खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात

रात के आठ भी नहीं बजे थे। अकोला के राजस्थान भोजनालय में लज़्ज़तदार भोजन का स्वाद लेते हुए, हम पिता-पुत्री में विमर्श होता रहा कि अकोला में रूका जाए या नहीं? अजंता लगभग 155 किलोमीटर दूर था। यदि रवानगी ली जाए, रूकते रूकाते अलसुबह पहुँच कर दोपहर बाद औरंगाबाद निकल पड़ेंगे, जहाँ से हमें शिरड़ी जाना था। मुझे तो कोई कम्प्यूटर के सामने या स्टेयरिंग व्हील के पीछे बिठा दे तो नींद पास भी नहीं फटकती बशर्ते कम्प्यूटर या कार चलते रहें! आखिरकार यह निश्चय हुआ कि रात को ही चला जाए।

अब सवाल आ खडा हुआ कि किस मार्ग से जाना है? अनजान जगह में रात के सफर के लिए किसी से राह पूछने से मैं कतराता हूँ, क्या पता किसके मन में क्या हो? सुपुत्र को फोन किया गया। पूछना यही था कि मैं जो रूट बनाकर आया हूँ उनमें अकोला-अजंता के बीच कौन से शहर पड़ते हैं? गूगल मैप्स के लिए अपना पासवर्ड कैसे बताऊँ उसे!

तभी ख्याल आया कि यात्रा की जानकारी देने वाले लेख पर पर तो डाल ही आया हूँ संभावित मार्ग। उसे वही पोस्ट खोलने को कहा तो शिकायत आई कि खूब बारिश हो रही है, शाम से नेट काफी धीमा है, नक्शा लोड होने में समय लग रहा। कुछ मिनट के बाद बताया गया कि लाल रंग में मार्ग तो दिख रहा लेकिन पृष्ठभूमि में नक्शा नहीं आ रहा।

मैंने दूसरे कम्प्यूटर में नोकिया मैप खुलवाया और इतना ही कहा कि अकोला से अजंता के बीच का मार्ग बता दे। कुछ देर के बाद उसने बोलना शुरू किया ‘अकोला से 50 किलोमीटर खामगांव और फिर 50 किलोमीटर दूर बुलढाना और फिर अजंता … ‘ मैंने उसकी बात वहीं काटी क्योंकि पूरा रूट याद हो आया था, आगे बात करने से कोई फ़ायदा नहीं।

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»

इस तरह हम पिता-पुत्री चल पड़े अजंता की और। कुल दूरी थी 152 किलोमीटर और समुद्र तल से ऊँचाई 278 मीटर्। इरादा यही बना कि जहां नींद आई वहीं किसी आबादी के पास गाड़ी रोक झपकी मार लेंगे। जानकारियाँ देते मार्गदर्शक बोर्ड्स के सहारे, 28 जून के उस दिन की उमस भारी गरमी के बाद रात की बढ़िया ठंडी हवा में गाडी की स्पीड रखी हुई थी 40-50 की। बालापुर पार करते हुए हम एक घंटे में ही पहुँच गए खामगाँव। राह वही था -राष्ट्रीय राजमार्ग 6 और धुलिया की दूरी दिख रही थी 220 किलोमीटर।

भिलाई से 550 किलोमीटर दूर, खामगाँव में प्रवेश करते ही पहुंचे एक ऎसी जगह जहां अंग्रेजी के Y आकार में बंटती सड़क दिखी लेकिन कोई मार्ग सूचक बोर्ड नही, कोई जानकारी नहीं। ठीक सामने ही एक ढ़ाबानुमा जगह दिखी। कुछ दूर गाड़ी खड़ी कर बुलढ़ाना की और जाने वाली सड़क का पता करने के इरादे से अंदर गया तो एक बेहद मोटा सिक्ख युवक चूल्हे पर कुछ पकाते मिला। अभिवादन के बाद मैंने पूछा कि बुलढाना की सड़क कौन सी है वह ऐसा चिंहुका जैसे उसे किसी ने काटा खाया हो ‘बुलढाना!!??’ मैंने उसकी इस हरकत को नज़रअंदाज़ करते हुए सहमति में सिर हिलाया तो उसने कुछ कहा नहीं, बस कड़छुल पकड़े हाथ से ही दिशा बताते हुए इशारा कर दिया।

लगभग साढ़े नौ बज चुके थे। मैं अभी वैन को 50 फुट भी दूर नहीं ले जा पाया था कि एक काली बिल्ली सरपट भागती हुई सडक ऐसे पार कर गई जैसे हमारा ही इंतजार कर रही हो। बिटिया कसमसाई लेकिन किसी प्रतिक्रिया के पहले ही गाडी कहीं की कहीं पहुँच चुकी थी। करीब 15 किलोमीटर बाद रोहाना पार करते ही सिलसिला शुरू हो गया पहाड़ों का।

साफ आसमान की चांदनी और घुप्प अंधेरे को चीरती 150-150 वाट की हैडलाईट्स में कभी तीसरे, कभी दूसरे गीयर के सहारे हम पहाड़ों के ऊपर पहुँचते जा रहे थे। हिरण प्रजाति के समूह, खरगोश, लकड़बग्घे, बंदर आदि सड़क पार करते या किनारे खड़े, हमारी ओर हैरानी से निगाहें किए हुए, दृष्टिगोचर हो रहे थे। तभी एक बिल्ली जैसा प्राणी मद्धिम चाल चलता हुआ सड़क पार करता दिखा। मैंने गति कुछ और धीमी कर ली। अभी उसने सड़क पार भी नहीं की होगी कि पीछे-पीछे एक और उसका सगा-संबंधी उसी की स्टाइल में आता दिखा, फिर तीसरे ने भी अपना नम्बर लगाया। तब तक मैंने मारूति वैन रोक ली थी।

उनकी परेड खतम होते ही हम चल पड़े। हम पिता-पुत्री में बहस छिड़ गई कि यह कौन सा जानवर था? मैंने बिल्ली के होने पर जोर दिया तो बिटिया ने प्रतिवाद किया कि यह बिल्ली हो ही नहीं सकती! उसकी लम्बाई देखी नहीं क्या? जैसे 6 दरवाजों वाली लिमाऊज़ीन चली जा रही हो। उसकी बात में दम तो था। वाकई में कुछ असामान्य लम्बाई तो थी उन प्राणियों में।

समुद्र तल से उँचाई हो चुकी थी 650 मीटर! तभी मेरी निगाह पड़ी इंजिन का तापमान बताने वाले मीटर की सुई पर। सुरक्षित सीमा को पार कर वह इतना ऊपर जा रही थी कि मैं एकाएक तनाव में आ गया। दूसरे गीयर में चल रही वैन को तीसरे गीयर में ला कर कुछ दूर गया होऊँगा कि चढ़ाई देख फिर दूसरा गीयर लगाना पड़ा। अगले ही अवसर में जहाँ थोड़ी सी समतल जगह दिखी मैंने हैडलाईट्स बंद कर, गाड़ी रोक दी।

अभी इग्नीशन बंद भी नहीं कर पाया था कि उबलते पानी की भारी गड़गड़ाहट के साथ सीटों के नीचे से ढ़ेर सारी भाप निकलने लगी। बिटिया दरवाज़ा खोल बाहर निकलने लगी तो मैंने रोका कि इतने बियाबान में बाहर नहीं जाना। वह वापस, ठीक से बैठ भी नहीं पाई थी कि स्तब्ध माहौल में एकाएक तेज सी गुर्राहट आई। बिटिया सहम कर दरवाज़े का काँच ऊपर करने लगी तो न चाहते हुए भी मैं झल्लाया कि काँच ऊपर मत करो, बंद गाड़ी में इस भाप के बीच दम घुट जाएगा।

हम दोनों ने खामोशी अख्तियार कर ली। पूरे वातावरण में गीदड़, मोर, चिड़ियों, बंदरों आदि की आवाज़ें गूँज रही थीं। उस समय रात के लगभग 12 बज रहे थे। एक अनजाने से डर ने घेरना शुरू कर दिया। मैंने इधर-उधर देखा तो पहाड़ों के निचले हिस्से से आ रही इक्का-दुक्का गाड़ियों की हैडलाईट्स से अंदाज़ लगाया कि हम कितने खतरनाक रास्ते से हो कर आए हैं। तभी पास ही एक मिश्रित सा शोर उठा और जैसे किसी ने स्विच बंद कर दिया हो चारों ओर खामोशी छा गई। किसी आशंका से एकाएक गला सूख गया। किशोरावस्था तक जंगलों में घूमा-फिरा हूँ इसलिए जंगल की हरकतों और आवाज़ों का अनुभव भी है।

तभी बिटिया ने कुहनी से टहोका। मैंने उसकी ओर देखा तो उसकी नज़रों का पीछा करते जहाँ निगाह टिकी वहाँ दो जोड़ी आँखें, टॉर्च सरीखी चमकती दिखीं। बिटिया ने मेरी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा तो मैंने चुप रहने का इशारा करते हुए चारों साईड इंडीकेटर चलाने वाला लीवर ऊपर खींच लिया। पार्किंग लाईट्स भी जला लीं। उन आँखों के आकार और हमसे उनकी दूरी के हिसाब से इतना अनुभव तो हो गया कि वह कोई छोटे आकार के प्राणी नहीं हैं।

मैंने आव देखा ना ताव! एक झटके में इग्नीशन ऑन किया और हैडलाईट्स जलाते हुए गाड़ी को भगा ले चला। दो किलोमीटर बाद बिटिया की आवाज़ आई ‘आपने उस पेड़ के नीचे कुछ देखा?’ मैं भुनभुनाया ‘यहाँ जान की पड़ी थी। कहीं देख पाने की फुरसत थी क्या?’ तब उसने बताया कि चलते समय हैडलाईट्स ऑन हुई तो जिस जगह सबसे पहले रोशनी पड़ी, वहाँ पेड़ के नीचे सिन्दूरी रंग में रंगी हनुमान जी की मूर्ति थी। डैशबोर्ड पर निगाह मारी। तारीख बदल चुकी थी -29 जून और दिन था मंगलवार!

बाद में हमें ज्ञात हुआ कि यह इलाका शेर, चीता, भालू, जंगली भैंसे, नीलगाय, सांबर, चीतल जैसे जानवरों से आबाद है।

 

एक बार फिर इंज़िन गर्म होने की सूचना देती, मीटर की सुई आगे बढ़ने लगी। धुलिया की दूरी बताता बोर्ड आया तो ढ़लान शुरू हो गई। गीयर बदलते ही सुई स्थिर सी हो गई और फिर वापस लौटने लगी। धीरे धीरे गाडी चलाते सावधानी से घाट पार कर मैदान आया फिर दिखा बुलढाना शहर। मैने अपने बेटे को सूचना दी बुलढ़ाना पार कर लेने की।

अगला अपडेट, सुबह पाँच बजे देने की बात करते हुए दिखा सुनसान सा एक टोल प्लाज़ा। बाहर ही सड़क पर दो लोग ऊँघते दिखे। 30 रूपए पकड़ाते हुए मैंने सीधे-सीधे अजंता ना पूछते हुए नासिक की दिशा पूछी तो हैरान सा होता हुआ किशोर बोल पड़ा कि नासिक का रास्ता तो पीछे था। जो शायद उसका वरिष्ठ था उसने कंधे उचकाते हुए कहा कि आगे हाईवे है बांए मुड़ जाईएगा। अजंता की गुफ़ायों के बारे में दोनों अनजान दिखे।

 

रात के ढ़ाई बज चुके थे। बिटिया ने नींद आने की बात कह पीछे की सीटों का रूख किया और हम चल पड़े फिर अपनी रफ़्तार में। धुले की दूरी 200 किलोमीटर दिख रही थी और मलकापुर था 27 किलोमीटर दूर। मलकापुर का नाम देखते ही कुछ राहत महसूस हुई क्योंकि याद आ गया था कि यह भी मेरे बनाए रूट में है। समुद्र तल से उँचाई 253 मीटर आ चुकी थी। सरपट भागती गाड़ी ने मलकापुर पार किया। तब तक ख्याल आने लगा कि अजंता के बारे में सूचना देता कोई बोर्ड नहीं दिख रहा! माथा तब ठनका जब बोर्ड दिखा कि जलगांव 70 किलोमीटर और भुसावल 45 किलोमीटर!! अरे, जलगांव तो मेरे रूट में था ही नहीं।

पौने पाँच का समय हुया था। बिटिया सो रही थी। मैंने रात भर जागकर कार्य करते रहने वाले सुपुत्र को फोन लगाया तो उसने चहकते हुए पूछा कि अभी तो पाँच नहीं बजे, कहाँ तक पहुँच गए। मैंने उलझन भरे स्वर में कहा शायद हम रास्ता भटक गए हैं। नक्शा देख कर बताओ कि हम किस जगह पर हैं? उसने जो कुछ बताया उससे तो मैंने अपना माथा ही पकड़ लिया

हम बुलढ़ाना से दक्षिण-पश्चिम की ओर जाने की बजाए उत्तर की ओर आ गए थे और इस समय अकोला से 115 किलोमीटर दूर, भुसावल से 40 किलोमीटर पहले खड़े थे। मन ही मन बीएसएनएल के जीपीआरएस को कोसते हुए मैंने बेटे से पूछा कि अब अजंता मेरी प्राथमिकता में नहीं रहा सो शिरडी का रास्ता बताओ। उसने सलाह दी कि सीधे धुलिया पहुँच जाओ, फिर मालेगाँव होते हुए मनमाड़ और फिर शिरड़ी।

ज़्यादा सोचने से अपने आपको मैंने रोका। आखिर, फायदा कुछ था नहीं। पेट्रोल, गैस का संतोषजनक भंडार था। भोर की पहली किरण फूट रही थी। मैंने एक अँगड़ाई ली, इग्नीशन घुमाया और चल पड़ा भुसावल, जलगाँव होते हुए धुलिया की ओर।

और क्या करता? कोई विकल्प है तो बताएं नीचे टिप्पणी कर के 🙂 हालांकि फिर उसके बाद शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली

खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
4.8 (95%) 4 votes

जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

Powered by Hackadelic Sliding Notes 1.6.5

खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात” पर 44 टिप्पणियाँ

  1. इस तरह अकेले अपनी बच्ची के साथ निकलना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती. वैसे बड़ी रोचक रही यह रोमांचक यात्रा.

  2. यात्रा वृतांत तो रोचक रहा..कई जगह पढ़ते पढ़ते लगा कि हम भी साथ साथ हैं।

    सुब्रमण्यन जी की बात से मैं भी सहमत हूँ कि इस तरह बच्ची के साथ इतने खतरनाक इलाके से होकर और वह भी रात के समय नहीं निकलना चाहिए था।

    अकेले होते या फिर और साथी दोस्त तो बात अलग थी….तब एडवेंचर का मजा लिया जा सकता है लेकिन रात के समय इस तरह के इलाके से होकर गुजरना ठीक नहीं था।

    आगे की पोस्ट का इंतजार है। बहुत रोचक वृतांत रहा।

  3. हम तो जी आपके साथ साथ चल रहे है सो जो भी हो रहा है यही लगता है अभी अभी हो रहा हो ! जलगाँव ससुराल है मामा जी के लड़के की पहले जानकारी होती तो शायद कुछ लाभ होता !

    खैर जलगाँव तो अपन अगली पोस्ट में पहुँच रहे है ……..कोई जरूरत पड़ी तो देख लेगे !

  4. छत्तीसगढ मीडिया क्लब में आपका स्वागत है.

  5. कृपया रात को गाडी चलाने से बचे.

    रात को गाडी चलाना समझदारी की बात नहीं हैं.

    आप चाहे जितने मर्ज़ी अनुभवी और बहादुर क्यों ना हो, रात को गाडी चलाना, सफ़र करना सुरक्षित और अच्छा नहीं हैं.

    आप घूमने फिरने, मौजमस्ती मारने, गए हैं या सुसाइड करने.????

    या तो फ़ौरन ये सारे कार्यक्रम समाप्त करके घर लौट जाइए या फिर दिन में और सुरक्षित माहोल में आगे का सफ़र तय कीजिये.

    (ज्यादा कहने के लिए माफ़ी चाहता हूँ, लेकिन ये सब मैंने आपके और आपके परिवार के हित के लिए ही कहा हैं. सोचिये, अगर जंगली जानवरों की बजाय आदिवासी-खूंखार लोग आपको घेर लेते तो आप क्या करते और आपकी बिटिया को वो कुछ कह या कर देते तो कौन जिम्मेवार होता. पुन: माफ़ी चाहता हूँ.)

    धन्यवाद.

    http://WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  6. आपके यात्रा वृतांत पढने के क्रम में कई बार सांसे ही रूक गयी .. अकेले बिटिया को लेकर रात्रि में इतने भयानक जंगल को पार करना .. खैर अंत भला तो सब भला !!

  7. रात्रि वाहन चालन सुरक्षित नहीं होता

  8. खामगांव बायपास में जहां सड़कY हो जाती है वहां से लेफ़्ट में ही मुड़ने से चिखली होते हुए बुलढाणा पहुंचा जाता है। बुलढाणा से55किलो मीटर पर अजंता है।
    आप राईट साईड का रोड़ पकड़कर मलकापुर निकल गए, इससे 45 किलो मीटर पहले नांदुरा पड़ता है वहां से लेफ़ट में बुलढाणा के लिए सीधी सड़क जाती है जो मोपाळा होते हुए बुलढाणा पहुंचती है, यह दूरी भी लगभग 100 किलो मीटर है। फ़िर वहां से अजंता। रास्ता भूलने पर चक्कर तो काटना पड़ ही जाता है, लेकिन लेडिज साथ हो तो रात को सफ़र करना ठीक नहीं है।
    कुछ रास्ते बिलकुल सुनसान हो जाते हैं। पहाड़ी इलाकों में चीते और तेंदुए का खतरा बढ जाता है।

    चलिए अब सफ़र कर आए हैं तो कोई बात नहीं आगे की यात्रा जारी रहे।

  9. यात्रा वृतांत तो रोचक रहा..सुब्रमण्यन जी की बात से मैं भी सहमत हूँ.

    जरा संभल कर महाराज!!

  10. ऐसा लग रहा है कि हम भी आपके साथ आपकी ही गाड़ी में सफ़र कर रहे हैं, और रास्ता भटक गये हैं, अब क्या होगा… बहुत ही रोमांच आ रहा है..?

  11. मेरे ख्याल से गाड़ी के अंदर आप सुरक्षित थे कांच हवा आने लायक खुले रखकर आप वहां ठहर भी सकते थे !
    वैसे रास्ते की पक्की जानकारी के बिना रात का सफर गलत ही कहा जायेगा !

  12. उड़न तशतरी जी से सहमत हूँ,एडवेन्चर तो करिये रोमांच तो होता है,लेकिन अपने परिवार का भी तो ख्याल रखिये ।

  13. बहुत ही खतरनाक…. लेकिन बहुत ही बहादुरी के साथ सामना किया अपने ऐसी परिस्थिति का.

  14. बुजुर्गों ने समझाईश दे दी है।
    लेकिन मैं आपके और मेरी बहन के साहस के सामने नतमस्तक हूँ।
    सच्चाई ये है कि मैं थोडा भीरू प्रवृति का आदमी हूँ और ऐसी रोमांचक और साहसी कथायें मेरा आत्मविश्वास बढाती हैं।

    आपकी यात्रा में बिल्लियां तो "सत्य की खोज@आत्मग़्यान" वाले बाबा के उपन्यासों के किसी चरित्र की तरह सामने आ रही हैं!!!

    प्रणाम स्वीकार करें

  15. धुआंधार सफ़र -और वृत्तांत भी शफक साफ़ ,कुछ भी धुआं धुंआ नहीं -मेरी छठी हिस बता रही है के घूरती आँखों वाला प्राणी भेड़िया है ! और वे झुण्ड में रहते हैं .

  16. यात्रा वर्णन बहुत रोमांचक रहा, हमारी भी सांसे अटकी हुई थीं, गनिमत है उन चमकती आंखों के पीछे इंसानी भेड़िये नहीं थे। ये जी पी आर एस का चक्कर अपुन को समझाइए जी। लगता है बड़े काम की चीज है।

    हम कल अकेले खपौली गये थे, पतिदेव से रास्ता समझ लिया था, जाते समय तो सीधा निकल गये पुराना बोम्बे पूना हाइवे पकड़ते हुए, वापसी के लिए भी हिदायत ये थी कि सीधी सड़क पर चली आना, कहीं मुड़ना नहीं है। पनवेल के पास पहुंचे तो रोड तीन रास्तों में बंट गयी। हमने सोचा हम को तो सीधा जाना है तो चलते रहे। थोड़ी दूर निकले तो सुनसान रास्ता और आस पास पहाड़ ही पहाड़ दिखने लगे। लगा कि हम किसी गलत रास्ते पर आ गये हैं। रास्ते में एक जगह बोर्ड पढ़ लिया था 'उरण' तो फ़िर रुक कर पतिदेव को फ़ोन लगाया और कहा कि हम रास्ता भटक गये। उनकी तो सांस अटक गयी। वो बैठे थे वरली में, मतलब हमसे कम से कम 90 किमि दूर्।

    खैर जब हमने कहा कि हमने रास्ते में उरण का बोर्ड देखा था तो उनकी जान में जान आयी। उन्हों ने हमें यू टर्न लेने की हिदायत देते हुए कहा कि अब बायें मुड़ जाना।

    शाम को पता चला कि एक दिन पहले वो भी उसी रास्ते पर वही गलती कर चुके थे इसी लिए इतनी सटीक हिदायत दे सके…।:)

  17. From FeedBurner:
    वाह पाबला जी,
    आप ने तो साक्षात यात्रा करा दी .आप की हिम्मत को आप की सूझ बूझ को सलाम.
    आप को आप के नेक इरादे हर बला से बचाते रहेंगे.
    बधाई.

    -Suresh Yadav

  18. बहुत बढिया। इसे कहते हैं एडवेन्चर। बच्चे बडों को देख कर ही सीखते हैं, बनते हैं हिम्मती, साहसी, धैर्यवान।

  19. रात को यूं अनजान रास्तों से बचने में कोई हर्ज़ नहीं.

  20. पाबला साहब बहुत रोमांचकारी यात्रा रही आप की, मजा आ गया पढ कर, मै भी सारी सारी रात काल चलाता था यहां, लेकिन भारत जेसे देश मै नही ओर मै भी सुब्रमण्यन जी की बात से सहमत हूँ,

  21. बहुत रोमांचित करदेने वाला वृत्तांत है …सच है कई जगहों पर मुझे भी डर सा लगा !

  22. रोचक एवं रोमांचक विवरण…पढते-पढते कई बार तो रौंगटे खड़े होने को आए …
    आगे का विवरण जानने की उत्सुकता बनी रहेगी

  23. जोखिम कहाँ नहीं है ?
    जोखिम तो सड़क पर किनारे पैदल चलने में भी है.
    खतरे में तो वो भी हैं जो सीप में बंद घोंघे की मानिंद खुद को महफूज समझते हैं और कहीं नहीं निकलते.


    मैं तो चाहूँगा कि आप बार-बार ऐसी ही एडवेंचर यात्रा पर निकलें. हौसला बाजार में नहीं मिलता जनाब. आपको कुदरत ने दिया है तो उसका एहतराम कीजिये. बस 'तैयारी और जानकारी' का साथ होना बहुत जरूरी है. और हाँ लोग भूल रहे हैं कि शेर की बहन भी शेर-दिल ही होगी.



    आपका रोमांचक यात्रा वृतांत और शैली बहुत पसंद आयी. बिलकुल कर्नल रंजीत के उपन्यास सरीखी.

    बेकरार हूँ आगे की यात्रा जानने के लिए …

  24. Wow!! मजा आ गया.. अंकल जी, आपको तो पता होगा ही कि रात में ही हाइवे का असली मजा होता है.. काश मैं भी आपकी गाडी में होता.. 😀

  25. दूसरा मिला खतरों का खिलाड़ी

  26. टिप्पणी का धन्दा कैसा रहेगा ? ये सब दुनिया भर के रैंकिंग फलां dhikhna टिप्पणी पर तो ही चलाते हैं ।है न ।

  27. आपको तो बिल्ली दर्शन होते रहे .मै तो बिना बिल्ली देखे ही अपनी सफ़ारी चुरवा आया हू नोयडा से . आप से बात करने के बाद ही नोयडा गया था

  28. आप सभी की चिंतायों, सलाहों, हौसलाअफ़जाई का शुक्रिया।

    अगर मुझे इस राह की भयावहता का पूर्व-ज्ञान होता तो बिटिया के साथ रात का सफ़र नहीं करता

  29. सर मुझे लगता है कि एक बार फ़िर से दोबारा इस रोमांचक सफ़र को पूरा पढा जाए , यकीन मानिए जितना रोचक आपका सफ़र रहा है उतनी ही बेहतरीन आपकी पोस्टें और उनका प्रस्तुतिकरण है । मुंह से एक ही शब्द निकल रहा है …बाप रे बाप
    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: व्यक्ति तय करता है पद की गरिमा ….My Profile

  30. बहुत रोचक यात्रा, लेकिन मित्रों की इस बात से मैं भी सहमत हूं कि आपको​ रात में ऐसी यात्रा का खतरा नहीं उठाना चाहिए था। खैर रोज लेख पढने में मजा आ रहा है।

  31. घुमक्कडों ने कब समय जगह की परवाह की है ..फिर भी यात्रा में सावधानी जरुरी है..

  32. इस तरह की जोखिम वाली और खतरनाक यात्रा आप जैसा साहसी व्यक्ति ही कर सकता है; और वह भी रात को. आप के साहस को सलाम है.

इस लेख पर कुछ टिप्पणी करें, प्रतिक्रिया दें

Your email address will not be published. Required fields are marked *


टिप्पणीकर्ता की ताज़ा ब्लॉग पोस्ट दिखाएँ