हम दोनों कूदे और तुरंत ही तीन हो गए

डेज़ी होती थी उन दिनों जब की यह बात है। समय बिल्कुल निश्चित होता था उसका मुझे टहला कर लाने का! क्या मज़ाल कि 5-10 मिनट ज़्यादा हो जाए। अगर मैं सोते रहूँ तो मेरे ऊपर कूद कर मचल कर किसी भी तरह बिस्तर से नीचे उतरवा लेती थी भले ही चीखते चिल्लाते रहूँ। यही हाल तब होता था जब कम्प्यूटर के सामने बैठा कोई ‘ज़रूरी’ काम निपटाने में मग्न रहूँ। बहलाने फुसलाने से कुछ देर शांत रहने के बाद उसका सब्र खत्म हो जाने पर पिछले पंजों पर खड़े हो अगले पैर मेरी छाती पर रख डाँटने के अंदाज़ में भौंकना शुरू करती तो तभी रूकती जब मैं उठ खड़ा होता। आगे आगे दौड़ते, मेन गेट तक जाते भी मुड़ मुड़ देखती कि आ रहा है ये कि नहीं!?

 

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डेज़ी के साथ हमारी बिटिया रंजीत (20 मई 2009)

 

उस दिन बारिश रूकते ही मैं डेज़ी के साथ उसकी चेन पकड़े निकल पड़ा बाहर। हमारे घर से सटा हुआ साढ़े चार एकड़ का एक मैदान है जिसमें घर की ओर ही  झाड़ियों का छोटा सा झुरमुट है। बरसाती पानी का बहाव भी इसी ओर होने से सड़क और मैदान के बीच नाली में पानी का स्तर घटता बढ़ता रहता है। शाम के हल्के अंधेरे में बारिश रूके हुए आधा घंटा हो चुका था लेकिन पानी इतना बह रहा था कि छलांग मारे बिना उसे पार किया जाना दिक्कत भरा काम होता।

डेज़ी को मैंने इशारा किया और हम दोनों ने अपनी अपनी शक्ति अनुसार उछाल मारी। लेकिन यह क्या हमारे पैरों की धमक जैसे ही जमीन पर हुई वहाँ मौज़ूद  लम्म्म्म्म्म्म्म्बा सा साँप घबरा उठा इस आसमान से उतरती दो आफ़तों को महसूस कर। अपनी जान बचाने की खातिर वह सरपट भागा लेकिन डेज़ी ने उसे देख लिया था और वह भी भागी उसके पीछे। उसके गले में बंधी चेन का दूसरा हिस्सा मेरे हाथ में था। दोनों हाथों से अपनी पूरी ताकत के साथ मैं डेज़ी को रोकते रहा लेकिन वह नहीं रूकी। मुझे घसीटते हुए सी जब तक झुरमूट के मुहाने तक जाना हुआ उसका तब तक 20 फीट की दूरी तय हो चुकी थी।

नतीज़ा वही था जो होना चाहिए। वह घबराया प्राणी कहीं दुबक चुका था। लेकिन डेज़ी को शायद उसके छुपने की जगह की भनक थी तभी तो आसमान सर पर उठाया हुआ था उसने। बड़ी मुश्किल से  वापस खींचते हुए मैं दूसरी राह पर उसे ले गया।

आज जब मैक को ले जाता हूँ उस ओर, तो हमेशा यह वाक्या याद आता है।

हम दोनों कूदे और तुरंत ही तीन हो गए
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हम दोनों कूदे और तुरंत ही तीन हो गए” पर 33 टिप्पणियाँ

  1. ऐसे ही कई बार हम भी दुकेले से अकेले हो चुके हैं।
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: पारिवारिक समय का कत्ल कर रहे है अंतर्जाल और फ़ेसबुकिया दोस्त (Facebook and Internet are killing family time)My Profile

    • ये अच्छी याद दिलाई आपने
      गूगल ने जो खाता बंद किया उसमें ढ़ेरों चित्र थे डेज़ी, मैक के
      अब की बार फिर अपलोड करता हूँ

    • ज़िंदगी में साँप हैं तो बहुत 🙂
      अभी परसों ही घर पर बेटे को दिखा, पिछले माह तो ऑफ़िस वाले कमरे में ही हुआ आमना-सामना

      अभी कई किस्से बाकी हैं

  2. अपनी डेजी का भी यही हाल है -एक मोहतरमा ने कहा या तो आप मेरे साथ चैटिंग पर रहिये सात सवा सात बजे सुबह या डेजी को टहलाईये -नतीजा केवल आप समझ सकते हैं -सम्बन्ध विच्छेद हो गया उनसे ..,..अब भला ये भी कोई बात हुयी ..जो लोग कुत्ता प्रेमी नहें हैं उनसे कुत्ता प्रेमियों को दूर रहना चाहिए ..गिरिजेश जी का अपवाद मानूंगा –
    टिप्पणीकर्ता arvind mishra ने हाल ही में लिखा है: पिता जी की पुण्य तिथि पर …My Profile

    • अब डेज़ी जैसों के मुकाबले ‘ये’ कहाँ टिकते हैं!?
      लेकिन गैर(कुत्ता) प्रेमी इसे नादानी मानेंगे 😀

  3. बहुत दिलचस्प संस्मरण । शीर्षक तो और भी दिलचस्प है ।

  4. यादें ना होतीं तो?
    परसों मुलाकात होते-होते रह गयी। अफसोस रहेगा।

  5. वाह क्या मजेदार दॄष्य रहा होगा? आगे आगे नागराज..उसके पीछे डेजी और पीछे घिसटते जा रहे पाबला जी?:) आनंद आगया जी.

    रामराम.

    • इससे मिलता जुलता दृश्य तो अब भी लगभग रोज ही दिखता है 🙂

      मैं सब समझ रहा हूँ ताऊ
      मुझे घिसटते देख मज़े ले रहे, आनंदित हो रहे हो आप x-(

  6. लीजिये घबराना किसे था और घबरा कौन गया । रोचक.
    दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ…

  7. ये तो अच्छा हुआ उसकी कमर पर नही पड़े वरना……… चार हो जाते.आप,डेज़ी और सांप दो हिस्सों मे :Tounge-Out: :Distort: हा हा हा बेचारा ! जाने किसका मुंह देख कर उठा था. माऊ कितनी प्यारी,इंटेलिजेंट,कोंफिदेंत, स्मार्ट लग रही है ना ? जी एकदम ……… अपनी बुआ को गई है.इंदु बुआ को :Angel:

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