज के माहौल में और छत वाला कुँआ दिखना तो मुश्किल है।

गाँव की गलियाँ देखने के लिए पिताजी और चाचाजी में, मेरे पास बैठने के लिए बच्चों जैसी नोकझोंक हो गयी। तभी हमारे सुपुत्र ने कहा ‘देख रहे हो डैडी? दादाजी की आंखों में चमक और चेहरे पर खुशी की मुस्कराहट! और छोटे दादाजी की खुशी तो देखो।’ आखिरकार एक एक कर दोनों भाईयों ने जी भर कर अपने जनम स्थान को देखा, ठंडी साँसे लेते हुए एक एक गली की टोह ली।


चाचा जी ने बेहद रुआंसे होते हुए मुझे धन्यवाद दिया कि जिंदगी में दोबारा अपने जन्मस्थल को सिर्फ तुम्हारे कारण, कम से कम आसमान से देख पाया। पिताजी तो आँखें मूँदे हुए इतने अभिभूत थे कि उनकी मुस्कराहट से ही अंदाज लग रहा था, प्रसन्नता का। हम भी मन ही मन में आधुनिक तकनीक के चमत्कार को नमस्कार करते हुए अपने पूर्वजों के (संभावित) निवास स्थल को नक्शे में देख पाने का आनंद ले रहे थे।

कभी मौका मिला तो, अपने दादा-दादी द्वारा बताये गए, विभाजन के समय के किस्से साझा करूंगा.

चाचा का रूआंसापन, पिता जी की मुस्कुराहट
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चाचा का रूआंसापन, पिता जी की मुस्कुराहट” पर 17 टिप्पणियाँ

  1. आपकी पोस्ट पड़ कर कुछ यादे भीतर से बहार आने को आतुर हो रही हैं……बहुत सुंदर ……..भावपूर्ण

  2. आपकी पोस्‍ट में वर्णित किसी भी जगह से मेरा कहीं कोई रिश्‍ता नहीं। किन्‍तु पता नहीं क्‍या हुआ कि पढते-पढते आंखें भर आईं।
    बस।

  3. आपकी पोस्‍ट में वर्णित किसी भी जगह से मेरा कहीं कोई रिश्‍ता नहीं। किन्‍तु पता नहीं क्‍या हुआ कि पढते-पढते आंखें भर आईं।
    बस।

  4. अपनी मां से सुने पार्टिशन के किस्से मेरे जहन में भी ताजा हो गये, क्युं न आप एक नया ब्लोग ही बना लें और हम लोग जिन्हों ने मौखिक रूप से उस इतिहास को सुन कर अपने जहन में संजोया है वो हमारे साथ ही खत्म न हो जाये उसका एक रिकॉर्ड बन जाए, वर्ना इतिहास की किताबों में तो वही लिखा जाता है जो दोनों देशों की सरकारें चाह्ती हैं । ये बहुत ही सार्थक प्रयास होगा।

  5. आपके पिताजी और चाचाजी का रुआंसा हर्ष मैं समझ सकता हूँ. अच्छा लिखा है आपने!

  6. गूगल अर्थ ऐसी कई स्मृतियां सामने लाता है! मेरे साथ भी कुछ ऐसा हुआ है।

  7. गूगल अर्थ ने बहुत कुछ याद दिलाया है, खुशियाँ दी हैं और रुलाया है।

  8. यादेँ ऐसी ही होतीँ हैँ
    – लावण्या

  9. अज्ज आराम नाल बै के त्वाडी नवियाँ ते पुरानिया सारी बाकी बची पोस्टां पढ़ लईयां… मिन्नू ऐ वाली पोस्ट बोत पसंद आयी..मेरे माता पिता वि अपना सब कुछ छड के पकिस्तान तों भारत आये सन..१९४८ विच…ओना ने दिलं तों अपने पिंड दी गलियां अज्ज नहीं निकलियाँ…मेरी माता जी दी बड़ी खावईश है की इक वारि ओनानुं अपना घर पिंड वेखन नून मिल जावे…जिथ्थे तुसी अपना बचपन जवानी गुजारी होंदी है ओस जगह नाल किन्ना प्यार हो जांदा है ऐ गल समझ आंदी है ओना दियां गल्लां सुन के…गुजरांवाला दे कोल बदोक्की पिंड दियां गल्लां सुन सुन के ते मेरे बच्च्यां नूं वि रट गयीयाँ ने…
    बोत ही सोना लिखिया है तुसी…मेरी दिली मुबारकबाद कबूल करो.
    नीरज

  10. पुरानी यादों से जो खुशी मिलती है ,इस उम्र में
    उसको सिर्फ महसूस कर सकते हैं ..बयाँ नही !!!मैं भी बयाँ नही कर सकता !
    शुभकामनाएँ!
    अशोक सलूजा !

  11. गज़ब की पोस्ट..कितना कुछ…सच सबके साथ है ऐसा कुछ न कुछ अलग अलग अंदाज में…मगर आपके कहन की बात जुदा!!
    टिप्पणीकर्ता समीर लाल “भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार” ने हाल ही में लिखा है: नारे और भाषण लिखवा लो- नारे और भाषण की दुकानMy Profile

  12. ओकाड़ा? हमारे दादे-परदादे जरूर पड़ौसी रहे होंगे!!

  13. अपनी जड़ों को सर्च करना ,,, वहां से जुड़ने का रोमांच
    मैं पढ़ते हुए महसूस कर रहा था

    अप्रतिम ,,,, बहुत सुन्दर पोस्ट

  14. ‘जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात् जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है ।जन्मभूमि से सभी को प्यार होता है अति सुंदर संस्मरण ।

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