‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला

अपनी समझ से सारी तैयारी कर भिलाई से, 27 जून को जब हम अपनी मारूति वैन में मुम्बई की ओर रवाना हुए तो मौसम सुहाना ही था। बारिश के आसार पुन: दिख रहे थे। जुड़वां शहर, दुर्ग-भिलाई की सीमा, शिवनाथ नदी छोड़ ही चुके थे कि बिटिया को एकाएक शून्य की ओर ताकते पाया।

एक गहरी सी सांस लेते हुए बातों का सिलसिला प्रारंभ करना चाहा तो जैसे वह नींद से जगी हो। उसका चेहरा मेरी ओर हुआ तो कहीं ऐसा लगा कि उसकी आंखें गीली हैं। आखिर हम उस जगह के पास से गुजर रहे थे, जहाँ डेज़ी को अपने हाथों से उसकी अंतिम यात्रा पर विदा किया था।

3 किलोमीटर बाद ही निर्माणाधीन फोर लेन शुरू हो गई। यह था 6 राज्यों से हो कर गुजरने वाला, कोलकाता-हजीरा राष्ट्रीय राजमार्ग 6। हालांकि राजमार्गों के नम्बर बदल गए हैं किन्तु अभी तक शायद इन्हें लागू नहीं किया गया है। मार्ग हालांकि जान-पहचाना ही था किन्तु निर्माण कार्य के कारण अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही थी।

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»

फिर आया राजनांदगांव। याद आई संवेदनाओं के पंख ब्लॉग वाले डॉ महेश परिमल की, जो हैं तो यहीं के पैतृक निवासी किन्तु आजकल भोपाल में भास्कर समूह से संलग्न हैं। पंजाबी में धाराप्रवाह बात कर सकने वाले महेश जी से उनके स्थानीय प्रवास पर फोन पर बातें तो खूब होती हैं लेकिन रूबरू होने का मौका अब तक नहीं मिल पाया है। राजनांदगांव के बारे में, हमारे क्षेत्र में यह मशहूर है जितना पैसा यहाँ है उतना कहीं नहीं! इसके समर्थन में कई अकाट्य तथ्य भी रखे जाते हैं।

इलाके के सुप्रसिद्ध डोंगरगढ़ मंदिर की ओर जाने वाले स्थल, तुमड़ीबोड़ से कुछ आगे ही बढ़े तो एक गांव का नाम दिखा, कोहका। वही नाम, जिस नाम का एक उपनगर ही है भिलाई में। प्रदेश की सीमा पर चिचोला के पास बिक्री कर बैरियर पार कर हम दाखिल हुए महाराष्ट्र की सीमा में और पहला गांव मिला चिरचिरी। 10 किलोमीटर बाद ही दिखी वह जगह जिसे मेरी निगाहें तलाश रही थीं। वह था गोंदिया जिले में, बाघ नदी पर बना बाघ बैराज़।

राजमार्ग छोड़, सुरम्य पहाड़ियों के बीच लाल मुरूम वाली संकरी सी टेढ़ी मेढ़ी सड़क पर धीरे-धीरे गाड़ी चलाते हुए लगभग 5 किलोमीटर बाद पहुँचना हुआ मुख्य स्थान पर। इस यात्रा में कैमरे के इस्तेमाल का यह पहला ही मौका था, सो जम कर फोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी की गई। लगभग एक घंटा कुदरत के नज़ारों को जी भर देखने के बाद, हम रवाना हुए तो समय था लगभग शाम के 4 बजे का।

अब गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी संभाली बिटिया ने। छोटे-छोटे घाट, खुली सड़कों से होते हुए हम बढ़ रहे थे भंडारा की ओर्। तभी आया एक कस्बा, साकोली। इसी क्षेत्र में है बाघ, तेंदुया, भालू, सांबर, चार सिरों वाले हिरण, नीलगाय, चीतल, भौंकने वाले हिरण, सिवेट बिल्ली, गीदड़, जंगली बिल्ली, जंगली कुत्ते, खरगोश, मोर, जंगली मुर्गी आदि से भरा-पूरा वन्य प्राणी अभ्यारण्य ‘नागज़ीरा‘। यह लगभग 155 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। चूंकि 16 जून से 30 सितंबर के मध्य सभी अभ्यारण्य, आम जनता के लिए बंद कर दिए जाते हैं, सो यहाँ जाने की कोई योजना ही नहीं थी।

तभी बिटिया ने इशारा किया आगे-आगे जाते एक बजाज स्कूटर सवार की ओर्। गहरे लाल रंग का परिधानधारी वह सवार बड़ा सा हेल्मेट लगाए हुए था और लगभग 20 किलोमीटर से हमसे आगे-आगे चल रहा था। बिटिया ने तारीफ़ भरे स्वर में कहा कि हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी उस आंटी की। मैंने सपाट आवाज़ में कहा कि लोग तो पता नहीं कितनी-कितनी दूर से ‘अप-डाऊन’ करते हैं। कुछ समय नज़रों से ओझल रहने के बाद दूर से ही दिखा कि वह स्कूटर खड़ा है किनारे और सवार हेल्मेट सहित उसके पास।

बेटी ने चिंता भरे स्वर में कहा ‘शायद स्कूटर को कुछ हो गया, आंटी को किसी मदद की ज़रुरत तो नहीं?‘ मैंने कंधे उचकाते हुए कहा कि ज़रूरत होगी तो खुद ही रूकवा लेगी वह। फिर भी बिटिया ने गाड़ी धीरे करते हुए उसके पास रोक ही दी। गाड़ी रूकने से रोकने के लिए मैंने ऊंचे स्वर में पूछा कि आपको कोई हेल्प चाहिए क्या? तभी बेटी फुसफुसाई कि ये तो कोई ‘अंकल’ हैं!

तब तक, मोबाईल पर बात करते वह सज्जन चलते हुए पास आए और अपनी बातचीत रोक कर पूछा कि कुछ कह रहे थे क्या? मैंने अपना प्रश्न दोहराया तो उन्होंने झट से मोबाईल पर चल रही बात खतम की और उल्टा मुझसे पूछने लगे कि आप कौन हैं? ज़वाब मिलने पर उन्होंने बताया कि वे बौद्ध भिक्षु हैं और कुछ आगे ही उनका आश्रम है। अपने पीएचडी किए होने की सूचना सी देते हुए हमारी तारीफ़ करने लगे कि आज के जमाने में कौन राह चलते को मदद के लिए पूछता है।

तारीफ़ का सिलसिला लम्बा होते देख मैंने समयाभाव बताते हुए विदा लेनी चाही तो उनका आग्रह आया कि घूमने ही तो निकलें हैं आप, शाम हो रही है आज हमारे आश्रम में रूक जाएं, सुबह निकल लीजिएगा। लगभग जिद ही कर रहे थे। मैंने भरोसा दिलाया कि लौटते हुए आ जायेंगे तो अपना मोबाईल नम्बर नोट करवाया और वादा सा करवा लिया कि आना ज़रूर। लेकिन अफ़सोस, हम जा ही नहीं पाए।

पहाड़ी क्षेत्र छोड़, मैदानी इलाके से गुजरते, भंडारा जिले की अशोक लैलेंड फैक्टरी के बाद गाड़ी मेरे हवाले हुई। भूख लग रही थी। एक ढ़ाबे की ओर गाड़ी मोड़ी। कदम नीचे रखा ही था कि म्यांऊ करती महीन सी आवाज़ आई। नज़रे टिकाईं तो छोटी सी बिल्ली मेरे पैरों के पास! पिछले कई कटु अनुभवों की याद आई मन किया कि एक लात लगाऊँ उसे। बिटिया भांप गई थी तुरंत निर्देश आया ‘मारना मत’। पीठ मोड़ कर मैं चल पड़ा।

मुंह हाथ धो मटर-पनीर की सब्ज़ी, तंदूरी रोटी, जीरा फ़्राई राईस का आनंद, मूँज की खाट पर बैठ कर लिया गया। इस बीच वही या कोई और बिल्ली मंड़राती ही रही आस-पास। लकड़ी की आग पर बनी चाय का घूँट भरते हुए, मोबाईल पर देखने की कोशिश की कि यह है कौन सी जगह? तो पता चला कि जीपीआरएस काम नहीं कर रहा!

वैनगंगा नदी, कन्हान नदी पार करते हम जब नागपुर शहर की सीमा में दाखिल हुए तो अंधेरा गहरा चुका था। कई बार आना हुआ है, सो सड़कें जानी पहचानी सी थीं। भारी ट्रैफ़िक के बीच चलती गाड़ी के सामने ही एक सिपाही प्रकट हुआ। लम्बी सी सीटी के साथ किनारे होने का इशारा मिला। गाड़ी रोकते ही, कहीं पढ़ा हुआ याद आ गया कि ऐसे मौकों पर यदि आप नीचे नहीं उतरे तो ‘अगले’ को हेठी महसूस होती है और ‘बचना’ मुश्किल हो जाता है।

नीचे उतरते ही तीन वर्दीधारियों को सामने पाया। कागजात पूरे पाए जाने पर पूछताछ शुरू हुई। कौन हैं, कहाँ से आए, कहाँ जा रहे, साथ में कौन है आदि आदि। सब जवाब फटाफट मिल गए तो एक एक सामान की तलाशी शुरू हुई। अकेले रह गए सिपाही ने ‘ठीक है’ कहते हुए जाने का इशारा किया तो लगा कि वह कुछ उदास सा है।

नागपुर में रूकने की समस्या हमें कभी नहीं हुई। पिछले कई वर्षों से वहाँ के परिचित, बुज़ुर्ग सिक्ख, सरदार दर्शन सिंह हमें अपने प्रबंधन वाले गुरूद्वारे में सर्वसुविधायुक्त कमरा दिलवा देते हैं। हमें शीश नवाने का मौका भी मिल जाता है और श्रद्धापूर्वक दान देने का भी। तरोताज़ा हो जब हम गुरूद्वारे में मत्था टेकने पहुँचे तो रात के 10 बज चुके थे। लंगर का प्रसाद हमें नसीब नहीं हुआ। शहर की बंद दुकानों वाली सड़कों से गुजरते हुए अपने मनपसंद पराठों की दुकान पहुँचे तो शटर गिरा पाया। आस-पास पूछते हुए हम जा पहुँचे पास ही के एक रेस्टारेंट, जिसका नाम था ‘मोती महल’

अंदर पहुँचे तो कोई भी सीट खाली नहीं! चारों तरफ़ हंगामाखेज माहौल। शायद रविवार होने के कारण! 10 मिनट बाद एक जगह तक पहुँचाया गया। शाकाहारी थाली का ऑर्डर दे, इंतज़ार के पलों में एक से एक नज़ारे दिखे। एक सजी-धजी अधेड़ महिला, भारी-भरकम मेन्यू फोल्डर को लिए, जापानी स्टाईल से अपने चेहरे को हवा देती उफ़-उफ़ कर रही थी। जबकि अंदर का वातावरण बिल्कुल भी गर्म नहीं था। एक खूबसूरत सी कन्या, हाथ में पकड़ी हुई मुर्गे की टाँग के साथ ‘फ्रेंच किस’ का अभ्यास करती दिखी। एक बुज़ुर्ग, अपने भरे-पूरे परिवार को ले कर आए होंगे, लेकिन वे अकेले ही खाए चले जा रहे थे, जबकि खाद्य पदार्थों से भरे टेबल को घेरे पूरा परिवार बिना कोई हलचल किए, सिर झुकाए बैठा था। शायद वह बुज़ुर्ग खाते खाते कुछ बोल भी रहे थे।

एक शिशु को संभाले हुए युवती, संभवत: अपने पति पर बरस रही थी और वह महाशय अनसुना सा करते हुए पूरी तन्मयता से खाने पर पिले हुए थे। पास ही टेबल पर बैठे जोड़े ने भोजन खतम किया और महाशय तुरंत बाहर की ओर लपक लिए। महिला ने बिल चुकाया और इंतज़ार सा करते बैठी रही। इसी बीच, उस टेबल को खाली होते देख इंतज़ार करते युवकों का घेरा तंग होने लग गया। महिला को उठते ना देख आखिर युवकों ने कुर्सियों पर धावा बोला तो वह हड़बड़ा कर उठी और बड़ी मुश्किल से उनके बीच होती हुई निकली।

एक विशेष बात पर, ध्यान भी गया कि सभी टेबलों पर एक समानता ज़रूर थी, वह थी मांसाहार की।

स्वादिष्ट भोजन का आनंद ले, लगभग साढ़े ग्यारह बजे जब हम लौट रहे थे तो यातायात बदस्तूर जारी था। शायद यह हर शहर की आदत हो गई है। रात के समय राह की पहचान न होने के कारण हम रास्ता भटक गए। कोई कहता इधर जाओ, कोई कहता उधर जायो। जीपीआरएस भी काम नहीं कर रहा था। आखिर एक आटोरिक्शा वाले ने सटीक रास्ता सुझाया तो हम पहुँच पाए।

नागपुर के दर्शनीय स्थलों को प्राथमिकता में इसलिए नहीं रखा गया था क्योंकि पहले भी कई बार आना हुआ है और थोड़ा-बहुत तो घूमा जा चुका था। दूसरे दिन दोपहर को रवाना होना था, एक ब्लॉगर साथी से मिलने के बाद, अमरावती होते हुए, अकोला की ओर। उन्हें कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी, क्योंकि हमारे ही कार्यक्रम का कोई समय निश्चित नहीं था।

आपके पास तो समय है ना नीचे टिप्पणी करने का? अगली कड़ी में पढ़िए ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’

‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
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मेरी वेबसाइट से कुछ और ...

जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला” पर 60 टिप्पणियाँ

  1. सिपाही ने 'ठीक है' कहते हुए जाने का इशारा किया तो लगा कि वह कुछ उदास सा है।

    इन्ही भड़भूजों ने हमारे को सुबह सुबह 300 का चंदन लगाया था।:)

  2. मुर्गे की टाँग के साथ 'फ्रेंच किस' का अभ्यास

    हा हा हा-बहुत बढिया जी,
    हमें तो ये मुर्गा मिला ही नहीं।

    आगे की कथा का इंतजार है।

  3. बेचारा सिपाही उसका रुँआसा चेहरा तो हमें भी दिख रहा है।

    वैसे कई जगहें ऐसी रह जाती हैं जहाँ चाहकर भी नहीं जा पाते हैं।

    खाना तो अच्छा ही होगा, मोतीमहल वैसे भी बहुत प्रसिद्ध है। वैसे गणगौर सीताबुल्डी में है वहाँ भी खाना बहुत अच्छा मिलता है।

  4. लीजिए आप शुरू हो गए। हम इंतजार ही कर रहे थे कि कब उंगलियाँ काम करने लगें और हमें उस रोमांचक यात्रा से रूबरू होने का अवसर मिले जिस का अंत बहुत कष्टप्रद रहा था।
    मैं पुरानी शिकायत फिर दोहरा रहा हूँ।आप के यात्रा विवरण की गति बहुत तेज है।

  5. बहुत बढ़िया …….लगा मैं भी साथ साथ चल रहा हूँ !! आगे की कथा का इंतजार है। शुभकामनाएं !

  6. सिपाही ने आपका सामान तलाशने, कागज देखने में इतनी मेहनत की…चाय पानी की तो बनती थी..फिर क्यूँ न बेचारा उदास हो.

    बढ़िया है, जारी रहिये.

  7. आपकी यात्रा का विवरण पढकर ऐसा लगा जैसे मैं आपके साथ…आपकी ही वैन की छत पर बैठ कर सफर करा रहा हूँ….
    अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा

  8. इतना डिटेल में विवरण पढ़ कर मजा आ गया, लगा हम भी साथ में सफ़र कर रहे हैं। पर आप का तो कैमरा जल गया था न फ़िर फ़ोटोस नेट से ली हैं क्या? या कैमरा बचा पाये थे?

  9. mast vivran sir jee.
    to ye mana jaaye ki is Hiway me Aunty aur Uncle me bhed karna mushkil ho jata hai 😉

    soch raha hu ki journalisy hone ke baavjud heading lagaane ki kalaa aapse sikhni hi padegi
    😉 ekdam shandar…..

    baki anita ji wala sawal ekdam prasangik hai…..

  10. रोचक यात्रा विवरण…हम तो आपके साथ ही घूम रहे है…अब आगे?

  11. @ दिनेशराय द्विवेदी

    यात्रा विवरण की गति बहुत तेज इसलिए लग रही कि कैमरे से लिए गए चित्र, वॉयस रिकॉर्डर व टोल टैक्स की रसीदों के आधार पर पोस्ट लिख लेने का आत्मविश्वास था,

    अब वह नष्ट हो चुके:-( सो कई बातें छूट रहीं 🙂

  12. @ anitakumar

    कैमरा जल गया था, लेकिन मोबाईल कैमरा भी तो था 🙂

  13. @ Sanjeet Tripathi

    टाँग खिंचाई अच्छी कर लेते हैं आप 🙂

  14. चलते रहिए सर जी नागपुर कि रात अब बित चुकी आगे चलिए बहुत दुर तक सफर करना है

  15. बहुत देर से यह फैसला नहीं ले पा रहा हूँ कि यात्रा विवरण ज्यादा जोरदार है या फिर फोटोज ….या दोनों बराबर !

  16. सबसे पहले तो यह बताइए… कि अब आप कैसे हैं? यह सवाल तो यहाँ पूछना तो फौर्मैलीटी है…. आप तो मेरे दिल के इतने करीब हैं…. कि किसी भी वक़्त आपसे बात कर सकता हूँ…. आपका यह ट्रावैलोग बहुत अच्छा लगा….

  17. आपने ऊपर जो फ़ोरलेन का फ़ोटो लगाया है वह भारत का ही है? 🙂 🙂

  18. @ Suresh Chiplunkar

    इस बात का बहुत अफ़सोस रहेगा कि ऊपर दिए गए चित्र से भी बेहतर तस्वीरें लेने के बावज़ूद उसे यहाँ प्रस्तुत कर पाना नामुमकिन हो गया। सड़कों के मामले में बदला हुआ भारत इनमें बखूबी झलकता था।

    लेकिन …

  19. शीर्षक पोस्‍ट को पढने की उत्‍सुकता जगाता है .. तथा सडक और थाली के चित्र क्रमश: यात्रा करने का और खाने का लालच बढाते हैं .. पर आपके विवरण से पूरी संतुष्टि मिल रही है.. ऐसा महसूस हो रहा है कि हम भी साथ ही थे !!

  20. पा(बला)जी, तुस्सी क्या बयान करदे हो!! हमरे सामने त बिना भिडियोग्राफी के सिनेमा घूम गया.. रास्ता का एक एक जगह का छोटा बड़ा बिबरन सुनकर लगता है कि इसको कहते हैं जात्रा बृतांत… तुस्सी चालू रखो पाजी!

  21. are nahi prabhu, taang khinchai wali koi baat nahi, shirshak itna dhansu laga hai ki dil khush ho gaya. ekdam shandar

  22. यात्रावृतांत का हम आनंद ले रहे हैं, अगली कडि़यों का इंतजार है।

    रेस्‍टारेंट के अनुभवों को जीवंत करने के लिए धन्‍यवाद.

  23. एक ढाबा हमने भी देखा था उसके आसपास बिल्लियां ही बिल्लियां थी, कहां यह याद नहीं।

    ट्रैफिक सिपाही को उदास होना ही था, कागजात जो पूरे थे।

    रेस्टोरेंट का जो वर्णन आपने किया है, मजा आ गया। जैसे हम वहीं खडे देख रहे हैं।

    प्रणाम

  24. बहुत बढिया चल रहा है जी, टिप्‍पणियों से भी ज्ञान वर्द्धन हो रहा है।

  25. जंगल से होती हुई सड़क को देखकर कनाडा की याद आ गई ।
    बहुत खूबसूरत लगी सड़क भी और थाली भी ।
    लेकिन और भी बढ़िया रहा खाने का वर्णन ।

  26. बहुत रोचक यात्रा संस्मरण, चायपानी का खर्चा तो देना ही चाहिये था.:)

    रामराम.

  27. आपका यात्रावृत्त बहुत अच्छॆ गद्द्य का नमूना पेश कर रहा है। रोचक तो है ही। जारी रहे !

  28. बेहद रोचक प्रस्तुतिकरण…लग रहा है कि कि मानों हम भी आपके साथ सफर का आनन्द ले रहे हैं….

  29. इन बिल्लियो ने ही गुल खिलाया क्या . आगे का इन्तज़ार

  30. इन बिल्लियो ने ही गुल खिलाया क्या . आगे का इन्तज़ार

  31. पता नही आपका जीपीआरएस कैसे काम नही किया । नागपूर की हर गली में यह बडे आराम से घुमता हुआ पाया जाता है ।

  32. वैसे आपके सफर वृतांत से मुझे भी अपने सफरों की याद ताजा हो गई । वैन गंगा नदी का टोलप्लाजा भी वाकई दर्शनीय है ।

  33. @ DABBU MISHRA

    GPRS के काम न करने की भी एक अलग कहानी है, जिसे अगली पोस्ट में पढ़िएगा

  34. वाह , इस मार्ग पर तो मै भंडारा तक पिछले 30 साल से लगातार सफर कर रहा हूँ । भंडारा मे मैट्रिक तक पढा हूँ और माता पिता भी वहीं रहते थे । अब भी मकान वहाँ है और भाई वहाँ रहता है । यह सड़क अब बहुत खूबसूरत बन गई है । नागझीरा के जंगलों मे बचपन से पिकनिक के लिये जाते रहे है और वैनगंगा मे बचपन से डुबकियाँ लगाते रहे हैं । अभी हम लोग परिवार सहित आपकी यह पोस्ट पढ रहे है और आपके सफर का चित्रों के साथ आनन्द ले रहे हैं ।बस……. एक बात समझ नही आई जिक्र आप चिकल की टांग का कर रहे है और फोटो शाकाहारी थाली का है ?

  35. और एक बात ..ऐसे खतरनाक शीर्षक न दे .. अभी परिवार के सामने इसे खोलने मे झिझक रहा था मै ….. हाहाहा…

  36. ऐसे ही एक ढाबे मे हम मित्र लोग भी जाया करते थे भंडारा के पास ,अचानक एक दिन मैने ढाबे वाले से कहा "अरे यार कल तक एक बिल्ली यहाँ घूमा करती थी वह कहाँ गई ?" इससे पहले की ढाबेवाला कुछ कहता बगल की टेबल पर बैठे लोगो ने अपने सामने से मटन की प्लेट हटा दी । हाहाहा……

  37. पाबला जी एक जीवंत और सुन्दर यात्रा सुदर भोजन के साथ .बधाई. .

  38. सुन्दर यात्रा विवरण,आगे का वृतांत की प्रतीक्षा
    रहेगी ।

  39. अकेले रह गए सिपाही ने 'ठीक है' कहते हुए जाने का इशारा किया तो लगा कि वह कुछ उदास सा है।
    आपने बेचारे सिपाही के पेट पर लात मार दी.. अच्छा नहीं किया.. कम से कम एक कागज़ तो छुपा लेते, वह भी खुश हो जाता.. 🙂 😛

  40. आपके जीते जागते यात्रा-विवरण ने अभी अभी मेरी स्वयं की सत्तर-वर्षीय टांगों में फड़कन सी पैदा कर दी है| पढते ही मैं भारत-दर्शन हेतु यात्रा पर निकल चुका होता लेकिन जब रात कहाँ बिताई जाये का प्रश्न सामने आया तो बंधा सामान एक ओर रख आपसे इस बारे पूछने की जिज्ञासा है| हाँ, रात कहाँ बिताई जाये? बहुत से यात्रा-विवरण पढ़े है लेकिन अभी तक लंबी यात्रा में इस महत्वपूर्ण बात को लेकर कोई नहीं लिखता है| आपके इस ब्लाग पर और आपके पाठकों से अनुरोध है कि भावी यात्रियों को अपने अभ्यास द्वारा जागृत करें| तीन दशक के अधिक से मैं संयुक्त राष्ट्र अमरीका में रहते कभी कभी सोचता हूँ कि समय की मर्यादा को न देखते हुए कम से कम एक वर्ष भारत में उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, जहां बन सके, घूमता रहूं| क्या कोई भारत में यात्रियों का ऐसा संगठन है जो सदस्यों को यात्रा संबंधी प्रयोजन से अवगत कराता हो?

  41. बड़ा बढ़िया विवरण है जी। और वो रेस्टोरेंट का लाइव टेलिकास्ट…वाह।

  42. सिपाही फ्रेंच किस की आस लिए था पर केवल टांग निहारता रह गया , आंटी की | और बेचारी आंटी उफ़ उफ़ करती रह गई | कुछ इस तरह की कहानी होनी चाहिए थी | इतना भ्रामक शीर्षक रखेंगे तो आप पर ‘मिसलीड’ करने का मुकदमा ठोंकना पडेगा | हा !हा !मस्त यात्रा वृतांत |

  43. आपका यात्रा वृत्रांत अतंत रोचक तरीके से लिखा गया ,जिसको पढ़ के लगा की की हम यात्रा में आपके साथ ही है ,सजीव लेखन की रोचकता मन्होहक है ,धन्यवाद .

  44. बहुत रोचक विवरण . लौटते हुए बौद्ध आश्रम जरूर जाना चाहिए था आपको.

  45. आपकी कोई सानी नहीं! आंटी, टांग, फ्रेंच किस, ऊफ-ऊफ ने तो बस मार ही डाला था ! आपकी यात्रा गाथा घुमक्कड़ मन में आग भड़का देती है , क्या मेरी अगली यात्रा के प्रायोजक होंगे आप ?

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