स्वच्छ भारत में मेरी हरकतें

स्वच्छ भारत अभियान से भी बहुत पहले मैंने जो हरकतें की, वह लिख दी हैं चुपचाप यहाँ

हालिया केंद्र सरकार ने जब सत्ता संभाली तो जोर शोर से जो काम शुरू किये गए, उसमें 1999 में प्रारंभ निर्मल भारत अभियान का नाम बदल कर उसे स्वच्छ भारत कहा गया और इसका प्रचार प्रसार कुछ यूं किया गया कि पहले कभी भारत स्वच्छ ही नहीं रहा.

हाल यह तक यह हुआ कि शुरुआती दौर में झाड़ू पकड़ फोटो खींचने की हास्यास्पद होड़ लग गई देश के कोने कोने में.

हालाँकि इस अभियान से लोगों में जागरूकता बढ़ी दिखी लेकिन अभी भी इस तरफ व्यक्तिगत, सामाजिक प्रयास जरूरी हैं.

आजकल टेलीविजन पर इस स्वच्छ भारत अभियान से संबंधित कई सरकारी, गैर-सरकारी विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं. इन्हें देखते हुए मुझे अपनी ही दो घटनाएँ याद आती हैं.

पहली तो चंडीगढ़ की है और दूसरी है मेरे ही शहर की

स्वच्छ भारत की तस्वीर
मौजूदा स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत में सिने तरिका हेमा मालिनी का रोड शो

बात उस समय की है जब हम 1995 में अपनी मोटरसाइकिल के उत्तर भारत की यात्रा पर गए थे

चंडीगढ से शिमला जाते हुए हमारा रुकना  हुआ पिंजौर में एक परिचित के घर. दोपहर को जब पिंजौर गार्डन घूमने के बाद बाहर निकले तो सामने ही गेट पर एक आइसक्रीम वाला दिख गया.

मैंने भी सभी के साथ आइसक्रीम खाई और कप खाली होते ही उसे यूं ही जमीन पर उछाल फेंका. मन की अपराध भावना ही कहिये एकाएक मुझे महसूस हुआ कि कोई मुझे देख रहा है.

स्वच्छ भारत में पिंजौर
पिंजौर गार्डन का विहंगम दृश्य

तिरछी निगाहों से इधर उधर देखा और ऐसा लगा कि जैसे वहां खड़ा हर इंसान मुझे घूर घूर कर देख रहा है. मैंने आव देखा ना ताव वह फेंका हुआ कप उठा कर सामने ही पड़े कचरे के डब्बे में डाल दिया.

यह माहौल का तकाजा ही रहा कि उसके बाद फिर कभी  ऐसा नहीं हुआ. हमेशा ही किसी डब्बे की तलाश करता और हाथ का कचरा वहां डालना एक आदत ही बन गई.

दूसरी घटना है भिलाई से सटे हुए दुर्ग रेलवे स्टेशन की. किसी को लेने गए थे हम कुछ मित्र. ट्रेन का इंतज़ार करते  मैं प्लेटफार्म 1 पर अपने मित्र के साथ खड़ा हुआ था.

पास ही में एक चाय का स्टाल था जहां खड़े तीन चार  नवयुवक अपनी ही धुन में शोर करते चाय पी रहे थे.  स्वाभाविक रूप से ध्यान उधर ही था. चाय खत्म होते ही उनमें से एक युवक में दन्न से प्लेटफार्म पर ही खाली कप उछाल फेंका.

स्वच्छ भारत में रेलवे

इधर उसका कप फेंकना हुआ उधर मैं सनी देओल जैसे चिल्लाया ओएsssssss.  मेरा चिल्लाना था कि आस पास खड़े हुए लोगों की निगाहें मेरी ओर हो गई. उस युवक ने भी देखा हमारी आंखें चार हुई और मैंने उस कप की ओर इशारा किया.

युवक ने वह कप उठाया और टी-स्टाल के पास रखे डस्टबिन में डाल कर सॉरी कहा.

यह दो घटनाएं मेरे साथ ऐसी बीती कि मैं आज भी हाथ का कचरा कहीं इधर उधर नहीं फेंकता. इस आदत को बनाए रखने में मेरी बेटी ने भी बहुत मदद की है.

आज स्वच्छ भारत अभियान को देखता हूं तो मुझे ऐसा लगता है कि यह आदत तो एक सभी नागरिक में होनी ही चाहिए इसके लिए अलग से अभियान चलाने की क्या जरुरत!

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