नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई

शिरड़ी में साईं बाबा के दर्शनों के बाद, विचलित मन में कई सवाल लिए नासिक की ओर जाने के इरादे से जब मैंने शहर से बाहर, मनमाड़ की ओर सड़क का रूख किया तो दोपहर के दो बज चुके थे। करीब छह किलोमीटर बाद ही नासिक के लिए बाईं ओर मुड़ने का निर्देश, बोर्ड पर दिखा।

सड़क खराब थी कुछेक किलोमीटर तक। भूख लगनी शुरू हुई तो राह में एक स्थान पर आलू के परांठे और चाय का आनंद लिया गया। वहीं से नवी मुंबई में बेटों-पोते-पोतियों के साथ निवासरत अपने सगे मामाजी को फोन लगा कर सूचना भी दे दी कि हम आज रात तक पहुँच जाएंगे। इससे पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई थी। विवेक रस्तोगी सहित अनिता कुमार जी को भी हैरत में डाला गया, यह बताकर कि हम अपनी पुरानी मारूति वैन से आ धमके हैं।

अपनी गणना के हिसाब से मैंने मामाजी को बता दिया था कि दो घंटे में नासिक पहुँच कर, रूकते-रूकाते आते हुए चार घंटे और लग जाएँगे। मतलब रात 9 बजे नवी मुम्बई! नासिक से शानदार एक्सप्रेस वे है चिंता की बात नहीं।

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»


राष्ट्रीय राजमार्ग 50 के पहले, सिन्नार तक सड़क की हालत ठीक नहीं मिली। राजमार्ग पर आते ही महसूस हुआ कि गाड़ी कुछ भारी सी चल रही। नीचे उतर कर चारों चक्के देख लिए कि हवा वगैरह ठीक है। फिर भी वैसा ही लगा तो पार्किंग ब्रेक की ओर ध्यान गया। वह भी सामान्य मिली। थोड़ी देर बाद इंजिन का तापमान बढ़ने की सूचना देती मीटर की सुई अपनी गति बढ़ाती दिखी। नासिक अभी 20 किलोमीटर दूर ही था कि एकाएक सब कुछ सामान्य सा हो गया। मेरा माथा ठनका। वैन को रोक नीचे उतरा, सभी चक्कों के रिम को हाथ लगा कर देखा तो पता चला कि पिछले दाहिने ओर का रिम बाकियों के मुकाबले गरम है। ओह! ब्रेक शू का झमेला है।

नासिक की भीड़ भरी, निर्माणाधीन सड़कों, फ्लाईओवर्स, फोरलेन के कारण शहर पार करने में ही हमें एक घंटे का समय लग गया होगा। शायद हम बाय-पास का रूख नहीं कर पाए थे। राष्ट्रीय राजमार्ग 3 पर, मुम्बई की ओर जाते हुए नासिक के बाहरी इलाके में फिर लगा कि ब्रेक शू अपना काम बिगाड़ रहे। किनारे ही एक गैरेज दिखा और हमने उधर अपनी वैन मोड़ ली।

मैकेनिक ने पिछला पहिया खोला, ब्रेक ड्रम निकाला और घोषणा कर दी ब्रेक शू में कोई दिक्कत नहीं है, शायद बेयरिंग टूट गया है। हमने आगे बढ़ने का इशारा किया। बेयरिंग भी साबुत निकाल लिया गया। छुटके मैकेनिक ने बडके मैकेनिक से बात की। बडका अपने बॉस को ले लाया। तीनों की मीटिंग का नतीजा निकला कि बेयरिंग खराब नहीं है! अब?

मीटिंग फिर शुरू हुई कुछ प्रेजेंटेशन दिया गया कुछ पुराने मामलों का हवाला लिया गया, फिर घोषणा की गई कि हो ना हो यह डिफरेंशियल की समस्या है। तब तक दो घंटे बीत चुके थे। अन्धेरा गहरा चुका था। मैंने उनकी योजनायों को वीटो करते हुए ब्रेक शू साफ कर चक्के की फिटिंग का निर्देश दे दिया। साथ ही कह दिया कि ब्रेक भी सेट कर लें, ठोक बजा लें

न जाने क्यों मुझे बार-बार ऐसा लग रहा था कि मैं पहले भी इस जगह को देख चुका हूँ। वही तिरछी सी बनी दुकानों वाली इमारत, वही तिकोना सा चौक, वैसा ही खुला सा मैदान। जहन में बार-बार खलबली होने लगी तो कुर्सी से उठकर थोड़ा टहल आया तो और हैरान हुआ। बिटिया को कई बार मैंने कहा कि यह जगह कुछ जानी-पहचानी सी लगती है. उसने हँसते हुए कहा कि किसी सपने में दिखी होगी यहाँ जगह. सपने में भी दिखी होगी तो इससे आगे का दृश्य क्यों नहीं दिख रहा!?

155 किलोमीटर दूर रह गई नवी मुम्बई के लिए जब तक गाडी सड़क पर फिर फर्राटे से दौडती तब तक साढ़े सात बज चुके थे। एक बार एक्सप्रेस वे पर आने की देर हुई कि 80-90 की गति पकड़ ली हमारी मारूति वैन ने। शानदार हाईवे, दूर दूर तक कोई खिचपिच नहीं, कोई झमेला नहीं। समुद्र तल से ऊँचाई हो चुकी थी 650 मीटर। कभी भी बारिश शुरू हो जाती थी कभी भी बंद। नासिक से 50 किलोमीटर दूर जब ईगतपुरी आया तो मेरे मुँह से एक आह निकल गई।

1981 में मुम्बई से भिलाई लौटती ट्रेन से उस क्षेत्र के पहाड़ों पर जो प्रकृति का रंगबिरंगा नजारा देखा था, उसे फिर से देखने की तमन्ना अब तक दिल में है। अफ़सोस हुया कि दिन के समय यहाँ से क्यों नहीं गुजर रहा। दौड़ती गाडी में बिटिया ऊंघने लगी तो मैंने पीछे जा कर सो जाने को कहा। उसके पिछली सीटों पर जाते ही मैंने गति कम कर ली और खरामा-खरामा कसारा घाट पार कर गया। मामा जी का फोन भी आ गया कि अपडेट बताओ, अंदाज़न पहुँचाने का समय भी उन्हों खुद ही निकाल लिया।

उस चौड़े से हाईवे पर अपनी गाडी को हमेशा बीच की लेन में ही रखने की कोशिश करते हुए किसी गाँव, कसबे से जुडने वाली सडकों के आते ही होर्न बजाना और हैडलाईट्स की रोशनी को उपर नीचे करते हुए गुजरना एक सामान्य सी प्रक्रिया बन चुका था। ऐसे ही एक स्थान पर हॉर्न बजाते, अपर-डिप्पर मारते निकल रहा था। महसूस हुया कि सामने हाईवे जैसा कुछ नहीं दिख रहा। पलकें झपकाईं तो दिखा कि सामने दो संकरी सी सुरंगें हैं। आंखें फोकस करते हुए मस्तिष्क अभी अपनी गणना कर ही रहा था कि पीछे से बिटिया की आवाज आई ‘डैडी!!! सामने …!!!’

आवाज का लहजा जतला गया कि कुछ गडबड है। किसी आशंका की ओर जब मस्तिष्क लपका तो मैं देख पाया कि बाईं ओर की सडक से 40-50 फुट लंबा, गहरे नीले रंग वाला एक कंटेनर ट्रेलर, हाईवे पर आकर 45 डिग्री का कोण बनाते हुए अपने आप को उस हाईवे के लायक बनने की कोशिश में सरक रहा है। दिमाग से सिगनल मिलने पर पैर ने ब्रेक पर अपना जोर लगाया और 80 की रफ्तार से दौडती मारूति वैन, बिना आड़े-तिरछे हुए, चीखती हुई, अड़ियल घोड़े सी रूकी तो टायरों के जलने सी दुर्गन्ध पूरे वातावरण में फैल चुकी थी।

वह विकराल कंटेनर अभी हाईवे की लेन में ठीक से अपने आप को रख भी नहीं पाया था कि 5 सेकेंड तक स्तब्ध बैठे रहने के बाद मैंने गीयर लगाया और उसके करीब से होता हुआ फिर अपनी रवानी में आ गया। उपरोक्त घटनाक्रम के प्रारम्भ होने व समाप्त होने के बीच मात्र 5 सेकेंड का ही समय रहा होगा। हाईवे नज़र न आना इस लिए हुया कि गहरे रंग वाले कंटेनर के कारण दो लेन्स के बीच की सफ़ेद रेखायें दिखनी बंद हो गईं और वह संकरी सुरंगनुमा आकृतियाँ थी उस ट्रेलर के दोनों तरफ के पहियों वाले स्थान। इसके अलावा उसके दोनों ओर किसी भी तरह कोई भी लाईट नहीं थी। बाद में बिटिया ने बताया कि हमारी गाड़ी के पीछे आ रहे 5-6 वाहनों ने भी अगर फुर्ती न दिखाई होती तो वे हमसे आ टकराये होते। गनीमत रही कि उस समय बारिश नहीं हो रही थी, सड़क भी सूखी थी और नासिक में ब्रेक्स की जाँच परख हो चुकी थी।

मैंने अक्सर अपनी चार-पहिया वाहनों की विंड-स्क्रीन से रात के समय आ टकराने वाले कीटों की हालत देखी है। कई बार मुझे मह्सूस होता है कि उस रात हमारी भी वही गत होने वाली थी।

समय हो चला था 10 बजे का। भूख लग रही थी। समुद्र तल से मात्र 25 मीटर ऊपर पड़घा जैसे किसी नाम के कस्बे में एक लम्बे-चौड़े पारिवारिक ढ़ाबे के सामने गाड़ी रोक आराम से भोजन किया गया और फिर सावधानी के तौर पर मैंने एक किनारे में पंखे के नीचे लगी खाट पर आधे घंटे की नींद पूरी कर ली। तब तक बिटिया वहाँ लगे बड़ी स्क्रीन वाले टीवी पर किसी धारावाहिक का मजा लेते रही। भोजन के समय ही ममेरे भाई का फोन आ गया था। मैंने जगह का नाम पूछ कर बताया तब उसने बताया कि 1 तो बज ही जायेंगे पहुँचते-पहुँचते। जीपीआरएस अब तक काम नहीं कर रहा था सो राह की पूछताछ भी कर ली मैंने।

भिवंडी के पास से होते हुए नेशनल हाईवे 3 में लगे चमचमाते, बड़े-बड़े दिशासुचक बोर्ड्स के सहारे जब हम माजीवाड़ा से मुड़ कर राष्ट्रीय राजमार्ग 4 के भीड़ भरे टोल प्लाज़ा पहुँचे तो बूंदाबांदी शुरू हो गई थी जो कि टोल प्लाजा के बाद मूसलाधार बारिश में बदल गई। फिर तो इतनी तेज हुई बारिश कि कई बार कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता था। धीमी गति से सावधानीपूर्वक वैन चलाते हुए हम आ गए 20 किलोमीटर दूर रह गए खारघर जाने वाले रास्ते पर। फिर जैसे किसी चमत्कार सी बारिश भी रूक गई। आगे जा कर तो सारा इलाका ही खुश्क मिला।

पिछले वर्ष इस इलाके की सैर हो चुकी थी इसलिए जल्दी ही उत्सव चौक को पार करते हुए हम पहुँच गए खारघर के सेक्टर 12। मामाजी की तीन मंजिला इमारत का दरवाजा जब खुला तो समय था मध्य रात्रि पौने एक बजे का। समुद्र तल से ऊँचाई रह गई थी केवल 7 मीटर!

हम पहुँच चुके थे मुम्बई, मौत से बचकर। कैसा लगा आपको यह तो बतायें नीचे टिप्पणी कर के. वैसे उसी मुम्बई में, आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई

नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
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जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई” पर 28 टिप्पणियाँ

  1. baavlaa ji desh kaa koi bhi konaa he sbi jgh ki sdken aese hi mot baantne vaali khtrnaak sdken hen. akhtar khan akela kota rajsthan

  2. चलिये रब ने बचा लिया बिटिया के रूप में

  3. गाड़ी चलाते समय कितनी भी सावधानी बरत ली जाये कहीं न कहीं चूक हो ही जाती है, पर जाको राखे …

  4. शिरडी के साईं बाबा का आशीर्वाद आपके साथ बना हुआ था तभी तो आपकी बिटिया पीछे सोने चले जाने के बावजूद हादसे से बचाने के लिए उसी वक़्त जाग उठी जब हादसा होने वाला था. वरना वो पहले या बाद मैं तो जाग सकती थी. उसी वक़्त कैसे जाग उठी????
    (पाबला जी, मैंने आपको पिछले ब्लॉग-पोस्ट में अनास्था या अश्रद्धा जैसी कोई बात नहीं की थी. फिर भी आपके ब्लॉग-पोस्ट पर किसी व्यक्ति मेरे बारे में नास्तिक होने की बात कही हैं. मैंने उलझना उचित नहीं समझा. आप दोबारा मेरी टिपण्णी को पढ़े, समझे, और आप उन्हें समझा देवे.)
    धन्यवाद.
    http://WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  5. mahesh bhaiya ki baat se sehmat hu sir, baaki aapka vivran kai jagaho par hila kar rakh deta hai…..

  6. बहुत मजा आ रह है आप की यात्रा का, जेसे कोई फ़िल्म देख रहे हो धन्यवाद

  7. मानना पड़ेगा आप दुस्साहसी हैं।
    आप ने कहा…
    न जाने क्यों मुझे बार-बार ऐसा लग रहा था कि मैं पहले भी इस जगह को देख चुका हूँ। वही तिरछी सी बनी दुकानों वाली इमारत, वही तिकोना सा चौक, वैसा ही खुला सा मैदान। जहन में बार-बार खलबली होने लगी तो कुर्सी से उठकर थोड़ा टहल आया तो और हैरान हुआ। बिटिया को कई बार मैंने कहा कि यह जगह कुछ जानी-पहचानी सी लगती है. उसने हँसते हुए कहा कि किसी सपने में दिखी होगी यहाँ जगह. सपने में भी दिखी होगी तो इससे आगे का दृश्य क्यों नहीं दिख रहा!?
    इस अहसास को देजा-वू कहते हैं। आप भी शब्द चर्चा समूह में हिस्सेदारी कीजिए वहाँ बहुत से शब्द मिलेंगे।

  8. परमात्मा का शुक्र है,कोई हादसा नहीं,हुआ आप और आपकी बिटिया का बचाव हो गया ।

  9. जब भी सब अच्छा लगने लगता है, वह भयंकर अग्निकांड़ याद आ जाता है।

  10. आपसे हिम्मत लेकर आज कल खुद ही गाडी चला रहे है . आपका यात्रा संसमरण पढ कर खुद ही घुमने की इच्छा हो रही है . वैसे अभी नैनीताल बिना ड्राईवर के होकर आया हूं .

  11. बहुत रोचक और साहसिक यात्रा की आपने, देजा वू लगता है हर किसी को होता है कभी ना कभी. वैसे राजी खुशी सुरक्षित लौट आये ये भी ईश्वर की कृपा रही, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  12. यात्रा का विवरण तो निश्चय ही बहुत अच्छा चल रहा है लेकिन रह रह कर मुझे हाइवे पर अपनी ड्राइविंग याद आ रही है. मैं भी ख़ुद ही ड्राइव करना पसंद करता हूं. हो सकता है कि आपको यह जानकर हंसी आए कि मैं हाइवे ड्राइविंग के दौरान एक मज़बूत रस्सा गाड़ी में ज़रूर रखता हूं 🙂 (यह बात अलग है कि आजतक गाड़ी टो करने के इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी) लेकिन रात को ड्राइव करने से हमेशा बचता हूं. बहुत हुआ तो सुबह 3 बजे से पहले तो नहीं ही निकलता. कोशिय होती है कि दिन छुपने तक ड्राइविंग ख़त्म कर पूरी नींद ली जाए ..कम से कम पांच घंटे.

  13. पाबला जी ,आप ने जिस जीवन्तता के साथ इस साहसिक यात्रा का अनुभव प्रस्तुत किया है वह मन मष्तिष्क से निकल नहीं सकता है .जो लोग इस यात्रा में आप के साथ नहीं थे आप ने उन्हें अपने अनुभव बाँट कर साथी बनाया मैं आप को इस साहस के लिए और संवेदना के लिए बधाई देता हूँ.

  14. हे भगवान! वो ट्रेलर वाली बात पढ़ कर तो कलेजा मुंह को आ गया। कोई दो साल पहले मेरे कॉलेज के भूतपूर्व प्रिंसिपल इंदौर से बम्बई इसी रास्ते से आ रहे थे और बम्बई के ही निकट शाहपुर में ऐसे ही एक ट्रेलर वाली घटना उनके साथ हो गयी। कार सीधी ट्रेलर के नीचे घुस गयी और प्रिंसिपल बिचारे ऊपर उठ गये, हांलाकि बरसों से गाड़ी चला रहे थे। बहुत खतरनाक होते हैं ये ट्रेलर्, अपनी ही धुन में चलते हैं।
    शुक्र है कोई हादसा नही हुआ। आगे से रात को गाड़ी न चलाया कीजिए

  15. पाबला जी,

    यात्रा विवरण रोचक तो है ही कई जगह बातें एकदम जीवंत सी हो उठीं। ट्रेलर वाली घटना तो वाकई दहला देने वाली है।

  16. आपकी यात्रा का वर्णन इतना रोचक है कि कुछ पल के लिए ऐसा लगने लगता है कि आपकी वैन में हम भी सवार हैं। वाकई बहुत मजेदार लिखा है आपने। रोज काम खत्म होने के बाद पहला काम जिंदगी के मेले पर जाने का करता हूं।

  17. जाको रखे साईया मर सके न कोय ,बाल न बाका कर सके जो जग बैरी होय

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