सालगिरह पर ब्लॉगरों को खरी खोटी

कई बार ऐसे काम हो जाते हैं जिनके भविष्य के बारे में आशंका ही रहती है. बरसों पहले ऐसा ही हुआ था जब मुझे गूगल पर बने अपने ही एक ब्लॉग का जिक्र समाचार पत्र में किये जाने की खबर लगी। बताने वाला यह तो नहीं बता पाया कि समाचार-पत्र कौन सा था, लेकिन कौन सी पोस्ट है यह ज़रूर बता दिया। उत्सुकता हुयी कि आखिर वह कहाँ छपी है और क्या लिखा गया है। हमने पता लगाना शुरू किया। ‘विक्टोरिया नम्बर 203′ जैसा बड़ी टेढ़ी खीर वाला लगा यह काम। चाबी (पोस्ट) थी, लेकिन ताला (समाचार पत्र) नहीं! फिर खबर लगी कि ‘उसे’ एक ऐसे अखबार पर देखा गया है जिसका एक संस्करण हमारे क्षेत्र से भी निकलता है। हमने अंदाजा लगाया और तीर निशाने पर बैठा।

हमने सोचा, पता नहीं ऐसे कितने ही ब्लॉगर होंगें, जिन्हें मालूम भी नहीं होता होगा कि उनकी किसी पोस्ट की, किसी समाचार पत्र या पत्रिका या ऐसे ही किसी प्रिंट मीडिया में तारीफ की गयी है, चर्चा की गयी है, उद्धृत किया गया है। पता चल भी जाये तो उसकी झलक पाने के लिए कितने ही पापड़ बेलने पड़ते होंगे। इस सोच का परिणाम यह निकला कि एक ब्लॉग बना डाला गया प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा’

blogs in media

इसकी सूचना जब ब्लॉग जगत को दी हमने तो एक ब्लॉगर द्वारा तारीफ़ किए जाने पर दूसरे ब्लॉगर ने व्यंगात्मक तरीके से प्रतिक्रिया दी कि ब्लाग जगत के संस्थापक बनने के लिए बधाई

4 अप्रैल 2009 को शुरू किए गए इस ब्लॉग ने उस समय सौ घंटों के भीतर ही 1000 से ज़्यादा हिट्स पा लिए थे, 25 जून 2009 आते आते इसने 200 पोस्ट्स का आंकड़ा पार कर लिया और 2 सितंबर को 1000वीं टिप्पणी करने की जुगत में जब एक ब्लॉगर ने टिप्पणी की सुविधा ना दिख पाने की शिकायत की तो मेरा तल्ख़ ज़वाब था कि

 … टिप्पणी लिंक बंद कर दिया क्योंकि सार्थक टिप्पणियाँ ही नहीं आतीं। बस यही लिखा जाता है कि बधाई, आपको बधाई, उनको बधाई, इनको बधाई, दोनों को बधाई, तीनों को बधाई, आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आदि आदि! अरे दिए गए ब्लॉग की लिंक पर पढ़ कर कुछ कहें तो अपनी मेहनत का फल मिलते खुशी हो। चलिए आपके लिए, लेटेस्ट पोस्ट पर टिप्पणी तंत्र खोल रहा हूँ, उम्मीद है हजारवीं या 1001वीं टिप्पणी आपकी होगी, उसके बाद फिर बंद हो जायेगा टिप्पणी तंत्र … किन्तु 1000 टिप्पणियों में से शायद 10 ही टिप्पणियाँ ऐसी होंगी जिनमें बधाई या तारीफ के शब्दों को छोड़कर अन्य सार्थक बातें कही गईं होंगी

उस समय  तीन ब्लॉगर साथी मिले जिन्होंने अपनी अपनी व्यस्ततायों के बीच इस ब्लॉग में लगातार यथासंभव योगदान दिया। शेफाली पांडे जी माह में लगभग दो बार, उत्तर भारत के समाचार पत्र की ताजा कतरनों को स्कैन कर भेजती थीं, अजय कुमार झा जी माह में दो बार, नई पुरानी कतरनों का संकलन, कुरियर या डाक द्वारा भेजते थे, कुमारेन्द्र सेंगर जी समय मिलते ही अपने मोबाईल से ही कतरन का चित्र उतार कर पेश करते.

और फिर उसी वर्ष, 17 अक्टूबर 2009 को दीपावली पर्व पर, लगभग 6 माह में, 500 पोस्ट्स का आंकड़ा छू लिया तथा लगभग 1200 टिप्पणियों सहित इसके पाठकों की संख्या 16,000 पार हो गई. 22 फरवरी 2010 को रंगों के त्यौहार के कुछ दिन पहले, लगभग 10 माह में, 1000 पोस्ट्स का आंकड़ा पार कर लिया तथा लगभग 2000 टिप्पणियों, 165 फॉलोअर्स सहित इसके पाठकों की संख्या 29,000 पार हो गई.

ठीक एक वर्ष पहले मकर संक्रांति वाले दिन 14 जनवरी 2011 को गूगल के मुफ्त प्लेटफार्म से शुरू किए गए एक छोटे से प्रयास को www.BlogsInMedia.com में बदलते की घोषणा करते एक अनोखे ब्लॉग-एग्रीगेटर को साकार किया गया जो केवल संचार माध्यमों में उल्लेखित हिन्दी ब्लॉगों का संकलन करने वाला था. यह निश्चित तौर पर अविवादित भी है क्योंकि ब्लॉग लेखक व एग्रीगेटर के मध्य आकलनकर्ता के रूप में मीडिया के अन्य कारक भी शामिल होते हैं। इसी के साथ पुराना, प्रिंट मीडिया पर ब्लॉग चर्चा वाला ब्लॉग बंद किया गया.

उस समय तक  Blogs In Media वेबसाईट में 2178 जानकारियाँ देते लेखों पर लगभग 2700 अखबारी कतरनें थीं जिन पर विभिन्न 32 समाचार पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी ब्लॉगरों की पोस्ट का उल्लेख ब्लॉगर का नाम/ ब्लॉग नाम/ ब्लॉग यूआरएल/ संदर्भ देते हुए किया गया था। इस प्रयास में अंदाज़न 4000 हिन्दी ब्लॉग लेखों का संकलन भी हो चुका था।  इसके पीछे 21 माह का व्यक्तिगत परिश्रम व विभिन्न ब्लॉगर साथियों ( सुश्री शेफ़ाली पांडे, प्रतिभा कटियार, प्रतिभा कुशवाहा, सर्वश्री अविनाश वाचस्पति, कुमारेन्द्र सेंगर, संजीव कुमार सिन्हा, प्रवीण त्रिवेदी, अजय कुमार झा, महेश सिन्हा, कृष्ण कुमार मिश्रा आदि) का सक्रिय सहयोग मिला.

ठीक एक वर्ष बाद आज मकर संक्रांति वाले दिन आंकड़े देखे जाएं तो इसमे लगभग 4100 जानकारियाँ देते लेखों के सहारे, 67 पत्र-पत्रिकायों व रेडियो/ ऑनलाइन पत्रिकायों द्वारा 2000 हिंदी ब्लॉगों की 6000 कतरने/ उल्लेख दी जा चुकीं (लगभग 700 कतरने अभी भी प्रतीक्षा सूची में हैं).  नए-पुराने 500 गूगल फौलोअर, 400 ई-मेल सदस्य, औसतन 300 फीड ग्राहक हैं, इसके अलावा विभिन्न स्त्रोतों द्वारा रोजाना 600 से अधिक पाठक पाते हुए एक वर्ष में ही (केवल वेबसाईट पर ही) हिट्स एक लाख पार कर 1,11,111 होने जा रहे. (हालाँकि अन्य भाषायों के मुकाबले पाठकों संबंधी यह आँकड़े बेहद कमज़ोर हैं)

अब बातें कुछ हटकर. कुछ शिकायतें है मुझे ब्लॉगर साथियों से। पहली बात तो यह कि कई ब्लॉगरों ने हिंदी नाम वाले अपने ब्लॉगों का शीर्षक अंग्रेजी अक्षरों में लिख रखा है. दूसरी बात यह कि कईयों ने अपने ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित आलेखों को प्रदर्शित करने वाला विज़ेट नहीं लगाया हुआ है। वह विज़ेट आम तौर पर Archive कहलाता है। इसे लगा लें, अधिक से अधिक दो मिनट लगेंगे। इसके अभाव में पुरानी पोस्ट तलाशना कठिन हो जाता है.

तीसरी बात यह कि लगभग सभी ब्लॉगों पर, उन्हीं ब्लॉगों पर किसी शब्द या वाक्यांश को तलाश कर चाही गई पोस्ट तक पहुँच पाना संभव नहीं, जिसके फलस्वरूप उनका संदर्भ नहीं दिया जा सकता, लिंक नहीं बन पाती जो ब्लॉग के प्रचार, प्रसार, रैंकिंग में बेहद महत्वपूर्ण है। इस सुविधा के लिए सर्च वाला विजेट उचित स्थान पर लगाया जा सकता है और चौथी बात यह कि कई ब्लॉगर अपने या किसी अन्य के ब्लॉग का उल्लेख किसी समाचारपत्र में किए जाने की जानकारी अपने तक सीमित कर लेते हैं। उसका पता भी नहीं लगता। कभी कभी इसे एक ब्लॉग तक ही सीमित कर दिया जाता है।

हाल ही में कुछ घनिष्ट ब्लॉगर मित्रों ने अपने ब्लॉगों का उल्लेख करने वाली कतरन खुद ही लगा ली लेकिन इस वेबसाईट तक उसकी सूचना नहीं दी. अरे भई! मुफ़्त का ब्लॉग तो कभी भी बंद हो जाएगा। मानक संदर्भ बन चुकी यह www.BlogsInMedia.com वेबसाईट उसे संभाल कर रखेगी.

अब बात की जाए उनकी जो विभिन्न समाचार पत्रों में नियमित तौर पर किसी ब्लॉग लेख को छापने की ज़िम्मेदारी उठाए हुए हैं.  निश्चित तौर पर वे ब्लॉगर ही हैं. उनके काम देखिए:

  • हरिभूमि वाले कॉलम में केवल और केवल चारों तरफ फैली राजनैतिक ख़बरों में मामूली फेरबदल कर अपने ब्लॉग में डाल देने वालों को पसंद करते हैं. उस पर भी एक ब्लॉगर पर तो इतनी मेहरबानी है कि करीब रोज़ ही उनका ‘लिखा’ छपता है. यही हाल आज की जनधारा, यश भारत वाले साप्ताहिक स्तंभ का है जो अपने शहर या पड़ोसी ब्लॉगर का लिखा ही छापेंगे और किसी का नहीं.
  • आज समाज को नया रास्ता छोड़ कर किसी दूसरे पर जाने की इच्छा नहीं होती
  • डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में एक बार यदि कोई ब्लॉग पसंद आ गया तो आए दिन बस उसी की चर्चा होती है. फिर बाद में भले ही टेस्ट बदल लिया जाए.
  • लोकसत्य अखबार को दिल्ली और मुंबई के दिल, जान से हद दर्जे का लगाव है
  • दबंग दुनिया में आजकल एक अनोखा चलन शुरू हुआ है कि ब्लॉग का जो नाम है उसी को आगे पीछे www और com लगा कर बताया जाए उसका लिंक जिससे बेचारा नादाँ अखबारी पाठक सिर पटक ले लेकिन असल ब्लॉग तक ना जा पाए
  • दैनिक जागरण की भी अज़ब कहानी है यह दो हिस्सों में ब्लॉग छापता है. पहला तो अपने राष्ट्रीय संस्करण में जिसका रिकॉर्ड है कि प्रेम का रस लेते हुए एक ही ब्लॉग पोस्ट को हुबहू नौ बार छाप चुका! दूसरे हिस्से में इसके बाक़ी राष्ट्रव्यापी संस्करण हैं जिनमे केवल अपने ही जागरण जंक्शन के (सम-सामयिक विषयों वाले) ब्लॉग सारांश दिए जाते है गोया और कहीं ब्लॉग लिखे ही नहीं जाते
  • नया इंडिया में जब तक निगाह पड़ती रही तक सिवाय हस्तक्षेप और जनज्वार से अलग कुछ ख़ास दिखा नहीं.
  • पीपुल्स समाचार ने सबसे ज़्यादा क्षोभ उत्तपन किया है ब्लॉग लेख कुछ और, लेखक कोई और, ब्लॉग का नाम कुछ और, लिंक ऎसी कि दो ब्लॉगों, चार ब्लॉग प्लेटफार्म को मिला कर बनी हो.
  • कुछ समाचारपत्रों ने तो कई बार कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा की कहावत पर अमल करते हुए कहीं की पोस्ट, किसी लेखक का नाम, लिंक दिया है.
  • इसके अलावा ऐसा भी होता है कि अगर किसी ब्लॉगर ने कुछ लिखा तो उसे बाक़ी वेबसाईट्स लपक लेती हैं और जब वह किसी अखबार में छपता है तो चौथी पांचवी वेबसाईट का नाम आता है. स्तंभ लेखक यह जानने की कोशिश ही नहीं करता कि मूल लेख किसका, कहाँ है? बड़े बड़े नामी अखबारों में भी ऐसा होता है.

अब बातें कुछ और
ब्लॉग चयन में विविधता का ख्याल रखने वाले अमर उजाला को जब दो ब्लॉगरों ने बिना पूछे उनका लिखा ‘उठा’ लेने के लिए कानूनी नोटिस भेज दिया तो उसने ब्लॉग पोस्टों वाला स्तंभ ही बंद कर दिया. डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट वालों ने एक ब्लॉग को संपादित कर छापने पर नोटिस पाने के बाद भले ही उसे जगह देनी बंद कर दी लेकिन दैनिक जागरण ने उस ब्लॉगर को आए दिन संपादित कर तवज्जो देनी शुरू कर दी. मैं हर बार उन्हें उनका लिखा छपने पर नोटिस भेजने के लिए उकसाते हुए छेड़ता रहा. अब वहां से भी गायब हैं वे. लगता है नोटिस आखिर चले ही गई.

इस मामले में राष्ट्रीय सहारा का काम प्रशंसनीय है. एक मामूली विवाद के बाद नारी केंद्रित साप्ताहिक परिशिष्ट में वे जो कुछ छापते हैं बाकायदा वहाँ पूरा लिंक देते हुए लिख दिया जाता हैं  कि प्रस्तुत अंश संपादित हैं.

कुल मिला कर तस्वीर अब  ऎसी हो रही कि आधी अधूरी जानकारियों के साथ जो ब्लॉग पोस्ट ली जा रही वह अधिकतर राजनैतिक, सामयिक विषयों वाली रहती हैं. जैसे कि ब्लॉगों पर और कुछ लिखा ही नहीं जाता 🙁 ना किसी यात्रा संस्मरण की बात, ना किसी का मौलिक लेखन, ना किसी की कोई भावनात्मक अभिव्यक्ति, ना कोई बच्चों की कहानी, ना कोई व्यंग्य.

एक विचित्र चलन भी दिखता है. किसी लेखक ने किसी अखबार में लेख लिख कर बदले में पैसे लिए. लेख छप गया तो उसे उठाकर अपने ब्लॉग में कतरन सहित पूरा लेख डाल दिया. अब दूसरे अखबार ने उस लेख को उठा कर अपने ब्लॉग वाले स्तंभ में ले लिया कि यह ब्लॉग है.

मेरा हमेशा कहना रहा है कि ब्लॉग याने (ऑनलाइन) मौलिक लेखन

इसके अलावा मुझे कई अनुरोध मिलते हैं कि उनका लिखा फलां अखबार में आया है या उनका उल्लेख हुआ है
उसे भी स्थान दीजिए Blogs In Media पर. जब मैं कहता हूँ कि ना तो इसमे किसी ब्लॉग का नाम या लिंक है, ना ब्लॉगर नाम का शब्द दिख रहा और ना ही ब्लॉगिंग संबंधी कोई बात तो वे नाराज़ हो जाते है. मेरा आग्रह होता है कि भले ही आप चर्चित ब्लॉगर हों लेकिन कतरन में तो ऐसा कुछ नहीं दिखता!

कुच्छेक ब्लॉगर ऐसे भी मिले जो इस बात से परेशान थे कि यहाँ वे अपना ब्लॉग कैसे लिखें. ऐसे ही कुछ ब्लॉगर तो www.hindibloggers.com, www.blogmanch.com, www.bloggarv.com में भी लिखने लग पड़े थे. एक ब्लॉगर को वेबसाईट दिखाई तो बिना किसी प्रतिक्रिया के पूछ डाला कि टिप्पणी कहाँ करनी है? ऐसा लगा कि हिन्दी ब्लॉगिंग में पोस्ट और टिप्पणी के अलावा कुछ है ही नहीं 🙁

happy blogging

बातें कभी ख़तम नहीं होगी इसलिए एक फिल्मी गीत की तर्ज़ पर समापन किया जाए कि

देखो ओ ब्लॉगरों तुम ये काम ना करो!
ब्लॉग का नाम बदनाम ना करो!!

अभी भी कई पत्र पत्रिकाएँ ऐसी हैं जिनमें ब्लॉग्स का जिक्र होता है किन्तु उसकी जानकारी मुझे नहीं है या जिन तक मेरी पहुँच नहीं हो पाती। आपसी सहयोग से ही इसे बढ़ाया जा सकता है।

आप सभी के ब्लॉग लेखन के बिना इस महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुँच पाना संभव नहीं था। ये कारवां चलता रहेगा।

धन्यवाद आपका।

सालगिरह पर ब्लॉगरों को खरी खोटी
5 (100%) 1 vote[s]

51 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


टिप्पणीकर्ता की ताज़ा ब्लॉग पोस्ट दिखाएँ
[+] Zaazu Emoticons Zaazu.com