आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया


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14 जुलाई को मुम्बई से पुणे जाते हुए तथा पुणे में भी किसी से मुलाकात न हो पाने के कारण हमारे पास काफी समय बच गया था। दोपहर लगभग दो बजे हमने राह पकड़ी अहमदनगर की। यह था स्टेट हाईवे 27. सड़क इतनी बढ़िया मिली कि हम पिता-पुत्री, रंजनगाँव – शिरूर होते हुए सवा चार बजे ही अहमदनगर पहुँच गए।

शहर के आते ही चिंता हुई अगली राह की क्योंकि मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी हम अहमदनगर में होंगे। मुम्बई का हाल देखते हुए लग रहा था कि अभी अंधेरा होते कम से कम चार घंटे तो लगेंगे।

नज़रे तलाश रहीं थी एक इंटरनेट कैफ़े। जल्द ही वह भी दिख गया। लेकिन वहाँ था इंटरनेट एक्सप्लोरर 6 जो किसी भी हालत में गूगल मैप्स को भाव देने वाला नहीं था। कैफ़े वाले को चमका-धमका कर मोज़िला फायरफ़ॉक्स और गूगल क्रोम डाउनलोड पर लगा दिया और उतने समय में बगल ही के रेस्टारेंट में हल्का फुलका नाश्ता कर लिया। आवश्यक जानकारी कैफ़े से ली, नांदेड़ की ओर जाने वाली सड़क का नक्शा बताते दो प्रिंट निकाले। कैफ़े वाले ने लिए 10 रूपए!

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»


शाम के 5 बजे हमारी मारूति वैन दौड़ पड़ी नांदेड़ की ओर। जाना था करीब 300 किलोमीटर और इस बार था स्टेट हाईवे 222, जो कि हमारी इस यात्रा की सबसे खराब सड़क थी! 10 वर्ष पुरानी वैन को 60 किलोमीटर की गति पर लगातार चलाए रखना बड़ा ही दुरूह कार्य लग रहा था।

मैने सोच रखा था कि रात 10-11 के बीच सुरक्षित समय तक नांदेड़ पहुँच ही जाएँगे लेकिन ज़ल्द ही अहसास हो गया कि यह नहीं हो पाएगा! महाराष्ट्र की शानदार सड़कों की तारीफ़ करते वक्त यह गड्ढों भरी ऊबड़-खाबड़ सड़क मुझे हमेशा याद रहेगी। राजमार्ग!? हुँह्

राह में, समुद्र तल से 830 मीटर ऊपर, पहाड़ों पर पवनचक्कियों की कतारें देखते हुए, तीसगाँव से गुजर कर जब हम सवा 6 बजे पाथर्डी पहुँचे तो आगे जाने की सही राह पूछने-चुनने में ही आधा घंटा लग गया। वातावरण में सुरमई रंग दिखने लगा था। पाथर्डी से 70 किलोमीटर दूर साढ़े 8 बजे के आसपास एक दोराहा दिखा। कुच्छेक दुकानें और आम चहल पहल में लगे लोग। जिससे मैंने नान्देड़ की राह पूछी उसने झूमते-बहकते हुए एक ओर इशारा करते हुए बताया कि थोड़ी दूर आगे जा कर जो चौक मिलेगा उससे दाहिनी तरफ़ मुड़ना है। मैंने गाड़ी उस ओर मोड़ ली।

4 किलोमीटर गाड़ी चल गई, वह ‘थोड़ी दूर’ नहीं आया! गलत राह बताए जाने की संभावना को सोच, झुंझलाते हुए मैंने मारूति वैन वापस मोड़ी और व्यर्थ हो चुके समय को देखते हुए विपरीत दिशा में अधिकतम गति में दौड़ा दी। रास्ते की बेहद खराब हालत को देखते हुए माथा ठनका, लेकिन पिछले 100 किलोमीटर में वही हाल देखता आया था सो मन मार कर बढ़ता रहा। लगभग 15 किलोमीटर बाद नज़र आए मील के पत्थर पर निगाह पड़ी तो चौंका ‘अरे! यह तो कोई नेशनल हाईवे नहीं है!’ बिटिया ने कारण पूछा तो मैंने बताया कि राष्ट्रीय राजमागों में मील के पत्थर का ऊपरी हिस्सा पीले रंग से रंगा जाता है जबकि राज्यों के मार्ग में हरे रंग से।

पाथर्डी में रास्तों की भूलभुल्लैया

घुप्प अंधेरे में एक-दो गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, कोई नहीं रूका। 10 बजने वाले थे। जीपीआरएस तो मुम्बई छोड़ते ही बंद हो चुका था। सुपुत्र महाशय को भिलाई में फोन लगाया गया। क्षेत्र का पूरा खाका समझाना पड़ा, तब जा कर उसने गूगल मैप्स, नोकिया मैप्स से नतीजा निकाला कि हम गलत राह पर हैं! जाना था उत्तर की ओर, आ गए हैं दक्षिण की ओर। मतलब, उस बहकते आदमी ने ठीक ही बताया था।

गाड़ी को फिर वापस मोड़ हम चल दिए उसी ओर, जिधर से जबरन आ गए थे। बाद में पता चला वह ‘थोड़ी दूर’ का फासला था साढ़े पाँच किलोमीटर का!अभी वह कथित चौक नहीं आया था जिससे हमें नान्देड़ के लिए मुड़ना था, तभी हमें दिखा एक ढ़ाबा। शानदार दाल मक्खनी, पालक पनीर, चिकन मसाला, गर्मागरम तन्दूरी रोटियाँ और जीरा फ्राई चावल। अंत में लकड़ी की आग पर बनी, अदरक डली चाय की चुस्कियाँ।

रात के 11 बज चुके थे। कायदे से तो हमें नान्देड़ के पास होना चाहिए था। सुरक्षित समय निकल चुका, रात बिताने का कोई साधन नज़र नहीं आ रहा था, नींद भी कोसों दूर थी। ज़रूरत पड़ने पर किसी आबादी या ढ़ाबे के पास गाड़ी रोक कर रात बिता लेंगे और फिर तड़के निकल चलेंगे, यही सोच हम बढ़ गए पूर्व की ओर। सड़क की हालत और खराब होने लगी।

राह में एक बैरियर मिला, किनारे ही छोटे से बोर्ड पर आड़े-तिरछे शब्दों में लिखा था ‘टोल नाका’। जब 15 रूपए मांगे गए तो मैंने किंचित रोष में पूछा कि यह 15 रूपए किस सड़क के हैं? जो आगे मिलेगी उसके या जिस से हो कर आए हैं उसके? उसने बताया कि जिस सड़क से हो कर आए हैं उसके लिए पैसे देने हैं! ‘आगे सड़क कैसी है?’ ‘बढ़िया है सा’ब’। लेकिन आगे तो उससे भी खराब सड़क मिली। इतनी खराब कि सेकेंड गीयर में 25 से ऊपर की गति नहींले जाई जा रही थी।

आधी रात के बाद आया माजलगाँव। यहाँ जितने गधे दिखे उससे लगा कि हो ना हो यहाँ गधों का कोई सम्मेलन चल रहा होगा। ताऊ की याद हो आई तो मुस्कुराहट भी तैर गई चेहरे पर। कस्बे को पार करते ही फिर मिला गच्चा! सड़क अच्छी दिखी तो गाड़ी दौड़ा दी लेकिन फिर से दिख गया हरे रंग वाला मील का पत्थर। 10 किलोमीटर वापस लौट कर पता चला कि एक छोटे से मोड़ से मुड़ना है नान्देड़ के लिए!

माजलगाँव से हम अभी 40 किलोमीटर आगे बढ़े ही थे कि एकाएक गाड़ी बंद! घुप्प अंधेरा। पास ही कहीं रेलगाड़ी गुजरने की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी। याद आया कि हम अभी किसी मनवाथ कस्बे को पार कर आए हैं। जाँच करने पर पता चला कि गैस खतम हो गई है। गुणा-भाग करने का वह समय नहीं और पेट्रोल भी काफ़ी तादाद में मौज़ूद था। वैन को पेट्रोल से चालू कर हम बढ़े आगे। नान्देड़ अभी भी 120 किलोमीटर दूर था। लेकिन यह क्या? अच्छी सड़क देख कर अभी रफ़्तार में आ भी नहीं पाई थी मारूति वैन कि इंजिन फिर बंद। अब पता चला कि पेट्रोल नहीं आ रहा पाईप में।

सब कुछ देख लिया नतीजा ढ़ाक के तीन पात। अब क्या किया जाए? पास ही एक फैक्टरी थी, सोचा यहीं गाड़ी में रात बिता दी जाए, सुबह देखा जाएगा। उदास मन से आखिरी कोशिश में बस यूँ ही इग्नीशन की चाबी घुमाई और इंजिन गुर्रा उठा। फिर क्या था कूद-फांद कर ड्राईविंग सीट पर बैठा और भाग खड़ा हुआ।अभी तीन किलोमीटर भी नहीं चली गाड़ी और फिर इंजिन बंद। तब तक समझ आ चुका था कि किसी कारण से पाईप में पेट्रोल का बहाव धीमा हो गया है।

अब चारा यही था कि किसी आबादी के पास रूका जाए, सुबह होने पर मैकेनिक से जाँच करवा लें। तब तक यूँ ही रूक रूक कर चला जाए। गाड़ी एक बार फिर चल पड़ी और तीन-चार किलोमीटर बाद फिर रूक गई। मैंने स्टेयरिंग व्हील पर सिर टिकाया और कुछ मिनटों के लिए प्रतीक्षा करने लगा।तभी पीछे से किसी वाहन की हैड-लाईट्स चमकने लगीं। सावधानी के तौर पर पार्किंग लाईट्स जला ही रखीं थीं मैंने। वह वाहन हमारे पास से उड़ता हुआ सा गुजरा ही था कि एकाएक ब्रेक लगते टायरों की चीख सुनी मैंने। सिर उठा कर अभी देखा ही कि पीछे से बिटिया ने भी पुष्टि की ‘पुलिस’!

तब तक उस जीप के ऊपर पीली बत्ती लपलपानी शुरू हो गई थी। बड़ी ही फुर्ती से पिछले गीयर में ही जीप वापस हमारे समांतर आ कर रूकी। तब तक मैंने जेब से अपना परिचय पत्र निकाल लिया, अंदर की लाईट जला ली, स्टेयरिंग पर टिके खाली हाथ कुछ और ऊँचे कर लिए।

14-15 जुलाई की उस अंधेरी रात के दो बजे, जीप से उतरकर आने वालों में सबसे आगे शायद उस दल का मुखिया, कोई अधिकारी लग रहा था। अंग्रेजी के V अक्षर समान उसके पीछे बाकी 5 लोग फैले थे। अधिकारी ने पास आते ही सवाल दागा ‘कौन हैं आप?’ मैंने चुपचाप सीआईएसएफ़ द्वारा जारी अपना आई-कार्ड उसकी ओर बढ़ा दिया। ‘हूँ, तो आप भिलाई स्टील प्लांट से हैं? लेकिन यहाँ क्या कर रहे?’ मैंने बताया कि पेट्रोल रूक-रूक कर आने की वजह से गाड़ी थोड़ी दूर चल कर बंद हो रही, इस बार बंद हुई तो ठहरा हुआ था’ किसी एक ने पूछा ‘अकेले हैं?’ मैंने जब बताया कि बिटिया पीछे बैठी है तो उनमें से तीन लोग तो ‘ओह्ह्ह’ बोलते हुए अपनी एड़ियों पर पीछे की ओरघूम गए।

उन्होने तय किया कि भले ही मारूति वैन रूक रूक कर चले लेकिन वे हमारे पीछे अपनी जीप से निगरानी रख चलते-रूकते हुए 22 किलोमीटर दूर अपनी सीमा में परभनी शहर तक पहुँचा देंगे। हिदायत भी दी गई कि वहाँ से हम नान्देड़ के लिए सुबह ही रवाना हों। मैंने इग्नीशन घुमाया, गीयर बदला और गाड़ी आगे बढ़ा दी। बढ़ा क्या दी दौड़ा दी। अब पीछे पीली बत्ती चमकाती पुलिस आ रही हो तो सामने वाले की रफ़्तार बढ़ ही जाएगी।

वही हुआ। मैंने सड़क की परवाह ना करते हुए अंधाधुंध गति 80 तक कर ली। लेकिन यह क्या? 7-8 किलोमीटर पार हो गए इंजिन बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा! देखते ही देखते 4 किलोमीटर और निकल गए। अब मेरा गला सूखने लगा। अगर गाड़ी नहीं रूकी तो इन पुलिस वालों को खामखाह शक करते देर नहीं लगेगी कि मैंने उनसे झूठ बोला। अब शक का इलाज़ कोई कर सका है क्या? मैंने जानबूझ कर चलती गाड़ी का इग्नीशन बंद कर दिया और गाड़ी को लुढ़कते रहने दिया। रूकते ही पुलिस जीप बाजू में आ कर खड़ी हुई। वे नीचे उतरे तो मैं भी नीचे उतर आया।

सड़क पर ही मेरे साथ टहलते उस अधिकारी ने बताया कि इस राह पर लूटपाट बहुत होती है। खुद ही देखिए हमारे लोग इतना सतर्क हैं कि कोई नज़र नहीं आया होगा रास्ते में। उस शांत वातावरण में कुछ दूर एकाएक हलचल हुई तो पुलिस टीम अपनी पोजीशन लेते दिखी। स्थानीय भाषा में उन पुलिस वालों ने आपस में कुछ बात की। नतीजे के तौर पर हम सब अपनी-अपनी गाड़ियों में आ बैठे। कुछ समय बाद मैंने मारूति स्टार्ट कर आगे बढ़ाई।

परभनी शहर के आते ही हमारे पीछे आती उस पुलिस जीप की रफ़्तार बढ़ी और हमारे समान्तर दौड़ने लगी। मैंने कृतज्ञता व्यक्त करने के अंदाज़ में हाथ हिलाते हुए बढ़ना चाहा तो दिखा कि वह अधिकारी महोदय जीप से पूरी बाँह निकाले मेरा रूमाल लहराते हुए पकड़ा रहे थे। वह रूमाल शायद सड़क पर टहलते हुए गिर गया था। जैसे कारों की दौड़ में रुमाल की रिले रेस हो रही हो वैसे फिल्मी अंदाज़ में रुमाल एक हाथ से दूसरे हाथ में आया और दोनों वाहन Y के आकार में अलग अलग सड़कों पर चल दिए। हाथ लहराते, जोरों से चिल्लाते हुए बस थैंक्यू ही कह पाया मैं, उन अनजान मददगारों को तब।

इस अनोखी रात के बारे में कुछ कहना चाहेंगे नीचे टिप्पणी कर के? आगे पढियेगा इस अनोखी घटना के बाद कैसे किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!

आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
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मेरी वेबसाइट से कुछ और ...

जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया” पर 33 टिप्पणियाँ

  1. वाह! आपने तो फिलिम ही बना दी … वैसे बिटिया के साथ अनजान इलाके में खराब गाड़ी के साथ चलना उचित नहीं था

  2. ……चलना उचित नहीं था ….यद्यपि मै भी अक्सर लंबा सफर रात को ही करता हूँ … कभी कोई समस्या फिलहाल नहीं आई …लेकिन रास्ता भूलने या भटकने का चक्कर रात में बहुत होता है मेरे साथ ..

    आपका अंदाज़े बयाँ बहुत रोचक लगा … मिलते हैं सत्रह नवंबर को 🙂

  3. meri taraf se bhi thank you…bhagwan ko… police wale ke bhesh me aaye honge… original ka to sawaal hi nahi utthata..

  4. @ PADMSINGH

    कभी कोई समस्या फिलहाल नहीं आई

    गनीमत है समस्या नहीं आई कभी, लेकिन आती हैं तो बताकर नहीं आती 🙁

  5. @ PADMSINGH

    मिलते हैं सत्रह नवंबर को 🙂

    बिल्कुल, मुझे भी इंतज़ार है 🙂

  6. @ भारतीय नागरिक – Indian Citizen

    original ka to sawaal hi nahi utthata

    sahii hai jee 😉

  7. अरे, आप कौन से किसी VVIP से कम है ….. पुलिस वालो को तो अपनी ड्यूटी करनी ही थी ! 😉

  8. शीर्षक ने तो डरा ही दिया था।

    प्रणाम

  9. @ शिवम् मिश्रा

    पुलिस वालो को तो अपनी ड्यूटी करनी ही थी

    जो उन्होंने बखूबी की भी

  10. @ Arvind Mishra

    बड़ी सांस रोकाऊ यात्रा है

    मेरे सहकर्मी भी यही कह रहे 🙂

  11. @ अन्तर सोहिल

    शीर्षक ने तो डरा ही दिया था।

    जो बीता, वही तो लिखा है 🙂

  12. काफी जोखिम उठाया आपने ! मुझे तो वे पुलिस वाले भले लगे !

  13. बहुत हिम्मत है आपमे . मै तो नई कार से भी ऎसी यात्रा करने की हिम्मत नही कर सकता .
    पोलीस [ महाराष्ट्र मे ऎसा ही लिखा होता है ] वाले तो सचमुच बहुत भले थे .भगवान उन्हे इस उपकार का बदला जरुर दें

  14. @ ali

    काफी जोखिम उठाया आपने!

    यह तो इंसान की फितरत है अली जी

  15. @ dhiru singh {धीरू सिंह}

    पोलीस वाले तो सचमुच बहुत भले थे .भगवान उन्हे इस उपकार का बदला जरुर दें

    आम धारणा के विपरीत, वे वाकई में भले थे। इसका बदला ज़रूर मिलना चाहिए उन्हें

  16. आप की यात्रा वाली पोस्टें पढ़ते हुए महसूस हो रहा है कि यदि आप किसी 'थ्रिलर उपन्यास' पर हाथ आजमाएं तो वह किताब जरूर हिट होगी।

    बहुत ही रोचक अंदाज में लिखा गया यात्रा विवरण।

  17. अहर्निश यात्रा चलती रहे।
    लेकिन अब जोखिम नहीं लेने का।

  18. @ सतीश पंचम

    किसी 'थ्रिलर उपन्यास' पर हाथ आजमाएं तो वह किताब जरूर हिट होगी।

    अच्छा हुआ उपन्यास पर ही हाथ आजमाने की सलाह मिली वरन हिट क्या पिट भी जाता 🙂

  19. @ ललित शर्मा

    अब जोखिम नहीं लेने का।

    कोई गलती हो गई क्या हुज़ूर!?

  20. पूरी यात्रा की छोटी छोटी बातों के वर्णन से रोचकता कई गुणा बढ़ गयी है.

  21. सतीश पंचम जी से सहमत और साथ ही ऐसा लग रहा है जैसे में भी बगल की सीट पर बैठा हूँ ….

  22. बहुत रिस्क लेते हैं आप…बिटिया को साथ लेकर यह जरा संभाला किजिये. उचित नहीं है.

    हालांकि वृतांत पढ़कर आनन्द आया.

  23. पाबला जी,
    आप भी बड़े जीवट वाले हैं। मुझे भी कुछ लोग क्रैक कहते हैं क्योंकि मैंने कन्याकुमारी से रोहतांग तक की यात्रा अपनी कार में खुद ड्राइव करके तय की है और दो बार जानलेवा ऐक्सीडेंट हुए परंतु साफ सुरक्षित रहा। ईश्वर मेहरबान है और मित्रों की शुभकामना। अभी नागपुर-बंगलौर की यात्रा से वापस आया हूं। आपका वृत्तांत बहुत दिलचस्प और रोमांचक लगा। हिंदी का शिक्षक मैं हूं और इतनी अच्छी हिंदी आप कैसे लिख लेते हैं? मैं आपसे अभिभूत हूं।

  24. सर आप वाकई पाबला हैं ..जहां जाते हैं एक बला पा जाते हैं ..मगर क्या खूब पाते हैं और उसे हमारे लिए ले आते हैं । बहुत खूब सर बहुत ही दिलचस्प । आपका ये यात्रा वृत्तांत अंतर्जाल के लिए किसी धरोहर से कम नहीं है । अगली कडी का इंतज़ार रहेगा

  25. पुलिस वाले अच्छे भी होते हैं और इतनी मदद करते हैं ये जानकर हैरानी और ख़ुशी दोनों का अनुभव हुआ.
    आपकी यात्रा मंगलमय हो और कृपया अपनी बिटिया का खासमखास ख्याल रखियेगा और कोशिश कीजिएगा कि — भविष्य में, आइन्दा ऐसे खतरनाक टूर पर बिटिया को किसी भी कीमत पर ना ले जाया जाए.
    धन्यवाद.
    http://WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  26. बहुत रोचक यात्रा वर्णन है |

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