मीडिया डॉक्टर प्रवीण चोपड़ा के प्रयोग और इंटरनेट पर एक हिंदी भाषी

आज रविवार है, सोचा था कि ‘हैम रेडियो‘ पर अगली कड़ी लिख ही डालूँ, लेकिन नज़र पड़ गई मीडिया डॉक्टर प्रवीण चोपड़ा जी के ब्लॉग पर। जिसमें उन्होंने हिंदी पर अपनी सार्थक सोच को उतारा है।

कुछ दिन पहले ज्ञानदत्त जी की पोस्ट और कुछ माह पहले अन्य ब्लॉगों पर, भाषा की शुद्धता पर बहुत से विचार रखे जा चुके हैं। चोपड़ा जी का कहना ठीक है कि हमें हिंदी में अधिकाधिक लेखन को बढ़ाना होगा। लेकिन मेरे विचार में भाषा की व्याकरण (Grammer) बेशक ठीक न हो, लेकिन वर्तनी (Spelling) तो हमेशा, सही उच्चारण के अनुसार, ठीक ही होनी चाहिये, फिर चाहे वह अंग्रेजी का शब्द हो, पंजाबी का हो या फिर तेलगू का! तभी सर्च इंजिन पर आप सटीक परिणाम पा सकेंगे।

चोपड़ा जी के लेखन में अंग्रेजी शब्दों की भरमार है। भले ही वह आम बोलचाल की भाषा से लिए गये हों, लेकिन जब एक सच्चा हिंदी प्रेमी इंटरनेट पर उत्साहित होकर आयेगा तो उसका भी सिर वैसे ही भारी हो जायेगा जैसे चोपड़ा जी का हो जाता है।

अब बात उनके प्रयोगों की। हमने भी वही प्रयोग दोहराये। परिणाम देखिये, डाय़बिटिज का मात्र एक पृष्ठ (1), डायबिटिज़ के सात हजार दो सौ अस्सी (7,280) पृष्ठ, डायबिटीज़ के छह हजार नौ सौ चालीस (6,940) पृष्ठ, सर्च एंजिन गूगल ने दिखाये। लेकिन मधुमेह के कुल एक लाख अस्सी हजार (1,80,000) से अधिक पृष्ठ मिले! विकिपीडिया पर भी एक पृष्ठ मिला।

हिंदी भाषी

तमाम सर्च एंजिनों के लिए वेबसाईटों की जानकारी उपलब्ध कराने वाले ओपन डायरेक्टरी प्रोजेक्ट (Open Directory Project) पर तो मधुमेह पर www.diabetes.org.uk का एक पृष्ठ मिला, जो किसी कारणवश फिलहाल उपलब्ध नहीं, किन्तु डायबिटिज़ जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है वहाँ! अब आप ही सोचिये कि एक हिंदी भाषी इंटरनेट पर डायबिटीज़ क्यों खोजेगा, वह तो प्रचलित मधुमेह ही जानता है।

मेरा तात्पर्य यह है कि यदि वाकई में इस विचारधारा के व्यक्ति, इंटरनेट पर हिंदी को सम्मानजनक स्थान पर देखना चाह्ते हैं तो कम से कम अपने लेखन में भाषा की शुद्धता पर स्वयं ध्यान दें। हम प्रतिदिन कुछ ना कुछ नया सीखते ही हैं। इनमें अपनी भाषा को जोड़ना कोई गलत नहीं।

प्रवीण चोपड़ा जी का धन्यवाद, जिनके माध्यम से मैं अपनी बात रख पाया। आशा है वे इसे अन्यथा नहीं लेंगे। उनकी भावनायों को ठेस पहुँचाने की मंशा नहीं है मेरी।

मीडिया डॉक्टर प्रवीण चोपड़ा के प्रयोग और इंटरनेट पर एक हिंदी भाषी
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मीडिया डॉक्टर प्रवीण चोपड़ा के प्रयोग और इंटरनेट पर एक हिंदी भाषी” पर 11 टिप्पणियाँ

  1. आप हि्दी भाषी क्षेत्र के पंसारियों की दुकानों पर कॉमन साल्ट मांगेंगे तो 90% मना कर देंगे कि वे नहीं रखते। लेकिन आप नमक कह कर देखिए, सब के पास हाजिर होगा।

  2. इस सोच को बदलना होगा कि अँग्रेज़ी बोलने वाला ज़्यादा अकलमंद है. हमारी सोच है कि अच्छी हिन्दी में लिखें/बोले, आपकी प्रतिश्ठा अपने आप बढ़ जाएगी – आभार.
    http://mallar.wordpress.com

  3. मेहनत करके अच्छी जानकारी जुटाई आपने. साधुवाद!

    हिन्दी को भ्रष्ट करने के पीचे भारतीयों की हीन भावना काम्कर रही है; बाकी तो बहाने हैं। जब आप अपने पिताजी को ‘पिताजी’ न कहकर ‘फ़ादर’ कहते हैं तब जाने-अनजाने आप अपनी हीन भावना का ही प्रकटीकरण कर रहे होते हैं।

  4. बहुत अच्‍छी जानकारी दी है। मेरा ख्‍याल है , चोपडा जी इसे अन्‍यथा न लेकर सकारात्‍मक रूप में ही लेंगे।

  5. आप सही कह रहे हैं, असल में हमें हिन्दी के शब्दों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिये, अपने-आप इसे बढ़ावा मिलेगा, मेरी कोशिश रहती है कि भाषा की शुद्धता बरकरार रखूं…

  6. भाषा अपने ही प्रवाह में ही विकसित होती है हमारे -आप के सोचे ढंग से नही भारत की हरभाषा में कुछ न कुछ शब्द ऐसे अवश्य मिल जाएँगें जो भावार्थ में समान होने के साथ-साथ उच्चारण में भी लगभग मिलते जुलते होंगें , कुछ ना कुछ छूट तो दनी ही पड़ेगी ; काल पवाह हमारे आप के अनुसार नही चलता |

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