सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना

वह गर्मियों का ही मौसम था जब सड़क मार्ग से भारत भ्रमण की योजना के तहत उत्तर-पश्चिम भारत का विचार आया। सड़क मार्ग से, अपने वाहन द्वारा घूमने का मुझे बहुत शौक रहा है। पहले सायकल, फिर दसियों दुपहिया वाहन, 90 के दशक में सुजुकी की जापान से असली आयाति़त कार और फिर इस मारूति ओमनी वैन से न जाने कितनी जानी अनजानी जगहों का आनंद लिया जा चुका है। लेकिन बच्चों की उच्च शिक्षा के चलते पिछले कई वर्षों से किसी लंबी दूरी वाले मार्ग पर जाना नहीं हो सका था।

इधर बिटिया ने एमबीए की पढ़ाई खत्म की तो फिर तमन्ना जाग उठी घूमने जाने की। बाकायदा सारा खाका भी बना लिया गया और जबलपुर – इलाहाबाद – लखनऊ – नैनीताल – दिल्ली – अमृतसर – जयपुर – अहमदाबाद – सूरत – मुम्बई – पूणे – नागपुर मार्ग के कुछ नाते-रिश्तेदारों, ब्लॉगर साथियों, कुछ मित्रों को संभावित तारीख भी बता दी गई। नियोक्ता, भिलाई इस्पात संयंत्र से अवकाश भी स्वीकृत हो गया। यात्रा प्रारंभ करने दिन निश्चित किया गया शुक्रवार, 18 जून 2010।

मुख्य समस्या थी 10 वर्ष पुरानी हो चली मारूती ओमनी वैन की तंदरूस्ती। स्थानीय यात्रा के लिए तो जोखिम लिया जा सकता था किन्तु इतने लम्बे सफ़र के लिए नहीं। लिहाजा, हमने दौड़ लगाई अपने शहर के शो-रूम्स में। बजट सीमित था और अपेक्षाएँ अधिक, सो पसंद आई हाल ही में अवतरित मारूति इको। बुज़ुर्ग माता-पिता, दोस्तों के साथ अक्सर लम्बी ड्राईव, आम पारिवारिक-सामाजिक कार्य, हम सभी का डील-डौल आदि-आदि ऐसे कारण थे कि मुझे यही गाड़ी बहुपयोगी लगी। किन्तु पता चला कि इसकी माँग अधिक है और उत्पादन कम, सो आज मांगी गई गाड़ी मिलेगी 4 माह बाद! मन मार कर बुकिंग राशि दी और अपनी प्यारी वैन 25 मई को पहुँचा दी वर्कशॉप्। मैकेनिक को बता दिया गया था कि इसे लगभग 10,000 किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ सकता है अगले दो माह के भीतर।

इधर चिंतित संबंधियों, शुभचिंतकों ने हमारे इस दुस्साहस को रोकने के लिए अपने प्रयास शुरू कर दिए थे। सलाहें मिल चुकी थीं कि बरसात के मौसम में दिक्कत होगी, नदी – तालाब -झील – जलप्रपात की प्राकृतिक सुंदरता नहीं मिलेगी, अभ्यारण्यों में प्रवेश नहीं मिलेगा, पहाड़ों पर गाड़ी चलाना मुश्किल होगा आदि आदि। सिवाय हाँ-जी के कुछ बोलना बेमानी था।

आधुनिक तकनीकों से युक्त मोबाईल लेने का एक अच्छा बहाना मिल चुका था मुझे। अरसा पहले अपना एक बहुत मंहगा, प्रिय मोबाईल खो जाने के बाद से खिन्न हो, सामान्य सा मोबाईल हैंडसेट लिए समय गुजार रहा था। सोचा था सैमसंग कोर्बी-प्रो के बारे में। कीमत का अंदाज़ था 13,000 रूपए। 7 जून को दुकान पर पहुँचा तो पता चला कि अब वह 10,000 से भी कम का है! परिचित दुकानदार ने सामने रख दिया नोकिया का E71। देखते ही बिदक गया, क्योंकि नोकिया से मुझे हमेशा ही एक अनजानी सी चिढ़ रही है, शायद शुरूआती किन्हीं मॉड्ल्स की वज़ह से।

सुपुत्र से संपर्क किया गया तो ज़वाब मिला कि एक बार इसे लेकर देखिए पछतावा नहीं होगा, जीपीएस की बदौलत आवाज़ के सहारे मार्ग-निर्देशन की खूबी भी है मोबाईल में, 3जी के साथ-साथ। उसी के अनुसार, कुछ दिन पहले तक यह 16,500 रूपए का था। तारीफ़ों के पुल बांधते सुपुत्र की कॉल को बीच में ही खतम कर कुछ और मॉड्ल्स देखे। फिर बहाना सा मारते हुए E71 के दुसरे रंग का हैंडसेट मांग लिया। झट से एक लड़का दौड़ाया गया स्थानीय नोकिया प्रायोरिटी की ओर और 10 मिनट में ही मनचाहे रंग का हैंडसेट सामने! ले जा कर उसे सीधे सुपुत्र के हवाले कर दिया कि जो कुछ इसमें स्थापित करना है, कल तक कर के वापस दो मुझे।

सड़क मार्ग से की गई इस यात्रा की संक्षिप्त जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें»

Nokia E71

9 जून की अलसुबह मोबाईल अपने कम्प्यूटर टेबल पर मिला। उत्सुकता से देखना चाहा कि क्या कुछ है इसमें? तो पता चला ज़नाब की आंखें ही नहीं खुल रहीं! चार्जिंग पर लगाया, इधर उधर हिलाया डुलाया, नतीज़ा शून्य्। सुपुत्र महोदय सो चुके थे। असमंजस में ही था कि बेटे की एक ई-मेल दिखी जिसमें लिखा था कि ‘सॉफ़्टवेयर अपग्रेड करते समय अचानक ही फोन बंद हो गया और लाख कोशिशों के बाद भी ऑन नहीं हुआ, सॉरी! इसे नोकिया वालों को दिखा दीजिए!’ अयं!! अब यह महाशय नहीं कर पाए तो यहाँ के नोकिया वाले क्या करेंगे!?

तमतमाते हुए, दोपहर को धावा बोला गया स्थानीय नोकिया केयर सेंटर में 🙂 वहाँ मिल गए पुराने परिचित। आधे घंटे की कसरत के बाद उन्होंने घोषित किया कि इसे ‘कम्पनी’ भेजना पड़ेगा, एक सप्ताह बाद वापस मिलेगा। कसमसाते हुए हामी भरी और भुनभुनाते हुए घर आ गए और फिर अपने पुराने मोबाईल में दिल लगा लिया… ओह… सिम लगा लिया।

11 जून को मारूति वाले मैकेनिक ने कॉल किया और अपना काम खतम हो जाने की सूचना दी। टायर बदले जा चुके थे, वायरिंग नई लगा दी गईं थी, रेडिएटर साफ़ हो चुका था, तमाम पाईप, ब्रेक शू, आवश्यक बेयरिंग, प्लग, ऑईल, साईलेंसर, आल्टरनेटर, सन स्क्रीन फिल्म, वाईपर, रबर मैट आदि बदल दिए गए थे, इंजिन ट्यूनिंग हो गई, एलायनमेंट हो गया। आटो एलपीजी किट की जांच-परख हो गई। धुलाई, पॉलिशिंग हो गई। कुछ छुटपुट निर्देश दे अगले दिन ले जाने की बात कह लौट आया।

दूसरे दिन वैन चला कर देखी, संतुष्ट हो ले जाने लगा तो खींसे निपोरते आग्रह आया कि गैस है नहीं, पेट्रोल भी कम होगा, अगले पेट्रोल पम्प पर टैंक का गला तर कर दीजिएगा। पेट्रोल डलवा कर बमुश्किल दो किलोमीटर ही गया होऊँगा कि गाड़ी बंद! दो बार कोशिश की फिर गरजते हुए, मैकेनिक को तड़ित गति से हाजिर होने का फरमान जारी हो गया। हक्के-बक्के से उसके तीन सहायक आ पहुँचे। बिना एक शब्द कहे, चाबी थमा, अपन चल दिए बुलावे पर पहुँचे सेक्टर 4 में ही रहने वाले एक मित्र के साथ, उसके कार्यालय। दो घंटे बाद खबर आई कि फ़्यूल पम्प गड़बड़ था, अब बदल दिया गया है, सब ठीक है।

एक समस्या और आ खड़ी हुई थी, बिटिया की एड़ी दर्द की शिकायत पर एक्सरे हुआ था, जिसकी बिना पर एमआरआई की सिफ़ारिश की गई और तारीख मिली 22 जून की। इधर, गुणा-भाग करते समझ आ रहा था कि इस सफ़र में समय, उम्मीद से कुछ ज़्यादा ही लग जाएगा। कई कार्य भी सामने मुँह बाये खड़े थे।

जद्दोजहद के बाद एक हिस्सा अलग किया गया, महाराष्ट्र का। यह सोच कर परिवर्तन कर लिया गया कि पहले चरण में इसका आनंद लिया जाए, बाकी हिस्से का नवम्बर में नई गाड़ी के साथ। परिवर्तित योजना के बीच, अवकाश की तिथियाँ भी एक सप्ताह आगे बढ़ा दी गईं।

डेज़ी चले गई तो मेरे शरीर का आकार भी बढ़ सा गया था! उसके रहते लगभग फिट ही था मैं!! कुछ अच्छे कपडे छोटे हो गए थे! लिहाजा कुछ नए परिधान लिए गए। बिटिया को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई हो खरीददारी के लिए। कई दिनों तक वह सफ़र के दौरान प्रयुक्त हो सकने वालीं अपनी पसंदीदा वस्तुएँ इकट्ठा करती रही।. लंबी यात्रा के दौरान किसी संकट के समय प्रयुक्त हो सकने के लिहाज से दो डंडे, गाडी खींच कर ले जाने में सहायक रस्सी, अतिरिक्त फैन बेल्ट, हेडलाईट बल्ब, पीने का ठंडा पानी रखने के लिए आधुनिक सी टंकी आदि समय पर याद आ ही गए.

24 जून को मोबाईल वापस मिला। खुशी खुशी शाम को घर वापस आए ही थे कि अजय कुमार झा जी की कॉल आ गई। कई बार कोशिश की किन्तु उनकी शिकायत बनी रही कि आवाज़ नहीं के बराबर आ रही। रात होते होते दिनेशराय द्विवेदी जी, संजीव तिवारी जी और अन्य से सम्पर्क होते समझ में आ गया कि माईक्रोफोन में कुछ गड़बड़ है। 26 जून की दोपहर जाना हो पाया नोकिया केयर सेंटर। बताया गया कि सिम ‘घिस’ गया है इसलिए गड़बड़ हो रही।

शनिवार था, भागे भागे बीएसएनएल ऑफ़िस गए, सिम बदलवा दिया लेकिन फिर वही समस्या। नोकिया वाले फिर उसे ‘कम्पनी’ भिजवाने पर ऊतारू हो गए। मैं भी अड़ गया कि कल, 27 जून को मुझे जाना है और जिस काम के लिए मोबाईल लिया वह काम ही नहीं होगा तो क्या मतलब? बदले में दुसरा कामचलाऊ मोबाईल देने की पेशकश की गई तो यही कहा मैंने कि वह मोबाईल जीपीएस युक्त होना चाहिए। सर हिलाते हुए मुझे E51 थमा दिया गया। घर आया तो बेटे ने देखते ही कह दिया कि इसमें जीपीएस नहीं है!

अब 27 जून की सुबह निकलना भूल नोकिया दरबार में हाजिरी दी कि मुझे वही मोबाईल लौटा दें, आवाज़ नहीं जाएगी तो भी चलेगा, पता तो रहेगा किसने कॉल की है, दूसरे मोबाईल से बात कर लूँगा। ज़वाब मिला कि वह मोबाईल तो रवाना हो चुका है। मन मार कर तसल्ली करते हुए लौट गया कि चलो, जीपीआरएस तो है, गूगल मैप्स से काम चला लेंगे।

BS Pabla Home

ज़रूरी निर्देशों के अनुसार बिटिया तैयार ही थी यात्रा के लिए, लगभग दोपहर 12:30 जब गाड़ी का इंजिन गुर्राया तो पास ही से निकलते मानव ने छींक मार दी, माता जी ने इशारा किया तो एक चम्मच चीनी मुँह में डाल ही आगे बढ़े। अभी दूसरा गीयर लगा ही रहा था कि एक बिल्ली दौड़ते हुए सड़क पार कर गई। मैंने गर्दन को जुम्बिश दे कर हंसते हुए अगला गीयर लगाया और इस तरह हम चल पड़े अपनी पुरानी मारूति वैन में मुम्बई की ओर, जिसमें पहला पड़ाव था नागपुर

कैसी रही तैयारियां? यह तो आप नीचे टिप्पणी कर बताईए और अगली कड़ी में पढ़िए ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला

सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
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जून-जुलाई 2010 में की गई इस यात्रा का संस्मरण 20 भागों में लिखा गया है. जिसकी कड़ियों का क्रम निम्नांकित है.
मनचाही कड़ी पर क्लिक कर उस लेख को पढ़ा जा सकता है

  1. सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना
  2. ‘आंटी’ द्वारा रात बिताने का आग्रह, टाँग का फ्रेंच किस, उदास सिपाही और उफ़-उफ़ करती महिला
  3. ‘पाकिस्तान’ व उत्तरप्रदेश की सैर, सट्टीपिकेट का झमेला, एक बे-सहारा, नालायक, लाचार और कुछ कहने की कोशिश करती ‘वो’
  4. खौफ़नाक आवाजों के बीच, हमने राह भटक कर गुजारी वह भयानक अंधेरी रात
  5. शिरड़ी वाले साईं बाबा के दर से लौटा मैं एक सवाली
  6. नासिक हाईवे पर कीड़े-मकौड़ों सी मौत मरते बचे हम और पहुँचना हुया नवी मुम्बई
  7. आखिर अनिता कुमार जी से मुलाकात हो ही गई
  8. रविवार का दिन और अपने घर में, सफेद घर वाले सतीश पंचम जी से मुलाकात
  9. चूहों ने दिखाई अपनी ताकत भारत बंद के बाद, कच्छे भी दिखे बेहिसाब
  10. सुरेश चिपलूनकर से हंसी ठठ्ठे के साथ कोंकण रेल्वे की अविस्मरणीय यात्रा और रत्नागिरि के आम
  11. बैतूल की गाड़ी, विश्व की पहली स्काई-बस, घर छोड़ आई पंजाबिन युवती और गोवा का समुद्री तट
  12. सुनहरी बीयर, खूबसूरत चेहरे, मोटर साईकिल टैक्सियाँ और गोवा की रंगीनी
  13. लुढ़कती मारूति वैन और ये बदमाशी नहीं चलेगी, कहाँ हो डार्लिंग?
  14. घुघूती बासूती जी से मुलाकात
  15. ‘बिग बॉस’ से आमना-सामना, ममता जी की हड़बड़ाहट, आधी रात की माफ़ी और ‘जादू’गिरी हुई छू-मंतर
  16. नीरज गोस्वामी का सत्यानाश, Kshama की निराशा और शेरे-पंजाब में पैंट खींचती वो दोनों…
  17. आधी रात को पुलिस गश्ती जीप ने पीछा करते हुए दौड़ाया
  18. किसी दूसरे ग्रह की सैर करने से चूके हम!
  19. वर्षों पुरानी तमन्ना पूरी हुई, गुरूद्वारों के शहर नांदेड़ में
  20. धधकती आग में घिरी मारूति वैन से कूद कर जान बचाई हमने

… और फिर अंत में मौत के मुँह से बचकर, फिर हाज़िर हूँ आपके बीच

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सड़क मार्ग से महाराष्ट्र यात्रा की तैयारी, नोकिया पुराण और ‘उसका’ दौड़ कर सड़क पार कर जाना” पर 32 टिप्पणियाँ

  1. शुरुआत में ही इतनी मुश्किलें आ गई ।
    लेकिन छींक और बिल्ली रास्ता काटने पर —अब इसे दुर्घटना से तो नहीं ही जोड़ना कृपया ।
    आखिर सकुशल तो रहे ना ।

    इंतजार रहेगा सफ़र का पूरा वर्णन सुनने का ।

  2. चलिए शरू तो हुआ यह यात्रा पुराण मगर सगुनियो की तो चांदी हो जायेगी !

  3. सबसे पहले तो उसकी नाक पे फ़टा हुआ छित्तर रखना था पकड़ के।
    फ़िर एक दो नजुमियों से सलाह लेनी थी,जो आपने नहीं ली।

    आगे से ध्यान रखिएगा।

  4. नोकिया के नाम से मुझे भी भयंकर चिढ़ हो गई है….सैमसंग के मुरीद हैं आजकल

  5. जो हुआ सो हुआ …………अब तो आगे का सफ़र तय करना है ! हम भी साथ साथ है अब की बार तो ……….! वैसे तैयारियाँ तो धासु थी !

  6. आमतौर पर ऐसे ही चलती है, जिंदगी की गाड़ी. कहा जाता है कि आप कहीं जा रहे हों और बिल्‍ली रास्‍ते में आ जाए तो इसका क्‍या मतलब होता है, सीघा सा जवाब है – 'बिल्‍ली भी कहीं जा रही है'

  7. यह हुई ना बात .. तो अब यायावर जाग गया है और लेखक बन कर यात्रा विवरण लिख रहा है … इसे कहते हैं एक यात्रा का बार बार मज़ा लेना और जो साथ मे नही जा सके उन्हे भी मज़ा दिलवाना ( सही कहें तो इर्ष्या पैदा करना ) तो अब आपकी आगे की यात्रा मे नागपुर गिरेंगा .. क्या भाऊ बरोब्बर बोला ना ?

  8. चुँकि कहानी का अंत त मालूमे है इसलिए अभिए से ड्र लग रहा है..अऊर पाबला जी आपका बर्नन भी एतना लाईव है कि बिना डरे नहीं रहा जाता है… बताइए का कहिएगा ई सब घटना को, प्रिमोनिशन कि हैल्युसिनेशन… ई सब नया नया सीखे हैं, सोचे आपही के टिप्पणि में इस्तेमाल कर लेते हैं. जारी रखिए, पाबला जी, जिंदादिली का दास्तान!!

  9. ji mai to ye soch kar chal raha hu ki ant mujhe nahi maloon, bas ise hi sahi me shuruaat maankar padham jo ki hai bhi,

    shuruaat toi padh liya ki kaise kin kin samasyao se jujhte hue hui….

    ab intejar karrta hu agli kisht ka,…

  10. हमारे हर काम पर बिल्लियां रास्ता काट जाती है हमे खूद छींके आती है…. वगेरा वगेरा…. लेकिन मै कभी नही रुका, ओर आज तक जिंदा हुं. आप को पढना बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद

  11. नोकिया सर्विस सेंटर के अपने अनुभव अच्छे नहीं रहे है। दो बार ऐसा हो चुका कि उन्होंने पार्ट बदलने की सलाह दी लेकिन बिना बदले फोन पहले जैसा काम करने लगा।

  12. आपके सफर की पूरी तैयारी को पढना अच्‍छा लगा .. आगे सफर में भी साथ साथ रहेंगे हम !!

  13. तैयारी तो सही रही..आगे सफर का इन्तजार करते हैं.

  14. धुंआधार तैयारी तो देख ली …अब यात्रावृतांत भी देखें …
    रोचक अंदाज़ …!

  15. यह वही सफर है क्‍या जो दुर्घटना में परिवर्तित हुआ?

  16. आगे का इन्तज़ार . रोअचक सफ़र . वैसे मैने भी सैमसंग के फोन इस्तेमाल करने शुरु कर दिये है . आपको ईको मिली या नही अभी तक

  17. आगे का इन्तज़ार . रोअचक सफ़र . वैसे मैने भी सैमसंग के फोन इस्तेमाल करने शुरु कर दिये है . आपको ईको मिली या नही अभी तक

  18. उस समय यात्रा टालने के इतने बहाने/इशारे होने के बाद भी आपके जज्बे और जिंदादिली को सैल्यूट

    छींक और बिल्ली वाले प्रकरण को हटा कर देखें बहुत सारे इशारे हुये हैं।

    प्रणाम स्वीकार करें

  19. तय्यारी और सफर रोचक है अब आगे का वर्णन सुनने का इंतज़ार है.

  20. अरे ये तो शुरुआत में ही बहुत खटराग दिख रहा था फिर आप चल कैसे दिए ?

  21. नोकिया को शुरू में ही नो क्यों नहीं किया…

    इतनी तैयारी तो अपोलो मिशन ने भी चांद पर जाने से पहले नहीं की होगी…

    वैसे रस्से पर बात याद आई…

    सड़क पर खराब हो गए एक ट्रक को दूसरा ट्रक रस्से से खींच कर ले जा रहे थे…मक्खन की नज़र पड़ गई…ढक्कन से बोला…देख इनका दिमाग़ खराब…एक रस्से को खींचने के लिए दो-दो ट्रक लगा रखे हैं…

    मज़ेदार रहा ट्रेलर…पूरे वृतांत की पिक्चर वाकई टॉपम-टॉप होगी…

    डेज़ी की याद दिलाकर फिर भावुक कर दिया…

    जय हिंद…

  22. इंतजार रहेगा सफ़र का पूरा वर्णन सुनने का.

  23. शुरुआत बेहद रोमांचक है. बिल्ली और छींक का आना इंगित कर रहा है कि यात्रा किस तरह होगी. अगली कडी का इंतजार करते हैं.

    रामराम.

  24. बेस्ट ऑफ़ लक जी.
    आपकी यात्रा मंगलमयी हो, ऐसी मेरी भगवान से प्रार्थना हैं.
    और अंधविश्वास से तो दूर ही रहिएगा.
    धन्यवाद.
    http://WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

  25. सुन्दर संस्मरण पाबला जी। आप के लेखन में तमाम जानकारियाँ भी मिलती है। मैं भी सड़क मार्ग से खूब यात्राएं करता हूँ अपनी मारुती 800 से। लोग ताज्जुब करते है की छोटी कार से पहाड़ जंगल सब कैसे घूम आते हो

    • Smile
      कार तो केवल एक मशीन है, असल बात होती है मानव का साहस

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