हम तुम एक कमरे में बंद हों तो क्या क्या खो सकता है?

जब से हमारे सुपुत्र गुरुप्रीत एक जानलेवा सड़क दुर्घटना से सकुशल बचे हैं तब से वाहन चलाते हुए सभी सुरक्षित मानकों का पालन करते चलते हैं। इसके बावज़ूद पिछले दिनों ट्रैफ़िक पुलिस ने किसी कारण उन्हें ‘पकड़’ लिया। मेरे मोबाईल पर उसकी आवाज़ गूँजी कि क्या करूँ? मैंने झट से अपना आजमाया फार्मूला बता दिया कि गाड़ी भी ले लेने दो उनको और लाईसेंस भी रखने दो केवल पावती माँग लेना!

शायद मेरा फार्मूला काम नहीं आया या उसने आजमाया नहीं लेकिन अपने काम निपटा कर वह घंटे भर बाद घर पर था 🙂 सब कुछ सामान्य पा कर तब तक मैं वह घटना याद भी न रख सका लेकिन इस एक वाक्ये ने कई जिज्ञासाओं, आशंकायों को फिर सामने ला खड़ा किया।

अक्सर कहा जाता है कि हर आने वाली पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से ज़्यादा अकलमंद, लेकिन शारीरिक रूप से कमजोर होती है। यह सत्य भी प्रतीत होता है जब हम देखते हैं कि हमारे पुरखों ने जितनी शारीरिक मेहनत की थी जीवन यापन में, हम नहीं कर पाते क्योंकि वह शैली हमारे जीवन का अंग रह नहीं गई। अब रही बात अकलमंदी की तो इस पर मेरा मत कुछ भिन्न है।

बात शुरू की जाए तो याद आता है मुझे अपने स्कूल की दूसरी-तीसरी कक्षा में गणित वाले पीरियड का वह हिस्सा जिसे मन-गणित कहा जाता था। होता कुछ खास नहीं था बस सभी को फर्श पर खामोश खड़े रहने का आदेश दे कर गुरूजी (उस समय सर नहीं कहते थे भई!) 5 आसान से प्रश्न पूछते थे जैसे कि एक संतरा 15 पैसे का आता है तो सात संतरे कितने के आएँगे? या अगर 12 आने 5 लोगों में बाँटने हों तो हरेक को कितने पैसे मिलेंगे? मन ही मन गुणा भाग करते रहते थे हम बच्चे और एकाध मिनट बाद निर्देश मिलने पर उत्तर को जमीन पर पड़ी स्लेट पर खामोशी से लिख कर फिर खड़े हो जाना पड़ता। फिर जब होती जाँच तो एक गलती की तीन छड़ियाँ हथेली पर सटासट पड़ती।

आज मैं किसी दुकान पर जाता हूँ तो तीन समोसों की कीमत भी सामने पड़े कैल्क्युलेटर पर गणना कर बताई जाती है। 😀

 

अभी कुछ सप्ताह पहले टेलीविज़न पर एक कंपनी के तेज गति से चलने वाले इंटरनेट के विज्ञापन पर नज़र पड़ी जिसमें हर मुसीबत का सामना करने के लिए उसका समाधान इंटरनेट पर खोजने के दृश्य बताए जाते हैं। ऐसा ही एक दृश्य है हाथों में बंधी रस्सी की गठान खोलने का। इसे देख मुझे अपने स्काऊट और एनसीसी के वो दिन याद आ गए जब दसियों बातों के साथ-साथ तरह तरह की गठान लगाने व आसानी से खोलने के तरीके बताए जाते थे और वह अब तक याद भी हैं। कभी ज़रूरत पड़े तो इसके लिए कभी इंटरनेट की ओर झांकना भी नहीं होगा।

दिक्कत यह है कि मशीनी उत्पादों, प्रक्रियायों के कारण कई मानवीय कलाएँ पीढ़ियों में स्थानांतरित नहीं हो पा रहीं। जैसे कि मेरे पिता जी मूँज की रस्सी वाली खाट बड़े ही कलात्मक ढ़ंग से बुन लेते थे, जिसे मैंने भी सीखा लेकिन कालांतर में डबल बेड और डनलप के गद्दों ने उसकी प्रासंगिकता  ही खतम कर दी।

मैंने अक्सर ही अपने दायरे में देखा है कि जरा जरा सी बात पर लोग झट से इंटरनेट पर उसका समाधान तलाशना शुरू कर देते हैं, उसकी जानकारी जुटाने के लिए तत्पर हो जाते हैं या उसकी सलाह देते हैं बजाय उसका वास्तविक सामना करने के।

वर्षों पहले कल की दुनिया शुरू करते हुए मैंने सोचा नहीं था कि इस बहाने मुझे मिल रही भविष्य के विज्ञान की जानकारियों से खुद को ही दहशत होने लगेगी। उस दिन तो हद ही हो गई जब मैंने खबर देखी कि एक दिन मशीन, मानव दिमाग की जगह ले लेगी। फिर भी मुझे लगा कि जितनी चीजें हम सोच सकते हैं उन्हीं चीजों को याद कर डालते हैं और साथ में कुछ ऐसी चीजें भी जिनकी आशंका होती है।

लेकिन इसके बावजूद बहुत कुछ ऐसा है जिनके बारे में पहले से सोचा नहीं जा सकता जाहिर है कि बिल्कुल इंसान का दिमाग बना पाना संभव नहीं है। छोटा सा बच्चा तो कुछ ना कुछ सोच कर कहानी गढ़ लेता है लेकिन कंप्यूटर ऐसा नहीं कर सकता।

अब तो इस तरह के उपकरण आ गए हैं जो अपनी समझ और आस पास के वातावरण से कुछ चीजों को लेकर लगातार विकास कर रहे हैं। ऐसे में उनके भीतर लगातार सुधार की प्रक्रिया चलती रहती है और उनकी ‘समझ’ विकसित होती रहती है। बेशक इस अनोखी मशीन ने कुछ काम ऐसे जरूर किए हैं जो इंसान के बूते की बात नहीं थी और ये तो ऐसे काम आगे भी करते रहेगी।

इसके अलावा एक अहम मुद्दा ये भी तो है कि हमारी जिंदगी में तकनीक का दखल जितना ज्यादा बढ़ रहा है उससे जुड़ी नई परेशानियां भी सामने आ रही हैं। आने वाले वक्त में जब हमारे ड्राइंग रूप से बेडरूम और हमारे दिल से दिमाग तक में घुस जाने वाला विज्ञान हमारी सोच में भी घुसने लगेगा तब क्या होगा? क्या नई समस्याएँ हमारे सामने नहीं आ जाएंगी?

वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारे जीवन में तकनीक का विकास तो हो रहा है लेकिन इंसानों के लिए बुनियादी मूल्य नहीं बदले उस तरफ विकास की कोई बयार नहीं चली। मेरा ख्याल है कि विज्ञान से होने वाले नुकसान की यही वजह है जिस दिन विकास का पहिया इस तरफ मुड़ा ये समस्या खुद-बखुद खत्म हो जाएगी।

बात गुरुप्रीत से प्रारंभ हुई थी और खतम भी उसी से होनी चाहिए। 🙂 उस समय मैंने सोचा कि अगर उसके पास मोबाईल ना होता तो वह बिना किसी की मदद लिए क्या करता? अगले ही पल वर्षों पहले की वो आधी रात याद आ गई जब वह मारूति वैन ले गया था और वीरान सड़क से मुझे बताया कि वैन का कोई गीयर काम नहीं कर रहा। इतनी दूर बैठा मैं कुछ कर ना सका वहीं आसपास के ढ़ाबे पर रात गुजारने को कह दिया।

लेकिन महाशय रात दो बजे सही सलामत मारूति सहित घर पर हाजिर! ज़नाब गाड़ी के नीचे लेटकर, ढ़ाबे से लिए गए काँटेदार चम्मच को गीयर शिफ़्टर रॉड के निकल चुके लॉक की जगह फंसा कर आ गए सुरक्षित। तब तसल्ली हुई कि अभी वैसी नौबत नहीं है जिसके लिए चिंता में घुला जाए।

लेकिन एक फिल्मी गीत की तर्ज़ पर यह जहन में आ रहा कि हम या आप कभी किसी सुनसान कमरे में बंद हो जाएँ और आधुनिक संचार साधन खो चुके हों तो?

हम तुम एक कमरे में बंद हों तो क्या क्या खो सकता है?
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हम तुम एक कमरे में बंद हों तो क्या क्या खो सकता है?” पर 35 टिप्पणियाँ

  1. दिमाग को झकझोरने वाला , आपका यह महत्वपूर्ण आलेख है । जैसे जैसे विज्ञान तरक्की कर रहा है , जीवन की स्थितियाँ पहले से बेहतर होती जा रही हैं । अब भले ही पुराने लोग कुछ भी कहलें ( हर नया कभी न कभी पुराना होता ही है ) लेकिन यह तो है कि जीवन जीना पहले से आसान हुआ है । आदिम मनुष्य से लेकर अब तक के आधुनिक मानव तक ( इसे पिछले 40000 साल से आधुनिक मानव कहा जा रहा है यानि cromagnun) इस विकास को परिलक्षित किया जा सकता है । जब भी यह पृथ्वी नष्ट होगी यहाँ केवल वही लोग शेष रहेंगे जिन्होने विज्ञान का सहारा लेकर अपने जीवन को सुविधापूर्ण व सुरक्षित कर लिया है । बाकी लोगों का भगवान मालिक । रही बात गुरप्रीत की तो अब भी सस्पेंस यह बाकी है उसने उस पकड़ने वाले पुलिसवाले को क्या कहा ? उम्मीद है उसने आपको बता दिया होगा .. आप भी हमे बता दें ” बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ”
    टिप्पणीकर्ता शरद कोकास ने हाल ही में लिखा है: कल का दिन बिगड़ी हुई मशीन सा थाMy Profile

    • शरद जी, इस बात से मैं सहमत नहीं कि
      जब भी यह पृथ्वी नष्ट होगी यहाँ केवल वही लोग शेष रहेंगे जिन्होने विज्ञान का सहारा लेकर अपने जीवन को सुविधापूर्ण व सुरक्षित कर लिया है

      एक छोटा सा उदाहरण है कि बिजली का बटन दबा कर रौशनी करने, खाना बनाने वाले लोग बिना बिजली के आग जला कर बिना बर्तनों के खाना कैसे बना पाएंगे? जिसे मशाल बनानी, दिया बाती बनानी ना आए वह क्या करेगा? ऐसे भी लाखों लोग हैं धरती पर जिन्होंने यह सब कभी देखा-सुना-किया नहीं है

      वैसे, जब सर पर आती है सब हो जाता है
      Tears

  2. बेहतरीन लेख।
    कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट ने काफी कुछ आसान कर दिया है पर इसका एक पहलू यह भी है कि यह हमें कमजोर भी बना रहा है। यदि ये न हो तो…..
    टिप्पणीकर्ता अतुल श्रीवास्‍तव ने हाल ही में लिखा है: अध्‍ययन यात्रा बनाम दारू पार्टी…. !!!!!My Profile

  3. तो क्या गए काम से … अब आदत जो पड़ गई है दिमाग को आराम और गूगल को काम देने की … 😉

  4. @शरद कोकास
    जब भी यह पृथ्वी नष्ट होगी यहाँ केवल वही लोग शेष रहेंगे जिन्होने विज्ञान का सहारा लेकर अपने जीवन को सुविधापूर्ण व सुरक्षित कर लिया है ।
    आज विकसित कहे जाने वाले सारे लोग अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को समाप्‍त करके बीपी , शूगर या अन्‍य किसी न किसी बीमारी की दवा खाकर अपने दिनभर के 24 घंटे काट रहे हैं .. जब पृथ्‍वी नष्‍ट होगी तो उसके साथ प्रयोगशाला भी .. और दवा न मिलने से ये भी .. जबकि अविकसित लोग प्रकृति के हर तकलीफ को सहन करते हुए .. उससे लडते हुए शेष रह जाएंगे !!

  5. बिल्कुल सही, आजकल यही हो रहा है, सब अपने दिमाग को आराम देकर गूगल को परेशान करते हैं। अगर चीजें आसानी से मिलती हैं तो मेहनत क्यों करना यह मूलमंत्र हो गया है। परंतु आजकल की पीढ़ी की सोच बहुत ही पेचीदी है और तकनीक कौशल से भरपूर भी।

    इसलिये पुराने जमाने मतलब कि जब गूगल नहीं था और अब जब गूगल है इसमें तुलना करना ठीक नहीं।

    आज भी जब हम किराने की दुकान पर समान लेने जाते हैं, दुकानदार रोज कैलकुलेटर पर ऊँगलियां चलाता है और हम उसे झट से फ़ाईनल टोटल बोल देते हैं। ये तारीफ़ नहीं है परंतु हाँ इतना तो है कि आज की पीढ़ी यह नहीं करती।
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: एक सीट की हार से तूफ़ान का अंदाजा लगाईये..नहीं तो बहुत देर हो जायेगीMy Profile

    • झट से फ़ाईनल टोटल वाली बात अपने साथ भी है

      लेकिन हमारा एक दुकानदार कैल्क्यूलेटर पर दो बार गुणा भाग करने के बाद कागज पर हिसाब करता है तब जा कर हमें भुगतान की रकम बताता है भले ही वह रकम 27 रूपए हो

      I-see-stars

  6. बहुत सुन्दर आलेख. सोचने को तो विविश कर ही रहा है. लेख के अंतिम वाक्यांश में चिन्हित समस्या का समाधान कांटेदार चम्मच ही बनेगी. अत्यधिक तकनीकी दखल दिमागों को किसी काम का नहीं रख छोड़ेगी.

  7. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

  8. आधुनिक मशीनीकरण का प्रभाव तो चिकित्सा पर भी पूरा दिखाई देता है । अब डॉक्टर्स भी हाथ से काम लेने के बजाय पूरी तरह से मशीनों पर निर्भर रहते हैं । कभी कभी बड़ा अटपटा लगता है । लेकिन यही सच है ।
    http://tsdaral.blogspot.com/2011/10/blog-post_19.html#comments

    • बिना ताम झाम के डॉक्टर करें भी तो क्या करें
      गाँव देहात में तो उस डॉक्टर को कोई डॉक्टर नहीं मानता जो बिना सुई के इलाज़ करे
      Conceited

  9. @ क्या क्या खो सकता है ,

    (१)ये मुगालता कि बालक हमपे अब भी निर्भर है 🙂
    (२)ये घमंड कि ट्रेफिक पुलिस को टरकाने का हुनर सिर्फ हममें है 🙂
    (३)ये विश्वास कि तकनीक और विज्ञान की तरक्की से जुगाड़ का महत्व घट जाता है 🙂

    @ बंद कमरे में क्या क्या नहीं खोना चाहिए ,

    (१) आपा नहीं खोना चाहिए 🙂
    (२) और मोबाइल के सिग्नल्स भी 🙂
    (३) यार दोस्तों के पते 🙂

  10. जब पति ने पत्नी से कहा मुझे अंतिम समय में सुकून से मरने देना तो पत्नी ने टीवी का केबल, कंप्य़ूटर का वायर और वीडियो-आडियों के कनेक्शन निकाल दिए। तब मरना आसान हो जाएगा 🙂
    टिप्पणीकर्ता Chandra Mouleshwer ने हाल ही में लिखा है: घूस का लेन-देनMy Profile

  11. वैचारिकता से ओतप्रोत एक अहम् मुद्दे पर पोस्ट….मनुष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा मशीनों द्वारा उसके विस्थापित कर दिए जाने का है -बहस जारी है !
    टिप्पणीकर्ता arvind mishra ने हाल ही में लिखा है: फूली फूली चुन लिए काल्हि हमारी बार ….एक नए सदर्भ में …!My Profile

  12. मजाक-मजाक में इत्ती बड़ी बात कह गए जी !
    मुझे याद है ..निवाड़ का पलंग मैं भी बना लेता था,पर भाई मूंज वाला तो पिताजी ही कर सकते थे ! अब कुर्सियां,हाथ-पंखे,लिफाफे सब गायब हैं,बचा है तो ई नकली विकास !

  13. अब हम तो यह पढ़ने की उम्मीद लगाए थे कि नैनो की भूल भुलैया मे बोबी के खो जाने का ज़िक्र होगा पर……… अब विद्वानों के बीच हम क्या बोले? विज्ञान ने जीवन को सुविधाजनक और आसान कर दिया है.यह विज्ञान का कमाल ही है कि पूरी दुनिया एक मुट्ठी(कंप्यूटर रे भाई)मे सिमट आई है और हम भावनात्मक रूप से जुड गये हैं.
    खेर……ये बताइए गुरुप्रीत ने पुलिस वाले को क्या बोला? फोर्क के नए उपयोग के बारे मे पढकर मजा आ गया.भतीजा किसका है? आखिर दिमाग…………. मेरे जैसा पा ही लिया बच्चे ना हा हा हा Delighted

  14. Cry-Out मेरे ब्लॉग का लिंक क्यों नही दीखता यहाँ? Angry वीर जी ! ऐसा ना करो मेरे भाई.जरा देखो तो किस बात की दुश्मनी निकाल रहा है आपका ब्लॉग मुझसे Tounge-Out

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