1984 – ए रोड स्टोरी

इस बार मई माह में गाँव जाना हुया एकदम अकेले. मार्च में चचेरी बहन के विवाह पर देश-विदेश से इकट्ठा हुए कुनबे वालों की गहमागहमी के बाद, मेरे सबसे छोटे चाचा का घर सुनसान पड़ा था. इधर, हमारे घर का ताला ही तब खुलता है जब भिलाई से कोई पारिवारिक सदस्य वहाँ पहुंचता है. अकेले ही था सो अरसे बाद लुधियाना रेल स्टेशन पर उतर सायकिल रिक्शा, बस, ऑटो-रिक्शा की सवारी करते गाँव पहुंचा तो कई पुरानी बातें याद हो आईं. उन्हीं में से एक है 1984 की यह सड़क कथा -रोड स्टोरी. अरे! जब मुंबईया फ़िल्म बन सकती है ‘1942- ए लव स्टोरी’ तो फिर ‘1984 – ए रोड स्टोरी’ क्यों नहीं!?

जिस चचेरी बहन की शादी हुई उसके माता-पिता अब नहीं हैं. अप्रैल, 1984 में जब उसके जन्मदाता, मेरे चाचा का विवाह होना तय हुया तो आवश्यक कार्यों के लिए हम भिलाई से अपना वाहन (ट्रेन पर बुक करवा कर) ले गए. वह वाहन था बजाज सुपर स्कूटर.

उस समय बजाज के स्कूटर प्रतिष्ठा के प्रतीक माने जाते थे. विवाह के लिए जर्मनी से लौटे चाचा ने नई नई शादी का हवाला दे कुछ समय के लिए स्कूटर अपने पास ही रखवा लिया और हम वापस हो गए भिलाई.

दो माह बाद पिता जी का आदेश हुया कि तुम्हारे चाचा तो वापस जर्मनी चले जायेंगे, पंजाब से स्कूटर वापस ले कर आओ वरना स्कूटर हमेशा के लिए वहीं रह जाएगा. मेरे मन में भी खलबली मची हुई थी, हाथ खुजला रहे थे स्कूटर का हैडल थामने के लिए. सो, मई माह में भाग खड़े हुए ट्रेन पर सवार हो कर.

मेरे साथ एक मित्र भी हो लिए थे गाँव देखने के लिए. लेकिन ग्वालियर के आस-पास उनकी तबियत बिगड़ गई और हमें दिल्ली में उतरना पड़ा. बुया जी के घर दो दिन बिताये गए. मित्र की तबीयत में पूरी तरह सुधार नहीं आ पाया था. उन्हें वहीं छोड़ मैं पहुँच गया गाँव.

BS Pabla

चाचा को पिता जी का आदेश सुनाया गया तो उनका चेहरा मुरझा सा गया. कुछ आनाकानी के बाद आखिर हामी भरनी ही पड़ी उन्हें. शाम को, पेट्रोल से लबालब भरे स्कूटर को गाँव से लुधियाना स्टेशन तक ले कर पहुँचा इस योजना के साथ कि भिलाई के लिए उपलब्ध इकलौती ट्रेन द्वारा स्कूटर बुक करवा कर दिल्ली चला जाऊंगा और वहाँ से मित्र को ले कर जब तक वापस घर पहुँचूँगा तब तक स्कूटर भी जा चुका होगा जिसे स्टेशन से छुडा लेंगे.

लेकिन लुधियाना स्टेशन पर बुकिंग क्लर्क ने साफ़ मना कर दिया कि फिलहाल तो जगह खाली नहीं है पार्सल वैन में. एक दो दिन बाद ले आना. मैंने जब कहा कि दो दिन बाद का ही बुक कर लो तो फिर सर हिला दिया कि दो दिन तक कहाँ रखूंगा स्कूटर, जगह नहीं है. रात के 7 बज गए थे. मैंने तुरंत निर्णय किया कि अब तो स्कूटर को रात ही रात में सड़क मार्ग से ले कर दिल्ली तक जाना बेहतर है, ट्रैफिक भी कम मिलेगा

उस समय,1984 के मध्य तक आतंकवाद जोर पकड़ चुका था. चारों तरफ दहशत का माहौल था. स्टेशन के ठीक बाहर अर्ध सैनिक बलों का शिविर तना हुया था. किसी अज्ञात भावना के चलते मैंने उनसे पूछ लिया कि अभी सड़क मार्ग द्वारा दिल्ली जाया जा सकता है क्या? उस फौजी ने साफ़ इनकार कर दिया रात के सफ़र के लिए.

मैंने सुबह सुबह जाने की बात की तो उसने सीआईएसऍफ़ द्वारा हस्ताक्षरित मेरा परिचय पत्र देख एक कागज़ के टुकड़े पर कुछ लिख कर मोहर लगाई और भरोसा दिलाया कि पंजाब की सीमा में पुलिस, फौज कोई भी रोके उसे यह रूक्का दिखा देना.

अब दिक्कत यह कि सुबह तक का समय कैसे काटा जाए? तुरंत एक विचार उभरा. स्टेशन की पार्किंग में ही स्कूटर खडा किया, बाहर एक होटल में भोजन कर पास ही के एक थियेटर में जा घुसा. फ़िल्म थी सुनील दत्त, राजकुमार वाली हमराज. अपन ने कमीज के ऊपरी बटन खोले, सामने कुर्सी के ऊपर पाँव पसारे और फ़िल्म शुरू होते होते सीधे नींद के आगोश में. शोरगुल से आँख खुली तो फ़िल्म ख़त्म होने के बाद हॉल से निकलते लोग दिखे.

लेकिन अभी तक तो आधी रात ही हुई थी. एक बार फिर नींद ली गई स्टेशन के प्लेटफार्म पर अखबार बिछा कर. अलसुबह जब स्कूटर को किक मार कर स्टार्ट किया तो 4 बज रहे थे.

शहर की सुनसान सड़कों पर स्कूटर दौड़ाता जब मैं लुधियाना के बाहरी इलाके में ढोलेवाल चौक पहुंचा तो सूरज की रौशनी सरीखी सर्च लाईट ने मुझे अपनी जड़ में ले लिया. किसी आशंका के चलते बेहद कम रफ्तार कर ली थी मैंने. लेकिन मेगाफोन पर एक कड़कती आवाज़ से जैसे मैं काठ के पुतले में ही बदल गया. घिग्घी बंध गई जब बंदूक ताने हुए एक जवान को अपनी और बढ़ते हुए देखा.

इधर वह जवान मुझे अपने निशाने पर लिए हुए था उधर तीन चार जवानों ने मेरी तलाशी लेनी शुरू कर दी. जेब से सरकारी कंपनी का परिचय पत्र और स्टेशन के कैंप वालों का संदेश बरामद हुया तो सवाल ज़वाब शुरू हो गए. झल्लाते हुए एक जवान ने कहा सुबह होने तक का इंतज़ार नहीं कर सकते थे क्या? मैंने डरते डरते कहा देखो रोशनी होनी शुरू तो हो गई और कितनी सुबह तक रूकता!

आगे बढ़ने की इजाज़त मिली तो मैं भाग खड़े हुया. अब ज़्यादा तो याद नहीं लेकिन अंबाला के शायद 7-8 किलोमीटर पहले स्कूटर एकाएक बंद हो गया. किनारे कर जांच की तो पता चला पेट्रोल की एक बूँद नहीं. अरे! ‘रिज़र्व’ लगना चाहिए था ना, फिर ये क्या हुया. ध्यान से देखा तो समझ आया कि टंकी के अंदर ‘रिज़र्व’ के लिए लगा उभरा हुया पाईप भीतर ही टपक गया है. इसलिए बिना रिज़र्व लगे फुल टंकी पेट्रोल ख़त्म.

राहगीरों ने बताया, पेट्रोल पम्प 4 किलोमीटर आगे है. स्टाईल मारते हुए, पास ही से गुजरते ट्रेक्टर-ट्राली को एक हाथ से पकड़ दूसरे हाथ से हैंडल थामे स्कूटर को लुढ़काये ले जा रहा कि एकाएक धड़ाम. चारो खाने चित्त. जिस हाथ से हैंडल थाम रखा था, उसकी जुम्बिश से गेयर लगा और लुढ़कता स्कूटर अड़ियल घोड़े जैसे थम गया और सवार को पटक मारा.

कुहनी छिल गई, खून रिसने लगा. सामने ही एक किलोमीटर दूर पेट्रोल पम्प दिख रहा था. स्कूटर थामे वहाँ पहुंचा तो ना ना करते भी पेट्रोल पंप कर्मचारी ने घाव साफ़ कर दवा लगा पट्टियां बाँध दी. मैंने टैंक एक बार फिर भरवाया और चल दिया दिल्ली की राह पर.

summer drinks

मई माह का सूरज अपनी पूरी क्षमता से चमकने लगा था. तेज गर्म हवा चमड़ी झुलसाने लगी थी. राह में जहाँ भी मुझे मौक़ा लगता कैम्पा कोला, फैंटा, लस्सी, शिकंजवी, लेमन सोडा, रूह अफ़ज़ा, गन्ना रस, जलजीरा, संतरे का जूस जो कुछ भी मिला गटकते जाता और पानी से बाहें, चेहरा अच्छे से गीला कर लेता.

दिल्ली के शाहदरा इलाके में जब बुया के घर के सामने मैंने स्कूटर रोका तो दोपहर का एक बज रहा था. स्कूटर समेत आया देख कहीं डांट ना पड़ जाए इसलिए स्कूटर को किनारे ही खडा कर कॉल बेल का बटन दबाया तो बुया बाहर निकली और मुझे देखते ही चिल्लाई “ये क्या हुया?”

मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मासूमियत से पूछा कि क्या हुया? जब उसने हाथों से पकड़ कर मेरी दोनों बाँहें ऊपर उठाई तो मेरा ध्यान गया कि तवे के रंग जैसी काली पड़ चुकी हैं भुजाएं. अंदर ले जा कर बुया ने आईना सामने किया तो चेहरा भी ऐसा जैसे किसी ने काजल पोत दिया हो.

जहाँ शरीर कपड़ों से ढका था वहाँ चमड़ी का रंग सामान्य लेकिन खुली चमड़ी वाला हिस्सा जला भुना काला. करीब दो-तीन माह तक मेरा शरीर जेबरा की पट्टियों जैसा आभास देता रहा.

इस बार गाँव जाना हुया तो यह रोड स्टोरी याद कर एक बार फिर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट तैर आई. पता नहीं आपका क्या हाल है!

1984 – ए रोड स्टोरी
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1984 – ए रोड स्टोरी” पर 40 टिप्पणियाँ

  1. सर जी,प्रणाम
    मजा आ गया पढ़कर,और खास बात यह की स्कूटर उस समय का माध्यम वर्गीय परिवारों में अच्छी हैसियत का प्रतीक था {मैंने सुना हैं }
    आपकी छवि बहुत अच्छी हैं ,और अतीत की यह कहानी बड़ी लुभावनी हैं |
    टिप्पणीकर्ता अजय ने हाल ही में लिखा है: जिन्दंगी भाग-१My Profile

    • :Smile:
      सही है शिवम् जी
      यह तो बहुत पहले की स्टोरी है
      अब तो आप सबको मालूम है गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?
      जिसे नहीं मालूम वह देख लें यह लिंक
      https://www.bspabla.com/?p=1935

    • :THANK-YOU:
      आपके ‘प्राजी’ संबोधन ने मुस्कराहट ला दी

  2. @ जहाँ भी मुझे मौक़ा लगता कैम्पा कोला, फैंटा, लस्सी, शिकंजवी, लेमन सोडा, रूह अफ़ज़ा, गन्ना रस, जलजीरा, संतरे का जूस जो कुछ भी मिला गटकते जाता और पानी से बाहें, चेहरा अच्छे से गीला कर लेता.

    लिस्ट अधूरी लग रही है पाबला जी 🙂

    • :Ssshh:
      बेशक अधूरी है
      लेकिन सड़क किनारे यही मिलता था

      :Cheers:
      और एक बात नोट कीजिए मैं स्कूटर चला रहा था, ट्रक नहीं

    • :Amazed:
      सही है
      आज की पीढ़ी सहज विश्वास ही नहीं कर पाती इस बात पर

  3. स्कूटर अपने चाचा से छुड़ाकर भागा दबंग !
    भुजायें उसकी हो गईं जले तवे सी भुजंग !
    बुया भली सो दरवाजे पे ही पहचाना मलंग !
    जां बची यूं हुये पाबला-ओ-बजाज इक रंग !

    (टिप्पणी कार गण कृपया इक रंग के लिए सबसे पहली फोटो देखें )

  4. रोचक संस्करण। जेबरा की पट्टियों वाली हालत हमारी भी हुयी थी जब दो साल पहले जून की गर्मी में पहाड़ों में दो दिन यात्रा की।
    टिप्पणीकर्ता ePandit ने हाल ही में लिखा है: नैक्सस ७ टैबलेट भारत में आधिकारिक रूप से जारी, प्रीबुकिंग शुरु @₹१६,०००My Profile

  5. :Smile:
    गनीमत है ये ज़्यादा समय तक नहीं रहतीं

  6. स्लिम फिट में मस्त लग रहे हो जी।
    रोड ट्रिप बड़ा रोमांचक और एडवेंचरस रहा।

    • :Pleasure:
      हम भी अपनी फोटो देख मुस्कुराते हैं

  7. पाबला जी हमें आपका किस्सा पढ्कर १९८४ में जम्मू से दिल्ली बस का रात का सफ़र याद आगया, वाकई बहुत ही दहशत भरा समय था आपकी रोड स्टोरी वाला.

    • :Heart:
      किस्सा लिख कर बताईये

      सच है, बड़े ही दहशत के दिन थे वे

  8. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन १५ मई, अमर शहीद सुखदेव और मैं – ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !
    टिप्पणीकर्ता Shivam Misra ने हाल ही में लिखा है: अमर शहीद सुखदेव जी की १०६ वीं जयंतीMy Profile

  9. रात में निकलने देते तो पेय पदार्थों की सूचि इतनी लंबी ना होकर सूक्ष्म हो जाती 🙂

    प्रणाम

  10. Us din ka samay aapke pratikool tha, pahle Railway station par parsel ka book na hona, fir Petrol ka chuk jana, bad me kuhani ka chiljana, body ka garmi me burn hona aadi yahi batata hai,
    Aapko jyotish vichar karke hi ghar se nikalna chahiye tha , ha ha ha

  11. 1984 ए रोड स्टोरी बहुत ही रोचक संस्मरण है। भले ही उस समय बहुत परेशानी हुई होगी लेकिन उसे याद कर खुद को और सबको सुखद लगता है। तब और अब की बात में यही तो फर्क होता है

  12. aapne ye rochak sansmaran suna kar to dil bag-bag kar diya 1984 ke woh din yad dila diye jab main bhilwara(raj) me rahkar 10th ki study kar raha Tha.

  13. 300 km से ज़्यादा का सफ़र अकेले स्कूटर पर करने का निर्णय ही बहुत बड़ी बात है।

    • :Heart:
      ये तो 35 साल पहले का वाकया

      इसके बाद भी कई पंगे लिए

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