गोदी में उठाकर होटल के अंदर, ब्रांडी के घूँट और वो खिलखिलाहट…

28 दिसंबर जब भी आता है मुझे दो बातें याद आ ही जाती हैं।

पहली बात यह कि इस दिन मेरी छोटी बहन का जनमदिन होता है और दूसरी बात 16 वर्ष पुराना वह मौक़ा जब हम सपत्नीक मोटरसाईकिल से ऊत्तर भारत की यात्रा करते शिमला से मसूरी पहुंचे थे।

भूमिका कुछ ऎसी है कि 1995 का मानसून बीतते बीतते मेरे मन में दबी एक इच्छा जोर शोर से सर उठाने लगी कि दिल्ली-पंजाब के सभी रिश्तेदारों से मिला जाए। फिर चाहे वह मेरी पीढ़ी के हों या हों पिछली पीढ़ी के।

फिर क्या था चुपके चुपके कार्यक्रम बनाना शुरू कर दिया। अकेले ही जाने का मन था क्योंकि मेरे साथ कोई भी जाता तो मुझे उसका भी ख्याल करना पड़ता।

अपनी बात अलग है समय, ठहराव, चल पड़ने की बात ठान ली तो ठान ली।

सारे रिश्तेदारों की सूची बनी। ऐसे भी कई थे जिनके बारे में सुना ज़रूर था लेकिन कभी मिला नहीं। फिर जब सारा हिसाब किताब बिठाया गया तो होश फाख्ता हो गए। कितना भी कसा हुआ कार्यक्रम बने एक डेढ़ महीने से भी अधिक की  छुट्टी लेनी पड़ती और रेल, बस, टैम्पो, रिक्शा, पैदल यात्रा अलग। अब क्या करूँ?

उस समय मेरे पास बजाज-कावासाकी की मोटरसाईकिल KB 100 RTZ थी । सारी यात्रा को उस मोटरसाईकिल पर सवार हो कर पूरी करने का विकल्प बनाया गया तो छुट्टियों की संख्या घट कर 25 दिन हो गई और समय प्रबंधन भी बहुत बढ़िया दिखने लगा।

KB 100

जब सारा प्लान बन गया तो हमने घोषणा की अपने जाने की तारीख की। फिर क्या था चारों ओर से आक्रमण शुरू हो गया। घरवाली ने माँ-पिता जी के सामने पेशी करवाई। यारों दोस्तों ने अपने सर के पास उँगली घुमा घुमा कर आँखों ही आँखों में पूछना शुरू कर दिया कि सब ठीक तो है।

इधर, जब कोई दबाव कामं नहीं आया तो पत्नी जी ने जिद पकड़ ली कि वो भी जाएँगी साथ। हमने भी तरह तरह से डराना शुरू कर दिया कि कैसी कैसी परशानियाँ आ सकती है। तू डाल डाल मैं पात पात की कहावत पर दोनों ही अपने अपने दाँव चल रहे थे। शायद उन्हें लग रहा था कि यह अगर गया तो फिर लौट कर नहीं आने वाला 🙂

एक दिन अपनी आखिरी कोशिश में शानदार भोजन के साथ ढेर सी मनुहार से मुझे मनाने की कोशिश की गई तो मन कुछ पिघला। हमने भी आखिरी कोशिश की, धमकाने की, कि किसी भी रिश्तेदार के जितनी देर मैं रूकना चाहूँगा उतनी देर ही रूकना होगा कोई अतिरिक्त समय नहीं मिलेगा। फिर चाहे वह समय दो घंटे का हो या फिर पांच घंटे का।  बिना ना-नुकर के तुरंत ही हामी भर दी गई। मैंने फिर चेतावनी दी कि अगर मेरे साथ कदम से कदम मिला कर नहीं चल पाई  तो  छोड़ जाऊँगा वहीं। रोते रहना फिर बैठ कर। सिर फिर सहमति में हिला।

अब कार्यक्रम बदला गया। पहले तो भिलाई से पंजाब मोटरसाईकल से जाना-आना था।  लेकिन बदली परिस्थितियों में मोटरसाइकिल को ट्रेन में लाद कर दिल्ली तक और फिर दिल्ली-पंजाब-हरियाणा-हिमाचल घूमने के बाद दिल्ली से वापस लाद कर भिलाई  का निर्णय हुआ।

jonny

जब अकेले जाना था तब कोई समस्या नहीं थी लेकिन हम दोनों जाने वाले, तो घर पर 9 वर्ष के हो चुके दोनों नाजुक जुड़वाँ बच्चे और दो साल के पालतू खूँखार कुत्ते जॉनी की देखभाल के लिए अपनी चचेरी बहनों को मनाया गया। पहले तो बच्चे उदास थे हमारे जाने की खबर से, लेकिन बेरोकटोक मस्ती करने के लिए 20 दिनों तक तीन-तीन बुआ का साथ! उनकी तो जैसे पौ-बारह हो गई।

निश्चित तारीख पर साहब, बीबी और गुलाम ट्रेन पर सवार हो जा पहुंचे दिल्ली और फिर सफर शुरू हुआ चंडीगढ़ की ओर।

कार्यक्रम में फेरबदल करते मैंने कुछ पर्यटक स्थल भी जोड़ लिए थे सूची में।  उनमे से एक था शिमला। जहाँ हम पहुंचे थे 24 दिसंबर को। व्हाईट क्रिसमस मना 25 दिसंबर को।  26 को खबर लगी कि कुफरी में भारी बर्फबारी हो रही तो निकल पड़े मोटरसायकिल ले कर। लेकिन यह क्या? शिमला के बाह्र्री इलाके में पहुंचे तो बर्फ के सफ़ेद पहाड़ देख मोटरसायकिल की गति बढ़ाई और एकाएक सारी दुनिया के तारे घूम गए आँखों में। सड़क पर जमी बर्फ पर मोटरसायकिल एक दिशा में स्कीईंग करती लुढ़कती गई, दूसरी दिशा में पत्नी जी फिसलती गईं और अपने राम तीसरी दिशा में फुटबाल सरीखे फुदकते चले गए।

आसपास की दुकानों से लोग दौड़ते आए और बताया कि वे चिल्लाते रह गए कि दो-पहिया गाड़ी नहीं चलेगी बर्फ से ढकी सडक पर लेकिन सुना ही नहीं था हमने! आगे तो खैर गए नहीं वहीं बर्फ के गोले मार मार कर खेल लिए और एक फोटो खिंचा ली।

shimla

बात 28 दिसंबर की हो रही थी। शिमला से जाना था मसूरी और राह मैंने चुनी थी चंडीगढ़ की बजाए नाहन हो कर जाने की। सुबह आठ बजे होटल छोड़ा और चल दिए दिसंबर के आखिरी हफ्ते की ठण्ड में मसूरी की ओर।

ठंडी हवायों में ऊँचे ऊँचे पहाड़ों के बीच सुनसान घुमावदार राह पर बढ़ते गए। पौंटा साहब के आस-पास मैदानी इलाकों में किन्नू के खेतों से गुजरते हुए, सड़क के किनारे बिकते किन्नू के रस का रसस्वादन करते, देहरादून को पार करते हम जा पहुंचे मसूरी। समय याद नहीं लेकिन अंधेरा बस होने ही वाला था।

shimla mussourie

shimla nahan

मोटरसाईकल मैने ठीक उसी होटल के सामने रोकी जहां 1985 में रूका था। ब्रेक लगा कर बाईक रोकते मैंने कहा “उतरो” और कुछ ही पलों में आवाज़ आई -धड़ामssss! गरदन घुमा कर पीछे देखा तो मैडम जी चारों खाने चित्त धरती पर! हड़बड़ा कर मैं उतरा, गाड़ी खड़ी की और हाथ बढ़ाया कि उठो।

लेकिन लेटे लेटे ही उलझन भरी आवाज़ आई “मेरे हाथ कहाँ हैं, मेरे पैर कहाँ हैं?” तब महसूस हुआ कि बर्फीली ठण्डी हवायों के मारे हाथ पैर ही सुन्न हो गए हैं। गोदी में उठाकर होटल के अंदर ले गया। गर्म तेल से हाथ पैर की मालिश की। ब्रांडी मिली काली कॉफी के घूँट लगवाए। तब कहीं जा कर खिलखिलाहट सुनाई दी।

आज भी जब 28 दिसंबर की शाम आती है तो चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है।

गोदी में उठाकर होटल के अंदर, ब्रांडी के घूँट और वो खिलखिलाहट…
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गोदी में उठाकर होटल के अंदर, ब्रांडी के घूँट और वो खिलखिलाहट…” पर 56 टिप्पणियाँ

  1. पढ़ते हुए ही दिल दहल गया । आपने तो बहुत बडा रिस्क लिया पर ईश्वर आपके साथ है तो डर कैसा! कहते हैं ना- हिम्मते मर्दां तो मददे खुदा:)
    टिप्पणीकर्ता चंद्र मौलेश्वर ने हाल ही में लिखा है: एक समीक्षाMy Profile

  2. कुलमिलाकर लब्बोलुआब यह है कि आप पैदायशी ज़िद्दी और साहसी व्यक्ति हैं । आपका यह साहस लोगों को ऐसे एडवेंचर करने के लिये प्रेरित करता है । बेहतर होता आप इस पोस्ट के साथ एक सूचना लगा देते कि ऐसे दुस्साहस भरे कार्य या तो न करें या अपनी जोखिम पर अपने घर पर ही करें । नये साल की शुभकामनायें ।

    • :Heart:

      जब ‘प्यार बाँटते चलो’ कहा जाता है
      तो
      ‘एडवेंचर साहस बाँटते…’ क्यों नहीं हो सकता भई!

      पाश्चात्य नववर्ष की आपको भी शुभकामनाएँ

    • :Smile:

      पंक्चर वाली बात से याद आया कि अपने जीवन काल में इस मोटरसायकल का टायर एक बार ही पंक्चर हुआ था और वह भी इसी 28 दिसंबर वाले दिन इसी राह में
      गाड़ी सच में मस्त थी

  3. अथातों घुमक्कड़ जिज्ञासा….
    ये मोटरसाइकिल कभी मेरी फेवरिट हुआ करती थी…. मोटरसाइकिल पर घुमक्कड़ी का अपना अलग मज़ा है लेकिन ठंडी हवाओं मे घूमना कोई हंसी खेल नहीं है, बाकी एक बात समझ नहीं आई… साहब बीवी और गुलाम मे साहब और गुलाम स्पष्ट नहीं हो रहे 🙂
    टिप्पणीकर्ता पद्म सिंह ने हाल ही में लिखा है: जब अलबेला खत्री स्टेशन से उठाए गए … सांपला ब्लागर मीट 24-12-11 (भाग-1)My Profile

  4. :Amazed: सब समझ में आ गया, हमारा एक सरदार मित्र भी बिल्कुल ऐसा ही है। :Happy-Grin:
    टिप्पणीकर्ता विवेक रस्तोगी ने हाल ही में लिखा है: न्यू ईयर का हंगामा और फ़लाना ढ़िमकाना ब्रांड व्हिस्कीMy Profile

  5. रोमांचक संस्मरण। फोटो किसने खींची है, आप दोनों तो मोटरसाइकिल पर हो?
    टिप्पणीकर्ता ePandit ने हाल ही में लिखा है: ऍण्ड्रॉइड स्मार्टफोन/टैबलेट में अनऑफिशियल संस्करण (कस्टम रोम) इंस्टाल करनाMy Profile

  6. (१)
    होटल के सामने वो हुआ तो साहब जानते थे कि बीबी कैसे खिलखिलाएंगी 🙂

    इस वास्ते हो सकता है साहब ने रास्ते का इंतजाम भी कर रखा हो 🙂

    पर…उस गुलाम पे गर सरे राह यही सूरत गुज़रती तो क्या होता 🙂

    (२)
    अच्छा हुआ जो भाभी ने मुंह में बिना स्कार्फ बांधे हुए एक दो पोज दे दिये,वर्ना हम समझते कि ठण्ड का फायदा उठाना कोई आपसे सीखे 🙂

    मिसाल के तौर पर नाहन ३२ किलोमीटर वाले फोटो से कोई क्या साबित कर सकता है 🙂

    • :Smile:

      (1)
      * …तब तक इतना तो जान चुके थे 🙂
      * …रास्ते का आनंद अलग है, मंज़िल का अलग 🙂
      * …वही होता जो … 🙂

      (2)
      … अब अब इतनी भी ज़हमत क्या दें बंदे को 🙂

  7. मोटर बाइक पर घूमने के बारे में मुझसे बेहतर कौन मानेगा,
    मैं तो बाइक से अलावा किसी और वाहन को प्राथमिकता देता ही नहीं हूँ।
    बाइक सवारी का साफ़ मतलब जिन्दादिली, रोमांच, सब कुछ तसल्ली से देखना होता है
    जबकि रेल कार बस का सीधा मतलब आराम से जुड जाता है,

    क्यों पावला ठीक कहा है ना।
    टिप्पणीकर्ता “जाट देवता” संदीप पवाँर ने हाल ही में लिखा है: "SAMPLA BLOGGER MEET साँपला ब्लॉगर मिलन समापन किस्त "My Profile

  8. वाह सर , जिंदगी के मेले , यूं ही तो नहीं लगा करते । कमाल है सर , आप अपने भीतर एक बहुत ही कमाल का संसार छिपाए बैठे हैं । निकालिए सर सब बाहर निकालिए
    टिप्पणीकर्ता अजय कुमार झा ने हाल ही में लिखा है: सांपला ……एक मुलाकात , हरियाणा के गांव की ,अंतर्जाल के बाशिंदों सेMy Profile

  9. हद हो गई !
    जब हसीन साथी साथ देने को तैयार हो तो कोई अकेले जाने की सोच भी कैसे सकता है ! 🙂
    अच्छा हुआ , इसी बहाने आपको भी थोड़ी सेवा करने का अवसर मिल गया ।

  10. रोचक यात्रा वृतांत व साथ में कहने का अंदाज़ भी भी बिलकुल एक यात्रा की तरह | ऐसे लगा कि सचमुच में ही यात्रा का विडियो देख रहे हों |
    टिप्पणीकर्ता vaneetnagpal ने हाल ही में लिखा है: new year greeting for youMy Profile

  11. अब तो वे ठंडी हवाएँ कल्पना में भी ठिठुरा जाती हैं.
    क्या गजब की यात्रा रही होगी. पढ़कर ही मजा आ गया.
    घुघूतीबासूती
    टिप्पणीकर्ता ghughutibasuti ने हाल ही में लिखा है: हमारे बच्चों का उत्तरदायित्व सब पर है, बस हम पर नहीं।My Profile

  12. आज आपकी पोस्ट की चर्चा की गई है अवश्य पढ़ियेगा… आज की ताज़ा रंगों से सजीनई पुरानी हलचल बूढा मरता है तो मरे हमे क्या?
    टिप्पणीकर्ता सुनीता शानू ने हाल ही में लिखा है: बच के रहना रे बाबा बच के रहना तुझ पे नज़र है…My Profile

  13. मान गए पाबला जी आपको, ऐसे ठंडे मौसम में बाइक पर यात्रा, सच में ऐसी घुमक्कडी, वाह क्या कहने। कल्पना कर सकता हूं कि तमाम खतरों के बावजूद कितना मजा आया होगा।

    • :I-Wish:
      मेरा मन करता है एक बार फिर उन राहों पर जाऊँ

  14. Hhhaa
    जिद और साहस दोनों बड़े कमाल की चीज है ।
    लकिन कुछ रिश्तेदारो की खैर खबर ली या नही ।

  15. मुझ से यह पोस्ट कैसे छूटी, शायद कोई दुर्भाग्य रहा होगा। सौभाग्य से अब देखने को मिल गई।
    टिप्पणीकर्ता दिनेशराय द्विवेदी ने हाल ही में लिखा है: मृतक आश्रित को उस की योग्यता के अनुरूप नियुक्ति दी जानी चाहिएMy Profile

  16. बहुत अच्छा और रोमांचक लेख लिखा हैं आपने.
    आपकी हिम्मत, बहादुरी, और जिंदादिली को सलाम.
    लेकिन पाबला जी, आपने जो नक्शा डाला हैं, उसमे देहरादून तो बीच में आया ही नहीं.
    जबकि आपने मसूरी वाया देहरादून जाना लिखा हैं.
    धन्यवाद.
    चन्द्र कुमार सोनी

    • :Smile:
      ये गूगल की करामात है
      अपनी मर्जी से उसने रास्ता ही बदल दिया

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