हावड़ा-मुम्बई 8030 एक्सप्रेस के अनुभव

कल मैं जब तीसरा खंभा वाले द्विवेदी जी को विदा करने के लिए, दुर्ग रेल्वे स्टेशन पर मौज़ूद था तो आरम्भ वाले तिवारी जी ने आग्रह किया कि कतिपय व्यस्ततायों के चलते वे द्विवेदी जी की यात्रा पर संस्मरण नहीं लिख पायेंगे, मैं ही यह कार्य सम्पन्न करूँ। मैनें उनसे कहा कि व्यस्ततायों के कारण ही तो मैं भी अपनी मुंबई यात्रा पर कुछ लिख नहीं पाया हूँ।

अमीर धरती … वाले अनिल पुसदकर जी की एक पोस्ट आ ही चुकी है, द्विवेदी जी की रायपुर यात्रा पर्। आज जब लिखने बैठा हूँ तो लगा कि तारतम्य गड़बड़ा जायेगा, यदि मुँबई यात्रा के पहले, द्विवेदी जी की यात्रा पर कुछ लिखा गया। इसलिए पहले मुँबई यात्रा।

लगभग दो महीने पहले ही मुझे, मेरे ममेरे भाई ने मोबाइल पर सम्पर्क किया और आग्रह किया कि मैं उनके सुपुत्र की लोहड़ी के अवसर पर रखे गये श्री गुरूग्रंथ साहिब के अखंड पाठ के अवसर पर, 9 जनवरी से 11 जनवरी के बीच सपरिवार मौज़ूद रहूँ। उनके इस प्रेम भरे आग्रह को तुरंत स्वीकारा गया।

बाद में जब परिवार में चर्चा हुयी तो यह तय हुया कि व्यवसायिक व्यस्तता के कारण सुपुत्र महाशय, अपने दादा-दादी के साथ ट्रेन से जायेंगे और बाकी परिवार मारूति वैन से, रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न धार्मिक-ऐतिहासिक-दर्शनीय स्थलों का आनंद लेते हुये आना-जाना करेगा।

कार्यक्रम बन गया, रिजर्वेशन हो गया, वैन की ठोका-पीटी हो गयी। दिसंबर के आखिरी सप्ताह में बिटिया ने, उतरे हुए चेहरे के साथ सूचना दी कि उसका MBA का दूसरा सेमेस्टर शुरू हो रहा है और वह जा पाने में असमर्थ है!

आनन-फानन में निर्णय लिया गया कि 11 को रविवार और 13-14 को लोहड़ी-मकर संक्रांति की छु्ट्टियाँ हैं, 9 को रवाना हुया जाये, 14 को वापस  पहुँचा जाये। आरक्षण की स्थिति को देखते हुये सुपुत्र ने फरमान जारी किया कि आप सब जाईए, मैं Daisy के साथ रहूँगा।

इंडियन रेल्वे कैटरिंग एवं टूरिज़्म कार्पोरेशन लिमिटेड की वेबसाईट से रेल्वे आरक्षण की सुविधा का लाभ उठा, ई-टिकट प्राप्त किया गया। सुबह 7:45 पर आने वाली हावड़ा-मुंबई एक्सप्रेस में जब अपनी जगह संभाली और पूछ्ताछ की, तो पहला झटका लगा -रसोई यान नहीं है, No pantry car!

हम अपने स्वभाव के चलते, रेल यात्रा में खाने पीने की भारतीय परंपरा को ठुकराते हुए, ऐलान कर चुके थे कि घर से कोई कुछ बना कर नहीं ले जायेगा, कष्ट नहीं उठाना है, घूमने फिरने जा रहे हैं, रेल में ही अलग स्वाद लिया जायेगा। माता जी की निगाहें, मानों कह रहीं थी – आ गया स्वाद! कंडक्टर ने आश्वासन दिया कि गोंदिया में भोजन की व्यवस्था कर दी जायेगी, जल्दी है तो राजनाँदगाँव या डोंगरगढ़ से कुछ खाद्य सामग्री लेकर काम चलाईये!

गोंदिया में भोजन मिला। गरम था, लेकिन चम्मच गायब, पानी के गिलास गायब, अचार, नमक जैसी वस्तुएं भी नहीं दिखीं। पिता जी की निगाहों से बचते हुए, जब भुगतान करने लगा तो शिकायत करने पर जवाब मिला -गनीमत मानिए, खाना मिल गया।

कॉरीडोर में नज़र पड़ी, मूल्य तालिका पर्। बड़ी होशियारी से मूल्यों को ऐसा खुरचा गया था कि लगे, किसी ने अन्जाने में किया है। यहाँ तक कि सम्पर्क नम्बर भी नहीं छोड़े गये थे। थोड़ी देर बाद ही पोशाकधारियों का समूह आ पहुँचा। किसी के हाथ में कोलिन, किसी के हाथ में नैपकिन, किसी के हार्थों में आधुनिक शैली का झाड़ू। सब अपने अपने हुनर दिखाने में जुट गये।

देखकर ही लग रहा था कि काम, मात्र दिखाने के लिए ही किया जा रहा है। कुछ और समय पश्चात टाईधारी युवक आ पहुँचा, हाथ में यात्रियों को दी जाने वाली सुविधा पर किए जा रहे सर्वेक्षण फॉर्म का पुलिंदा लिए। जब मुझे वह फॉर्म दिया गया तो मैंने उसे बिटिया की ओर बढ़ा दिया।

युवक के बार-बार निर्देश आने शुरू हो गये -मैडम 1, 2 पर निशान लगाईयेगा। बिटिया के बर्दाश्त के बाहर हो गया जब मामला, तो उसने कहा कि आप खुद ही फॉर्म भर कर ले जाईये, मुझे क्यों तकलीफ दे रहें हैं? तब वह बेचारा सकपकाया।

जब मैने युवक से पूछा कि फर्श साफ हो गया तो बड़े फख्र से बोला -यस सर। तब मैंने उसे ले जाकर कॉरीडोर में फैले कचरे के दर्शन कराये। इसके आगे की कल्पना आप स्वयं कीजिए।

दूसरे दिन सुबह 5 बजे ट्रेन, लोकमान्य तिलक टर्मिनस पहुँची। खारघर के लिए टैक्सी ली गयी। ड्राईवर भी पंजाबीभाषी निकला। सुना तो था कि मारूति की कारें चलना शुरू हो गयीं हैं टैक्सी के रूप में, लेकिन तात्कालिक तौर पर मुझे वहाँ, वही प्रीमियर कारें ही दिखीं। ड्राईवर की चुस्ती-फुर्ती और सेवा-भाव की माताजी ने बाद में तारीफ भी की। घर की भौगोलिक स्थिति विकिमैपिया पर देख चुका था, लेकिन अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया।

इस तरह हमारा, मुंबई में पहला दिन शुरू हुया। रेडियोनामा वाले युनूस जी, कुछ हम कहें की अनिता जी से मुलाकात सहित आगे की बातें अगली पोस्ट में।

हावड़ा-मुम्बई 8030 एक्सप्रेस के अनुभव
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हावड़ा-मुम्बई 8030 एक्सप्रेस के अनुभव” पर 10 टिप्पणियाँ

  1. तीसरे खंभे के द्विवेदी जी के यात्रा संस्मरण और आरंभ के संजीव तिवारी और पुसादकर से हुई मुलाकात की बढ़िया जानकारी देने के लिए धन्यवाद. विधिक ब्लागिंग में दादा द्विवेदी जी का कोई सानी नही है . वे हरसम्भव न्यायालय और कानून के बारे में ब्लागजगत के पाठको के लिए अच्छी जानकारी प्रस्तुत करते है और ब्लॉग जगत के जाने माने हस्ताक्षर है ……
    महेन्द्र मिश्र जबलपुर.

  2. परमजीत भाई ठीक बोल रहे हैं. हमें भी यही लग रहा है की यात्रा में साथ हैं. बहुत सुंदर चित्रण. आगे टैक्सी के सफर की प्रतीक्षा. आभार..

  3. चलो जी आप की यात्रा तो शुभ रही, सुना तो था कि भारतीय रेलवे ने बहुत तरक्की कर ली, लेकिन आप की यात्रा क पढ कर तो लगा यह तीस साल पहले से भी खराब हो गई है.
    धन्यवाद

  4. जानकर हैरत हुई कि मुम्‍बई-हावडा जैसी लम्‍बी दूरी की रेल में रसोईयान नहीं है।
    यात्रा वर्णन अच्‍छा लिखा जी आपने।

  5. पाबला जी, अभी नौ बजे घर पहुँचा हूं। सत्ताईस घंटे के सफर ने थकाया तो सही लेकिन आते ही आप की पोस्ट देखी तो आनंद आ गया। विवरण जारी रखियेगा। आप ने यात्रा विवरण बहुत अच्छा लिखा है। साथ ही व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करते जा रहे हैं।

  6. पाब्‍ला जी रेलवे के भरोसे रहना अब ठीक नहीं है ।
    आपके और हमारे कुछ अनुभव मिलते-जुलते हैं ।
    इसलिए घर से ही व्‍यवस्‍था करके चलना चाहिए ।

  7. लो हम तो कहने वाले थे ज्ञान जी को खबर कीजिए उनकी अच्छी खबर लेगें वो तो रेलवे के ही वफ़ादार निकले। अब तो लालू को ही खबर करनी होगी कुछ कुल्लहड़ इधर भी भिजवाओ…:) बहुत बड़िया वर्णन्।

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