सरदारों के 12 क्यों बजते हैं?

पिछले दिनों अनिता कुमार जी की एक फॉर्वर्डेड ई-मेल मिली। जिसमें सिक्खों पर कथित व्यंग्यात्मक वाक्यांशों को ले कर कुछ गंभीर बातें लिखी हुईं थीं।

अंग्रेजी में लिखी गई ई-मेल को मैंने जब पढ़ा तो एकाएक याद आया कि कई वर्षों पहले जब मैं मुम्बई गया था तो दादर बस स्टैंड के पास हैट जैसा सा कुछ लगाए दो युवतियाँ कुछ पर्चे बांट रही थीं।

मुझे देखते ही एक ने बड़ी फुर्ती से कदम मेरी ओर बढ़ाए और मुझे रूकने का इशारा करते हुए पास ही में खड़े कायनेटिक होंडा से पीले रंग में छपे कुछ कागजों का पुलिंदा पकड़ा दिया और कहा कि ‘यह आप के लिए’

sardar 12

मुम्बई जैसी जगह की सैकड़ों कहानियाँ पढ़-सुन चुका था। स्वभाविक था मेरे चेहरे के हाव-भाव बदलना। इतने में दूसरी युवती भी पास आ गई, बड़े शांत स्वर में बोली कि घबड़ाईए मत, इसे पढ़ लीजिए और एक कागज मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने एक मिनट से भी कम समय में उसे पढ़ डाला। चेहरे पर मुस्कान आ गई। तुरंत पूछ भी डाला कि आपमें से विनिता कौन है? जवाब आया ‘कोई नहीं’!

मैंने प्रश्न दागा ‘फिर यह सब क्यों?’ जवाब आया ‘अच्छे काम भी करने चाहिए ना कभी कभी’ । मेरे पास सिवाय धन्यवाद कहने के कोई चारा नहीं था। उस पुलिंदे को लिए वापस भिलाई आया। कुछ अपने दोस्तों को बांट दिए, कुछ को गुरुद्वारे में दे आया।

अनिता जी की ई-मेल के बाद याद आया कि उस पुलिंदे के दो-चार कागज कहीं पड़े हैं। बहुत तलाशा पर वे नहीं मिले। विश्वकर्मा पूजा के पहले ऑफिस में साफ-सफाई का दौर चला तो अचानक एक जगह लिपटे मिल गए वह कागज। आज ड्यूटी से आते ही स्कैन कर यह पोस्ट लिख डाली।

आप भी ऊपर दिए गए उस पर्चे को क्लिक कर पढ़ सकते हैं कि सरदारों, सिक्खों के 12 क्यों बजते हैं?

यह भी बताईएगा कि यह सब कहीं मजाक तो नहीं!

सरदारों के 12 क्यों बजते हैं?
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सरदारों के 12 क्यों बजते हैं?” पर 50 टिप्पणियाँ

  1. अजी अपने तो बचपन से ही बारह बजते रहे हैं।

  2. चेहरे पर बारह बजना यह हिन्दी का एक मुहावरा है । मतलब बिना भाव का या भय से युक्त होना लेकिन सरदार का बारह बजना शायद इससे ताल्लुक नही रखता क्योंकि सिख और डर ? नामुमकिन । हमारे देश मे हर ऐसी बात कहीं न कहीं से जन्म लेती है । कुछ कहानियाँ गढ़ी भी जाती हैं । हर कौम के लिये ऐसी कहानियाँ हैं । विदेशों में भी ऐसा है । अंग्रेज स्कोटलैंड अमेरिकी सबके किस्से मशहूर हैं । अब तो सब मजे लेकर एक दूसरे के किस्से सुनते सुनाते हैं । लेकिन आपकी यह खोज लाजवाब है । कथाकार गुलबीर सिन्ह भाटिया जी भी कुछ ऐसा ही किस्सा बता रहे थे उनसे और पूछूंगा । लेकिन आपका पीला पर्चा यानि येलो पेज बड़े काम का है हमारे गुरुओ के समाज के प्रति दायित्वबोध का इससे पता चलता है । यह हमारे इतिहास मे भी दिया है लेकिन लोग इतिहास पढ़ते कहाँ है , मै जबरदस्ती अपने ब्लॉग पर पढ़वा रहा हूँ । खैर् इस पर्चे के पीछे की स्टोरी भी बढ़िया है । पढ़कर मज़ा आया ।

  3. शीर्षक पढ कर मैं थोडा चौंक गया..मुझे नहीं पता था कि आप इस बात को इस अंदाज़ में रखेंगे….पर्चे के दास्तान ने बहुत सी बातें सामने रख दी हैं..मुझे लगता है कि जो भी इस बात को मजाक में लेते हैं….अब शायद इस पर नये सिरे से कुछ सोच सकें…वैसे अब ये बहुत कम हो गया है ..अब सुनने में नहीं आता जल्दी …

  4. हम भी इसे लोगों द्वारा मजाक में बोलना ही समझते थे | आपने इस वाक्य के पीछे रहस्य को उजागर बहुत बढ़िया जानकारी दी |
    अब हम भी एसा मजाक करने वाले पर ठीक उसी तरह मुस्करायेंगे जैसे रेलवे स्टेशन पर खडा सिख युवक मुस्कराया था |

  5. सिंह हमेशा सहज स्वभाव वाले और जिंदादिल इंसान होते है…दुनिया को खुशियां बांटने के साथ अगर किसी की मदद करनी होती है तो भी सिंह सबसे पहले आगे आते हैं…कुछ लोग इसी भलमनसाहत का फायदा उठाकर व्यंग्य के नाम पर भद्दे कटाक्ष करते हैं, ऐसा करके वो अपना ही बौनापन दिखाते है…पाबलाजी आपने जो पेपर कटिंग दिखाई, इसका ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार होना चाहिए…ताकि फिर कोई पूछने कि हिम्मत ना करे…सिंह 12 बजे सबको क्लोरोमिंट क्यों खिलाते हैं…

  6. हिन्दू धर्म को क्लैव्यता से उबारने का स्तुत्य कम किया सिख ब्रिगेड ने -मेरा मस्तक बारह बजे झुकता है उन्हें सम्मान देने को ! लोग बाग़ चुहलबाजी भी करते हैं मगर अपना ही जान कर !

  7. सिखों की हिम्मत और जज़्बे के बारे में मैँ पहले भी किसी फॉरवर्डिड मेल में पढ चुका हूँ लेकिन इस बात को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिए।इस काम को पाबला जी ने बखूबी अन्जाम दिया है…

  8. भाईजी,
    बड़ा अच्छा लगा आपकी पोस्ट पढ़ कर………..
    इसी मसले में मुझे कुछ याद आ गया……..
    इसका भी आनन्द लो……….

    भोपाल के प्रख्यात कवि सरदार दिलजीत सिंह रील की एक कविता

    "12 बजे का समय "

    सबसे बड़ी सुई घंटे वाली
    हिन्दू है
    उससे छोटी मिनट वाली
    सिख है
    उससे छोटी सेकेण्ड वाली
    मुसलमान है

    और 12 बजे का समय
    इन तीनों का जो
    मिलन बिन्दु है
    वह मिलन बिन्दु राष्ट्रीय एकता का तीर्थ स्थान है
    और जहाँ तक भी
    दुनिया में 12 बजते हैं
    वहाँ तक मेरा हिन्दुस्तान है

    _____अलबेला खत्री

  9. Pabla Sahab,
    aaj aapne bahut hi accha jankaari di hai.
    ek abhimaan karne waali baat ko vyangatmak roop se na maloom kab se prayog mein laya jaaraha hai aur yah sikkhon ki shansheelta hai ki hans kar ise jhel jaate hain.
    samast hindi blog jagat ko iska prachar karna chahiye saath hi atmsaat bhi karna chahiye..
    hriday se abhaari hun aapki..
    dhanyawaad..

  10. बहुत खूब पाबला साहब. मस्त पोस्ट. ये तो बारह बजने का फंडा ही बदल दिया आप ने.

  11. बिल्कुल वैज्ञानिक पोस्ट !!

    चलो हमें भी पता चल गया कि १२ बजे क्यों सरदारों का दिमाग फ़िर जाता है 🙂

    वैसे एक हमारे परम मित्र सरदार ही हैं और सरदारों पर ही चुटकुले सुनाते हैं।

  12. बहुत सुन्दर पाबला साहब, और आपने यह एकदम सही किया की पूरा "दर्पण" ही छाप डाला ! उम्मीद करता हूँ की यह दर्पण लोगो का भरम दूर करेगा !लेकिन मैं समझता हूँ कि सरदारों पर जो भी जोक्स इत्यादि कहे जाते है वह इंसान के अन्दर की नफरत नहीं अपितु उनके प्रति प्यार है, और आप विस्वास करे ना करे, कुछ हद तक सत्यता पर आधारित भी है ! एक काफी पुरानी सच्ची बात बताता हूँ ! २६ जनवरी के दिन स्कूली बच्चो की प्रभात फेरी निकल रही थी, स्कूल के ३-४ गुरूजी लोग उस फेरी का नियंत्रण कर रहे थे ! बच्चे इस देश के आजादी के महापुरुषों की जय-जयकार कर रहे थे, कि तभी उस समय की मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित का नाम किसी बच्चे ने बीच में उछाल दिया, तो सब बच्चे बोले "जय", यह सुन साथ चल रहे सरदार गुरूजी गुस्से में बोल पड़े " ओये तेरी भैण की… सारी बच्चे बोले, "जय" 🙂 और फिर वह एक जोक बन गया !

  13. इतिहास के साथ खिलवाड़ होता आया है वे लोग वास्तव में बधाई के पात्र हैं जो तथ्यों की विवेचना करते हैं

  14. 12 बचने के पीछे कि ये बात पहले भी किसी ने सुनाई थी लेकिन, उसमें बात दिन के बारह बचे से जोड़कर बताई गई थी।

  15. पाबला जी, तुस्सी ते साडियाँ अक्खां वी खोल दित्तीयाँ नें…….सानू ते हुण पता चलिया कि जे एक गल्ल है ताँ फेर ते कदे कदे ताँ साढे वी बाराँ बज जाउन्दे नें:)

  16. सिक्खों के आचार-विचार के तो हम भी कायल हैं लेकिन यह तो बहुत अच्छी बात पता चली,

    यह जुमला जाटों के लिए भी अक्सर प्रयोग किया जाता है लिहाजा हम भी इससे पीड़ित हो चुके हैं!

  17. मेरी जानकारी की पुष्टि की है आपने. धन्यवाद.
    घुघूती बासूती

  18. वाकई इसे एक जोक के रूप में ही लिया जाता रहा है लेकिन ऐसी जानकारी तो पहली बार ही मिली।

    यह आपने सही किया जो इसे यहां प्रस्तुत कर दिया।

  19. .
    .
    .
    पाबला जी,
    धन्यवाद, आज एक और नई जानकारी दी है आपने…

  20. इस बात पर तो बहुत पर रोशनी डाल चुका हूं मैं भी। हरी सिंह नलूए जैसे बहादुर सैनापतियों ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए थे। ऐसी ही टिप्पणी मैंने समयचक्र पर भी दी थी। उसके बाद उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। पता नहीं वो बात उनको बुरी लगी, या फिर मैंने अभी तक कोई अच्छी पोस्ट नहीं लिखी।

  21. पाबला साहब, सत श्री अकाल. जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है, सरदार सरदार ही होता है.
    निडर, निश्चल, मनमौजी, किसी की भी सहायता करने को तत्पर. इतिहास की बात जो आपने बताई उससे तो पता चलता है कि सरदार शत्रुओं के बारह बजाते थे, और आज भी बजा रहे हैं.
    चुटकुले सरदारों पर ही नहीं, पठानों, मारवाड़ियों, सिंधियों, गुजरातियों, दक्षिण भारतीयों आदि-आदि पर बने है. इन्हें अन्यथा नहीं लेना चाहिये. वैसे तो अच्छे-बुरे हर कौम हर जाति में होते हैं.
    हम सभी सरदारों का, उनकी वीरता का अभिवादन करते हैं.
    विजयप्रकाश

  22. पाबला जी आपकी यह पोस्‍ट पढ़कर सचमुच अच्‍छा लगा। सबसे अधिक धन्‍यवाद तो विनीता जी को देना चाहिए। मेरा ख्‍याल है कि किसी कौम विशेष के खिलाफ मजाक बनाए जाने को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।

    आपकी इस पोस्‍ट से याद आया कि हम भी बचपन में किसी सरदार को देखकर एक जुमला बोलते थे 'शीशी भरी गुलाब की शीशा चटक गया सरदार जी की पगड़ी में चूहा लटक गया'
    हालांकि एक बार एक सरदार जी मेरे घर तक चले आए थे। बड़ी मुश्किल से जान बचाई थी उनसे। बहरहाल क्‍या इस तरह के जुमलों के पीछे की भी कोई कहानी है क्‍या।

    शरद भाई बताएं कि ऐसी ही खोजों से इतिहास लिखा जाता है।

  23. खुशदीप और खत्री जी की टिप्पणी के हम भी कायल्।
    हम तो खुद आधे सरदार्…तो अब क्या कहें…चलो छ: ही बजे समझ लिजीए

  24. आपने बहुत ही अच्‍छी जानकारी दी, इस तरह की घटनायें अक्‍सर कई लोगों के जीवन में घटित होती हैं पर विनीता जी ने एक साहसिक पहल की और आपने हमे अवसर दिया उसे पढ़ने का बहुत-बहुत आभार ।

  25. अरे ….पाबला जी …ये तो मुझे भी नहीं पता था …..

  26. सरदारों पर जितने भी चुटकुले बने हैं अक्सर उन्हें मैं किसी सरदार से सूना हूँ उन पर हंसते हुए.. मुझे तो यही लगता है की सरदार बहुत खुशमिजाज होते हैं, तभी तो खुद पर हसना जानते हैं..

    चुटकुलों में यह बात हमेशा दिखाया जाता है की सरदार बहुत बेवकूफ होता है, मगर मेरा मानना है की सरदार खुद अगर बेवकूफ होते तो उनका डंका आज सरे संसार में नहीं बजता होता..

    और रही बात इस ऐतिहासिक तथ्य की तो मुझे यह पहले से ज्ञात था.. 🙂

  27. यह तो बहुत महत्वपूर्ण पोस्ट है जी। धन्यवाद।

  28. पंजाबीयों के बीच रहने के कारण इस बात की जानकारी मुझे है लेकिन मजा तब आता था जब मेरी क्लास के ही सिक्ख लडके एक दूसरे को बारह बजने की चेतावनी देते थे…यह कहते हुए कि माईअवे तेरे वारा वज गए ने के…उनमें ही एक बलबीर नाम का लडका था जो पटका बांध कर आता था, पग् बांधने को जब भी कहो तो कहता था … सुखिया नहीं….कांजी ना लगी…. कम लगिया सी ऐस करके कांजी वास्ते दित्ती ऐ….यह बहुत बाद में पता चला कि असल में उसे पग् बांधने नहीं आती थी….कुछ दिन बाद उसे हमारे गुरप्रीत सर ने पकड कर सबके सामने पग् बांधना सिखाया था 🙂

    बचपन की बातें अब जाकर याद करता हूं तो दिल खुश हो जाता है।

    12 बजने को लेकर अच्छी चर्चा हुई है।

  29. पंजाबियत से बाहर कम ही लोग जानते हैं कि सरदार (leader)/ सिक्ख (preached)का मतलब क्या है.

    हमारे परिवार में भी परंपरा रही कि सबसे बड़ा बेटा सिक्ख होता था जबकि बाक़ी हिंदू. मेरे दादा जी इस परंपरा के अंतिम सिक्ख थे. उसके बाद यह परंपरा अब समाप्त हो गई. इसीलिए हमारे यहां सिक्ख या हिंदू में कोई अंतर नहीं देखा जाता.

    80 के दशक में, पंजाब में जो कुछ हुआ वह दुखदायी तो लगता ही था हास्यास्पद भी लगता था. जिस धर्म का मूलमंत्र ही हिंदू धर्म की रक्षा रहा हो वही धर्मावलंबी हिंदू विरोधी कैसे हो सकते हैं. जिसके धर्मग्रंथ में ही सभी धर्माचार्यों की वाणी हो उसके अनुयायी किसी अन्य धर्म के विरोधी कैसे हो सकते हैं…मुझे आज तक समझ नहीं आया…

  30. एक बार बारह बजने का मतलब खोजते खोजते हम भी इस तथ्य तक पहुंचे थे.
    काजल जी की बात शायद हमारे घर में ही होती थी बस थोडा मायने बदल गए थे
    बड़ा बेटा होने के चलते हमारे बाल बहुत दिन तक छोडे गए थे शायद ९ साल की उम्र में मुंडन हुआ था
    वैसे अभी रात के बारह बज चुके हैं और सभी के जन्म दिन का रिकार्ड रखने वाले पाबला जी के जन्मदिन पर उन्हें बधाई

  31. पाबला जी, आप को जन्‍मदिन की बहुत बहुत बधाई|

  32. यह पर्चे में छपी घटना, मुझे भी किसी ने ईमेल से भेजी थी | मैं तब भी सरदारों का कभी मजाक नहीं बनाता था, पर '१२ बजे' का मतलब मालूम ना था ! आप की पोस्ट ने फ़िर से याद करवा दिया, बहुत बहुत आभार !

  33. श्री पाबला जी!
    आपको जन्म-दिन की
    बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

  34. इस जानकारी के लिए आभार!

  35. ग़ज़ब!! पाबला जी इतना सुन्दर जवाब उस युवक का सचमुच आँखें खोल देता है | और ऐसे बारह तो सब बजाना चाहेंगे !मैंने पूरा आलेख पढा तो सचमुच इतना रोमांचित हुआ की कहते नहीं बनता | जो भि कहता है की सरदारजी १२ बज गए सचमुच कोई परेशानी में होता है ! लाजवाब ! वैसे आज आपका जन्म दिन है जन्मदिन हार्दिक शुभकामनाए !

  36. ये बात आज ही पता चली. और हम तो आपके जन्मदिन पर पिछड़ गए. देर से ही सही… बधाई और शुभकामनायें.

  37. वैसे है तो यह पर्चा भी एक मज़ाक ही, पर दिलचस्प है. असल में इस 12 बजे के संदर्भ बड़े गूढ हैं और वह मूल रूप से भारतीय युद्ध शास्त्र से जुड़े हुए हैं, जिसका बहुत अच्छा ज्ञान गुरु गोविन्द सिंह जी को था. वस्तुत: यह 12 बजे का मामला रात का नहीं, दोपहर का है. इसका बड़ा गहरा जुड़ाव ज्योतिष से भी है. ख़ैर, यह एक अलग चर्चा ही हो जाएगी. कुल मिलाकर आपकी पोस्ट दिलचस्प है. भाई काजल कुमार की टिप्पणी ग़ौरतलब है.

  38. बहुत खूब..अपने कुछ अँग्रेज़ी भाषी दोस्तो के लिए मैने इस लेख का अँग्रेज़ी अनुवाद करीब २ साल पहले अपने ब्लॉग मैं प्रकाशित करा था….

    http://techieminds.wordpress.com/2008/04/16/sardarji-barah-baj-gaye/

    इस पीले पर्चे मैं बस एक ही खामी थी ( पॅक्ति क्रमांक २, शब्द-१०)….

  39. आपने बहुत अच्छी जानकारी सब के साथ साँझा की धन्यवाद वैसे बहुत लोगो ने दोपहर के 12 बजे के भी बारे में पूछा है दोपहर के 12 बजे सरदारों द्वारा लंगर चलाया जाता था और है लेकिन अच्छे कामो को लोग आजकल बेवकूफी में लेते है …………………..इसलिए मजाक उड़ाते है !

  40. आपने बहुत अच्छी जानकारी सब के साथ साँझा की धन्यवाद वैसे बहुत लोगो ने दोपहर के 12 बजे के भी बारे में पूछा है दोपहर के 12 बजे सरदारों द्वारा लंगर चलाया जाता था और है लेकिन अच्छे कामो को लोग आजकल बेवकूफी में लेते है …………………..इसलिए मजाक उड़ाते है !

  41. मेरे पिताजी ने बताया था कि ‘बारह बजने’वाला मुहावरा मदद माँगने के अर्थ में बोला जाता है. लेकिन ये किस्सा नहीं मालूम था.
    टिप्पणीकर्ता aradhana ने हाल ही में लिखा है: दिए के जलने से पीछे का अँधेरा और गहरा हो जाता है…My Profile

  42. इस बारे मे बहुत पहले मैनें भी एक रचना लिखी थी।आज पुन: पढ कर अच्छा लगा। वैसे भी सिख इतिहास के बारे मे लोगो को बहुत कम जानकारी है।शायद इसी लिये लोग सिखो को समझने में अक्सर भूल करते हैं।
    टिप्पणीकर्ता paramjitbali ने हाल ही में लिखा है: पत्थर और आदमीMy Profile

  43. समय बदल गया, माहौल बदल गया, पुरानी बातें लोग भूलने लगे। अब किसी को बताओ कि पंजाब मे बडे लडके को केशधारी बनाने की परंपरा थी तो शायद विश्वास ही ना करे।

  44. सरदारो के बारह क्यों बजते है नामक ब्लॉग बहुत अच्छा लगा, हालांकि सिक्ख धर्म हिन्दू की रक्षा के लिए ही उदित हुआ था ये एक ऐतिहासिक तथ्य था , परन्तु जो पम्पलेट आपने छापा वह मन को छू गया और मेरे मन में सम्मान और बढ़ गया सिक्खो के प्रति. देश के प्रति जज्बातो के कारण वैसे भी लोग सिक्खो को बड़े सम्मान से देखते है, भले प्रकट नहीं करते, जिंदादिली के कारण सिक्खो के कायल रहते है. सिक्खो पर बने चुटकुले तो एक चुहलबाजी भरा प्रेम भी है, जो १९८० के दशक से कम भी हुआ एक राजनीतिक पार्टी के कारण

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