शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली


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भोर की पहली किरण फूटने के साथ ही मैंने एक अँगड़ाई ली, इग्नीशन घुमाया और चल पड़ा भुसावल, जलगाँव होते हुए धुलिया की ओर। हम रास्ता भटक गए थे. जाना था बुलढाना से दक्षिण-पश्चिम होते हुए अजंता-औरंगाबाद लेकिन आ गए थे उत्तर में भुसावल के पास, जो कि लगभग 40 किलोमीटर की दूरी दर्शा रहा था.

भुसावल का नाम मैंने कुछ ही सन्दर्भों में सुन रखा था पहला यहाँ के केले, दूसरा यहाँ का रेलवे प्रशिक्षण केन्द्र, तीसरा सफ़ेद बैंगन की खेती और यह बात कि एक बहुत पुरानी अंग्रेजी फिल्म भवानी जंक्शन (1956) के स्टेशन का सेट भुसावल स्टेशन जैसा था!

जलगांव नाम भर सुना था। अब यह दोनों ही अनचाहे ही राह में आ गए थे और अंधेरा छंटा नहीं था सो सरपट भागती मारूति वैन इन्हें पार कर गई और धुलिया के पहले तब रूकी जब इंजिन खुद-ब-खुद बंद हो गया।

सुबह की चहल-पहल शुरू हो गई थी। बिटिया पीछे सो ही रही थी। मैंने जाँच की तो पाया कि ‘करंट’ नहीं आ रहा। मोटर मैकेनिकों की भाषा में यह कार्बूरेटर वाली गाड़ी थी। डिस्ट्रीब्यूटर खोल कर देखा तो पाया कि ‘प्वाईंट’ में हलचल ही नहीं हो रही। उपलब्ध औजारों की मदद से उसे कार्य करने लायक बनाकर, फिट कर चाबी घुमाई तो इंजिन के शोर से बिटिया ने आँखें खोलीं।

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»

धुलिया के कुछ पहले ही एक कस्बे से गुजरते हुए मुँह-हाथ धो, पकौड़े-चाय का नाश्ता किया गया। राह के लिए पीने के पानी का इंतज़ाम कर कस्बे से धीरे-धीरे धुलिया की ओर जाते हुए तमाम औद्योगिक इकाईयों की झलक मिली। धुलिया के बारे में बस इतना ही मालूम था कि सुपुत्र गुरूप्रीत यहाँ कुछ अवधि तक यहाँ आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में कार्य कर चुका। वैसे यह पहले राष्ट्रीय राजमार्ग 6 का अंतिम शहर हुआ करता था। आज भी समुद्र तल से 270 मीटर की ऊँचाई वाला यह स्थान, मुम्बई-नासिक-इंदौर-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग 3 तथा कोलकाता-खड़गपुर-नागपुर-हजीरा राष्ट्रीय राजमार्ग 6 का मिलन बिन्दु होने के कारण ट्रक व्यवसायियों का चहेता है।

राह में पड़ने वाले मार्गसूचक बोर्ड बता रहे थे कि मनमाड 85 किलोमीटर, इंदौर 260 किलोंमीटर, मुम्बई 320 किलोमीटर सूरत 230 किलोमीटर दूर हैं। अलबेला खत्री जी उन दिनों मुम्बई-सूरत के बीच किसी धारावाहिक की शूटिंग के लिए आना जाना कर रहे थे। उनसे मुम्बई में मिलने की बात हो चुकी थी। मैंने यूँ ही चुहलबाजी के लिए उन्हें मोबाईल पर सम्पर्क किया कि पूछ लूँ ‘(मुम्बई में) अपनी सूरत दिखायेंगे कि अपना सूरत दिखायेंगे!?’ लेकिन घंटी बजती रही फोन किसी ने उठाया ही नहीं 🙁 आखिर सुबह के साढ़े सात ही तो बजे थे!


मनमाड़ जाते हुए राह में आया मालेगाँव। एक नाम उभरा ज़हन में –प्रज्ञा ठाकुर। अब पता नहीं यह वही मालेगाँव था या कोई और। मनमाड़ तक पहुँचते बज गए थे सुबह के सवा नौ। भूख फिर लग आई थी स्नान किए भी लगभग 24 घंटे होने को आ रहे थे। शिरड़ी जा कर स्नान तो करना ही है यह सोच मुँह-हाथ धो कर एक ढ़ाबेनुमा सजे धजे रेस्टारेंट में बड़े चाव से दाल, आलू-गोभी, मटर-पनीर, तंदूरी रोटी वगैरह मंगाया गया। लेकिन वह सब-कुछ इतना बेस्वाद था कि खाना बीच में छोड़ देना पड़ा।

गैस से टंकी लबालब कर हम निकल पड़े शिरड़ी की ओर जो कि 50 किलोमीटर ही दूर था। भिलाई से सीधे आना हो तो यह दूरी होगी करीब 750 किलोमीटर्। लेकिन हम पहुँचे थे 825 किलोमीटर की यात्रा कर।

धीरे-धीरे सड़क पर ट्रैफ़िक बढ़ते चले जा रहा था। इसके बावज़ूद टोल शुल्क चुका फोर लेन पर भागती गाड़ी ने राज्य राजमार्ग 10 पर, महज 40 मिनट में ही येवोला, इसगाँव, कोपरगाँव पार करते हुए शिरड़ी की सीमा तक पहुँचा दिया। एक आम शहर से दिखने वाली हर इमारत के नाम या बोर्ड पर साईं का शब्द दिख ही जाता था।

भीड़ भरी सड़क पर पता पूछते हम साईं दरबार के सामने पहुँचे तो कुछ युवकों ने घेरना शुरू कर दिया्। हर जना, किसी स्थान की ओर इशारा कर हमें उस ओर ले जाने को बेताब था! आखिर अपनी मर्जी से एक स्थान पर मारुति वैन रोकी तो रटे-रटाए अंदाज़ में उस युवक ने बताना शुरू किया कि स्नान कर, पूजा सामग्री ले कर गेट नम्बर 2 से जाना है, 12 बजे की आरती का समय हो ही रहा है। जल्दी दर्शन-लाभ कर लें।

हम अभी उतर ही पाए थे कि एक पर्ची पकडाते हुए युवक ने कहा ’30 रूपए, आने के बाद दे दीजिएगा’। गाईडनुमा युवक ने हमें जहाँ पहुँचाया वह उस कथित पार्किंग के सामने ही थी। वह स्थान सामने से तो एक जनरल स्टोर ही दिखता था लेकिन उससे लगा हुआ जनाना स्नानगृह आदि तथा पीछे की ओर पुरूषों के लिए स्नानागार था। दोनों में ही एक छोटा सा हॉल भी मौज़ूद, मय आईनों के। गरम पानी, शौचालय की भी व्यवस्था थी। मुझे लगा, कॉलेज के दिनों वाले सार्वजनिक बाथरूम्स हैं। तरोताज़ा हो जब हम जाने लगे तो भुगतान राशि पूछी मैंने। बताया गया ’20 रूपए प्रति व्यक्ति’!

गाईड महाशय हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे। उनके कहे अनुसार एक पूजा सामग्री वाली दुकान पर पहुँचे तो जो कुछ प्रचलन में बता कर दिया गया, उसकी कीमत थी लगभग दो हजार रूपए रूपए। बिटिया ने जब अपनी चाही हुई वस्तुओं को कुल 151 रूपयों में लिया तो फिर उसके बाद वह गाईड महोदय मायूससे हो गये और दुबारा हमारे पास नहीं फटके।

दोपहर 1 बजे के पहले हम पिता-पुत्री पास ही में स्थित द्वार क्रमांक 2 पर पहुँचे तो जूते-चप्पल बाहर ही उतार, महिला-पुरूष की अलग-अलग कतारों में, निजी सुरक्षा गार्ड की औपचारिक जाँच से गुजरते हुए अंदर की ओर प्रस्थान कर ही रहे थे कि बिटिया को कुछ याद आ गया और वह पास ही के मैदान में खडी की गई अपनी गाडी की और लपकी.

जब मैं उसकी प्रतीक्षा कर रहा था तो वहाँ कुछ बच्चे, चढावे के रूप में गुलाब के फूल लिए जाने का आग्रह करने लगे. 10 रूपए में मैंने भी उन गुलाबों का एक गुच्छा ले लिया। गिनती कर दिखा कि वह कुल 5 गुलाब है। दस रूपये में 5 तरोताजा गुलाब! छू कर महसूस किया कि वह वास्तविक ही हैं।

बड़ी उत्सुकता थी, विश्व प्रसिद्ध ‘शिरड़ी वाले सांई बाबा’ के दर्शनों की। बाहरी कतार के बाद जब बड़े से हॉल में निगाहें सांई बाबा की तलाश में भटकीं तो, सिवाय आड़ी, एक-दूसरे से सटी स्टेनलेस स्टील के पाईप से बनी 4-4 फुट चौड़ी रेलिंग में, धीमी गति से बढ़ते बेहिसाब भक्तों के कुछ नज़र नहीं आया। इन तमाम उम्र के भक्तजनों में से कोई भजन गुनगुना रहा था कोई समूह रह-रह कर धार्मिक उद्घोष में व्यस्त था। छोटे बच्चे अपनी बाल-सुलभ कार्यों में लगे हुए थे, उनके पालक अपने-अपने तरीके से उन्हें नियंत्रित कर रहे थे।

मेरे आगे एक युवा जोड़ा धीमी करतल ध्वनि के साथ भक्ति में झूम रहा था जबकि उनकी पुत्री गोद में जाने को लालायित थी। मेरे देखते ही देखते उस युवक ने भक्ति-भाव छोड़ बच्ची को एक चाँटा जड़ दिया और फिर भक्ति में लीन हो गया। बेचारी नन्हीं-मुन्नी बुक्का फाड़ कर रो पड़ी, उसकी माँ ने अपनी श्रद्धा के सामने उसे प्राथमिकता दी तब कहीं जाकर वह शांत हुई।

कुछ किशोर-किशोरियाँ हुडदंग मचाते हुए, रेलिंग फाँद कर कतार में आगे पहुँच जाने के भरसक प्रयास कर रहे थे और सफल भी होते जा रहे थे। मजे की बात यह भी कि हैरान-परेशान होने के बावजूद उन्हें कोई रोक-टोक नहीं रहा था. हो सकता है वह सब भी मुझ जैसों की ऎसी गिनती में आते हों जिन्होंने पहली बार वहाँ प्रवेश किया था. ऐसे मौकों पर मेरी प्राथमिकता रहती है प्रबंधन के लोगों से शिकायत करने की लेकिन वहाँ ऐसा कोई दिखा ही नहीं जिसे इस अव्यवस्था के बारे में बताया जाए

सर्व-धर्म सद्भाव की मिसाल यहाँ बखूबी देखने को मिली. आपसी बातचीत, चेहरे-मोहरे, वेशभूषा से साफ़ झलक रहा था कि देश के कोने-कोने से आए हर तबके के भक्त, शीश नवाने साईँ दरबार में हाजिरी दे रहे हैं। स्थानीय निवासी, खासकर बुजुर्ग, हॉल की दीवारों पर लगे विभिन्न चित्रों व उन पर लिखे श्लोकों, उक्तियों दोहों को बड़ी ही श्रद्धापूर्वक देख पढ़ भावविभोर हुए जा रहे थे।

इंतज़ार करते उस जन-समुदाय के साथ-साथ हम भी धीरे-धीरे कतार में बढ़ रहे थे। दो तरफ से लोहे की जालियों से घिरे उस प्रतीक्षालय में हालांकि पंखे चल रहे थे लेकिन उमस के मारे बुरा हाल था। शायद वहाँ बाहर की ओर हवा निकालने वाले पंखे नहीं थे।

एकाएक नज़र पड़ी उन्हीं रेलिंग्स से सटे हुए एक खान-पान केन्द्र पर्। पानी की बोतलें, चाय, कॉफ़ी, कुरकुरे, मिक्चर, कोल्ड ड्रिंक्स, चिप्स, आईसक्रीम से सजे उन काऊँटर्स पर एक तरह की पोशाक पहने व्यक्ति कीमत की सूची दिखा-दिखा कर सामान बेच रहे थे। पता नहीं क्यों मन खिन्न हो गया। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की याद हो आई।

दो कतारें और भी नहीं बढ़ पाया था कि बेचैनी सी महसूस होने लगी। मन में अजीबोगरीब ख्याल आने लग गए। कहीं आग लग जाए-लगा दी जाए या अफ़वाह के कारण भगदड़ मच गई या जेब-पर्स से कोई साँप-बिच्छू निकाल कर छोड़ दे तो निकलने के लिए कोई सरल रास्ता नहीं! बाद में आपात्कालीन दरवाज़े दिखे, लेकिन जंजीरों-तालों में जकड़े हुए। पसीना आ गया, गला सूख गया।

घबरा कर उन्हीं काऊँटर्स से पानी की बोतल मंगवाई। उन्होंने भी दर्शाई गई कीमत से अधिक ही वसूलाकि चिल्हर नहीं है।दो घूँट लेते ही पानी की गुणवता समझ आ गई। नल का पानी भी शायद बेहतर होता उससे। मेरी ही मन:स्थिति ठीक नहीं होगी, सो बिटिया को अपनी आशंका दूर करने के लिए पानी पीने को कहा। उसने भी वही प्रतिक्रिया दी। बोतल हाथ में पकड़े-पकड़े, उस भीड़ में अभी आगे सरका ही था कि नंगे पैरों के नीचे कुछ टकराया।

निगाहें गईं उस ओर तो दंग रह गया! सारा फर्श चाय-कॉफी के जूठे पेपर कप्स, खाली रैपर्स, पानी की खाली बोतलों, बाहर बिक रही फूल मालाओं, फूलों से भरा पड़ा था। भजन गाते, जयकारा लगाते लोग उन्हें पैरों से कुचलते , हटाते आगे बढ़ रहे थे। उस भीड़ का एक हिस्सा मैं भी हूँ, यह सोच अपने आप को लज्जित महसूस करते हुए मैं और उदास हो गया। अभी तो एक घंटा ही बीता था। लोगों की बातचीत से लग रहा था कि एक घंटा और बाकी है। अपने आपको व्यस्त रखने की कोशिश में कुछ नन्हें-मुन्नों की ओर ध्यान लगा लिया।

दो तरफ लगे बड़े से एलसीडी स्क्रीन्स पर 9 भागों में बंटे क्लोज़्ड सर्किट टेलीविजन के दृश्य देखते देखते हम जा पहुँचे अंतिम छोर की कतार में। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त होते देख राहत की साँस ली। निगाहें दर्शनाभिलाषी थीं आस्था के प्रतीक की। लेकिन अभी कहाँ! अभी तो और आधा घंटा लगेगा -सामने खड़ी महिला ने जानकारी दी।

तब तक किसी विशेष तकनीक से उतपन्न ठंड़ी फुहारों का झोंका रह रह कर उस भारी गर्मी से राह्त देने की कोशिश करने लग चुका था। कतार की गति थम सी गई थी। पता चला कि शुल्क ले कर दर्शन करवाने वाले व्हीआईपी द्वार पर भीड़ बढ़ गई है, उसे हल्का किया जा रहा!

अंत में आया आस्था के प्रतीक ‘साईं बाबा’ की मूर्ति वाला वह कक्ष जहाँ अनियंत्रित भावनाओं वाले भक्तों को संभालने में स्थानीय पुलिस व मंदिर कर्मचारियों/ स्वयंसेवकों को भारी मशक्कत करनी पड़ रही थी। कोई साष्टांग प्रणाम करने गया तो उठ ही नहीं रहा। कोई मुदित आँखों में उस क्षण के रूक जाने की कामना करते खड़ा ही रहे जा रहा। कोई खामोशी से हाथ जोड़े अश्रू बहाए जा रहा। कोई उन्माद के क्षणों में फूट-फूट कर रो रहा। धार्मिक उद्घोषों के बीच कुछ भी स्पष्ट नहीं सुनाई पड़ रहा था। दो किनारों पर ऊँचे स्थान पर खड़े पुजारी की वेशभूषा वाले पुरूष ऊँची आवाजों के सहारे निर्देश दे रहे थे।

बिटिया ने श्रद्धापूर्वक पूजा सामग्री आगे बढ़ाई तो पुजारीनुमा व्यक्ति ने नारियल, समाधि स्थल से छुआ कर वापस कर दिया और बाकी सामग्री सामने ही लगे ढ़ेर में उछाल दी। हम दोनों ने हाथ जोड़ शीश नवाया। इतनी देर में हम वहाँ खड़े स्वयंसेवक के लिए अवाँछित से हो गए। रूखे-कर्कश स्वर में हमें धकियाते हुए जल्दी बाहर निकल जाने का निर्देश मिल गया। एकदम सटे हुए निर्गम द्वार के बाहर ही हमने वह बड़े-बड़े ड्रम देखे जिसमें अंदर लगे पूजा सामग्री के ढ़ेर को बेदर्दी के साथ कचरे के माफ़िक ठूँसा जा रहा था। उन्ही ड्रमों में चारों ओर बिखरी फूल मालायों को अंदर से निकल रहे भक्त अपने पैरों से कुचलते चले जा रहे थे.

मंदिर परिसर में ही अन्य कई दर्शनीय स्थल भी थे। किन्तु इस अब मन नही रह गया था। द्वार क्रमांक 4 से बाहर निकल परिचितों-संबंधियों के लिए दुकान से प्रसाद के पैकेट लिए गए। दोपहर के दो बज चुके थे। सारा कुछ तो गाड़ी में ही पड़ा हुआ था। अपने जूते-चप्पल ले, पार्किंग के 30 रूपए दे, नासिक की ओर जाने के इरादे से मैंने उन भीड़ भरी संकरी हुई गलियों से रूख किया शहर से बाहर जाने वाली सड़क की ओर।

लेकिन विचलित मन में कई सवाल भी उठ रहे थे। आपका क्या हाल है ये तो नीचे टिप्पणी कर बता सकते हैं. इसके बाद नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई

शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
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मेरी वेबसाइट से कुछ और ...

जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली” पर 37 टिप्पणियाँ

  1. मैं एक बार ही गया शिरडी,फ़िर दुबारा नहीं गया।
    व्यावसायिकता की भेंट सभी धर्म-कर्म स्थल चढ चुके हैं। यहां के ट्रस्ट में अकूत सम्पति होने के बाद भी अव्यवस्था होना मन को क्षोभ से भर देता है।

    सांई बाबा सहाय करें।

  2. मेरा भी मन बहुत दुखा था जब वहाँ पर मैंने यह हालत देखी थी, वैसे भी देवस्थानों को व्यवसायिक स्थान बना दिया गया है।

  3. इसी बहाने बाबा के तस्वीर में हमने दर्शन कर लिये.

    दो साल पहले गये थे वहाँ.

    बढ़िया वृतांत.

    अब फेमस देवस्थानों का तो यही हाल है.

  4. भारतवर्ष में जिस सुंदर भावना से तीर्थ करने की परंपरा रखी गयी थी .. वो आज बिल्‍कुल नष्‍ट हो गयी है .. चमत्‍कारों को बढा चढाकर पेश कर धर्मस्‍थलों को प्रसिद्ध बनाने और अधिक से अधिक लाभ प्राप्‍त करने में ही संस्‍था से जुडे लोगों का पूरा ध्‍यान संकेन्‍द्रण होता है .. इतने दूर से आनेवालों के सुख और सुविधा की किसी को भी चिंता नहीं .. इन हालातों को देखकर ऐसा महसूस होता है‍ कि आज भगवान गरीबों के हो ही नहीं सकते !!

  5. lagbhag yahi sawal abhi kuchh din pahle mere mann me bhi uth rahe the jab mai kolkata ki yatra par tha aur vaha kaalibadi mandir aur kaali ghaat ke mandir me darshan karne pahucha tha, halanki is se pahle thik yahi sawal tab bhi mann me aaye the jab saalo pahle kaashi vishwanath ke darshan kiye the……. sab jagah bharat ek hai…..

  6. बाबा है या कुछ ओर मै कभी नही जाता ऎसी बकवास जगह पर…ब्स सीधा भगवान को मानता हुं ओर उस के कहे अनुसार चलने की कोशिश करता हुं, साई बाबा तो एक फ़कीर था जिस के शरीर पर कपडा भी नही होता था ओर जो खुद भुखा सोता था, अपने हिस्से को खाना भी दुसरो को दे देता था, यह आज के बाजी गर क्या जाने

  7. कृपया आप मेरी इन निम्नलिखित बातों को नोट कर लीजिये और अमल में भी अवश्य लाइए =
    1.कभी भी इतनी दूर जाकर निराश, चिडचिडे, क्षोभित, और खिन्न नहीं होना चाहिए. ऐसी यात्रा किस काम की जिसमे आप ख़ुशी-प्रफुल्लित ना महसूस करे. इससे बढ़िया तो आप घर पर थे.
    2.अगर दुर्भाग्य से या किसी कारणों से आप ऐसा कुछ महसूस करते हैं, तो उसे अपने सहयात्रियों के अलावा किसी को मत बताइये. वरना, लोग कहेंगे इतनी दूर जाकर भी एन्जॉय नहीं किया.
    3.अपनी यात्रा को सफल मानिए और ख़ुशी-गर्व महसूस कीजिये क्योंकि हर आदमी साईं बाबा तक नहीं पहुँच सकता. साईं ने बुलाया, साईं का हुक्म हुआ, साईं की कृपा हुयी तभी आप वहाँ जा सके. वरना, कुछ भी ऐसा (छुट्टी रद्द होना, आपातस्थिति आ जाना, एक्सीडेंट होना, तबियत बिगड़ जाना, मंदिर में भगदड़ मचना और दर्शन स्थगित किया जाना, आदि-आदि) हो सकता था. लेकिन, साईं ने ऐसा कुछ भी नहीं होने दिया और आपको अपने पास बुला लिया.
    4.आदि-आदि.
    (कृपया मेरी इस बात का बिलकुल भी बुरा ना माने. मैं आपका दोस्त हूँ, इसलिए आपके फायदे के लिए ही ये सब कहना पडा. मेरी बातें कडवी जरूर हैं. लेकिन अगर आप इन पर ठन्डे दिमाग से विचार करेंगे तो ये बातें ना सिर्फ सत्य बल्कि मीठी भी लगेंगी. कृपया अपने ब्लॉग पर ही मुझे अपना जवाब देने की बजाय मुझे मेरे ब्लॉग पर जवाब दीजिएगा या मुझे CHANDERKSONI@YAHOO.COM पर ईमेल कीजिएगा.)
    धन्यवाद.
    http://WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  8. @ चन्द्र कुमार सोनी

    मैंने आपकी किसी बात का बिलकुल भी बुरा नहीं माना है। निश्चित ही और साथियों की तरह आप मेरे शुभचिंतक हैं। अच्छी बातें कडवी हों, यह कतई आवश्यक नहीं।

    आपके ब्लॉग पर भी अवश्य आऊँगा

    स्नेह बनाए रखिएगा

  9. हर धर्म स्थल का लगभग यही हाल है . व्यवसायिकता हावी है . क्या मतलब है वी आई पी लाईनो का ….. यह दर्शाता है सब एक नही है .

  10. हर धर्म स्थल का लगभग यही हाल है . sahamat

  11. अब धर्म धर्म-स्थलों से बहुत दूर रहता है।

  12. .
    .
    .

    यह मान कर चलना ही गलत है कि 'सर्वशक्तिमान-ईश्वर' या उस जैसा कोई सिद्ध किसी खास इमारत या स्थान पर ही बैठा है… इस इंतजार में कि उस जगह भक्त आये… उपासना करे…शीश नवाये… और फिर मैं उसके दुख हरूँ… अजन्मे-अविनाशी-सर्वव्यापी-विवेकवान-सर्वशक्तिमान ईश्वर की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है यह मान्यता… जब यह माना जाता है कि सारी दुनिया उसकी है… तो वह क्यों कर किसी खास जगह बैठेगा ?

    सभी धर्म स्थलों से धर्म बहुत दूर है… यह सभी स्थल महज कुछ लोगों के खाने-कमाने का जरिया बनकर रह गये हैं… अपवाद कोई नहीं है…

  13. धार्मिक स्‍थलों की हमारे यहाँ ऐसी ही स्थिति है। आपकी यात्रा शुभ रही बस यही अच्‍छी बात है।

  14. हर जगह यही हाल है…सभी पैसा कमाने के स्थल बन गए हैं

  15. मेरा एक मित्र भी अभी शिरडी होकर आया है….कल वो बहुत तारीफ कर रहा था उस मंदिर की…मेरा भी मन हुआ जाने का…पर आपकी पोस्‍ट पढ़कर कुछ और ही तस्‍वीर सामने आई…

  16. सभी धार्मिक स्‍थलों पर अक्‍सर ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है, फिर कई बार मन दुखी भी हो जाता है, आपकी यात्रा शुभ रही, यही बात सबसे बड़ी है ।

  17. बढिया प्रस्तुति
    लगा जैसे मन्दिर में ही पहुंच गया हूँ।
    केवल श्राइन बोर्ड (जो वैष्णों देवी के रख-रखाव संस्था है) का कार्य काबिले तारिफ रहता है। स्वर्णमन्दिर के दर्शन नहीं किये हैं, वहां के बारे में नहीं पता लेकिन भारत के अधिकतर धार्मिक स्थलों,मन्दिरों, मस्जिदों में यही हाल है।

    रोष होता है उन लोगों पर जो भगवान के दर्शन करने जाते हैं और बच्चों पर क्रोधित होते रहते हैं या बच्चों की तरफ ध्यान नहीं देते।

    युवावस्था में बिना कतार में लगे, रेलिंग फांदकर हमने भी कई मन्दिरों में अन्दर जाने में कामयाबी पाई है जी।

    सभी बडे धार्मिक स्थलों पर हर धर्म को मानने वाले लोग मिल ही जाते हैं।

    दलाल, मूल्यों में लूट, नकली और घटिया खाना-पानी आदि तो सब जगह हो गया है।

    इस बार बिल्ली नहीं दिखी जी? 🙂 (Just Joking)

    प्रणाम स्वीकार करें

  18. आज से करीब 20 साल पहले,शिरडी के सांई मन्दिर गया था,उस समय एसी कुव्यवस्था नहीं थी,मेरी माँ अमृतसर की होने के कारण अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर और शीतला मन्दिर भी जा चुका हूँ,उस समय तो बहुत अच्छी व्यवस्था थी,और दिल्ली के बंगला साहब गुरद्वारे में तो जाना होता रहता है,और
    वहाँ सेवा भाव देख कर नतमस्त्क हो जाता हूँ,जबकि दिल्ली के कालका मन्दिर में भी एसी ही अवव्यस्था है,हाँ
    जम्मु के वैष्नो मन्दिर की श्राईन बोर्ड ने तो बहुत ही,अच्छी व्यवस्था कर रक्खी है,गुरद्वारों में सेवा भाव को देख कर नतमस्तक हूँ,इसके अतिरिक्त चर्चों में भी बहुत साफ सफाई रहती है,बाकि पीरो के यहाँ जा चुका हूँ,बस मसजिद ही नहीं गया हूँ ।

  19. वीरजी ! मेरा कमेन्ट कहाँ गया?
    इतनी मेहनत की अपना दिल उड़ेल दिया और मरा कमेन्ट ……..
    खेर गुरुद्वारे,चर्च एकदम साफ़ सुथरे रहते हैं.वहाँ मैंने कभी नाम मात्र की भी गंदगी नही देखि.दरगाह शरीफ भी साफ़ सुथरे पाए गए.ख्वाजा साहब की दरगाह में अपेक्षाकृत सफाई कम मिली.मंदिर कहीं साफ़ सुथरे नही मिले.कुछ को छोड़ कर.
    धर्म स्थलों का व्यावसायिककरण इतना ज्यादा हो गया कि स्थान विशेष से जुडी उसकी 'विशेषताएं' कहीं नही मिली.राम मंदिर में राम का,कृष्ण मंदिर में कृष्ण का,वियोगिनी राधा मंदिर में राधा और मीरा मंदिर में 'उनके' होने का 'अहसास' तक नही
    था.उससे ज्यादा तो उन्हें मैंने 'खुद' के भीतर पाया……
    क्या कहूँ??? क्या लिखूं.अब तो शायद कभी जाऊँ भि नही बाकि बचे धर्म-स्थलों पर,किन्तु मुझ दुष्टिनी को घसीट लाता है वो -'' 'आएगी'कैसे नही.हर बार तू जहाँ बुलाती है मैं आ जाता हूं इस बार तेरा नम्बर.' और …पहुंचना पड जाता है परिस्थितियाँ ही ऐसी बन जाती है.
    हा हा हा
    क्या करूँ
    ऐसिच हूं मैं
    'वो' इतने प्यार से बुलाता है तो नही रोक पाती खुद को.

    • कभी जैन मंदिरो को घूम कर देख लिया करो ,वहा ब्राम्हणवादी व्यवस्था नहीं होती , पर जैन धर्म हिन्दू धर्म से भिन्न नहीं . आदिनाथ तो शिव ही है .सरस्वती इसी नाम से तो गणेश जी पार्श्व यक्ष के नाम से पूजित होते है, शिव का आठवा अवतार भैरव भी रहते है

  20. आपकी ही मनःस्थिति मेरी थी जब मैंने दर्शन किया था .उफ़ बहुत भीड़ ! आपने वहांरियायती कूपन पर मिलने वाला खाना खाया या नहीं ?

  21. सैकड़ों मील की यात्रा कर जब अपने मन में वहां की पवित्रता की आस संजोए जब कोई ऐसी जगह पहुंचता है तो सारी तस्वीर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। लगता है कि अपने घर में ही वह सर्वशक्तिमान कैसे अपने नाम पर होती लूट खसोट को देख कर चुप रहता है। उस धन पिपासू लोगों को ही जब वह काबू में नहीं रख पाता तो……………….
    अभी पिछले दिनों मेंहदीपुर के बालाजी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, दोबारा दसेक साल के अंतताल में, पर अबकी बार के अनुभव ने कोई सुखद याद रखने लायक नहीं छोड़ी।
    रही चंद्रकुमार जी की बात तो इतनी अश्रद्धा देख कर श्रद्धा कैसे कायम रह सकती है कह नहीं सकता।

  22. पाबला जी ,आप की यात्रा के सागर में डुबकी लगाने का पवित्र अवसर मिला आप को बधाई.

  23. .
    बहुत म्हणत और ख़ूबसूरती से लिखी गयी शानदार पोस्ट । भारत भ्रमण करवाने लिए आपका आभार ।
    .

  24. अधिकांश धार्मिक स्थलों पर शिरड़ी जैसा ही माहौल रहता है ।वही पण्डे पुजारियों का हुजूम, वही दुकानदारो का वस्तुओ के लिए मनमाना मूल्य लेना , दूर दूर से आये धार्मिक भवनों से युक्त स्राधालुओ को अव्यवस्थाओ से दो चार होना पड़ता है । इन अव्यवस्थाओ से परचित होने के बाद भी हम जहाँ इनको समाप्त करने सहयोग कर सकते है कोई सहयोग नहीं करते ,अब्यवस्थाये ज्यो की त्यों यथावत बनी रहती है दूसरो के लिए।
    सजीव चित्रण पुनह धन्यवाद ।

    • Weary
      यह सब तो व्यवस्थापकों को देखना चाहिए

      • इस बात में मै आपसे सहमत नहीं हूँ ,हमारा भी तो कुछ कर्तव्य बनता है। ऐसी व्यवस्था में परिवर्तन के लिए व्यवस्थापकों से हम अनुरोध तो कर ही सकते है ।

  25. सभी धार्मिक स्थलों यही हाल है..हमारा अभि तक शिरडी जाना नहीं हुआ परन्तु आपके और कुछ और मित्रों के विवरण से हिम्मत भी नहीं होती.

    • Worry
      श्रद्धा बहुत कुछ करवा लेती है

  26. पाबला जी, धार्मिक स्थलों पर आस्था के साथ पहुंचने के बाद ऐसे हालात देखकर सच में दुख होता है। विडंबना ही कहेंगे कि आस्था के केंद्र भी पैसे कमाने और राजनीति के केंद्र बना दिए गए है। खैर छोडिए, आपकी यात्रा का मजा ले रहे हैं हम तो।

    • Sad
      दुःख तो होता है पर हमारे बस में कुछ नहीं

  27. एक बहुत बुरी खबर है, विदेशी जानते है की भारत मे मंदिरो मे बहुत सा धन चढावा के रूप मे दिया जाता है. गरीब से गरीब अंध भक्ति के चलते चढावा देते रहते है लाखो करोड़ो. इसलिये भारत मे अब विदेशी मंदिर की स्थापना कर रहे है, जैसे इस्कॉन भी विदेश संचालित मदिर है जो बहुत सा धन विदेश भेजता है. चढावा इन्कम्टेक्स फ्री होता है, आस्था से जुड़ा हुआ , इसलिये कमाई का बढिया जरिया है. “अन्धे भारतीयो” की आंख कब खुलेगी पता नही !!!!!!

  28. पत्थरो लकडियो धातुओ की मूर्ति में भगवान नहीं बसते बल्कि वे तो भावो में बसते है – एक धार्मिक ग्रन्थ से . इसलिए मैं किसी धार्मिक स्थल में लूट का शिकार नहीं होता , उपेक्षा करता हम. इलाहबाद में , शिरडी में , पुरी में आदि सभी स्थानो में ठगो दूर ही रहा उपेक्षा करके .बाबाओ के चक्कर में भी नहीं पड़ता अंध भक्तो कि तरह .(पढ़े सत्य की खोज में -रेनिकजैन.ब्लागस्पाट.कॉम में

  29. कुछ ऐसा ही हाल कोलकाता कालीघाट मंदिर का है

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