वो मेरे नंगे बदन को टटोल कर नीचे उतर गया

1981 का वर्ष मेरे लिए कई मायनों में बदलाव का वर्ष रहा। उस समय दिल्ली एशियाड की तैयारी जोरों पर थी। इस मौके पर तकनीक के क्षेत्र में रंगीन टेलीविजन लाए जाने की पुरजोर कोशिश, केंद्रीय सरकार की ओर से हो रही थी और इसके मुखर समर्थक थे (स्व) बसंत साठे जी।

हमने भी इस क्षेत्र में जोर आजमाने की नीयत से तकनीक की बारीकियों के लिए लुधियाना में फटाफ़ट-प्रशिक्षण प्राप्त करने की सोची और फरवरी-मार्च 1981 में आ गए लुधियाना  जो हमारे पैतृक गाँव से महज 50 किलोमीटर दूर है। जहाँ आना-जाना लगा रहता था।

जुलाई के माह में प्रशिक्षण खत्म होते ही भिलाई वापस लौटने के पहले कुछ सगे-संबंधियों से मिलने के क्रम में एक दिन मैं पठानकोट के पास मुकेरियाँ अपनी मौसी के पास चले गया। जब तीसरे दिन अपने गाँव वापस आया तो शाम होने ही वाली थी और उमस के मारे बुरा हाल था। घर में बारीक सी धार वाले हैण्डपंप के सहारे नहाने का मन बिल्कुल नहीं था। अपने कपड़े उठा मैं भाग खड़ा हुआ खेतों की ओर जहाँ 4 इंच मोटे पाईप वाले ट्यूबवेल से हाथी की सूँड़ सी मोटी धार का ठंडा पानी  मेरा इंतज़ार कर रहा था। दादी बेचारी पीछे पीछे दौड़ी कि शाम के अंधेरे में मत जा कोई कीड़ा-मकौड़ा काट लेगा! पर अपन तो यह जा और वह जा 🙂

जी भर कर तब तक नहाते रहा जब तक बदन काँपने नहीं लगा। नौकर सारे कपड़े-लत्ते ढ़ोते मेरे साथ बतियाते हुए चल रहा था। उसे बहुत खुशी होती थी जब हम लोग गाँव जाते थे। आखिर हिंदी बोलने समझने वाला कोई तो मिलता था।

दादी के स्नेह पगे भोजन से पेट भर गया लेकिन मन नहीं भरा। आँखें जबरन मुंदने लगीं। बिजली गुल थी। सोऊँ कैसे? कमबख्त पंखे की आदत पड़ी हुई थी। मैंने छत पर सोने का निर्णय लिया तो दादी मनुहार में जुट गई कि दादा जी घर पर नहीं हैं, गाँव में पार्टीबाजी बहुत है, छत पर मत सो, कुछ हो गया तो? जाहिर है मैं नहीं माना। हार कर दादी ने दो नौकरों को मेरे आजू-बाजू हथियारों समेत रहने, सचेत हो कर सोने की शर्त पर जाने दिया।

शानदार चाँदनी रात थी। नौकरों ने स्टोरनुमा कमरे से मूँज की रस्सी से बुनी हुई तीन चारपाईयाँ छत पर पहुँचाईं। मस्ती के आलम में मैंने केवल चारखाने की एक झीनी सी लुँगी बाँध रखी थी। ऊपरी बदन पर कुछ नहीं था। ठंडी हवा मंद मंद चल रही थी जिसके और ठंडे होते जाने के आसार दिख रहे थे।  दादी ने फुल बाँह की कमीज, खेस और रजाईयाँ भिजवा दीं थी जो अलग रखी गईं।

खुमारी ऐसी थी कि चारपाई पर लेटते ही आँखें बंद हो गईं। न कुछ ओढ़ पाया ना कुछ पहन पाया।

रात गुजरती रही। अंदाजा ही लगा सकता हूँ कि उस समय रात के दो बजे होंगे जब मेरी दाईं बाँह को जोरों से झिंझोड़ा गया। कल्पना की जा सकती है ऐसी गहरी नींद में वह झटका कितना जबरद्स्त रहा होगा जब मैं पलक झपकते ही स्प्रिंग सरीखा उठ बैठा और जोर से चिल्लाया “कौन है?” शायद यह दादी की मनुहार का असर रहा हो अचेतन मस्तिष्क में।

दो पलों में ही आँखे उस दमकती चांदनी रात की अभ्यस्त हो गईं तो दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आया। दायें बायें दोनों सेवक अपनी अपनी नींद में सोते दिखे। मैं हैरान-परेशान कि आखिर माज़रा क्या है? कुछ समझ नहीं आया तो फिर से सोने के पहले पानी पी लेने का विचार बनाते चप्पल की स्थिति देखने के लिए दांईं ओर झांका तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गई, घिग्घी बंध गई, सारे बदन में झुरझुरी दौड़ गई। वहाँ था एक अच्छा खासा साँप जो अपनी अस्त व्यस्त स्थिति से अपने परिचित ट्रैक पर आने की कोशिश कर रहा था।

मेरी गरदन जो झुकी थी झुकी ही रह गई। पल भर में ही वह महाशय पूर्व की ओर लगे, छत से सटे नीम के पेड़ की ओर अपनी ही चाल में चलते बने। मेरी आँखें उसका पीछा कर रहीं थीं लेकिन वह कब अदृश्य हो गया पता ही नहीं चला

अपन चारपाई पर बैठे थे तो बुत समान बैठे ही रह गए। पाँव नीचे रखने की हिम्मत ही नहीं हुई। कुछ समय पश्चात बांई ओर चारपाई पर सोए नौकर ने करवट ली तो मुझे बैठे देख झट से उठ खड़ा हुआ कि “क्या हुआ सरदार सा’ब” अब अपने मुँह से बोल निकलें तो कुछ बोलें। चुपचाप ना में सिर हिला दिया। वह फिर सो गया। आधे घंटे बाद दांई ओर के सेवक की आवाज़ आई “कुछ चाहिए क्या सा’ब?” हम फिर सिर हिला कर रह गए।

नींद फिर जोर मारने लगी लेकिन न तो लेटने की हिम्मत हो रही थी और ना ही नीचे कदम रखने की। आखिरकार कब लेटा पता ही नहीं।

अल-सुबह जब आँख खुली तो छलांगे मारते, सीढ़ियाँ उतरते हुए सीधे दादी से जा लिपटा और उत्तेजनापूर्वक सारा किस्सा एक साँस में ही बयां कर गया। फिर शुरू हुई उसकी चीख-पुकार और साथ ही साथ मेरे अंग-प्रत्यंग पर हाथ फेरते हुए सुनिश्चित किया कि कहीं कुछ हुया तो नहीं! जबकि मैं हँसते हुए कहे जा रहा था कि मुझे कुछ नहीं हुआ अच्छा खासा तो सामने खड़ा हूँ।

लेकिन मामला इतना आसान ना निकला। दोपहर बाद जब दादाजी जालंधर से लौटे तो उन्होंने गंभीरता पूर्वक सारी बात सुनी और एक ही बात पूछी कि कहीं कुछ खुजली जैसा तो नहीं लग रहा? बेख्याली में मेरा बांया हाथ दाहिनी कुहनी के अंदरूनी हिस्से की ओर बढ़ा और खुजलाने को हुआ ही कि चिहुँक उठा। वहाँ सुनहरी सी बिंदी जैसी चमड़ी उभरी हुई थी और चारों ओर आभामंडल सा लाल रंग का दायरा बना हुआ था। दादाजी ने उसे ध्यान से देखा। कमरे के अंदर जाने कहाँ से कुछ जड़ी बूटी सरीखा ले कर आए आधा गिलास पानी में डुबोया और बीसेक मिनट बाद शहद सा गाढ़ा हो चुका वह द्रव्य उस पर लगाया और कुछ ही घंटों में सब कुछ सामान्य!

तब तक यह स्थापित हो चुका था कि वह निरीह प्राणी टहलते रहा, मेरे बेसुध बदन की टोह लेता रहा और जब जाने की बारी आई तो कोई और तरीका ना देख बाँह का सहारा या लपेटा ले नीचे उतर गया लेकिन जाते जाते झटका दे गया ऐसा जैसे किसी ने झिंझोड़ा हो।

बात यहीं खतम नहीं हुई। आने वाले करीब 7 वर्षों तक हर माह उस स्थान पर लाल बिंदी उभर आती, हल्की खुजली होती और 72 घंटे तक हलकी बेहोशी रहती फिर सब ठीक। गोया कोई मासिक चक्र हो 🙂

अब आप बताईए। वो मुझ तक कैसे पहुँचा?

वो मेरे नंगे बदन को टटोल कर नीचे उतर गया
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वो मेरे नंगे बदन को टटोल कर नीचे उतर गया” पर 34 टिप्पणियाँ

  1. बादशाहों , वो मंजी में पहले से ही चिपका बैठा होगा जिसे नौकर देख नहीं पाए होंगे । होर की । 🙂

  2. मेरी समझदानी में तो यही आता है कि हो ना हो अगला उसी चारपाई की बानो में उलझा सो रहा होगा … जब आपने अपनी तशरीफ़ का टोकरा वहाँ रखा तो जनाब को अपनी जान बचाने की सुध आई होगी … खैर जो भी हो … सिवाए खुजली , उस लाल बिंदी और इन यादो के … कुछ और नहीं दे गए जनाब यही गनीमत है !
    टिप्पणीकर्ता Shivam Misra ने हाल ही में लिखा है: जन्मदिन मुबारक हो जिम्मी पाजीMy Profile

  3. पाबला नाल पंगा…सांप दी शामत ते आऊ ही आऊ…मुकेरिया विच मंजे हल्ले वी हैण या नहीं…

    जय हिंद…

  4. सारा किस्सा पढ़ गए। ये तो लिखा ही नहीं कि अच्छे खासे का क्या हुआ? दूसरे दिन तक जीता भी था या नहीं?
    टिप्पणीकर्ता दिनेशराय द्विवेदी ने हाल ही में लिखा है: गरीबी संख्या से हटती है।My Profile

  5. होशियारपुरिये होशियार नहीं सी, यह सप्प को पता लग गया था. ख़ास कर मुकेरियाँ में तो आँखें खोल कर सोना चाहिए था न :))
    टिप्पणीकर्ता भारत भूषण ने हाल ही में लिखा है: सुदर्शन चक्र चल गया भईMy Profile

  6. पाबला प्राऽऽजी…

    किस्सा तो रोचक है … रोंगटे खड़े हो रहे हैं … 🙂
    लेकिन रब्ब दा शुक्र है …

    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाओं सहित
    -राजेन्द्र स्वर्णकार
    टिप्पणीकर्ता राजेन्द्र स्वर्णकार ने हाल ही में लिखा है: हर घड़ी सांस को गंवाना है !My Profile

  7. लोमहर्षक आपबीती का रोमांचक प्रस्तुतीकरण!

    जाको राखे साइयाँ मार सके ना कोय।
    बाल ना बाँका कर सके जो जग बैरी होय॥
    टिप्पणीकर्ता जी.के. अवधिया ने हाल ही में लिखा है: भीष्म प्रतिज्ञा और शान्तनु को सत्यवती की प्राप्तिMy Profile

  8. ओ जी बडों की बात माननी चाहिए कि नही?बोलो बोलो
    नही मानी.खेत पर नहाने गए. मना कर दिया फिर भी छत पर सोये.बेचारे को डरा दिया.उस पर तोहमत भी बेचारे ‘उस’ पर लगा रहे हैं आप.चिपक कैसे जाता मर जानिया,फेसबुक वाली ‘उन’ खतरनाक लड़कियों जैसा थोड़े है ? घर जाकर उसने भी तो हाल सुनाये होंगे-

    ‘शहर के लोगो का कोई भरोसा नही रहा डार्लिंग! पाबला जी जैसा आदमी पास आ कर सो गया.वो तो ऐसे नही है.मैं तो सपने में नही सोच सकता कि वो…’

    ‘हे भगवान! क्या मुंह ले के मेरे पास आ गए?निकल जाओ मेरे घर से.पराये आदमी के साथ आधी रात तक…एक चारपाई पर?दोष उनको दे रहे हो?पूरे गाँव में इसी बात के चर्चे हो रहे होंगे. मैं नही रहने वाली अब तुम्हारे साथ.तलाक चाहिए मुझे.अभी…इसी वक्त’-सर्पिनी ने सुबकते हुए कहा.

    दोनों के बीच झगड़ा करवा दिया आपने.हद कर दी.उपर से ब्लॉग मे पोस्ट बना कर चिपका भी दिया.बेचारा सांप! हा हा (क्षमायाचना -आपसे नही उस सांप से -सहित)

  9. उस बेचारे के तो आज तक निशान पडता होगा . ……………..

    क्यो …………क्योकि उसके दादा ने उसे दवाइ नही पिलाई थी .

  10. ऐसा सुना है कि तुलसी दास साँप को रस्सी समझ कर चढ़ गये थे उसके बाद ही उन्होने रामचरित मानस लिखी । ( लेकिन इस का पाबला जी से क्या सम्बन्ध ? … )
    टिप्पणीकर्ता शरद कोकास ने हाल ही में लिखा है: आज जगमोहन कोकास की पुण्यतिथि है ….My Profile

  11. पढ़ते-पढ़ते ही रोमाचित हो गए ….वैसे अगर उस वक्त आपको कुछ हो जाता तो आज ये किस्सा कौन सुनाता 🙂

  12. वाकई जिंदगी की चुनिन्दा घटनाओं में से एक है !! पूरी को एक साँस में पढ़ गया !!

  13. पब्लाजी वोह इच्छा धारी नाग था,मणि देने आया था,ओर आप घबरा गए.खैर कोई गल नहीं,
    एक बार फिर आजमाइश करना,मै कोई झूठ तो नहीं बोलता.
    टिप्पणीकर्ता harivansh sharma ने हाल ही में लिखा है: जीवन क्रमMy Profile

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