सिवाय नमन के हम कुछ कर सकते हैं क्या?

एक प्रश्न पता नहीं कितनों के दिलों में हलचल मचा पाता होगा?

मेरे बेटे के कमरे से अक्सर होम थियेटर पर गूंजती एक गीत की पंक्तियाँ सुनाई देती है और कभी कभी उस गीत के साथ अपनी धुन में लय मिलाने की कोशिश करते हुए उसकी ऊंची आवाज़ भी।

मैं अक्सर ही सोचता हूँ कि गीत में पूछा गया यह प्रश्न पता नहीं कितनों के दिलों में हलचल मचा पाता होगा?

सुनिए यह गीत
समझने की कोशिश भी कीजिए


यदि ठीक से समझ ना पाए हों तो इसका आसान सा अनुवाद है कि
“भगत सिंह! तुम्हारी फोटो नोटों पर क्यों नहीं लगती?”

आज ही के दिन, 23 मार्च 1931 को उस महामानव ने हँसते हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया था।

सिवाय नमन के हम कुछ कर सकते हैं क्या?

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21 comments

  • दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi says:

    नमन के सिवाय भी बहुत कुछ किया जा सकता है। भगतसिंह ने जिस लक्ष्य को हम तक पहुँचाने के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। उसे जान सकते हैं, समझ सकते हैं, उस की बात कर सकते हैं। बहुत लोग हैं (भारत में ही नहीं) दुनिया में जो उसी लक्ष्य के लिए इकट्ठे होते हैं, काम करते हैं, जीते और मरते हैं। हम उन के साथ नहीं हो सकते तो भी उन की मदद कर सकते हैं। उन पर बात कर सकते हैं।
    वह लक्ष्य ऐसे समाज की स्थापना है जिस में एक व्यक्ति द्वारा दूसरे का और एक देश द्वारा दूसरे देश का शोषण न हो।

  • दीपक 'मशाल' says:

    श्री द्विवेदी जी से पूर्णतया सहमत हूँ.. शत-शत नमन शहीद दिवस पर अमर शहीदों को.
    जाने क्यों आज के दिन सालों पहले किसी अज़ीज़ द्वारा सुनाये गए इस गीत को याद कर बैठता हूँ,
    ''भगतसिंह सुखदेव राजगुरु
    पहन वसंती चोले
    रात मेरे सपने में आये
    आकार मुझसे बोले..
    हमारा व्यर्थ गया बलिदान
    हमारा व्यर्थ गया बलिदान

    हम भी अगर चाहते तो
    सम्मान मांग सकते थे
    फांसी के तख्ते पर
    जीवनदान मांग सकते थे
    लेकिन कुछ ना माँगा
    हमने माँगा हिन्दुस्तान
    हमारा व्यर्थ गया बलिदान….

  • खुशदीप सहगल says:

    शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव, शहीद राजगुरु को नमन…

    वाकई हम नमन के सिवा कुछ नहीं कर सकते…

    जय हिंद…

  • शिवम् मिश्रा says:

    सभी अमर बलिदानियों को हमारा शत शत नमन !!

    इंक़लाब जिंदाबाद !!

  • विष्णु बैरागी says:

    'कुछ' ही क्‍यों? हम 'काफी कुछ' कर सकते हैं। पता नहीं क्‍यों हमने यह मान लिया है कि भगतसिंह की तरह मरना ही भगतसिंह के रास्‍ते पर चलना है। भगतसिंह के सोच के केन्‍द्र में 'देश' था। हमारे सोच में वह कहीं नहीं है। हम अपने 'देश' को अपने सोच के केन्‍द्र में ले आऍं तो 'बहुत कुछ' हो सकता है।

    भगतसिंह को केवल नमन करना भी भगतसिंह की अवमानना ही है। भगतसिंह के सोच-विचार को अपने आचरण में लाऍं, यही हमारी न्‍यूनतम जिम्‍मेदारी है। बेशक, हम मर न सकें किन्‍तु फिर भी 'काफी कुछ' कर सकते हैं। देश के लिए मरना जरूरी नहीं। जीते जी ही करना जरूरी तथा अधिक उपयोगी है।

  • डॉ. दलसिंगार यादव says:

    नमन तो हम शहीद भगत सिंह को करते हैं। उनको असली श्रद्धांजलि तो उनके बलिदान के कारण को अजाम देकर दे सकते हैं। आज तो लोग गोडसे को सही साबित करने पर लगे हुए हैं। उन्हें भगत सिंह याद नहीं आते हैं।

  • राजीव तनेजा says:

    दिनेशराय जी से सहमत

  • सतीश सक्सेना says:

    सादर नमन है इस सपूत को ! शुभकामनायें पाबला जी !!

  • ZEAL says:

    बहुत सटीक प्रश्न उपस्थित किया है आपने । देश के वीर सपूत भगत सिंह को नमन।

  • मीनाक्षी says:

    सबसे पहले आपको नमन कि आपने शहीद भगतसिंह को याद किया और हमें उस याद में शामिल किया..ऐसे शहीद नींव की ईंट होते हैं जो अनदेखे अंजाने से रह कर भी देश के कँगूरों को मज़बूती दे जाते हैं .

  • rashmi ravija says:

    नमन के साथ-साथ…. उनके जैसा ज़ज्बा….देश के लिए प्यार…स्वार्थहीन जीवन….त्याग…कितना कुछ अपने जीवन में उतार सकते हैं…पर अफ़सोस तो है कि..ऐसा करते नहीं हम.

  • ताऊ रामपुरिया says:

    बहुत सटीक प्रश्न है पर जवाब होते हुये भी कोई जवाब नही देना चाहता, कुछ घरानों का राज जो है, नमन इस वीर सपूर को.

    रामारम.

  • प्रवीण पाण्डेय says:

    शहीद को नमन।

  • गगन शर्मा, कुछ अलग सा says:

    सम्मान देना तो दूर अब तो सोची-समझी साजिश के तहत इन आजादी के दिवानों की छवि को धुमिल करने की कोशिश की जाने लगी है। पाठ्यक्रम की पुस्तकों में इन्हें आतंकी नाम दे-दे कर।

  • गगन शर्मा, कुछ अलग सा says:

    सम्मान देना तो दूर अब तो सोची-समझी साजिश के तहत इन आजादी के दिवानों की छवि को धुमिल करने की कोशिश की जाने लगी है। पाठ्यक्रम की पुस्तकों में इन्हें आतंकी नाम दे-दे कर।

  • डॉ टी एस दराल says:

    क्यों नहीं कर सकते जी । जिस देश को अंग्रेजों से छुड़ाया है , उसे अपने ही लोगों के हाथों ग़ुलाम न बनने दें ।
    अफ़सोस काफी हद तक बन चुका है । किसी को तो प्रयास करना होगा ।

  • ali says:

    उन्हें नमन !

  • शंभुनाथ says:

    अब तो हम उन शहीदों को नमन भी नहीं करना चाहते, धिक्कार है हमारे जीवन पर….

  • भारतीय नागरिक - Indian Citizen says:

    नमन भी क्यों करें? क्या मिलेगा इनके प्रति सम्मान दिखाने को और जो करते भी हैं वे क्यों करते हैं, इसलिये कि अखबार में फोटो छप जाये. भगत, अशफाक, बिस्मिल, सुभाष, आजाद इन्हें कौन जानता है. एक मित्र हैं वे आजाद को लुटेरा कहते हैं. धिक्कार है हमारी गंधाती मानसिकता को. कारण स्पष्ट है, आजादी जिस पीढ़ी को मिली वो आगे वाली पीढ़ी को आजादी का मोल नहीं समझा सकी. उसका भी कारण है कि शिक्षा नहीं थी, शिक्षा क्यों नहीं दी गयी इसलिये कि शिक्षा मिल जाती तो बहुतों के हाथों से सत्ता निकल जाती. और युवा, इन्टरनेट, सिनेमा, डिस्को, गर्लफ्रेण्ड, ऊंची सैलरी वाली जाब, दादागीरी, बिन्दास, इमोशनल अत्याचार, रोडीज बस…

  • चला बिहारी ब्लॉगर बनने says:

    नमन एक तीन अक्षरों का बिना मात्रा वाला शब्द है पाबला जी! इन शहीदों ने जो बुलंदियां बख्शीन हैं मुल्क को, उसे इस मुल्क के रहनुमा उतनी ही गहराई तक ल गए हैं.. अब तो लोगों ने भी फोर्मेलिटी बना ली है.. न मन करता है, न नमन करता है कोई.. अपने बच्चों को उनकी कहानियां सुनाते भी डर लगता है!

  • ajit gupta says:

    भगतसिंह के पीछे गाँधी नहीं लिखा है।

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